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आर्थिक रूप से कमजाेर अगड़ी जाति के लोगों भी मिले आरक्षण: मद्रास हाईकोर्ट


मद्रास हाई कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को यह सुझाव दिया कि आर्थिक रूप से कमजाेर अगड़ी जाति के लोगों को भी शिक्षा और रोजगार में आरक्षण दिए जाने की जरूरत है। हाई कोर्ट ने सरकार को इस संभावना को तलाशने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने 14 छात्रों की एक याचिका पर यह निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि गरीब, गरीब होता है। फिर चाहे वह अगड़ी जाति से हो या पिछड़ी जाति से। 

कोर्ट ने कहा कि फॉरवर्ड कम्यूनिटीज के आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के लिए आरक्षण की बात करने को इस नजर से नहीं देखा जाना चाहिए कि यह आरक्षण का लाभ उठा रहे समुदायों की खिलाफत है। जज ने कहा,'कोर्ट इस बात से अवेयर है कि सभी समुदायों में गरीब लोग हैं और शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक नजरिए से उन्हें विकसित करने के लिए उनका प्रोत्साहन जरूरी है।' 

जस्टिस किरुबाकरन ने आगे कहा कि,'गरीब, गरीब होता है। फिर चाहे वह अगड़ी जाति से हो या फिर पिछड़ी जाति से। ऐसे गरीबों की मदद की सिर्फ आर्थिक रूप से ही मदद नहीं करनी चाहिए। इनको शिक्षा और रोजगार में आरक्षण दिया जाना चाहिए।' 

छात्रों ने याचिका में यह निर्देश देने की मांग की थी कि सरकारी मेडिकल कॉलेजों में ओसी यानी ओपन कैटेगरी के लिए रखी गईं एमबीबीएस सीटें बीसी और एमबीसी कैटेगरी को ट्रांसफर करना अवैध, मनमानी और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करना है। छात्रों ने इन सीटों पर कोर्ट से डायरेक्ट्रेट आॅफ मेडिकल एजुकेशन को रिजर्वेशन पॉलिसी के हिसाब से ओपन कैटेगरी के लिए अलॉट सीटों पर दोबारा काउंसलिंग कराने का निर्देश देने की मांग भी की थी। 

जज ने सरकार के जवाबी शपथपत्र पर कहा कि,'22 सरकारी कॉलेजेज में 2,651 एमबीबीएस सीटें थीं। इनमें 31 पर्सेंट ओपन कैटेगरी, 26 पर्सेंट बीसी, 4 पर्सेंट बीसी(मुस्लिम), 20 पर्सेंट एमबीसी, 18 पर्सेंट एससी और 1 पर्सेंट सीटें एसटी के लिए आरक्षित हैं। ओपन कैटेगरी की कुल 822 सीटों में सामान्य वर्ग के अतिरिक्त आरक्षित वर्ग के विद्यार्थी भी मेरिट लिस्ट के हिसाब से दावेदार होते हैं। ऐसे में सामान्य वर्ग के छात्रों को मिलने वाली संख्या 7.31 पर्सेंट घटकर 194 सीटों तक ही रह जाती है।' 

इन डीटेल्स से यह स्पष्ट हो जाता है कि जातियों का वर्गीकरण बीसी, एमबीसी, एससी और एसटी के तौर पर हुआ है। केवल कुछ वर्ग ही एफसी यानी फॉरवर्ड कास्ट के तौर पर दर्शाए गए हैं। अब जबकि अधिकांश जातियों को बीसी या एमबीसी में वर्गीकृत कर दिया जाएगा तो सामाजिक और आर्थिक स्तर के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए दिए जाने वाले आरक्षण का कोई मकसद नहीं रह जाता।

#Moody's ने भारत सरकार की विदेशी मुद्रा रेटिंग को 13 साल बाद बढाकर B2 किया


मूडी की निवेशक सेवा (मूडीज) ने भारत सरकार की स्थानीय और विदेशी मुद्रा जारीकर्ता रेटिंग को उन्नत करते हुए बा3 से बा2 किया है और रेटिंग के आउटलुक को बदलते हुए सकारात्मक से स्थिर की श्रेणी में कर दिया है। भारत की क्रेडिट रेटिंग में 13 साल बाद यह सुधार हुआ है। भारत की स्वायत्त क्रेडिट रेटिंग में अंतिम सुधार जनवरी 2004 में बा3 (बा1 से) किया गया था।

भारत सरकार ने इस सुधार का स्वागत किया है और साथ ही विश्वास जताया है कि मूडीज के इस कदम से भारत सरकार द्वारा किए गए प्रमुख आर्थिक और संस्थागत सुधारों को मान्यता मिली है।इन सुधारों के अंतर्गत वस्‍तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू करना; एक सही मौद्रिक नीति का ढांचा तैयार करना; सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के लिए उपाय और अर्थव्यवस्था में औपचारिकता और डिजिटलीकरण (जेएएम एजेंडा) लाने के लिए किए गए कई उपाय- विमुद्रीकरण, “आधार” प्रणाली पर आधारित बायोमेट्रिक खाता तथा लाभ का सीधा प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) के जरिए संबंधित व्यक्ति के खाते में हस्तांतरण।

मूडीज ने स्थिरता के लिए सरकार की प्रतिबद्धता को भी मान्यता दी है जिसमें मुद्रास्फीति में कमी, घाटे में गिरावट और विवेकपूर्ण बाह्य संतुलन तथा सरकार के राजकोषीय समेकन कार्यक्रम शामिल हैं, जिसके परिणामस्वरूप राजकोषीय घाटा वर्ष 2013-14 में सकल घरेलू उत्पाद का 4.5 प्रतिशत से कम होकर वर्ष 2016-17 में 3.5 प्रतिशत और सामान्य सरकार ऋण पर भी गंभीर प्रभाव हुए हैं। सरकार मध्यावधि में राजकोषीय समेकन जारी रखने का इरादा रखती है।

प्रधानमंत्री द्वारा 15वें आसियान-भारत शिखर सम्मेलन में उद्धघाटन वक्तव्य


Your Excellency President दुतेर्ते, 

Excellencies, 

Mr. President, 

मुझे ASEAN (आसियान) की 50वीं वर्षगांठ के अवसर पर पहली बार मनीला आकर हार्दिक प्रसन्नता हो रही है। इसके साथ ही हम ASEAN-India Dialogue Partnership के 25 वर्ष भी पूरे कर रहे हैं।

इस महत्वपूर्ण वर्ष के दौरान Philippines (फिलीपींस) द्वारा आसियान के कुशल नेतृत्व और शिखर सम्मलेन के शानदार आयोजन के लिए मैं राष्ट्रपति महोदय के प्रति आभार प्रकट करता हूं।

आसियान-भारत की साझेदारी को और अधिक मजबूत बनाने में Country Coordinator के रूप में वियतनाम के योगदान के लिए मैं वियतनाम के माननीय प्रधानमंत्री को भी धन्यवाद देता हूं।

Excellencies, 

आसियान की यह 50 वर्षों की महत्वपूर्ण यात्रा जितनी celebration के योग्य है, उतनी ही विचार करने योग्य भी है।

मुझे पूरा विश्वास है कि इस ऐतिहासिक अवसर पर आसियान देश एक vision, एक पहचान और एक स्वतंत्र समुदाय के रूप में आगे भी मिल कर काम करते रहने का संकल्प लेंगे।

भारत की Act East Policy आसियान को ध्यान में रख कर ही बनाई गई है, और Indo-Pacific region के क्षेत्रीय सुरक्षा परिदृश्य में इस संगठन का महत्व स्पष्ट है।

तीसरे ASEAN-India Plan of Action के अंतर्गत आपसी सहयोग के हमारे विस्तृत agenda की प्रगति अच्छी रही है, जिसमें politico-security, economic तथा cultural partnership के तीन महत्वपूर्ण पहलू शामिल हैं।

Excellencies, 

भारत एवं आसियान के बीच कायम सामुद्रिक संबंधों की वजह से हज़ारों वर्ष पहले हमारे व्यापारिक संबंध स्थापित हुए थे, तथा हमें साथ मिल कर इन्हें और मजबूत बनाना होगा।

इस क्षेत्र के हितों और शांतिपूर्ण विकास को ध्यान में रखते हुए, नियमों पर आधारित क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे की स्थापना के लिए भारत आसियान को अपना समर्थन जारी रखेगा।

हमने अपने-अपने देशों में आतंकवाद तथा उग्रवाद से कड़ा संघर्ष किया है। अब समय आ गया है, जब हम इस महत्वपूर्ण विषय पर आपसी सहयोग बढ़ा कर इस चुनौती का मिल-जुल कर समाधान निकालें।

Excellencies, 

भारत-आसियान Dialogue Partnership के पच्चीसवीं वर्षगांठ समारोह का theme "Shared Values, Common Destiny” बिल्कुल उपयुक्त है। इस अवसर पर हमने बहुत से कार्यक्रम मिल-जुल कर आयोजित किये हैं।

मुझे विश्वास है कि इस यादगार वर्ष का समापन भी शानदार रहेगा। 25 जनवरी 2018 को नई दिल्ली में India-ASEAN Special Commemorative Summit में आपका स्वागत करने के लिए भारत और मै व्यक्तिगत रूप से उत्सुक हैं।

भारत के 69वें गणतंत्र दिवस समारोह के हमारे मुख्य अतिथियों के रूप में आसियान देशों के नेताओं का स्वागत करने के लिए सवा सौ करोड़ भारतवासी इंतज़ार कर रहे हैं।

हम सभी के बेहतर भविष्य के लिए आपके साथ मिल कर काम करने के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। 

बहुत बहुत धन्यवाद।

मैला ढोने वालों के रूप में रोजगार पर रोक और उनके पुनर्वास पर बैठक हुई


केन्‍द्रीय सामाजिक न्‍याय और अधिकारिता मंत्री श्री थावरचन्‍द गहलोत ने ‘मैला ढोने वालों के रूप में रोजगार पर रोक और उनके पुनर्वास कानून-2013’ के कार्यान्‍वयन की समीक्षा के लिए केन्‍द्रीय निगरानी समिति की 5वीं बैठक की अध्‍यक्षता की। बैठक में सामाजिक न्‍याय और अधिकारिता राज्‍य मंत्री श्री रामदास अठावले, मंत्रालय में सचिव श्रीमती लता कृष्‍ण राव और अन्‍य वरिष्‍ठ अधिकारी मौजूद थे। बैठक में राष्‍ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्‍यक्ष, राष्‍ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के अध्‍यक्ष, सांसद, समिति में शामिल गैर-सरकारी सदस्‍य, केन्‍द्रीय मंत्रालयों/विभागों और राज्‍य सरकारों/संघ शासित प्रशासनों के प्रतिनिधि तथा मैला ढोने वालों/सफाई कर्मियों के कल्‍याण के लिए काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी हिस्‍सा लिया।

इस महत्‍वपूर्ण केन्‍द्रीय कानून को संसद ने सितम्‍बर 2013 में बनाया और यह दिसम्‍बर 2014 में अमल में आया। इसका उद्देश्‍य मैला ढोने की प्रथा को पूरी तरह समाप्‍त करना और पहचाने गए मैला ढोने वालों का विस्‍तृत पुनर्वास करना है। सरकार मैला ढोने की प्रथा को निर्धारित समय के आधार पर समाप्‍त करना चाहती है जिसके लिए राज्‍य सरकारों से आग्रह किया गया है कि वे मैला ढोने की प्रथा कानून 2013 के प्रावधानों को लागू करें। बैठक में सिफारिश की गई कि मैला ढोने वालों की तेजी से पहचान के लिए सर्वेक्षण दिशा-निर्देशों को सरल बनाया जाए।

समीक्षा बैठक में भारत में मैला ढोने की प्रथा और इससे जुड़े कानून-2013 के बारे में विचार-विमर्श किया गया ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि जो भी व्‍यक्ति मल-मूत्र उठा रहा है उसकी पहचान कर उसे मैला ढोने वालों की सूची में शामिल किया जाए। बैठक में इस बारे में भी चर्चा की गई कि पहचाने गए मैला ढोने वालों के पुनर्वास के लिए स्‍व–रोजगार योजना का कार्यान्‍वयन किया जाए जिसके अंतर्गत एक बार नकद सहायता प्रदान करना; कौशल विकास प्रशिक्षण और ऋण सब्सिडी देना शामिल है।

सदस्‍यों को जानकारी दी गई कि राष्‍ट्रीय सफाई कर्मचारी वित्त और विकास निगम (एनएसकेएफडीसी) ने मैला ढोने वालों और उनके आश्रितों को कौशल विकास प्रशिक्षण देने के लिए प्रोत्‍साहित करने के लिए अनेक जागरूकता शिविर लगाए हैं ताकि उन्‍हें उचित रोजगार मिल सके अथवा वे स्‍व–रोजगार कार्य शुरू कर सकें।  

दूरसंचार विभाग ने मोबाइल नम्बर से आधार कार्ड जोड़ने को किया बहुत सरल


दूरसंचार विभाग ने मोबाइल नम्बर से आधार कार्ड को जोड़ने की प्रक्रिया को सरल किया 

 दो अन्य सुविधाजनक विकल्प के साथ उपभोक्ता की आसानी के लिए नए ओटीपी आधारित विकल्प की शुरूआत 

उद्योग द्वारा इस कदम का स्वागत और सरकार का समर्थन करने की अपील



दूरसंचार सेवा प्रदाताओं द्वारा आधार कार्ड को मोबाइल नम्बर और मोबाइल उपभोक्ताओं की पुनः सत्यापन प्रक्रिया से जोड़ने संबंधी उच्चतम न्यायालय के 16 फरवरी के आदेश के अनुपालन में तेजी लाने के लिए दूरसंचार विभाग (डीओटी) ने बुधवार को व्यापक दिशा-निर्देश जारी किए।

नए नियमों के अनुसार दूरसंचार विभाग ने आधार कार्ड को पंजीकृत मोबाइल नम्बर से जोड़ने के तीन नए तरीके शुरू किए हैं। ये तरीके हैं - ओटीपी (वन टाइम पासवर्ड) आधारित, एप्प आधारित और आईवीआरएस सुविधा। इन नए तरीकों से उपभोक्ताओं को दूरसंचार कंपनियों के स्टोर्स पर जाए बगैर आधार कार्ड को अपने मोबाइल नम्बर से जोड़ने में मदद मिलेगी। दूरसंचार विभाग ने वरिष्ठ नागरिकों, दिव्यांग जनों और गंभीर बिमारी से पीड़ितों की सुविधा के लिए ऐसे उपभोक्ताओं के घर जाकर पुनः सत्यापन करने की भी सिफारिश की है। नए दिशा-निर्देशों के अनुसार दूरसंचार ऑपरेटरों को इन सेवाओं का अनुरोध करने वालों के लिए ऑनलाइन प्रक्रिया उपलब्ध करवानी चाहिए और उपलब्धता के आधार पर पुनः सत्यापन की प्रक्रिया पूरी करने के लिए उनके घर जाना चाहिए।

इस बारे में दूरसंचार राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री मनोज सिन्हा ने कहा, ‘महत्वपूर्ण सरकारी सेवाओं और सूचनाओं तक देश के सभी नागरिकों की पहुंच बनाने के लिए आधार नम्बर प्रणाली तैयार की गई थी, जिसकी समय-समय पर उन्हें आवश्यकता हो सकती है। देश में मोबाइल का प्रयोग तेजी से बढ़ रहा है और उपभोक्ताओं को मोबाइल नम्बर के साथ आधार नम्बर को जोड़ने की सुविधा प्रदान की जानी चाहिए। सरकार प्रयास कर रही है कि कम समय में सुविधा जनक तथा ऊर्जा गंवाए बिना उपभोक्ताओं तक सरकारी सूचनाएं और सेवाएं पहुंचाई जाए जो उनका अधिकार भी है।’

सीओएआई के प्रतिनिधि ने कहा, ‘दूरसंचार विभाग का नवीनतम स्पष्टीकरण उद्योग और उपभोक्ताओं के अनुरूप है जिसकी इस समय जरूरत है। हालांकि इन दिशा-निर्देशों को लागू करने में कुछ समय लगेगा लेकिन उपभोक्ताओं के मोबाइल नम्बर को ई-केवाईसी आधारित आधार से जोड़ना उपभोक्ताओं के लिए सुविधाजनक बनाने में हम सरकार के साथ मिलकर कार्य कर रहे हैं। हम सभी आवश्यक प्रक्रिया लागू कर रहे हैं ताकि ओटीपी, एप्प आधारित और आईवीआरएस सुविधा सहित दिए गए अतिरिक्त तरीकों का इस्तेमाल किया जा सके। हमें आशा है कि तेजी और आसानी से मोबाइल उपभोक्ता अपने आधार पंजीकृत मोबाइल नम्बर (एआरएमएन) का उपयोग कर ई-केवाईसी नियम को पूरा करेंगे।’  

अगस्त महीने के एक परिपत्र में दूरसंचार विभाग ने दूरसंचार सेवा प्रदाताओं को आंख की पुतली (आईरिस) और अंगुलियों के निशान आधारित आधार का  सत्यापन कराने का निर्देश दिया था। नए नियमों में यह स्पष्ट निर्दिष्ट किया गया है कि दूरसंचार सेवा प्रदाताओं को इसके लिए उचित भौगोलिक क्षेत्र में आईरिस रीडर तैनात करना चाहिए।

निजता के नियमों को ध्यान में रखते हुए दूरसंचार विभाग ने यह अनिवार्य किया है कि दूरसंचार सेवा प्रदाताओं के एजेंट की पहुंच उपभोक्ताओं के ई-केवाईसी डाटा तक पहुंच न हो और ग्राहकों के नाम तथा पते ही नजर आने चाहिएं। ग्राहक देश के किसी भी स्थान से अपने मोबाइल नम्बरों का सत्यापन या पुनः सत्यापन कर सकते हैं फिर चाहे उनका मोबाइल कनेक्शन किसी भी सेवा क्षेत्र का क्यों न हो।    

#NCH - 14 राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन काउन्टर, 14 से 60 तक बढ़ाए गए


आगामी अक्टूबर से शुरू की जाने वाली 6 जोनल हेल्पलाइन्सः राम विलास पासवान 

14 राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन काउन्टर, 14 से 60 तक बढ़ाए गए

18 राज्यों को मार्च 2018 से राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन से जोड़ा जाएगा 

केन्द्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य व सार्वजनिक वितरण मंत्री श्री रामविलास पासवान ने नेशनल कन्जूमर हेल्पलाइन (एनसीएच) के बारे में बताने के लिए नई दिल्ली में पत्रकार सम्मेलन किया। मीडिया से बातचीत करते हुए श्री पासवान ने कहा कि आगामी अक्टूबर से 6 जोनल हेल्पलाइन्स शुरू की जाएगी। प्रत्येक जोनल हेल्पलाइन में 10 उपभोक्ता डेस्क होंगे। इस तरीके से 60 उपभोक्ता डेस्क, देश में राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन के अलावा अतिरिक्त कार्य करेंगे। 

श्री पासवान ने जानकारी दी कि पहले 14 एनसीएच काउन्टर्स, उपभोक्ताओं की जन-शिकायतों के समाधान का कार्य कर रहे थे, इसे अब 60 तक बढ़ा दिया गया है। उन्होने कहा कि पहले प्रतिक्रिया का औसत समय 7 मिनट के लगभग लिया जाता था, जो राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन में अब लगभग तुरन्त मिल जाता है।

श्री पासवान ने आगे बताया कि राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज करने वालों की संख्या तीन गुना बढ़ गई है। राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन में 2014 में उपभोक्ताओं से 1.30 लाख शिकायते प्राप्त की जो 2017 में बढ़ कर 3 लाख हुई।

मंत्री महोदय ने कहा कि मार्च 2018 से 18 राज्यों को राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन से जोड़ा जाएगा। 

#NFSM के तहत दालों के लिए 835 करोड़ रूपये राज्यों को दिए गए


वित्‍त वर्ष 2017-18 के लिए राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा अभियान (एनएफएसएम) के लिए 1720.00 करोड़ रूपये (भारत सरकार का हिस्‍सा) निर्धारित किए गए हैं। इसमें से अब तक देश में दालों का उत्‍पादन बढ़ाने के लिए एनएफएसएम दालों के लिए 834.71 करोड़ रूपये राज्‍यों को आं‍बटित किए जा चुके हैं तथा 169.28 करोड़ रूपये दाल कार्यक्रम लागू करने के लिए राज्‍यों को जारी किए जा चुके हैं। दालों की खेती के संदर्भ में किसानों में जागरूकता पैदा करने के लिए भारत सरकार ने कई कदम उठाए हैं। जैसे राज्‍य सरकार और कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के माध्‍यम से नवीनतम फसल उत्‍पादन प्रणाली आधारित सबूत प्रदर्शित करना तथा फसल उत्‍पादन प्रणाली आधारित प्रशिक्षण प्रदान करना आदि। इसके अतिरिक्‍त आईसीएआर संस्‍थाओं/कृषि विज्ञान केन्‍द्रों (केवीके)/राज्‍य कृषि विश्‍व विद्यालयों (एसएयू) द्वारा बीज केन्‍द्रों के माध्‍यम से दालों का बीज उत्‍पादन भी किया जा रहा है।

यह सूचना लोकसभा में एक प्रश्‍न के लिखित उत्‍तर में कृषि और किसान कल्‍याण राज्‍य मंत्री श्री एस.एस.आहलूवालिया द्वारा प्रदान की गई।

रेल क्लाउड परियोजना की शुरुआत हुई, पढ़िए क्या होंगे लाभ



रेल क्लाउड परियोजना:

निवारण-शिकायत पोर्टल (रेल क्लाउड के बारे में पहला आईटी एप्लीकेशन)
रेलवे के सेवानिवृत्त कर्मचारियों और उनके आश्रितों के लिए आपात स्थिति में कैशलैस इलाज योजना (सीटीएसई), पहला सीटीएसई कार्ड सौंपा


विभिन्न रेलवे पहलों की शुरूआत के मौके पर रेल राज्य मंत्री श्री राजेन गोहेन, रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष श्री ए.के. मित्तल, रेलवे बोर्ड के अन्य सदस्य वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद थे। रेल मंत्रालय ने अपने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम, रेलटेल कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड के सहयोग से रेल क्लाउड परियोजना शुरू की है।

इस अवसर पर रेल मंत्री श्री सुरेश प्रभु ने कहा कि समूची रेल प्रणाली को समन्वित डिजिटल मंच पर लाने के प्रयास किए जा रहे हैं। रेलवे के डिजिटलीकरण की दिशा में रेल क्लाउड एक अन्य कदम है। रेल क्लाउड लोकप्रिय क्लाउड कम्प्यूटिंग प्रणाली पर कार्य करता है। अधिकतर महत्वपूर्ण कार्य क्लाउड कम्प्यूटिंग के जरिए किए जाते हैं। इससे लागत कम होगी और सर्वर पर सुरक्षित आंकड़े सुनिश्चित हो सकेंगे। इसके साथ ही एक अन्य महत्वपूर्ण कदम आपात स्थिति में कैशलेस इलाज योजना है। लोगों का अनुमानित जीवन काल बढ़ने के कारण स्वास्थ्य संबंधित अनेक समस्याएं पैदा होती है इस योजना से रेलवे कर्मचारियों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिल सकेंगी।

शुरू की गई पहल की विशेषताएं-

रेल क्लाउड:

भारतीय रेलवे ने रणनीतिक आईटी पहल की है, जिसका उद्देश्य ग्राहक की संतुष्टि में सुधार करना, राजस्व बढ़ाना और प्रभावी, कुशल और सुरक्षित संचालन करना है। रेलवे के लिए एकल डिजिटल मंच के लक्ष्य को हासिल करने के लिए कुछ मौलिक परियोजनाओं को लागू करना जरूरी था और रेल क्लाउड की स्थापना इस तरह की परियोजना है। क्लाउड कम्प्यूटिंग तेजी से और मांग पर सर्वर संसाधनों को स्थापित करने के लिए उभरती हुई प्रौद्योगिकी है जिसके परिणामस्वरूप लागत कम होती है। तदनुसार रेल क्लाउड चरण-1 को 53.55 करोड़ रुपये की लागत पर मंजूरी दी गई। रेल क्लाउड लागू होने के बाद रेलवे को होने वाले संभावित लाभ इस प्रकार हैः-

एप्लीकेशन का तेजी से और मांग पर फैलाव- रेल क्लाउड एप्लीकेशन के तेजी से फैलाव (परम्परागत समय, सप्ताहों और महीनों की तुलना में 24 घंटे के भीतर) का मार्ग प्रशस्त करेगा, साथ ही क्लाउड हार्डवेयर और परिवेश नए एप्लीकेशन के परीक्षण के लिए उपलब्ध होगा।

सर्वर और स्टोरेज का अधिकतम इस्तेमाल- इस प्रौद्योगिकी से उपलब्ध सर्वर और स्टोरेज का अधिकतम इस्तेमाल हो सकेगा, जिसके परिणामस्वरूप उसी सर्वर की जगह पर अधिक आंकड़े और अधिक एप्लीकेशन समा सकेंगे।

क्लाउड के हिस्से के रूप में वर्तमान बुनियादी ढांचे का इस्तेमाल- रेलवे के पास उपलब्ध वर्तमान संसाधनों को रेल क्लाउड में मिला दिया जाएगा, ताकि नए संसाधन प्राप्त करने में होने वाले खर्च को कम किया जा सके।

त्वरित मापनीयता और लचीलापन- सर्वर और स्टोरेज की जगह मांग के अनुसार ऊपर-नीचे होगी, इससे सिस्टम अधिक मांग वाले घंटों में कम खर्च के साथ मांग को पूरा कर सकेगा।

आईटी सुरक्षा बढ़ाना और मानकीकरण- यह क्लाउड सरकार के नवीनतम दिशा-निर्देशों के अनुसार सुरक्षा विशेषताओं से लैस होगा। सुरक्षा विशेषताओं को क्लाउड में मौजूद सभी एप्लीकेशनों के लिए अद्यतन किया जा सकता है इसके परिणामस्वरूप अधिक सुरक्षा और स्थिरता कम खर्च में मिल सकेगी।

लागत में कमी- सर्वर और स्टोरेज बुनियादी ढांचा जरूरत के अनुसार लगाया जाएगा, जिससे रेलवे की बचत होगी और जरूरत पड़ने पर मंहगे सर्वर की खरीद पर धनराशि खर्च करने की बजाए इसका इस्‍तेमाल किया जा सकेगा।

बेहतर उपयोगकर्ता अनुभव- क्लाउड में सर्वर के संसाधन उपयोगकर्ताओं की संख्या के अनुसार ऊपर-नीचे होते है इससे ग्राहकों को बेहतर अनुभव मिलेगा।

निकट भविष्य में प्रबंधित नेटवर्क और वर्चुअल डेस्कटॉप इंटरफेस (वीडीआई) सेवाओं की योजना बनाई गई है ताकि प्रत्येक रेल कर्मचारी को तेजी से और अधिक प्रभावी कार्य का माहौल दिया जा सके।

निवारण- शिकायत पोर्टल रेल क्लाउड पर पहला आईटी एप्लीकेशन:

निवारण- शिकायत पोर्टल रेल क्लाउड पर पहला आईटी एप्लीकेशन है। यह वर्तमान और पूर्व रेलवे कर्मचारियों की शिकायतों के समाधान के लिए मंच है। वर्तमान एप्लीकेशन को परम्परागत सर्वर में डाला गया है। इससे राजस्व की बचत होगी और साथ ही उपयोगकर्ता को बेहतर अनुभव मिलेगा।

आपात स्थिति में कैशलैस इलाज योजना (सीटीएसई):

रेलवे स्वास्थ्य संस्थानों, रेफरल और मान्यता प्राप्त अस्पतालों के जरिए अपने कर्मचारियों को विस्तृत स्वास्थ्य सेवा सुविधा प्रदान करती है। लाभ लेने वालों में उसके सेवानिवृत्त कर्मचारी और उनके परिवार के सदस्य होते है। बड़ी संख्या में सेवानिवृत्त लाभार्थी विभिन्न शहरों के नव-विकसित उप-नगरों में रहते है। शहर के यह हिस्से अक्सर रेलवे स्वास्थ्य संस्थानों से दूर होते है आपात स्थिति में ऐसे लाभार्थियों के स्वर्णिम घंटे यात्रा में बर्बाद हो जाते है।

सेवानिवृत्त कर्मचारियों को स्वर्णिम घंटे में तत्काल चिकित्सा प्रदान करने के लिए रेलवे बोर्ड ने अपने सेवानिवृत्त कर्मचारियों और उनके आश्रितों के लिए सूची में सम्मिलित अस्पतालों में आपात स्थिति में कैशलैस इलाज की योजना शुरू की है। निजी अस्पतालों और रेलवे अधिकारियों के बीच एक वेब आधारित संचार प्रणाली विकसित की गई है जिसमें लाभार्थी की पहचान आधार सर्वर में दर्ज बायोमीट्रिक का इस्तेमाल करते हुए स्थापित की जाएगी, पात्रता रेलवे डेटाबेस का इस्तेमाल करते हुए पता लगाई जाएगी तथा आपात स्थिति की पुष्टि निजी अस्पताल की क्लिनिकल रिपोर्ट के आधार पर रेलवे चिकित्सा अधिकारी द्वारा की जाएगी। पूरी प्रणाली ऑनलाइन है और बिल भी ऑनलाइन तैयार होगा। इस योजना से जरूरत के समय सेवानिवृत्त रेलवे कर्मचारियों को मदद मिलेगी।

इस योजना से लाल फीताशाही को खत्म करने के लिए आईटी उपकरणों का इस्तेमाल और कैशलैस लेन-देन को बढ़ावा देने के सरकार के स्वीकृत उद्देश्यों को पूरा करने में मदद मिलेगी।

वर्तमान में यह योजना चार महानगरों दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई में शुरू की गई है। इस शहरों के अनुभव के आधार पर इस योजना को पूरे देश में लागू किया जा सकता है।

राजभाषा विभाग द्वारा ऑनलाइन अनुवाद-प्रशिक्षण प्‍लेटफार्म का लोकार्पण हुआ

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति प्रो. गिरीश्वर मिश्र द्वारा राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन केंद्रीय अनुवाद ब्‍यूरो द्वारा विकसित ऑनलाइन अनुवाद-प्रशिक्षण प्लेटफार्म का आज यहां लोकार्पण किया गया। इस मौके पर राजभाषा विभाग के सचिव श्री प्रभास कुमार झा, संयुक्‍त सचिव डॉ. बिपिन बिहारी सहित केंद्र सरकार के विभिन्‍न मंत्रालयों/उपक्रमों आदि के अधिकारी उपस्थित थे।

दो सत्रों में आयोजित इस कार्यक्रम के प्रथम सत्र में ऑनलाइन अनुवाद-प्रशिक्षण प्लेटफार्म का लोकार्पण किया गया तथा केंद्रीय अनुवाद ब्‍यूरो के निदेशक डॉ. एस एन सिंह द्वारा इस प्‍लेटफार्म से होने वाले लाभ की विस्‍तृत जानकारी दी गई। द्वितीय सत्र में प्रसिद्ध साहित्यकार पद्मश्री डॉ. नरेंद्र कोहली, भाषाविद् और तकनीकी विशेषज्ञ डॉ. ओम विकास, भाषा-विज्ञानी और हंगेरियन तथा हिंदी के प्रसिद्ध अनुवादशास्त्री डॉ. विमलेश कांति वर्मा द्वारा अनुवाद जैसे महत्‍वपूर्ण विषय पर वक्‍तव्‍य दिये गये।

ऑनलाइन अनुवाद-प्रशिक्षण प्‍लेटफार्म के लोकार्पण समारोह को सम्‍बोधित करते हुए प्रो. गिरीश्वर मिश्र ने कहा कि यह एक महत्‍वपूर्ण प्रयास है एवं एक नई पहल है। उन्‍होने कहा कि यह प्‍लेटफार्म सभी को उपलब्‍ध होगा। उन्‍होने कहा कि भारत जैसा देश जहां इतनी भाषाऐं बोली जाती हैं तथा विश्‍व में भी बहुत सी भाषाऐं उपलब्‍ध हैं, अनुवाद ही ऐसा माध्‍यम है जिससे हम विचार सांझा कर सकते हैं। प्रो. गिरीश्वर मिश्र ने कहा कि सरकार की विभिन्‍न योजनाओं की जानकारी भी जनता की भाषा में तथा सरल भाषा में उपलब्‍ध होनी चाहिए। उन्‍होने कहा की अनुवाद के माध्‍यम से इतिहास तथा विभिन्‍न संस्‍कृतियों का ज्ञान संभव है।

इस अवसर पर सम्‍बोधित करते हुए श्री प्रभास कुमार झा ने बताया कि राजभाषा शब्‍दावली का कार्य प्रारम्‍भ हो गया है। उन्‍होने कहा कि यह शब्‍दावली ऑनलाईन और पुस्‍तक के रूप में उपलब्‍ध होगी तथा इस शब्‍दावली में नये-नये शब्‍द भी शामिल किये जायेगें। उन्‍होने कहा कि राजभाषा शब्‍दावली लाखो शब्‍दों का शब्‍दकोष होगा।

इस प्‍लेटफार्म से होने वाले लाभ की विस्‍तृत जानकारी देते हुए डॉ. एस एन सिंह ने कहा कि इस प्‍लेटफोर्म में सरल और सुगम पाठ तैयार किये गए हैं जिससे सभी को लाभ होगा।

इस अवसर पर राजभाषा भारती के 150 वे अंक का विमोचन भी किया गया।

केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो वर्ष 1971 से सरकारी दस्तावेजों का अनुवाद तथा वर्ष 1973 से राजभाषा के कार्यान्वयन से जुड़े अधिकारियों और कर्मचारियों को पारंपरिक रूप से अनुवाद का प्रशिक्षण देने का कार्य करता आ रहा है।

भारत सरकार की “सुशासन: चुनौतियां और अवसर” कार्य योजना के अंतर्गत सरकारी तंत्र में विभिन्न क्षेत्रों के कौशल विकास पर बल दिया गया है। इसी को ध्यान में रखते हुए राजभाषा विभाग (गृह मंत्रालय) ने केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो को “अनुवाद कौशल के विकास” के लिए ‘ऑनलाइन अनुवाद प्रशिक्षण’ के “ई-लर्निंग प्लेटफार्म” तैयार करने का कार्य सौंपा है।

इस प्लेटफार्म का उद्देश्य केंद्र सरकार के कार्यालयों में राजभाषा कार्यान्वयन और अनुवाद कार्य से जुड़े अधिकारियों व कर्मचारियों के अनुवाद कौशल को विकसित करने के लिए अनुवाद का ऑनलाइन प्रशिक्षण देना है। इसके ज़रिए अनुवाद प्रशिक्षण की पहुँच व्यापक और सर्वसुलभ हो सकेगी और सरकारी कामकाज में प्रयुक्त प्रशासनिक शब्दावली और अभिव्यक्तियों के प्रयोग में एकरूपता सुनिश्चित हो सकेगी।

इस कार्य योजना के अंतर्गत, ब्यूरो में एक अनुसंधान एकक की स्थापना की गई है। इस एकक ने अनुवाद प्रशिक्षण के पहले चरण में, प्रशासनिक विषयों से संबंधित दस्तावेजों के अनुवाद के बारे में सरल और सुगम ढंग से पाठ तैयार किए हैं और उन्हें अनुवाद प्रशिक्षण के इच्छुक व्यक्तियों तक ऑनलाइन पहुंचाने का प्रयास किया है। 

इन पाठों में प्रशासन से जुड़े पत्राचार और उनके अनुवाद से संबंधित विषय शामिल हैं। छोटे-छोटे वीडियो के माध्यम से आसान भाषा में प्रशासनिक अनुवाद को समझाया गया है। इसके साथ ही, कुछ पाठों को प्रश्नोत्तरी के रूप में भी तैयार किया गया है। इन पाठों के माध्यम से इच्छुक प्रशिक्षार्थी प्रशासनिक विषयों के अनुवाद की बारीकियों को जानकर, इस क्षेत्र में अपने कौशल को निखार सकेंगे।

इस शृंखला के अंतर्गत भारत सरकार के मंत्रालयों/विभागों और कार्यालयों में प्रयुक्त होने वाली प्रशासनिक भाषा और उसके अनुवाद से संबंधित 21 पाठ तैयार किए गए हैं :-

अनुवाद प्रशिक्षण : परिचय, अनुवाद क्या है? अनुवाद कैसे करें? अनुवाद के सिद्धांत - पारंपरिक और आधुनिक दृष्टिकोण, अनुवाद क्या करें? अनुवाद में सहायक उपकरण, प्रशासनिक भाषा और शब्दावली, प्रशासनिक भाषा और अनुवाद, वैज्ञानिक और तकनीकी अनुवाद की समस्याएं, प्रशासनिक पत्र व्यवहार के प्रकार और उनका अनुवाद, प्रशासनिक अनुवाद में प्रयुक्त शब्दों के सूक्ष्म भेद, अर्द्ध-सरकारी पत्र और अंतर्विभागीय टिप्पणियां, जनसंपर्क के लिए प्रयुक्त दस्तावेजों, और फॉर्मों का अनुवाद, आदेश और कार्यालय आदेश का अनुवाद, टिप्पणी लेखन और अनुवाद, मुहावरों और लोकोक्तियों का अनुवाद, अनुवाद-पुनरीक्षण, मूल्यांकन और समीक्षा, व्यतिरेकी विश्लेषण और अनुवाद, हिंदी – अंग्रेजी वाक्य संरचना और अनुवाद, अनुवाद में सृजनशीलता, प्रयुक्ति की संकल्पना और अनुवाद।


#CRPF जवानों की हत्या पर मानवाधिकार कार्यकर्ता खामोश क्यों ? : वेंकैया नायडू

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सूचना एवं प्रसारण मंत्री श्री वेंकैया नायडू का बयान – सुकमा में सीआरपीएफ जवानों की कायरतापूर्ण हत्या पर मानवाधिकार कार्यकर्ता खामोश क्यों ?

24 अप्रैल, 2017 को छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में विकास कार्यों के लिए सड़कों को सुरक्षित बनाने के काम में लगे सीआरपीएफ जवानों की कायरतापूर्ण हत्या से राष्ट्र सदमे में है। अन्य कई घायल हुए हैं। भूमिगत उग्रवादी तत्वों द्वारा की जाने वाली इस तरह की कायरतापूर्ण कार्रवाई अत्यंत निंदनीय है।

सीआरपीएफ के जो जवान मारे गए और घायल हुए हैं वे देश की जनता की सेवा कर रहे थे और उन्होंने अपने जीवन को न्यौछावर कर दिया। राष्ट्र के लिए यह सर्वोच्च बलिदान है। वर्दी पहने हुए जो समर्पित जवान मारे गए और घालय हुए हैं उनके परिवारों के प्रति केंद्र और राज्य सरकार पूरी तरह से समर्पित हैं। केंद्र और राज्य सरकार पूरी दृढ़ता के साथ काम करती रहेंगी और इस तरह की हिंसात्मक कार्रवाइयों को समाप्त करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

पूरा राष्ट्र इस हत्या और हिंसा से सदमे में है, लेकिन कल से ही मानवाधिकार के तथाकथित हितैषी और आवाज उठाने वाले लोग चुप्पी साधे हुए हैं। अगर पुलिस द्वारा किसी आंतकवादी या उग्रवादी को मारा जाता तो ये कार्यकर्ता आवाज उठाते और हिंसात्मक प्रतिक्रिया करते। लेकिन, बड़ी संख्या में जवानों और निर्दोष लोगों को जब ऐसे लोग मारते हैं तब मानवाधिकार के कार्यकर्ता चुप्पी ओढ़ लेते हैं।

क्या मानवाधिकार केवल उन लोगों के लिए है जो अपनी अप्रासंगिक विचार धाराओं को आगे बढ़ाने के लिए हिंसा का सहारा लेते हैं? क्या मानवाधिकार सुरक्षाकर्मियों और साधारण लोगों के लिए नहीं है?

जब गैर कानूनी तत्व इस तरह की अमानवीय हरकत करते हैं, तो मानवाधिकार कार्यकर्ता क्यों खामोश हो जाते हैं?

मैं यह कहना चाहता हूं कि इस तरह की हिंसात्मक गतिविधियों को मानवाधिकार की वकालत करने वाले तथाकथित कार्यकर्ताओं का मौन समर्थन प्राप्त है। ऐसी कार्रवाई हताशा में की जाती है ताकि केंद्र और राज्य सरकार के विकास कार्यों का सकारात्मक प्रभाव रोका जा सके और तेज आर्थिक विकास का लाभ गरीबों तक न पहुंच पाए।

इस बात की अत्यंत आवश्यकता है कि प्रतिबंधित तत्वों और तथाकथित मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की हिंसात्मक गतिविधियों के विरूद्ध मजबूत जनभावना बनायी जाए। ऐसे तत्व दोहरे मानदंड वाले हैं और राष्ट्र विरोधी गतिविधियों का शिकार होने वाले सुरक्षाकर्मियों, उनके परिजनों और निर्दोष व्यक्तियों के लिए यह मानवाधिकार की बात नहीं करते। 

पलटवार : भारतीय हैकर्स ने पाकिस्तान की 500 से ज्यादा वेबसाइट हैक कीं

भारतीय हैकर्स ने पाकिस्तान की 500 से ज्यादा वेबसाइट हैक कीं

कथित भारतीय हैकर्स ने पाकिस्तान की 500 से ज्यादा वेबसाइट हैक कीं. भारतीय हैकर्स ने रैंजमवेयर के जरिए पाकिस्तान की वेबसाइट हैक कीं. हैकर्स ने पाकिस्तान की 'पाकिस्तान पीपल्स पार्टी' की वेबसाइट भी हैक करने का दावा किया है. इससे कुछ घंटे पहले ही पाकिस्तानी हैकर्स ने भारत की टॉप यूनिवर्सिटी के अकाउंट हैक किए थे.

भारत के कथित हैकर ग्रुप ने पाकिस्तान की 500 से ज्यादा वेबसाइट्स हैक करने का दावा किया है. इनमें वो वेबसाइट्स भी शामिल हैं जो HTTPS से सिक्योर हैं.

हैक की गईं वेबसाइट्स में से ज्यादातर वेबसाइट पाकिस्तान सरकार के अधीन आती हैं. दावा किया गया है कि टीम इंडियन ब्लैक हैट नाम के एक ग्रुप ने हैकिंग को अंजाम दिया. हालांकि हैक्ड वेबसाइट के होम पेज पर टीम केरला साइबर वॉरियर्स लिखा हुआ है.

'पाकिस्तान पीपल्स पार्टी' की वेबसाइट भी हैक:

हैकर्स ने पाकिस्तान की 'पाकिस्तान पीपल्स पार्टी' की वेबसाइट भी हैक करने का दावा किया है. इन वेबसाइट में वहां के सरकारी शिक्षण वेबसाइट्स भी शामिल हैं. इसके अलावा ट्रेड वेबसाइट्स और रुरल डेवेलपमेंट वेबसाइट्स भी शामिल हैं.

हमने हैकर ग्रुप से बात की तो उन्होंने बताया है कि ये सिर्फ एक ग्रुप ने नहीं किया है बल्कि कई ग्रु ने मिलकर किया है. इसमें Luzsecind, team black hats और United Indian hackers जैसे ग्रुप्स शामिल हैं. इनका कहना है कि आने वाले समय में वहां कि और भी वेबसाइट्स को हैक किया जाएगा.

ये कोई आम हैकिंग नहीं है. बल्कि इन्होंने रैंजमवेयर का इस्तेमाल किया है. रैंजमवेयर का मतलब वेबसाइट को हैकर के कब्जे से छुड़ाने के लिए पैसे देने होते हैं. इसके लिए वेबसाइट पर हैकर्स के फेसबुक पेज की डीटेल्स हैं जहां से वो पैसे के लेन देन की बात करेंगे.

हैक की गई वेबसाइट को देखकर लगता है कि केरल साइबर वॉरियर ने किया है. यहां एक बॉक्स है जिसमें Key डालने को कहा जा रहा है. आम तौर पर हैकर रैंजम मनी लेने के बाद एक Key देते हैं जिससे वेबसाइट को वापस लिया जा सकता है.

10 भारतीय यूनिवर्सिटी की वेबसाइट की थीं हैक:

मंगलवार को दिन के वक्त पाकिस्तानी हैकर्स ने भारत की 10 यूनिवर्सिटीज की वेबसाइट हैक की थीं. हैक की गई वेबसाइट्स में आईआईटी दिल्ली, आईआईटी भुवनेश्वर, दिल्ली यूनिवर्सिटी, नेशनल एयरोस्पेस लैबोरैट्रीज और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की वेबसाइट शामिल हैं. हैकर्स ने इन वेबसाइट्स को हैक करके उन पर पाकिस्तान जिंदाबाद लिखा था. इसके अलावा कश्मीर के बारे में भी लिखा गया था. हैक की गई वेबसाइट्स में ज्यादातर आर्मी और डिफेंस से जुड़ी शिक्षण संस्थान शामिल हैं. इन वेबसाइट्स की हैकिंग का दावा पाकिस्तान के PHC ग्रुप ने किया है.

मालेगांव विस्फोट मामले में साध्वी प्रज्ञा को 9 साल बाद मिली जमानत


बंबई उच्च न्यायालय ने 2008 मालेगांव बम विस्फोट की साजिश रचने में कथित तौर पर फँसाई गई साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को आज जमानत दे दी लेकिन सह आरोपी और पूर्व ले. कर्नल प्रसाद पुरोहित को कोई राहत देने से इनकार कर दिया।  

अदालत ने साध्वी को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को अपना पासपोर्ट सौंपने और सबूतों से छेड़छाड़ नहीं करने का निर्देश दिया है। उसे यह भी निर्देश दिया गया है कि जब भी जरूरत हो वह एनआईए अदालत में रिपोर्ट करे।

न्यायमूर्ति रंजीत मोरे और न्यायमूर्ति शालिनी फनसाल्कर जोशी की खंड पीठ ने कहा, 'साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की अपील मंजूरी दी जाती है। याची (साध्वी) को पांच लाख रुपए की जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया जाता है। प्रसाद पुरोहित की ओर से दायर अपील को खारिज किया जाता है।'

न्यायमूर्ति मोरे ने कहा कि हमने अपने आदेश में कहा है कि पहली नजर में साध्वी के खिलाफ कोई मामला नहीं बनता है।

गौरतलब है कि 29 सितंबर 2008 को मालेगांव में एक बाइक में बम लगाकर विस्फोट किया गया था जिसमें आठ लोगों की मौत हुई थी और तकरीबन 80 लोग जख्मी हो गए थे। साध्वी और पुरोहित को 2008 में गिरफ्तार किया गया था और तब से वे जेल में हैं।     

राष्ट्रपति और मंत्रियों का हिंदी में भाषण देना अनिवार्य नहीं : वेंकैया नायडू


सूचना और प्रसारण मंत्री श्री वेंकैया नायडू का वक्तव्य – हिंदी थोपने के आरोप निराधार 

‘मुझे कुछ समाचार पत्रों में छपी कुछ रिपोर्टों को पढ़कर दुख हुआ है। इन खबरों में डीएमके नेता श्री एन. के. स्टालिन का हवाला देते हुए आरोप लगाया गया है कि केंद्र सरकार हिंदी थोप रही है।

श्री स्टालिन का हवाला देते इन खबरों में कहा गया कि संसदीय समिति (राजभाषा) ने हिंदी जानने वाले संसद सदस्यों और केंद्रीय मंत्रियों के लिए भाषणों और लेखों में हिंदी के उपयोग को अनिवार्य बनाने का प्रस्ताव किया। खबरों में आगे आरोप लगाया गया है कि इस संबंध में अध्यादेश जारी किया गया है यानी सरकार हिंदी थोप रही है।

मैं स्पष्ट करना चाहूंगा कि पूर्व गृह मंत्री श्री पी. चिदम्बरम के नेतृत्व में राजभाषा पर संसदीय समिति ने निम्नलिखित सिफारिश की और सिफारिश को 2 जून, 2011 को माननीय राष्ट्रपति को भेजा गया : - 

‘यह समिति हिंदी बोलने और पढ़ने वाले उच्च राजनीतिक पदों पर आसीन व्यक्तियों से अपने भाषण/ वक्तव्य हिंदी में देने का अनुरोध करती है। इस श्रेणी में माननीय राष्ट्रपति और सभी मंत्री आते हैं।

वर्तमान सरकार ने 31 मार्च, 2017 को इस सिफारिश को अधिसूचित किया।

यह दिखाता है कि राजभाषा पर संसदीय समिति के सुझाव का स्वभाव सिफारिशी है और अनिवार्य नहीं है। इस संबंध में अध्यादेश जारी करने का आरोप पूरी तरह निराधार और शरारतपूर्ण है।

याद रहे कि 2011 में डीएमके पार्टी भारत सरकार की सदस्य थी। उसी समय यह सिफारिश की गई और माननीय राष्ट्रपति को संसदीय समिति द्वारा सिफारिश भेजी गयी।

भारत सरकार का किसी भी व्यक्ति पर कोई भाषा थोपने की मंशा नहीं है’

सरकार का स्पष्टीकरण : ताजमहल में धार्मिक चिन्ह ले जाने पर कोई रोक नहीं

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ताजमहल देखने आने वालों की पोशाक अथवा दुपट्टे, गमछे जैसे कपड़ों पर रंग अथवा कुछ धार्मिक नाम-प्रतीक लिखे होने पर उनके प्रवेश पर किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं 

समाचार पत्रों और दृश्य मीडिया के माध्यम से यह समाचार प्रकाशित और प्रसारित हो रहा है कि १९ अप्रैल २०१७ को ताज महल देखने आयी महिला पर्यटकों को राम नाम लिखे भगवा दुपट्टे उतरवा कर ही अन्दर जाने दिया गया था। 

प्रश्नगत विषय में सी.आई.एस.एफ के सुरक्षा कर्मियों तथा अधीक्षण पुरातत्त्वविद, भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण, आगरा से प्रतिवेदन प्राप्त किए गए हैं। प्राप्त रिपोर्टों के अनुसार उपर्युक्त कार्यवाही सी.आई.एस.एफ के किसी सुरक्षा कर्मी अथवा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के किसी कर्मी द्वारा नहीं की गयी है। इस विषय में समाचार में उद्धृत नियमावली में ऐसा करने का कोई प्रावधान नहीं है और न ही इस आशय का कोई परिपत्र भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण द्वारा परिचालित किया गया है, अथवा लागू है। कमांडेंट, सी.आई.एस.एफ ने यह भी अवगत कराया है कि सुरक्षा की दृष्टि से सिगरेट, लाइटर, च्युइंगम, चॉकलेट इत्यादि सरकारी लॉकर में जमा कराए गए थे लेकिन स्कार्फ/ दुपट्टा नहीं उतरवाया गया था। इससे सम्बंधित सी.सी. टी. वी. फूटेज उनकी अभिरक्षा में है। सी.सी. टी. वी. फूटेज में यह स्पष्ट है कि रामनाम लिखे भगवा दुपट्टे पहने महिला पर्यटक को ताज महल परिसर में प्रविष्टि मिली है। 

अधीक्षण पुरातत्त्वविद, भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण, आगरा ने पुष्टि की है कि टी. वी. चैनलों पर दिखाए जा रहे विचाराधीन घटना से सम्बंधित वीडियो में दिख रहे दुपट्टे उतरवाने वाले व्यक्ति ना तो भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के कर्मी हैं और ना सी.आई.एस.एफ के। प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि ये व्यक्ति उक्त पर्यटकों के साथ के ही कोई व्यक्ति (गाइड अथवा उनका कोई सहयोगी) हो सकते हैं। इस बारे में अलग से जांच भी की जा रही है। स्थानीय पुलिस को भी इस सम्बन्ध में जांच करने के निर्देश दिए जा चुके हैं। 

ताजमहल देखने आने वालों की पोशाक अथवा दुपट्टे, गमछे जैसे कपड़ों पर रंग अथवा कुछ धार्मिक नाम-प्रतीक लिखे होने पर उनके प्रवेश पर भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण द्वारा किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं लगाया गया है। 

अनुसूचित जातियों,अन्य पिछड़े वर्गों के विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति अब डिजिटल माध्यम से


अनुसूचित जातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के 3.54 करोड़ विद्यार्थियों को डिजिटल भुगतान के अंतर्गत 14 छात्रवृत्ति योजनाओं का लाभ 

अनुसूचित जातियों और अन्य पिछड़े वर्गों (अपिव)/विमुक्त, घुमंतु और अर्द्ध-घुमंतु जातियों के विद्यार्थियों के लिए 14 स्कालरशिप योजनाएं डिजिटल भुगतान के अंतर्गत संचालित की जा रही हैं, जिनका लाभ 3.54 करोड़ विद्यार्थियों को मिल रहा है। छात्रवृत्ति की समस्त राशि विद्यार्थियों के बैंक खातों में अंतरित की जा रही है और अजा विद्यार्थियों के 60 प्रतिशत बैंक खाते आधार से जुड़े हुए हैं। उन्होंने बताया कि छात्रवृत्तियों, विद्यार्थियों के लिए छात्रावासों, प्रशिक्षण सुविधाओं, परिसरों,संस्थानों के निर्माण/उन्नयन के लिए पूंजी प्रदान करने आदि उपायों के जरिए अनुसूचित जातियों से सम्बद्ध विद्यार्थियों का शैक्षिक सशक्तिकरण किया जा रहा है। यह जानकारी केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री श्री थावर चंद गहलोत ने “प्रमुख सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों” के बारे में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में दी। 

सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय अलग अलग तरह की सात छात्रवृत्तियां कार्यान्वित करता है, जिनमें मैट्रिक-परवर्ती और मैट्रिक-पूर्ववर्ती छात्रवृत्तियां, टॉप क्लास स्कालरशिप, राष्ट्रीय विदेश अध्ययन छात्रवृत्ति, अनुसूचित जातियों के लिए यूजीसी द्वारा संचालित राष्ट्रीय फेलोशिप, अस्वच्छ व्यवसायों में लगे व्यक्तियों के बच्चों के लिए प्री-मैट्रिक स्कालरशिप, अनुसूचित जातियों और अपिव के लिए निशुल्क कोचिंग (70 : 30 अनुपात में) और योग्यता उन्नयन छात्रवृत्तियां शामिल हैं। भारत सरकार का यह विश्वास है कि सब के लिए शिक्षा सशक्तिकरण की कुंजी है। सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय अपने बजट का करीब 54 प्रतिशत अनुसूचित जातियों के लिए छात्रवृत्तियों पर खर्च करता है। 

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की प्रत्‍येक शाखा को वित्‍त मंत्रालय द्वारा एक उद्यमी के रूप में कम से कम एक अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति के युवक की सहायता करने की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है जिससे कि उनके बीच अधिक रोजगार का सृजन किया जा सके। 

#EarthDay (पृ़थ्‍वी मातृ दिवस) पर विशेष लेख : भारत की पहल


पृथ्वी मातृ को बचाने के लिए भारत की पहल 

पृ़थ्‍वी मातृ दिवस, 22 अप्रैल, 2017


संयुक्त राष्ट्र 22 अप्रैल को एक विशेष दिवस के रूप में पृथ्वी मातृ दिवस मनाता है। 1970 में 10000 लोगों के साथ प्रारंभ किये गये इस दिवस को आज 192 देशों के एक अरब लोग मनाते  हैं। इसका बुनियादी उद्देश्य पृथ्वी की रक्षा और भविष्य में पीढ़ियों के साथ अपने संसाधनों को साझा करने के लिए मनुष्यों को उनके दायित्व के बारे में जागरूक बनाना है।

2017 के विषय "पर्यावरण और जलवायु साक्षरता" का उद्देश्य पृथ्वी माँ की रक्षा के लिए आम लोगों में इस मुद्दे के प्रति जानकारी को और सशक्त बनाया और उन्हें प्रेरित करना है।

आईपीसीसी (जलवायु परिवर्तन पर अंतर्राष्ट्रीय पैनल) के मुताबिक भारत जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के मामले में सबसे कमजोर है जो स्वास्थ्य, आर्थिक विकास और खाद्य सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।

जलवायु परिवर्तन की इस चुनौती के समाधान के लिए भारत ने 'राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित अंशदान (आईएनडीसी): जलवायु न्याय की दिशा में कार्य करने' के उद्देश्य से एक व्यापक योजना विकसित की है। इस दस्तावेज़ में इस मुद्दे के समाधान के लिए समग्र रूप से अनुकूलता के घटक, शमन, वित्त, हरित प्रौद्योगिकी और क्षमता निर्माण को शामिल किया गया है। इन लक्ष्‍यों के क्रियान्वयन के दौरान, विकासशील देशों के लिए स्थायी विकास और गरीबी उन्मूलन को प्राप्त करने के अधिकार के लिये न्यायोचित कार्बन उपयोग का भी आहवान किया गया है।

2030 तक 33 से 35 प्रतिशत तक कार्बन उत्सर्जन कम करने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए कई पहलों के माध्यम से अक्षय ऊर्जा हेतु 3500 मिलियन या 56 मिलियन अमरीकी डॉलर से 'राष्ट्रीय अनुकूलन कोष' के गठन से नीतियों की पहल की जायेगी।

इसका मुख्य केन्‍द्र बिन्‍दु वायु, स्वास्थ्य, जल और सतत कृषि की पुनः परिकल्‍पना के अतिरिक्त अभियान के साथ जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्यवाही (एनएपीसीसी) के अतंर्गत राष्ट्रीय अभियानों को फिर से प्रारंभ करना है।  

अनुकूलन रणनीति का उपयोग भूमि और जल संसाधन के स्थायी उपयोग के लिए किया जाता है। देश भर में मृदा स्वास्थ्य कार्ड के क्रियान्वयन, जलशोधन और जल कुशल सिंचाई कार्यक्रम के उपयोग से जोखिम रहित कृषि की दिशा का मार्ग प्रशस्त होगा। जलवायु परिवर्तन संबंधी आपदाओं से किसानों को बचाने की दिशा में फसलों का कृषि बीमा एक और महत्वपूर्ण पहल है।

2022 तक नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता को 35 गीगावॉट (गीगा वाट) से 175  गीगावॉट तक बढ़ाने के द्वारा स्वच्छ और हरित ऊर्जा का निर्माण शमन रणनीतियों में शामिल है। सौर ऊर्जा में पांच गुना वृद्धि के साथ इसे 1000 गीगावॉट तक बढ़ाना के लक्ष्य के साथ राष्ट्रीय सौर मिशन के अतिरिक्त देश भर में बिजली पारेषण और वितरण की दक्षता बढ़ाने के लिए स्मार्ट पावर ग्रिड को भी विकसित करना है। 10 प्रतिशत ऊर्जा खपत को बचाने हेतु ऊर्जा की खपत को रोकने के लिए ऊर्जा संरक्षण की दिशा में एक राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू किया गया है।

हालांकि ये जलवायु परिवर्तन के मुद्दे के समाधान की दिशा में सूक्ष्म स्तर की नीतियां हैं,  लेकिन भारत सरकार ने ऐसी सूक्ष्म परियोजनाओं की शुरुआत की है, जो न सिर्फ ऊर्जा बचाने के लिए महत्वपूर्ण हैं बल्कि सबसे गरीब समूहों के प्रत्यक्ष लाभ में भी योगदान कर रही हैं।

नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के तहत, उजाला योजना का शुभारंभ किया गया है जिसके अंर्तगत 22.66 करोड़ एलईडी बल्ब वितरित किए गए हैं इससे न सिर्फ 11776 करोड़ रुपये की बचत होगी बल्कि यह प्रतिवर्ष कार्बन उत्सर्जन में भी 24 मीट्रिक टन की कमी लाएगी।

इसी प्रकार से, बीपीएल कार्ड रखने वाली महिलाओं को पेट्रोलियम मुक्त एलपीजी कनेक्शन दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना पहले से ही 2 करोड़ घरों तक पहुंच चुकी है और इसे 2019 तक 8 करोड़ रूपए के परिव्यय के साथ 5 करोड़ घरों तक पहुंचाने का लक्ष्य है।

इसके उपयोग से ग्रामीण महिलाओं पर सीधे प्रभाव पड़ता है, इससे स्वच्छ ऊर्जा स्रोत तक न सिर्फ आसान पहुँच प्रदान करता है बल्कि उनके स्वास्थ्य में सुधार होता है और इसके साथ-साथ वन संसाधनों पर दबाव कम होने के अलावा कार्बन उत्सर्जन भी कम होता है।

स्वच्छ भारत मिशन की एक और रणनीति शहरी क्षेत्रों में अपशिष्ट से ऊर्जा पैदा करने की पहल भी है। इसी तरह देश भर में 816 सीवेज उपचार संयंत्रों में पुर्नचक्रण के माध्यम से अपशिष्ट जल का पुन: उपयोग करके प्रतिदिन 23,277 मिलियन लीटर पानी को स्वच्छ बनाना एक और पहल है।

बंजर भूमि का पुनरुद्धार करके वन की गुणवत्ता को बढ़ाने तथा 5 मिलियन हेक्टेयर भूमि को वन क्षेत्र में बदलने के वार्षिक लक्ष्य के साथ हरित भारत मिशन एक और पहल है जिससे प्रतिवर्ष 100 मिलियन टन कार्बन को कम किया जाएगा।

पारंपरिक भारतीय संस्कृति ने मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व की आवश्यकता पर जोर दिया है। "वसुदेव कुटंबकम" की अवधारणा के साथ पृथ्वी पर सभी जीव रूपों को एक परिवार माना जाता है और यह एक दूसरे पर निर्भरता की अवधारणा को मजबूत करता है। आधुनिक दुनिया में पृथ्वी मातृ दिवस के आगमन से पहले, वेद और उपनिषदों ने धरती को हमारी मां और मानव को बच्चों के रूप में माना है। जलवायु परिवर्तन के संकट के आगमन से पहले, हमारे पूर्वजों ने पर्यावरणीय स्थिरता की अवधारणा पर विचार किया और पृथ्वी को सुरक्षित बनाने के लिए भविष्य की पीढ़ियों तक इसे पहुँचाने का कार्य भी किया।

संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए उस वक्तव्य का स्मरण करना उचित होगा, जिसमें उन्होंने कहा कि, "हमें तकनीकी, नवीनता और वित्त पोषण के साथ सभी की पहुंच तक सस्ती, स्वच्छ और अक्षय ऊर्जा हेतु एक वैश्विक सार्वजनिक साझेदारी बनानी चाहिए। हमें अपनी जीवन शैली में समान रूप से बदलावों को देखना चाहिए जिससे ऊर्जा पर हमारी निर्भरता कम की जा सके और हमारे उपभोग अधिक दीर्घकालीन हों। यह एक वैश्विक शिक्षा कार्यक्रम को प्रारंभ करने के समान ही महत्वपूर्ण है जो हमारी धरती मां के संरक्षण और इसकी रक्षा के लिए हमारी अगली पीढ़ी को तैयार करता है।"

इस प्रकार से, यह पर्यावरण और जलवायु साक्षरता के माध्यम से ही संभव है, जिसके परिणामस्वरूप जीवन शैली में परिवर्तन से वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन में कमी लाकर हम पृथ्वी माँ को बचा सकते हैं।

 - पांडुरंग हेगड़े

राष्ट्रीय जलमार्ग -1 विकसित करने के लिए विश्व बैंक देगा 375 मिलियन डॉलर


देश की महत्वाकांक्षी जलमार्ग परियोजना को आगे बढ़ाने और नियत समय में इसे पूरा करने की दिशा में जलमार्ग विकास परियोजना के अंतर्गत राष्ट्रीय जलमार्ग -1 (National Waterway -1) की क्षमता में वृद्धि करने के लिए विश्व बैंक ने 375 मिलियन डॉलर की धनराशि को मंज़ूरी दी है।

सरकार हल्दिया से लेकर वाराणसी (1390 किलोमीटर) तक जलमार्ग विकास परियोजना के अंतर्गत 5369 करोड़ रुपये की लागत से एनडब्ल्यू-1 (गंगा नदी) को विकसित कर रही है। इस परियोजना को पूरा करने के लिए विश्व बैंक से तकनीकी एवं वित्तीय सहायता ली जा रही है। यह परियोजना 1500-2000 डीडब्ल्यूटी की क्षमता वाले जहाजों के व्यावसायिक नेविगेशन को सक्षम करेगी।

परियोजना के अंतर्गत, वाराणसी (उत्तर प्रदेश), साहिबगंज (झारखंड) और हल्दिया (पश्चिम बंगाल) में तीन बहुआयामी टर्मिनल स्थापित किए जाएंगे। वहीं दूसरी ओर कालुघाट और गाज़ीपुर में दो अंतर-मॉडल टर्मिनल, पांच रॉल ऑफ रॉल ऑन टर्मिनल (आरओ-आरओ), वाराणसी, पटना, भागलपुर, मुंगेर, कोलकाता और हल्दिया में नौका सेवा का विकास, और पोत मरम्मत और रख-रखाव की सुविधाएं विकसित की जाएंगी।

वाराणसी एवं साहिबगंज में बहु-मॉडल टर्मिनल और फरक्का में नवीन नेविगेशन लॉक को निर्मित करने के लिऑए अनुंबध किए जा चुके हैं, और इन साइटों पर काम शुरू किया जा चुका है, जबकि हल्दिया में बहु-आयामी टर्मिनल का निर्माण कार्य जल्द ही शुरू किया जाएगा। साहिबगंज में बनने वाले बहु-आयामी टर्मिनल की आधारशिला 06 अप्रैल 2017 को प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने रखी थी। अगस्त 2016 में सड़क परिवहन, राजमार्ग और जहाज़रानी मंत्री श्री नितिन गडकरी ने वाराणसी में बनाए जाने वाले बहु-आयामी टर्मिनल की आधारशिला रखी थी।

इसके अतिरिक्त, यह परियोजना भारत में पहली बार एनडब्ल्यू-1 पर गंगा सूचना सेवा प्रणाली को स्थापित करने के लिए आईडब्ल्यूए को सक्षम करेगी। नदी सूचना प्रणाली (आरआईएस) उपकरण, हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर आधारित सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) संबंधित सेवाएं हैं, जिसे अंतर्देशीय नेविगेशन में यातायात और परिवहन प्रक्रियाओं को अनुकूलित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

राष्ट्रीय जलमार्ग – 1 राष्ट्रीय महत्व का जलमार्ग है, जो उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल से होकर गुजरता है। यह इलाहाबाद, वाराणसी, गाज़ीपुर, भागलपुर, पटना, हावड़ा, हल्दिया और कोलकाता के प्रमुख शहरों सेवा में अग्रसर है और गंगा से सटे क्षेत्रों की औद्योगिक ज़रूरतों को पूरा करने में योगदान देता है। इस क्षेत्र में रेल और सड़क गलियारे काफी अधिक भरे हुए हैं। इसलिए, एनडब्ल्यू -1 का विकास, परिवहन के एक वैकल्पिक, व्यवहार्य, आर्थिक, कुशल और पर्यावरण-अनुकूल तरीके की सुविधा प्रदान करेगा।

सरकार ने वाहनों से सभी तरह की बत्तियां हटाने का फैसला किया

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देश में स्‍वस्‍थ लोकतांत्रिक मूल्‍यों को सशक्‍त बनाने के उद्देश्‍य से केंद्र सरकार ने आज एक और ऐतिहासिक कदम उठाया। प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी की अध्‍यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में देश में सभी श्रेणियों के वाहनों के ऊपर लगी सभी तरह की बत्तियां हटाने का फैसला किया। 

सरकार का स्‍पष्‍ट मानना है कि वाहनों पर लगी बत्तियां वीआईपी संस्‍कृति का प्रतीक मानी जाती हैं और लोकतांत्रिक देश में इसका कोई स्‍थान नहीं है। उनका कुछ भी औचित्‍य नहीं है। 

हालांकि आपातकालीन और राहत सेवाओं, एम्‍बुलेंस, अग्नि शमन सेवा आदि से संबंधित वाहनों पर बत्तियों लगाने की अनुमति होगी। इस फैसले को ध्‍यान में रखते हुए सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय कानून में आवश्‍यक प्रावधान करेगा।

गर्मियों में सुविधाजनक यात्रा के लिए रेलवे ने उठाये ये विशेष कदम


इस गर्मी के मौसम में सुविधाजनक यात्रा प्रदान करने के उद्देश्य से भारतीय रेलवे ने कई नई पहल की है 

रेलवे ने यात्रियों को अच्छी यात्रा की सुविधा प्रदान करने हेतु, भारतीय रेलवे ने यात्रियों के लिए कई कदम उठाये हैं। गर्मियों के दौरान पीक सीजन होने के कारण भारतीय रेलवे ने यात्रियों को सुविधाजनक यात्रा की पेशकश करने की तैयारी की है।


उपलब्ध स्थान का ज्यादा-से-ज्यादा उपयोग सुनिश्चित करने के उद्देश्य से भारतीय रेलवे ने निम्नलिखित पहल की है:-   

i) ट्रेन के प्रस्थान करने से 4 घंटे पूर्व पहले आरक्षण चार्ट को अंतिम रूप देना।
   
ii) पहला आरक्षण चार्ट तैयार हो जाने के बाद, दूसरा आरक्षण चार्ट तैयार होने तक वर्तमान टिकट बुकिंग सुविधा टिकट खिड़की तथा इंटरनेट दोनों माध्यमों से प्रदान करना।  
iii) दूसरा आरक्षण चार्ट तैयार होने के बाद उपलब्ध स्थानों (सीटों) का हस्तान्तरण अगले दूरवर्ती स्थान के टिकट के लिए करना।  

iv) निम्नलिखित सुविधाएं आईआरसीटीसी वेबसाइट के माध्यम से भी ऑनलाइन प्रदान की जाती हैं:

अ) जिन यात्रियों का टिकट प्रतीक्षा सूची में रह जाएगा उन्हें बिना किसी अतिरिक्त भार के दूसरे ट्रेन में विकल्प योजना के तहत स्थान उपलब्ध कराया जाएगा। यह सुविधा उन यात्रियों के लिए भी लागू होगी जिन्होंने अपना ई-टिकट 1 अप्रैल 2017 से पहले बुक कराया है।

ब) वैसे यात्री जिन्होंने अपना टिकट बुकिंग खिड़की से आरक्षित (बुक) कराया है वे भी आईआरसीटीसी की वेबसाइट या 139 के माध्यम से आरक्षित टिकट रद्द करा सकते हैं।

स) ई-टिकट वाले यात्री आईआरसीटीसी की वेबसाइट के माध्यम से ट्रेन प्रस्थान करने से 24 घंटे पूर्व बोडिंग स्थान भी बदल सकते हैं।      

द) व्हील चेयर के ऑनलाइन बुकिंग की सुविधा यात्रियों को मुफ्त में मुहैया कराई जाएगी।

य) आईआरसीटीसी की वेबसाइट के माध्यम से रिटायरिंग कक्षों की ऑनलाइन बुकिंग की सुविधा की शुरूआत की गई है।  

र) आईआरसीटीसी की वेबसाइट के माध्यम से डिस्पोजेबल बेडरोल्स खरीद जा सकते हैं।

ल) यात्रियों के लिए उपलब्ध भोजन के विकल्प को बढ़ाने हेतु ई-कैटरिंग की सुविधा की शुरूआत की गई है।  

#HIV #AIDS से संक्रमित लोगों को समान अधिकार के लिए विधेयक पास

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संसद ने एचआईवी एवं एड्स संक्रमित लोगों को उपचार कराने एवं उनके प्रति किसी भी प्रकार के भेदभाव को रोकने हेतु समान अधिकार सुनिश्चित करने के लिए एक महत्वपूर्ण विधेयक पारित किया है। लोकसभा द्वारा इस वर्ष 11 अप्रैल को एवं राज्यसभा द्वारा 21 मार्च को ह्यूमन इम्युनोडेफिसिएंसी वायरस (एचआईवी) एवं एक्वॉर्ड इम्युन डेफिसिएंसी सिंड्रम-एड्स (रोकथाम एवं नियंत्रण) विधेयक, 2017 पारित किया गया।

भारत में एचआईवी संक्रमण पहली बार 1986 में चेन्नई में महिला सेक्स वर्करों के बीच पाया गया। हालांकि पिछले दशक के दौरान एचआईवी की व्याप्ति में लगातार कमी आती जा रही है, फिर भी भारत अभी भी दक्षिण अफ्रीका एवं नाइजीरिया के बाद दुनिया में एचआईवी महामारी से ग्रसित तीसरा सबसे बड़ा देश है। भारत में अभी हाल में पारित किया गया एचआईवी विधेयक दक्षिण एशिया में अपनी तरह का पहला विधेयक है। दक्षिण अफ्रीका एवं नाइजीरिया ने भी भेदभाव के कुछ रूपों को प्रतिबंधित करते हुए कानून पारित किए हैं। भारत में एचआईवी से ग्रसित लोगों की अनुमानित संख्या लगभग 21 लाख है। भारत में 2015 में लगभग 86 हजार नए एचआईवी संक्रमण दर्ज किए गए जो कि वर्ष 2000 की तुलना में 66 प्रतिशत गिरावट को प्रदर्शित करता है। 2015 में एड्स से संबंधित बीमारियों से लगभग 68 हजार लोगों की मौत हुई। यह विधेयक नए संक्रमणों पर अंकुश लगाते हुए राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम को समर्थऩ देगा एवं 2030 तक इस महामारी को समाप्त करने के सतत विकास लक्ष्य अर्जित करने में मदद करेगा।

देश में ऐसे कानून की आवश्यकता के पीछे एक मुख्य वजह यह थी कि एचआईवी/एड्स को एक प्रकार के सामाजिक कलंक एवं भेदभाव की दृष्टि से देखा जाता है। हालांकि सरकार के प्रयासों एवं सिविल सोसायटी के योगदान की वजह से इस भेदभाव में बहुत कमी आई है पर अभी भी यह भेदभाव बना हुआ है। नया कानून इस भेदभाव को समाप्त करने में काफी कारगर साबित होगा। यह विधेयक भेदभाव की व्याख्या रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं, अचल संपत्ति को किराये पर देने या वहां निवास करने, सार्वजनिक या निजी कार्यालय, बीमा एवं सार्वजनिक सुविधाओं की मनाही या इन्हें समाप्त करने के रूप में करता है। सरकार या किसी व्यक्ति द्वारा इन वर्गों में से किसी में भी अनुचित बर्ताव को भेदभाव माना जाएगा और उस पर कार्रवाई हो सकती है।

विधेयक में कहा गया है कि रोजगार प्राप्त करने, स्वास्थ्य देखभाल या शिक्षा की सुविधा प्राप्त करने के लिए किसी का भी एचआईवी परीक्षण एक पूर्व आवश्यकता के रूप में नहीं किया जा सकता। यह किसी भी व्यक्ति द्वारा एचआईवी संक्रमित व्यक्तियों के खिलाफ सूचनाओं के प्रकाशन या नफरत की भावनाएं फैलाने को प्रतिबंधित करता है। गोपनीयता सुनिश्चित करने के लिए, यह विधेयक बिना सूचित सहमति के एचआईवी परीक्षण या चिकित्सा उपचार को प्रतिबंधित करता है। बहरहाल, सूचित सहमति में लाईसेंस प्राप्त ब्लड बैंकों द्वारा जांच, चिकित्सा अनुसंधान या कोई ऐसा उद्देश्य जहां परीक्षण गुमनाम हो और उसका उद्देश्य किसी व्यक्ति की एचआईवी स्थिति को निर्धारित करना ना हो, शामिल नहीं है। किसी एचआईवी संक्रमित व्यक्ति को उसकी एचआईवी स्थिति का खुलासा करने की आवश्यकता तभी पड़ेगी, जब उसके लिए न्यायालय का आदेश हो।

भेदभाव करने तथा गोपनीयता का उल्लंघन करने पर दंड के भी प्रावधान हैं। स्वास्थ्य मंत्री श्री जे.पी.नड्डा ने कहा “जो कोई विधेयक के प्रावधानों का अनुपालन नहीं करेगा, उसे दंडित किया जाएगा। ऐसे व्यक्तियों के खिलाफ दीवानी एवं आपराधिक कार्रवाई की जाएगी।” जो कोई विधेयक के कार्यान्वयन को रोकने का प्रयास करेगा, उसके खिलाफ भी कदम उठाए जाएंगे।

एचआईवी संक्रमित व्यक्तियों की गोपनीयता का उल्लंघन करने पर दो वर्ष तक की कैद और एक लाख रूपये तक का आर्थिक दंड लगाया जा सकता है।

हालांकि एड्स का उपचार या एंटी रेट्रोवायरल थेरेपी वर्तमान में सरकारी अस्पतालों में निःशुल्क है। इस विधेयक में संक्रमित लोगों के उपचार को एक कानूनी अधिकार माना गया है। इसमें कहा गया है कि, “सरकार की देखभाल और संरक्षण में प्रत्येक व्यक्ति के पास एचआईवी की रोकथाम, जांच, उपचार एवं परामर्शी सेवाओं को पाने का अधिकार होगा।” इसलिए, केंद्र एवं राज्य सरकारें संक्रमण प्रबंधन सेवाओं के साथ-साथ एड्स एवं अवसरजनित संक्रमणों के लिए उपचार उपलब्ध कराएंगी। केंद्र एवं राज्य सरकारें एचआईवी एवं एड्स के प्रचार को रोकने के लिए भी कदम उठाएंगी तथा एचआईवी या एड्स संक्रमित व्यक्तियों, विशेष रूप से महिलाओं एवं बच्चों तक कल्याणकारी योजनाओं की सुविधाएं उपलब्ध कराने में भी सहायता करेंगी। सरकार ने पिछले वर्ष एंटी रेट्रोवायरल थेरेपी पर 2 हजार करोड़ रूपये व्यय किए हैं।

ह्यूमन इम्युनोडेफिसिएंसी वायरस (एचआईवी) एवं एक्वार्ड इम्युन डेफिसिएंसी सिंड्रम-एड्स (रोकथाम एवं नियंत्रण) विधेयक, 2014 राज्यसभा में 11 फरवरी, 2014 को तत्कालीन स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री श्री गुलाम नबी आजाद द्वारा पेश किया गया था। इस विधेयक के संशोधन वर्तमान सरकार द्वारा पिछले वर्ष जुलाई में पेश किए गए थे। तब से मूल विधेयक में कई परिवर्तन किए जा चुके हैं। उदाहरण के लिए विधेयक ने “परीक्षण एवं उपचार” नीति अंगीकार किया है जिसका अर्थ यह है कि कोई भी संक्रमित व्यक्ति राज्य एवं केंद्र सरकार द्वारा निःशुल्क उपचार का हकदार होगा।

हाल में पारित विधेयक में एचआईवी संक्रमित व्यक्ति के संपदा अधिकारों के प्रावधान है। 18 वर्ष से कम उम्र के प्रत्येक एचआईवी संक्रमित व्यक्ति को एक साझा परिवार में रहने का तथा परिवार की सुविधाओं का आनंद उठाने का अधिकार है। इसमें यह भी कहा गया है कि एचआईवी संक्रमित व्यक्तियों से संबंधित मामलों का निपटान न्यायालयों द्वारा प्राथमिकता के आधार पर किया जाएगा। अगर कोई भी एचआईवी संक्रमित या प्रभावित व्यक्ति किसी कानूनी कार्रवाई में एक पक्षकार है तो न्यायालय आदेश पारित कर सकता है कि कार्रवाई का संचालन व्यक्ति की पहचान को गुप्त रखकर, बंद कमरे में किया जाए तथा किसी भी व्यक्ति को वैसी सूचना प्रकाशित करने से रोका जाए जो आवेदक की पहचान का खुलासा करता है। एचआईवी संक्रमित या प्रभावित किसी भी व्यक्ति द्वारा दायर रखरखाव आवेदन के संबंध में कोई भी आदेश पारित करते समय न्यायालय आवेदक द्वारा उठाए जाने वाले चिकित्सा व्ययों पर विचार करेगा।

विधेयक में प्रत्येक राज्य सरकार द्वारा अधिनियम एवं स्वास्थ्य देखभाल सेवाओँ के प्रावधान के उल्लंघन से संबंधित शिकायतों की जांच करने के लिए लोकपाल की नियुक्ति किए जाने की आवश्यकता व्यक्त की गयी है। लोकपाल प्राप्त आवेदनों की संख्या औऱ प्रकृति तथा की गयी कार्रवाई और पारित किए गए आदेशों के विवरण समेत प्रत्येक 6 महीने पर राज्य सरकार को एक रिपोर्ट पेश करेगा। अगर लोकपाल के आदेश का अनुपालन नहीं किया जाता है तो 10 हजार रूपये के आर्थिक दंड का भी प्रावधान है।

विधेयक के प्रारूप के निर्माण की प्रक्रिया 2002 में आरंभ हुई जब सिविल सोसायटी के सदस्यों, एचआईवी संक्रमित लोगों और सरकार द्वारा एक कानून बनाए जाने की आवश्यकता महसूस की गयी। यह विधेयक एक गैर-सरकारी संगठन लॉयर्स क्लेक्टिव की पहल है। यह 2006 में राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (एनएसओ) को प्रस्तुत किया गया था। इस विधेयक का प्रारूप एचआईवी संक्रमित व्यक्तियों, सेक्स वर्करों, समलैंगिकों, ट्रांसजैंडरों एवं नशीले पदार्थों का इस्तेमाल करने वालों, स्वास्थ्य कर्मचारियों, शिशु संगठनों, महिलाओं के समूहों, ट्रेड यूनियनों, वकीलों एवं राज्य एड्स नियंत्रण सोसायटियों समेत हितधारकों के साथ राष्ट्रव्यापी सलाह मशविरों के बाद बनाया गया था।


बाबा साहेब : एक विश्‍व मानव [126 वीं जयंती पर विशेष लेख]

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आज भारत बाबा साहेब भीमराव आबेडकर की 126वीं जयन्‍ती मना रहा है; 126 वर्ष पूर्व आज के ही दिन भीम राव का जन्‍म एक छोटे से गांव महू, जो वर्तमान में मध्‍यप्रदेश में है, के पूर्ववर्ती अस्‍पृश्‍य परिवार में हुआ था। 

वास्‍तव में बाबा साहेब आम्‍बेडकर के जीवन और कार्यों के बारे में व्‍यापक अनुसंधान, अध्‍ययन और लेखन हो चुका है। आज हम बाबा साहेब को स्‍वतंत्रता आंदोलन के महानतम नेताओं में से एक के रूप में देखते हैं, जो न केवल एक क्रांतिकारी राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में महान थे, बल्कि शैक्षिक दृष्टि से एक महान बुद्धिजीवी थे। बाबा साहेब नेताओं की उस श्रेणी से  संबद्ध थे, जिन्‍होंने ऐसे विशिष्‍ट कार्य किए, जिनके बारे में बहुत कुछ लिखा जा सकता है, बल्कि उन्‍होंने स्‍वयं भी उपयोगी विषयों पर व्‍यापक लेखन किया, जो भावी पीढि़यों के लिए पढ़ने  योग्‍य है।   

जाने माने समकालीन इतिहासकार रामचन्‍द्र गुहा ने अपनी पुस्‍तकों में से एक पुस्‍तक 'मेकर्स ऑफ मॉडर्न इंडिया' यानी 'आधुनिक भारत के निर्माता' में बाबा साहेब को आधुनिक भारत के निर्माताओं की अग्रणी पंक्ति में रखा है, जिनका जीवन एक समान रूप से असाधारण बुद्धिमता और राजनीतिक नेतृत्‍व की अभिव्‍यक्ति है। एक जान-माने अर्थशास्‍त्री, सामाजिक चिंतक और राज्‍य सभा सदस्‍य नरेन्‍द्र जाधव ने छह खंडों और दो संस्‍करणों, क्रमश: 'आम्‍बेडकर स्‍पीक्‍स' और 'आम्‍बेडकर राइट्स' में आम्‍बेडकर के भाषणों और लेखों को अलग-अलग संकलित एवं प्रकाशित किया है। जाधव ने आम्‍बेडकर को एक ''महान बुद्धिजीवी'' की संज्ञा दी है।  

बाबासाहेब बहु-आयामी व्‍यक्तित्‍व के धनी थे। अर्थशास्‍त्र, समाजशास्‍त्र, मानवविज्ञान और राजनीति जैसे अधिसंख्‍य विषयों में उनकी विद्वता ने उनमें एक स्‍पृहणीय भावना पैदा की, जिसके चलते वे किसी विषय में किसी से कम नहीं थे। इन दिनों अत्‍यन्‍त चर्चित विषय 'अधिक मूल्‍य के नोटों का विमुद्रीकरण' की परिकल्‍पना बाबा साहेब ने उस समय की थी, जब वे अर्थशास्‍त्र के विद्यार्थी थे। उनकी शाश्‍वत विरासत को किसी एक समुदाय, राजनीति, विचार या दर्शन तक सीमित करके देखना वास्‍तव में, उनके प्रति गंभीर अपकार है।     

भारतीय संविधान के निर्माता:

जिन पुरूषों और महिलाओं ने भारत के संविधान का प्रारूप तैयार किया वे अत्‍यन्‍त कल्‍पनाशील और दूरदर्शी थे। बाबा साहेब उस प्रारूप समिति के अध्‍यक्ष थे, जिसने विश्‍व के सर्वाधिक विविधता वाले राष्‍ट्र के लिए सबसे लंबे संविधान का निर्माण किया। यह संविधान दुनिया की आबादी के छठे हिस्‍से के वर्तमान और भविष्‍य को प्रभावित करता है। आप इस बात का सिर्फ अनुमान ही लगा सकते हैं कि आर्थिक और लोकतांत्रिक विकास का समावेशी मॉडल तैयार करने के लिए कितनी अनुकरणीय बुद्धिमता की आवश्‍यकता पड़ी होगी।   

बाबा साहेब एक प्रचंड शिक्षाविद के रूप में:

बाबा साहेब ने कहा था, '' पिछड़े वर्गों को यह अहसास हो गया है कि आखिरकार शिक्षा सबसे बड़ा भौतिक लाभ है, जिसके लिए वे संघर्ष कर सकते हैं। हम भौतिक लाभों की अनदेखी कर सकते हैं, लेकिन पूरी मात्रा में सर्वोच्‍च शिक्षा का लाभ उठाने के अधिकार और अवसर को नहीं भूला सकते। यह प्रश्‍न उन पिछड़े वर्गों की दृष्टि से अत्‍यन्‍त महत्‍वपूर्ण है, जिन्‍होंने तत्‍काल यह महसूस किया है कि शिक्षा के बिना उनका वजूद सुरक्षित नहीं है।'' 

शिक्षा पर बल देने के मामले में बाबा साहेब कोलंबिया यूनिवर्सिटी के अपने प्राचार्य जॉन डेवी से अत्‍यन्‍त प्रभावित थे। बाबा साहेब अपनी बौद्धिक सफलताओं का श्रेय अक्‍सर प्रोफेसर जॉन डेवी को प्रदान करते थे। प्रोफेसर जॉन डेवी एक अमरीकी दार्शनिक, मनो‍वैज्ञानिक और संभवत: एक सर्वोत्‍कृष्‍ट शिक्षा-सुधारक थे।   

बाबा साहेब औपचारिक शिक्षा विदेश में प्राप्‍त करने के जबरदस्‍त समर्थक्‍ थे। ऐसे समय में जबकि कानून की शिक्षा ब्रिटेन में प्राप्‍त करना अधिक लाभप्रद समझा जाता था, बाबासाहेब ने शाश्‍वत मानवीय मूल्‍यों के प्रति आस्‍था व्‍यक्‍त करते हुए कोलंबिया विश्‍वविद्यालय में जाने का निर्णय किया। उन्‍होंने अमरीकी रेलवे के अर्थशास्‍त्र से लेकर अमरीकी इतिहास तक विविध पाठ्यक्रमों का अध्‍ययन किया। 

धर्म के बारे में बाबासाहेब के विचार :  

डा. आम्‍बेकर ने मैन्‍माड रेलवे वर्कर्स सम्‍मेलन में 1938 में कहा था कि ''शिक्षा से अधिक महत्‍वपूर्ण चरित्र है। मुझे यह देख कर दुख होता है कि युवा धर्म के प्रति उदासीन हो रहे हैं। धर्म एक नशा नहीं है, जैसा कि कुछ लोगों का कहना है। मेरे भीतर जो अच्‍छाई है या मेरी शिक्षा से समाज को जो लाभ हो सकता है, मै उसे अपने भीतर की धार्मिक भावना के रूप में देखता हूं।'' हमें यह समझना चाहिए कि महीनों और वर्षों तक आत्‍ममंथन करने के बाद उन्‍होंने एक धर्म का चयन किया, जो उनके पैतृक धर्म के करीब था। दुनियाभर के धार्मिक प्रमुखों और वैचारिक नेताओं ने उनके समक्ष ऐसे आकर्षक प्रस्‍ताव पेश किए, जिन्‍हें ठुकराना वास्‍तव में कठिन था। उनके व्‍यक्तित्‍व के सांस्‍कृतिक और आध्‍यात्मिक पक्ष को समझना और विश्‍लेषित करना अत्‍यन्‍त कठिन है। एकता में उनकी अटूट आस्‍था थी, जिसका अनुमान उनके इस कथन से लगाया जा सकता है, ''जातीय रूप में सभी लोग विजातीय हैं। यह संस्‍कृति की एकता है, जो सजातीयता का आधार है। मैं इसे अनिवार्य समझते हुए कह सकता हूं कि कोई ऐसा देश नहीं है जो सांस्‍कृतिक एकता के संदर्भ में भारतीय प्रायद्वीप का विरोधी हो।'' 

रचनात्‍कम कूटनीतिज्ञ :

 भारत की विदेश नीति को आकार प्रदान करने में उनके योगदान की कूटनीतिक समुदाय द्वारा अक्‍सर अनदेखी की जाती है। भारत पर चीन के हमले से 11 वर्ष पहले बाबासाहेब ने भारत को पूर्व चेतावनी दी थी कि उसे चीन की बजाय पश्चिमी देशों को तरजीह देनी चाहिए और तत्‍कालीन नेतृत्‍व से कहा था कि संवैधानिक लोकतंत्र के स्‍तम्‍भ पर भारत के भविष्‍य को आकार प्रदान करे।

1951 में लखनऊ विश्‍वविद्यालय में विद्यार्थियों की एक सभा को संबोधित करते हुए उन्‍होंने कहा था कि ''सरकार की विदेश नीति भारत को सुदृढ़ बनाने में विफल रही है। भारत सयुक्‍त राष्‍ट्र  सुरक्षा परिषद में स्‍थायी सीट क्‍यों न हासिल करे। इस प्रधानमंत्री ने इसके लिए क्‍यों नहीं प्रयास किया। भारत को संसदीय लोकतंत्र और मार्क्‍सवादी तानाशाही के बीच एक का चयन करते हुए अंतिम निष्‍कर्ष पर पहुंचना चाहिए।

चीन के संदर्भ में आम्‍बेडकर तिब्‍बत नीति से पूर्णतया असहमत थे। उन्‍होंने कहा था कि ''यदि माओ का पंचशील में कोई विश्‍वास है, तो उन्‍हें अपने देश में बौद्ध धर्मावलंबियों के साथ निश्‍चित रूप से पृथक व्‍यवहार करना चाहिए। राजनीति में पंचशील के लिए कोई स्‍थान नहीं है।''    

आम्‍बेडकर ने लीग आफ डेमाक्रेसीज को अवांछित बताया। उन्‍होंने कहा ''क्‍या आप संसदीय सरकार चाहते हैं?  यदि आप ऐसा चाहते हैं तो आपको उन देशों को मित्र बनाना चाहिए, जो संसदीय सरकार रखते हैं।''

वर्तमान सरकार ने बाबासाहेब की 126वीं जयंती के अवसर पर देश के विकास में अपेक्षित हितभागिता प्रदान करने के लिए दलितों के कल्‍याण के लिए अनेक वैधानिक उपायों की घोषणा की है, जो एक उपयुक्‍त कदम है। मुद्रा योजना और अजा एवं अजजा उद्यमियों के लिए राष्‍ट्रीय केन्‍द्र की स्‍थापना जैसे उपायों से दलित निश्चित रूप से उन क्षेत्रों में अपनी सुदृढ़ उपस्थित दर्ज कर सकेंगे, जो परम्‍परागत रूप में विभिन्‍न कारणों से उनकी पहुंच से बाहर रहे हैं।    

राष्ट्रऋषि बाबा साहब अम्बेडकर कैसे बने चौदहवें रत्न ?


बाबा साहब के दादा मालोजी का गांव 'आम्बावड़े' रत्नागिरी जिले के एक कस्बे मण्डनगढ़ से पांच मील दूर था। इस ग्राम के नाम से सभी लोग उनके परिवार को 'आम्बवाडेकर' उपनाम से पुकारा करते थे। उनके पूर्वज अपने गांव में धार्मिक त्योहारों के समय देवी देवताओं की पालकियाँ उठाने का काम करते थे, जो उनके पारिवारिक सम्मान का द्योतक था।

बाबा साहब के विद्यालयी जीवन में एक ब्राह्मण अध्यापक का उन पर अत्यधिक स्नेह था। वे उन्हें मध्यान्ह में अपने साथ लाया भोजन देते थे। उनको लगता था कि आम्बावाडेकर उपनाम बोलने में अटपटा लगता है। अतः भीमराव को अपना नाम 'अम्बेडकर' देते हुए विद्यालय अभिलेखों में भी परिवर्तन करवा दिया।

बाबा साहब के पिता 'रामजी सकपाल' थे। सेना की अनिवार्य शिक्षा के कारण अपने पिता मालोजी के साथ रहते हुए ये भी शिक्षित हो गए थे। पूना के नॉर्मल स्कूल शिक्षक प्रशिक्षण प्राप्त कर ये चौदह वर्ष तक सैनिक विद्यालय में प्रधानाध्यापक रहे।

मराठी भाषा पर उनका अधिकार था तथा अंग्रेजी भी जानते थे एवम गणित में प्रवीण थे। ये कबीर पंथी होने के कारण मांस-मदिरा का सेवन नहीं करते थे क्रिकेट व फुटबाल में उनकी रूचि थी। महात्मा फुले के प्रशंसक ,समाज-कल्याण के कार्यों में सक्रिय,स्वभाव से गंभीर एवम अनुशासन प्रिय थे। आप सूबेदार मेजर के पद से सेवानिवृत्त हुए।

बाबा साहब की माता भीमाबाई थी। इनका पीहर मुम्बई के निकट थाने जिले के 'मुरबाड' गांव में था। इसी से परिवार का उपनाम था मुबाड़कर। इनका परिवार धनी,धार्मिक तथा समाज मे प्रतिष्ठा प्राप्त था क्योंकि उनके पिता और छः चाचा सेना में सूबेदार मेजर थे, उस समय ब्रिटिश सेना में किसी भारतीय की प्राप्त हो सकने वाला सर्वोच्च पद था।

इनका परिवार भी कबीर पंथी था। ऐसी कौटुम्बिक पृष्ठभूमि वाली भीमाबाई सुंदर व्यक्तित्व वाली मिलनसार, शांत व गंभीर स्वभाव वाली धार्मिक महिला थी।

ध्यान में आता है कि बाबा साहब का अनुवांशिक प्रारब्ध अत्यंत प्रबल था और दिव्य अवतरण की आधार भूमि अत्यंत उर्वर थी। इसके साथ पितृ-पुरुषों की साधना का सुयोग था। रामजी सकपाल अपने परिवार सहित महू(इंदौर) छावनी में रहते थे उस समय की घटना है।

सन्यासी चाचा अपनी जमात के साथ वहां से निकल रहे थे। उस समय की एक स्त्री ने, जो पास ही नदी में कपड़े धो रही थी, उन्हें देखकर पहचान लिया। उसने दौड़कर घरवालों को सूचना दी। परिवार के सभी सदस्य संतों के विश्राम स्थल पर गए, उनका आदर-सत्कार किया तथा उनसे प्राथना की कि वे पधारकर घर को पवित्र करें।

उन्होंने सन्यास की मर्यादानुसार घर आने से मना कर दिया किन्तु रामजी व भीमाबाई को आशीर्वाद दिया कि "अपने वंश की तीन पीढ़ियों में तीन पुरुष सन्यासी बन गए। घोर तपस्या कर तीनों ने भगवान से एक ही वर मांगा है कि 'हे भगवान ! हमारे वंश में एक ऐसा पुत्र उतपन्न कीजिये जो हमारे कुल का नाम सर्वत्र रोशन करे और अपने बंधुओं तथा धर्म के बुरे दिन समाप्त कर जाती और धर्म को प्रकाशित करें।

"भगवान ने यह वर दे दिया। तुम्हारे यहां एक ऐसा पुत्र जन्म लेगा जो तुम्हारे परिवार को ही नहीं तुम्हारी समस्त जाति ओर देश को भी पवित्र कर देगा।"

आशीर्वाद के अनुरूप 14 अप्रैल 1891(चैत्र शुक्ल सप्तमी संवत 1948) को महू छावनी में भीमाबाई की कोख पवित्र करने जिस शिशु का अवतरण हुआ वह इस दंपति की चौदहवीं सन्तान थी। उसका नाम रखा गया भीम।

जिस प्रकार समुद्र मंथन से चौदहवीं व अंतिम रतन 'अमृत' प्राप्त हुआ था, उसी प्रकार यह शिशु भी बड़ा होकर स्वयं हलाहल पीकर अन्यों को अमृत बांटने वाला शंकर सिद्ध होने वाला था।


बाबा साहेब आंबेडकर : समाज सुधारक या क्रान्तिकारी ?


अपनी विलक्षण क्षमताओं के आधार पर एक विशिष्ट स्थान बना चुके डॉ़ भीमराव अम्बेडकर की सर्वाधिक ख्याति एक संविधान निर्माता तथा समाज के उपेक्षित और वंचित वर्ग के अधिकारों की रक्षा हेतु संघर्षरत योद्घा के रूप में ही अधिक दिखाई देती है।

उनके जीवन के ये दोनों ही आयाम महत्वपूर्ण हैं किन्तु, उनके जीवन और कार्य के अनेक महत्वपूर्ण आयाम और भी हैं, जिनके बारे में अध्ययन, चिन्तन तथा विश्लेषण आवश्यकतानुरूप नहीं हो पाया है।

उनकी प्रतिभा को देश ने स्वीकार किया था, इसी के फलस्वरूप, वे संविधान निर्मात्री सभा (Drafting Committee) के सदस्य बने। उनके मन में यह लक्ष्य था कि देश में अस्पृश्य बन्धुओं को उनके संवैधानिक अधिकार दिलाने का प्रयास करूंगा।

उनको आश्चर्य तो तब हुआ जब उन्हें 'संविधान प्रारूप समिति' का सदस्य बनाया गया। और, जब उन्हें इस 'प्रारूप समिति' का अध्यक्ष बनाया गया तब तो उनके आश्चर्य की सीमा नहीं रही।

उनको स्वप्न में भी यह कल्पना नहीं थी कि एक ऐसी सभा, जिसमें अधिकांश सदस्य तथाकथित उच्च जातियों के थे, मिलकर उन जैसे एक अस्पृश्य व्यक्ति को 'प्रारूप समिति' का अध्यक्ष भी बना सकते हैं!

संविधान सभा में सभी के समक्ष अपने भाषण में वे कहते हैं: 

I came into Constituent Assembly with no greater aspiration than to safeguard the interests of the Scheduled Castes. I had not the remotest idea that I would be called upon to undertake more responsible function.

I was therefore greately surprised when the assembly elected me to the Drafting Committee. I was more than surprised when the Drafting Committee elected me to be its Chairman.

There were in the Drafting Committee men bigger, better and more competent than myself such as my friend Sir Alladi Krishanaswami Ayyar.” (Speech in Constituent Assembly on-25.11.1949)

समाज सुधारक या क्रान्तिकारी:

डॉ़ अम्बेडकर जी के जीवन में एक महत्वपूर्ण बात हमको दिखाई देती है वह यह है कि वे पुरानी सभी मान्यताओं, आदर्शों और व्यवस्थाओं को ध्वस्त करना नहीं चाहते तथा किसी जाति या वर्ण के वे शत्रु भी नहीं हैं।

डॉ़ अम्बेडकर यह जानते थे कि भारतीय दर्शन के मौलिक-तत्व बहुत उदात्त हैं। किन्तु, विकृतियों, रूढि़यों, ढोंग, पाखण्ड, कर्मकाण्डों एवं परंपराओं के अनावश्यक अतिरेक ने समस्त दर्शन को ही ढक दिया है।

धर्म जीवन का संबल है:

बाबा साहेब ने धर्म को स्पष्ट करते हुए प्रोफेसर एलवुड के विचार को प्रस्तुत किया है। वे लिखते हं: ह्यधर्म मूलत: एक मूल्य निर्धारण प्रवृत्ति है, (जो) मनुष्य के विचारों से कहीं अधिक संकल्प तथा संवेगों को सार्वभौमिक बनाती है।

इस प्रकार, 'धर्म', संकल्प तथा संवेग के पक्ष को लेकर अपनी दुनिया के साथ मनुष्यों के बीच समन्वय करता है। 'धर्म' आशा को उत्साहित करता है और जीवन संघर्ष में असभ्य तथा सभ्य दोनों में विश्वास पैदा करता है।... इसी ढंग से धर्म जीवन का सामना करने के लिए शक्ति के नये स्तरों को बनाता है, जबकि साथ ही साथ आन्तरिक तथा बाह्य पक्षों में एक घनिष्ठ समन्वय भी स्थापित करता है।' 
(डॉ़ अम्बेडकर का धर्म दर्शन, पृ़ 27, 28)

सभी को साथ लेकर चलने की बात ही उन्होंने अपने अनुयायियों को लगातार सिखलाई। उनका संघर्ष उन जातियों से नहीं वरन् उस मनोवृत्ति से था जो दूसरों को तुच्छ या अस्पृश्य समझती है। यही कारण था कि उन्होंने घृणा, वैमनस्य, द्वेष अथवा जातिगत संघर्ष को कभी भी पनपने नहीं दिया।

समाज सुधारक और राजनीतिक नेता में अन्तर:

डा़ साहब ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न सभी के सामने रखा कि अधिक साहस किस में होता है उस समाज सुधारक में जो समाज को चुनौती देता है और अपने लिए सामाजिक बहिष्कार की सजा आमन्त्रित करता है या उस राजनीतिक बन्दी में जो सरकार को चुनौती देता है और केवल कुछ महीनों की या कुछ सालों की जेल की सजा पाता है?

जब कोई समाज सुधारक समाज को चुनौती देता है तब कोई भी व्यक्ति उसको शहीद कहकर उसका स्वागत नहीं करता। लेकिन जब राजनीतिक देशभक्त सरकार को चुनौती देता है तब उसकी सराहना की जाती है और उसका उद्घारक और मुक्तिदाता के रूप में आदर किया जाता है।

अर्थशास्त्री डा़ अम्बेडकर:

यह शायद बहुत ही कम लोगों को जानकारी होगी कि डा़ अम्बेडकर एक प्रसिद्घ अर्थशास्त्री भी थे। उन्होंने विश्व के श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में जाकर अर्थशास्त्र का व्यापक अध्ययन किया था।

लंदन स्कूल ऑफ इकानामिक्स से उन्होंने एम़ए़, पी़एच़डी़, डी़एस़सी़ आदि उपाधियाँ प्राप्त की थीं। मुस्लिम बहुल क्षेत्र सिन्ध को बम्बई प्रेसीडेन्सी से अलग करना उचित नहीं

3 फरवरी 1928 को साइमन कमीशन भारत आया था। सारे देश में इसका तीव्र विरोध हुआ। उस समय मुस्लिम नेता माँग कर रहे थे कि सिन्ध क्षेत्र को बम्बई प्रेसीडेन्सी से अलग कर एक पृथक प्रान्त बना दिया जाय।

डा़ अम्बेडकर को भी बंबई विधान परिषद की प्रान्तीय समिति के लिए चुना गया था। बंबई प्रान्त की समिति ने 1929 में जो अपनी संस्तुतियाँ दी थीं उसके अनुसार उन्होंने दो प्रमुख माँगें साइमन कमीशन के सामने रखी थीं।

सिन्ध क्षेत्र को बंबई प्रेसीडेन्सी से अलग कर एक नया प्रान्त बनाया जाय । बंबई प्रान्त की 140 सीटों में से 33: स्थान मुसलमानों के लिए आरक्षित किये जायें तथा उनके लिए पृथक मुस्लिम मतदाता मण्डल भी सुनिश्चित हों ।डा़ अम्बेडकर जी ने इन दोनों मांगों का विरोध किया और अपनी रिपोर्ट अलग से दी।

मुसलमानों के लिये पृथक निर्वाचन मण्डलों का विरोध डॉ़ अम्बेडकर लिखते हैं : शायद बहुत लोग यह नहीं जानते कि केवल भारत ही एक ऐसा देश नहीं है जहाँ मुसलमान अल्पसंख्या में हैं।

दूसरे कई देशों में भी मुसलमानों की इसी प्रकार की स्थिति है। बुल्गारिया, अल्बानियाँ, ग्रीस, रूमानियाँ, यूगोस्लाविया और रूस आदि देशों में भी मुसलमान अल्पसंख्या में हैं।

क्या उन देशों में भी मुसलमानों ने पृथक निर्वाचन मण्डलों की आवश्यकता पर बल दिया है ? जिस प्रकार इतिहास के विद्यार्थी जानते हैं कि उन देशों में मुसलमानों ने पृथक निर्वाचन मण्डलों के बिना ही निर्वाह कर लिया है अतएव मुसलमानों का पक्ष लक्ष्य से कहीं दूर और तर्क से परे है।

डॉं अम्बेडकर प्रारम्भ से ही पृथक मतदाता मण्डल के विराधी थे । साईमन कमीशन के समय भी उन्होंने इस नीति का विरोध किया।

भाषा के आधार पर प्रान्त नहीं:

डॉ़ अम्बेडकर का मानना था कि भारत एक बड़ा राष्ट्र है तथा देशभर में फैली हुई भाषाएँ हमारे राष्ट्र की विविधता और समृद्घि को प्रकट करती हैं। अलग-अलग क्षेत्रों की भाषाओं ने बड़े व्यापक और श्रेष्ठ साहित्य का सृजन किया है।

सभी भाषाएँ राष्ट्र की धरोहर हैं और सभी हमारी अपनी हैं, किन्तु भाषा के आधार पर प्रान्तों की रचना उचित नहीं। प्रान्तों की रचना का आधार प्रशासन का सरल एवं सुविधाजनक संचालन ही होना चाहिये।

आर्य कहीं बाहर से नहीं आये:

अंग्रेजों द्वारा बड़ी चतुराई से यह प्रचारित किया जा रहा था कि आर्यों ने भारत पर आक्रमण किया और यहाँ प्रवेश किया। डॉ़ साहब ने बहुत परिश्रमपूर्वक एक विस्तृत शोध-ग्रन्थ लिखा।

निष्कर्ष रूप में डॉ़ अम्बेडकर का कहना था कि पश्चिमी विचारकों ने योजनापूर्वक एक षड्यन्त्र रचा और एक परिकल्पना गढ़ दी कि आर्य यहाँ पर कहीं बाहर से आये हैं और जैसा अत्याचार अंग्रेजों ने अमेरिका, आस्ट्रेलिया, कनाडा, अफ्रीका आदि देशों में जाकर वहाँ के मूल नागरिकों पर किया था वैसा ही आर्यों ने यहाँ के लोगों पर किया है।

आर्यों ने भी यहाँ के मूल निवासियों को गुलाम बनाकर शूद्रों की श्रेणी में डाल दिया है।
डॉ़ अम्बेडकर ने पश्चिमी विचारकों की इस परिकल्पना को झूठ का पुलिन्दा ही नहीं कहा वरन् एक धूर्ततापूर्ण प्रयास कहा।

विदेशनीति और डा़ अम्बेडकर:

स्वतन्त्रता के बाद प्रधानमन्त्री श्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा विदेशनीति का जो प्रारूप देश के सामने रखा गया उसको देखकर डा़ अम्बेडकर प्रसन्न नहीं थे। सामने आते हुए संभावित खतरे उन्हें स्पष्ट दिख रहे थे।

इन्हीं सब कारणों से उन्होंने केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल से त्यागपत्र दे दिया और इसकी पूर्व संध्या पर संसद में भाषण देते हुए कहा- देश की विदेश नीति को देखकर मैं केवल असंतुष्ट और व्यग्र ही नहीं हूँ वरन् मैं चिन्तातुर भी हूँ।

कोई भी व्यक्ति जो भारत की विदेश नीति के सम्बन्ध में एवं दूसरे देशों के हमारे प्रति व्यवहार के बारे में जानकारी रखता है वह दूसरे देशों के हमारे प्रति व्यवहार में हो रहे अचानक परिवर्तन से अच्छी प्रकार अवगत होगा।

15 अगस्त 1947 को जब हम स्वतन्त्र हुए तब हमारा बुरा चाहने वाला कोई भी देश नहीं था। दुनिया के सभी देश हमारे मित्र थे। केवल चार वर्षों के अन्दर सभी हमको छोड़कर चले गये हैं।

आज हमारा कोई भी मित्र शेष नहीं रह गया है। हमने स्वयं अपने आपको दूर कर लिया है। हम आज नितांत अकेले हैं, इतने अकेले कि यू़एऩओ. के अन्दर हमारे प्रस्तावों का अनुमोदन करने वाला एक भी देश नहीं है।

तिब्बत पर चीनी अधिकार के परिणाम भयंकर होंगे चीन ने 1949 के बाद से ही तिब्बत पर अपना अधिकार जमा लिया। भारत शान्त बना रहा।

तिब्बत की दर्दनाक अपील पर भी भारत ने सहायता का हाथ नहीं बढ़ाया और न ही अमेरिका, इंग्लैण्ड आदि देशों को तिब्बत की सहायता हेतु आने दिया।

डा़ अम्बेडकर कहते हैं : ल्हासा पर चीनी अधिकार की अनुमति देकर प्रधानमन्त्री जी ने चीनी सीमाओं को हमारी सीमाओं से मिलाने में बड़ा सहयोग किया है।

इन सभी बातों को देखने से मेरे को यह लगता है कि यदि आज भले ही न हो किन्तु भविष्य में भारत उनके सामने आक्रमण के लिए खुला पड़ा है और वे अवश्य ही इस पर अधिकार के लिए आगे बढ़ेंगे क्योंकि उनकी वृत्ति ही आक्रमणकारी है।

किसी वर्ग के नहीं, राष्ट्रीय नेता थे डॉ आंबेडकर:

भारत रत्न डॉ़ भीमराव आंबेडकर महामानव थे। उनका जीवन राष्ट्रहित की साधना में समर्पित रहा। उन जैसे उदाहरण अत्यंत दुर्लभ हैं। उन्होंने अपमान और तिरस्कार के बावजूद न विद्रोह किया और न समूह हित की बात की, सदैव देशहित की बात की। इसलिए बाबा साहेब के व्यक्तित्व और कृतित्व का समग्रतापूर्वक अध्ययन होना चाहिए।

आज डॉ़ आंबेडकर के विचारों के अनुरूप चलने की बहुत आवश्यकता है। डॉ़ आंबेडकर ने स्वातंत्र्य, समता और बंधुत्व के आधार पर कार्य करने की प्रेरणा और व्यवहार की सही दिशा प्रदान की ।

डॉ़ आंबेडकर भी यह मानते थे कि हिन्दू तत्व ज्ञान के प्रकाश में सम्पूर्ण हिन्दू समाज के बीच सुसंगत व्यवहार पुनस्स्थापित किया जा सकता है। 

डॉ़ आंबेडकर ने स्वातंत्र्य, समता और बंधुत्व जैसे शब्द फ्रांसीसी क्रांति से नहीं, बल्कि तथागत भगवान बुद्ध के जीवन से लिए थे।

डॉ़ आंबेडकर का मानना था कि समाज में समरसता कानून बनाने और बाह्य जीवन में परिवर्तन लाने से नहीं होगा। इसके लिए अंत:करण में परिवर्तन लाना होगा और यह कार्य समाज प्रबोधन व जागरण से ही हो सकता है। उनका स्पष्ट मत था कि यदि संविधान क्रियान्वित करने वाले प्रामाणिक नहीं रहे तो संविधान ही अर्थहीन हो जाएगा।

बाबा साहेब ने 1924 में समाज निर्माण का कार्य शुरू किया लेकिन बाबा साहेब को देश के लोगों ने समझा ही नहीं। कुछ ने समझा तो केवल सीमित मात्रा में। देश ने डॉ. आंबेडकर को कितना समझा इसका अनुमान इस बात से लगा सकते हैं कि मदर टेरेसा को उनसे दस वर्ष पूर्व भारत रत्न से सम्मानित किया गया था।

सवाल योग्यता को लेकर नहीं है, बल्कि व्यक्तित्व को समझने का है।  प्रसिद्ध अर्थशास्त्री व योजना आयोग के पूर्व सदस्य डॉ. नरेन्द्र जाधव का  है  कि भारतीय समाज ने बाबा साहेब को आज तक ठीक से समझा ही नहीं है।

उनका पूरा जीवन इस राष्ट्र को समर्पित था। बाबा साहेब जैसे महामानव को केवल दलित नेता के रूप में पहचाना जाना या स्थापित करना, उनके व्यक्तित्व का अपमान करना है। वह देशभक्त महान राष्ट्रीय नेता थे।

अपनी शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात् वे समाज के पुनर्निर्माण तथा सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक परिवर्तन में लगे रहे। उन्होंने कहा कि बहुत कम लोग जानते हैं कि डॉ. आंबेडकर लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से 'डॉक्टर ऑफ साइंस' की उपाधि प्राप्त अर्थशास्त्री थे।

वे अर्थशास्त्री के साथ-साथ समाज विज्ञानी, शिक्षाविद्, पत्रकार, नीति निर्माता, प्रशासक और आदर्श सांसद थे। श्री जाधव ने कहा कि बाबा साहेब ने 1925 में केन्द्र-राज्य सम्बंधों पर पीएच.डी. की थी।

राज्य पुनर्गठन आयोग ने 1955 में सिफारिश की थी कि 'एक भाषा, एक राज्य' के आधार पर राज्यों का गठन होना चाहिए। इसके कारण उत्तर भारत में अनेक बड़े राज्य और दक्षिण भारत में अनेक छोटे राज्य अस्तित्व में आए। इसका परिणाम भी सामने दिख रहा है। जबकि डॉ. आंबेडकर ने उसी समय 'एक राज्य, एक भाषा का सूत्र' दिया था। उनका यह सूत्र आज भी प्रासांगिक है। डॉ. आंबेडकर ने 1935 में रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। देश में रोजगार कार्यालयों को प्रारंभ करने वाले भी डॉ. आंबेडकर थे।

आज नदी जोड़ो योजना की बड़ी चर्चा होती है, लेकिन डॉ. आंबेडकर ने उसी समय इसकी आवश्यकता पर जोर दिया था।  बाबा साहेब के व्यक्तित्व को सामने लाने का प्रयास उनके लिए राजनीतिक लाभ-हानि का माध्यम नहीं है, बल्कि अत्यानंद की बात है। 


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