नमामि गंगे:उत्‍तराखंड,बिहार,झारखंड,दिल्‍ली में शुरू होंगी 19 अरब की परियोजनाएं


नमामि गंगे कार्यक्रम के शीघ्र कार्यान्वयन के लिए 19 अरब रुपये लागत की परियोजनाओं को मंजूरी 
उत्‍तराखंड, बिहार, झारखंड और दिल्‍ली में शुरू होंगी 20 परियोजनाएं 

राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) की कार्यकारी समिति ने गंगा को स्वच्छ बनाने के अभियान में तेजी लाने के लिए करीब 19 अरब रुपये लागत वाली परियोजनाओं को मंजूरी प्रदान कर दी है। कार्यकारी समिति की 02 मार्च, 2017 को हुई बैठक में मंजूर की गई 20 परियोजनाओं में से 13 उत्तराखंड से सम्बद्ध है जिनमें नए मलजल उपचार संयंत्रों की स्थापना, मौजूदा सीवर उपचार संयंत्रों का उन्नयन और हरिद्वार में मलजल नेटवर्क कायम करने जैसे कार्य शामिल हैं। इन सभी पर करीब 415 करोड़ रुपये की लागत आएगी। हरिद्वार देश के सर्वाधिक पवित्र शहरों में से एक है, जहाँ हर वर्ष लाखों श्रद्धालु आते हैं। अनुमोदित योजना का लक्ष्य न केवल शहर के 1.5 लाख स्थानीय निवासियों द्वारा, बल्कि विभिन्न प्रयोजनों के लिए इस पवित्र स्थान की यात्रा करने वाले लोगों द्वारा उत्सर्जित मलजल का उपचार भी करना है। इन सभी परियोजनाओँ के लिए केंद्र सरकार द्वारा पूर्ण वित्त पोषण किया जाएगा। यहाँ तक कि इन परियोजनाओं के प्रचालन और रख-रखाव का खर्च भी केंद्र सरकार वहन करेगी।

उत्तराखंड में अनुमोदित अन्य परियोजनाओं में से चार परियोजनाएं अलकनंदा नदी का प्रदूषण दूर करने से संबंधित है, ताकि नीचे की तरफ नदी की धार का स्वच्छतर प्रवाह सुनिश्चित किया जा सके।  इसमें गंदे पानी के नालों को नदी में जाने से रोकने के लिए उनका मार्ग बदलना, बीच मार्ग में अवरोधक संयंत्र लगाना और साथ ही चार महत्वपूर्ण स्थानों – जोशीमठ, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग और कीर्तिनगर में नए लघु एसटीपीज़ लगाना शामिल है, जिन पर करीब 78 करोड़ रूपये की लागत आएगी। इनके अलावा गंगा का प्रदूषण दूर करने के लिए ऋषिकेश में 158 करोड़ रुपये से अधिक की लागत वाली एक बड़ी परियोजना का अनुमोदन किया गया है। गंगा जैसे ही पर्वत से उतरकर मैदानी भाग में प्रवेश करती है, तो वहीं ऋषिकेश से नगरीय प्रदूषक गंगा में मिलने शुरू हो जाते हैं। गंगा को इन प्रदूषकों से छुटकारा दिलाने के लिए ऋषिकेश में यह सर्व-समावेशी परियोजना शुरू करने को हरी झंडी दिखाई गयी है। इससे न केवल सभी शहरी नालों को ऋषिकेश में गंगा में जाने से रोका जा सकेगा बल्कि उत्सर्जित जल को उपचार के जरिए फिर से इस्तेमाल योग्य भी बनाया जाएगा। ऋषिकेश संबंधी इस विशेष परियोजना में लक्कड़घाट पर 26 एमएलडी क्षमता के नये एसटीपी का निर्माण किया जाएगा जिसके लिए ऑनलाइन निगरानी प्रणाली की भी व्यवस्था है।

राष्ट्रीय राजधानी दिल्‍ली में 665 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से उत्कृष्ट प्रदूषक मानकों के साथ 564 एमएलडी क्षमता के अत्याधुनिक ओखला मलजल उपचार संयंत्र के निर्माण की परियोजना भी अनुमोदित की गयी है। यह संयंत्र मौजूदा एसटीपी फेज़- I, II, III और IV का स्थान लेगा। इसके अलावा पीतमपुरा और कोंडली में 100 करोड़ रुपये से अधिक अनुमानित लागत वाली नई मलजल पाइपलाइनें बिछाने की दो परियोजनाएं भी मंजूर की गयी है, ताकि रिसाव रोका जा सके।

पटना में कर्मालिचक और झारखंड में राजमहल में 335 करोड़ रुपये से अधिक लागत से मलजल निकासी संबंधी कार्यों का भी कार्य समिति की बैठक में अनुमोदन किया गया। वाराणसी में, जहां वर्ष भर लाखों तीर्थ यात्री आते हैं, गंगा के प्रदूषण की समस्या का समाधान करने के लिए सार्वजनिक-निजी-भागीदारी यानी पीपीपी मॉडल वाली 151 करोड़ रुपये की परियोजना का भी कार्यकारिणी की बैठक में अनुमोदन किया गया। 

‘जल क्रांति’ को ‘जन क्रांति’ बनाने की जरूरत: उमा भारती


जल मंथन-3 का किया शुभारंभ, जल को समवर्ती सूची में लाने के मुददे पर राज्यों से चर्चा

केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्री सुश्री उमा भारती ने ‘जल क्रांति’ को ‘जन ‘क्रांति’ बनाने का आह्वान किया है। सुश्री भारती ने आज नई दिल्ली में ‘जल मंथन-3’ का उद्घाटन करने के बाद समारोह को संबोधित कर रही थीं। उन्होंने कहा कि पानी बचाने की जिम्मेदारी अकेले सरकारी तंत्र की नही हो सकती बल्कि इस कार्य के लिए जन भागीदारी बहुत जरूरी है। साथ ही गैर सरकारी संगठनों के सहयोग की भी जरूरत है।

जल को बचाने के लिए नवाचारों का जिक्र करते हुए सुश्री भारती ने कहा कि उनका मंत्रालय जल के प्रयोग एवं गंगा संरक्षण पर नया कानून लाने पर विचार कर रहा है। जल को समवर्ती सूची का विषय बनाये जाने पर उऩ्होंने कहा,-‘‘राज्यसभा और लोकसभा में जल को समवर्ती सूची में लाने की मांग उठी है। इस विषय पर राज्यों के साथ बातचीत कर रहे हैं। क्या संविधान की मर्यादाओं के अंतर्गत इस का कोई निदान निकाला जा सकता है? इस पर विचार चल रहा है।’’

केन - बेतवा परियोजना में आ रही बाधाओं एवं उनके समाधान का जिक्र करते हुए केद्रीय मंत्री ने कहा ‘‘केन- बेतवा परियोजना पर तेजी से काम चल रहा है। लेकिन एआईबीपी के तहत इसकी फंडिंग का अनुपात 60-40 निर्धारित हो गया है। हमारी जददोजहद है कि यह अनुपात या तो 100 प्रतिशत हो या 90-10 प्रतिशत हो।’’ उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इस परियोजना पर 2017 के प्रारंभ में ही काम शुरू हो जायेगा एवं इसे सात साल के अंदर पूरा कर लिया जायेगा।

महानदी-गोदावरी नदी जोड़ो परियोजना पर हो रही राजनीति का जिक्र करते हुए सुश्री भारती ने कहा कि मानस-संकोष-तीस्ता-गंगा-महानदी-गोदावरी देश की नदी जोडो परियोजनाओं का ‘मदर लिंक’ है। उन्होंने कहा-‘‘इस पर जो विरोध है वह राजनीतिक है। तर्क और बुनियादी आधार के बजाय यह भावनाओं पर आधारित विरोध है। इस परियोजना से ओडिशा, बिहार एवं बंगाल की सुखाड़ तथा बाढ़ की समस्याओं का समाधान होगा।’’

केंद्रीय मंत्री ने ‘पार-तापी नर्मदा’ एवं ‘दमनगंगा पिंजल’ नदी जोड़ो परियेाजनाओं से होने वाले लाभों का जिक्र करते हुए कहा  कि ‘दमनगंगा पिंजल’ मुम्बई के लिए 2060 तक पीने के पानी की व्यवस्था करेगी और ‘पार-तापी नर्मदा’ महाराष्ट्र और गुजरात के उन आदिवासियों की प्यास बुझाएगी जो वर्षों से पानी की समस्या से जूझ रहे हैं।

गंगा संरक्षण पर हुए कार्यों की चर्चा करते हुए सुश्री भारती ने कहा कि इस पर तेजी से कार्य चल रहा है और जो गंगा विश्व की दस सबसे प्रदूषित नदियों में शामिल होती थी वह आऩे वाले समय में निश्चित ही दुनिया की 10 स्वच्छ नदियों में शामिल होगी। जल संसाधन प्रबंधन के विभिन्न विषयों की चर्चा करते हुए केन्द्रीय मंत्री ने कहा कि ‘जल उपभोक्ता संगठन’ कई राज्यों में ठीक से काम नहीं कर रहे हैं।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए केन्द्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण राज्य मंत्री श्री विजय गोयल ने कहा कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जल संरक्षण समय की मांग है। उन्होंने कहा कि यह जरूरी नहीं है कि जल के जो प्राकृतिक संसाधन हमें अतीत में मिले हैं वह भविष्य में भी उपलब्ध हों। केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण राज्य मंत्री डॉ. संजीव बालियान ने दूषित जल प्रबंधन पर और अधिक ध्यान देने का आह्वान किया। उऩ्होंने कहा कि हमारे देश में बड़ी संख्या में जल का दुरूपयोग हो रहा है यदि इसका समुचित प्रबंधन कर लिया जाए तो इस बहुमूल्य प्राकृतिक संपदा को बचाया जा सकता है। मंत्रालय के सचिव डॉ. अमरजीत सिंह ने कहा कि हमें जल के प्रयोग की  जिम्मेदारी तय करनी होगी ताकि इसका दुरूपयोग रोका जा सके। उन्होंने कहा कि इसके लिए जल संरक्षण के महत्व को समझने की संस्कृति विकसित करनी होगी।  

इस एक दिवसीय सम्‍मेलन में प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, नदी घाटी प्रबंधन, नदी संरक्षण और पारिस्थितिकी, बाढ़ प्रबंधन जल प्रयोग कुशलता और सहभागिता सिंचाई प्रबंधन जैसे विषयों पर व्‍यापक विचार-विमर्श हुआ। सम्‍मेलन में मंत्रालय की नीतियों को लोगों के प्रति ज्‍यादा मित्रवत बनाने और राज्‍यों की आवश्‍यकताओं के प्रति ज्‍यादा उत्तरदायी बनाने पर ध्‍यान दिया गया। 

इस सम्‍मेलन में राज्यों एवं संघ शासित प्रदेशों के सिंचाई/जल संसाधन मंत्री, जल प्रबंधन क्षेत्र के प्रख्यात विशेषज्ञ, गैर सरकारी संगठनों के प्रतिनिधि और केंद्र एवं राज्य सरकारों के सभी संबंधित विभागों के वरिष्‍ठ अधिकारियों समेत करीब 700 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

उल्‍लेखनीय है कि जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्री सुश्री उमा भारती ने जल संसाधन विकास और प्रबंधन में जुड़े विभिन्‍न पक्षों के बीच व्‍यापक विचार विमर्श की आवश्‍यकता पर समय-समय पर बल दिया है ताकि जल संसाधन विकास को पर्यावरण, वन्‍य जीवों और विभिन्‍न सामाजिक एवं सांस्‍कृतिक पद्धतियों के साथ बेहतर ढ़ंग से जोड़ा जा सके। जल मंथन कार्यक्रमों का आयोजन इसी उद्देश्‍य से किया जाता है।  नवंबर 2014 और फरवरी 2016 में आयोजित पहले दो जल मंथन कार्यक्रम बहुत सफल रहे हैं।

उमा भारती के बयान "गंगा की डॉल्फिन प्रदूषण से अंधी हो गई हैं" पर स्‍पष्‍टीकरण


जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्री सुश्री उमा भारती द्वारा लोक सभा में दिए गए बयान का हवाला देते हुए मीडिया के कुछ हिस्‍सों में यह खबर आई है कि बयान के अनुसार गंगा की डॉल्फिन मछलियां प्रदूषण के कारण अंधी हो गई हैं, लेकिन उनके मंत्रालय के पास इस दावे के समर्थन में कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। रिपोर्ट में जल संसाधन मंत्रालय से प्राप्‍त एक आरटीआई जवाब का हवाला भी दिया गया है। 

इस संदर्भ में यह स्‍पष्‍ट किया जा रहा है कि मंत्री महोदया नियमित आधार पर गंगा से संबंधित विभिन्‍न गतिविधियों की समीक्षा करती रहती हैं। इसी तरह की एक समीक्षा के तहत गंगा के जल-जीवन का भी जायजा लिया गया था। इस समीक्षा में एक विशेषज्ञ ने जल-जीवन के बारे में एक प्रस्‍तुतिकरण दिया था, जिसमें मंत्री महोदया को जानकारी दी गई थी कि गंगा की डॉल्फिन मछलियां नदी के प्रदूषण के कारण अंधी हो रही हैं। इस तरह मंत्री महोदया द्वारा दिया गया बयान तथ्‍यात्‍मक रूप से सही है। 

राष्‍ट्रीय स्‍वच्‍छ गंगा मिशन ने जांच के आदेश दे दिए हैं ताकि यह पता लगाया जा सके कि आरटीआई का जवाब देते समय इस तथ्‍यात्‍मक सूचना का उल्‍लेख क्‍यों नहीं किया गया। 

उमा भारती ने 560 करोड़ रुपए की नमामि‍ गंगे परि‍योजनाओं का शि‍लान्‍यास कि‍या


केंद्रीय जल संसाधन, नदी वि‍कास एवं गंगा संरक्षण मंत्री सुश्री उमा भारती ने कानपुर में गंगा बैराज पर नमामि‍ गंगे कार्यक्रम के तहत वि‍भि‍न्‍न परि‍योजनाओं का शि‍लान्‍यास कि‍या। इनमें 63 करोड़ रुपए की लागत से सीसामऊ नाले की अवरोधन और दि‍शा परि‍वर्तन योजना, नेटवर्किंग के लि‍ए 397 करोड़ रुपए की नेटवर्किंग योजना, बि‍ठूर में नदी तट के वि‍कास के लि‍ए 100 करोड़ रुपए की योजनाएं और वहां 14 घाटों और 5 शवदाह गृहों का निर्माण शामि‍ल है। इस अवसर पर उन्‍होंने कहा कि‍ उनका मंत्रालय  हाइब्रिड एन्यूटी आधारित पी पी पी मॉडल के माध्यम से शोधित जल के पुनः इस्तेमाल के लिए बाज़ार विकसित करेगा जिससे एसटीपी और ईटीपी से निकलने वाला जल वापस नदी में न जाये। मंत्री महोदया ने कहा कि‍ इसके लिए विभिन्न मंत्रालयों के साथ समझौता ज्ञापन भी किये जा रहे हैं| उन्‍होंने कहा,‍ ‘’हम गंगा जी के संरक्षण के लि‍ए निर्धारि‍त प्रक्रि‍या से गुजरेंगे। कि‍सी भी जल्‍दबाजी में कोई निर्णय नहीं लेंगे जि‍ससे कि‍ आबंटि‍त धनराशि‍ व्‍यर्थ न जाए।‘’


कार्यक्रम में अपने अध्यक्षीय संबोधन में कानपुर से लोकसभा सदस्‍य डॉ मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि गंगा की आज जो दुर्दशा हो रही है उसके लिए हम सभी जिम्मेदार हैं। हमें गंगा के प्रति अपने स्वभाव में परिवर्तन लाने की आवश्यकता है| उन्होंने सुझाव दि‍या कि‍ गंगा का इतिहास बताने वाले एक दृश्‍य और श्रव्‍य कार्यक्रम के माध्यम से लोगों में इस अभि‍यान के प्रति‍ जागरूकता फैलाई जा सकती है|  


उल्‍लेखनीय है कि‍ जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय के अंतर्गत राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन द्वारा सात राज्यों - उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, दिल्ली और हरियाणा में नमामि गंगे कार्यक्रम के अंतर्गत आने वाली गतिविधियों का क्रियान्वयन प्राथमिकता के तौर पर किया जा रहा है। इसी के तहत 7 जुलाई 2016 को सातों राज्यों में 231 परियोजनाओं का एक ही समय पर अलग-अलग स्थानों पर एक साथ शुभारंभ किया गया । इसमें विभिन्न घाटों के नवीनीकरण, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों का पुनर्वास एवं विकास, वृक्षारोपण व जैव विविधता संरक्षण की परियोजनाएं शामि‍ल हैं। कानपुर में प्रवेश स्तर की गतिविधियों के अंतर्गत 11 घाटों और 2 शवदाह गृहों के निर्माण का काम शुरु कि‍या गया।  

इस अवसर पर प्रख्यात नृत्यांगना आरुषी और उनकी टीम द्वारा गंगा जी पर एक नृत्य नाटिका भी प्रस्‍तुत की गई।  

नमामि गंगे योजना के तहत देशभर में 231 परियोजनाओं की शुरूआत

नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत देशभर में विभिन्‍न स्‍थानों पर 231 परियोजनाओं की शुरूआत हुई। नई दिल्‍ली में यह जानकारी देते हुए केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्री सुश्री उमा भारती ने बताया कि ये परियोजनाएं उत्‍तराखंड, उत्‍तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, हरियाणा और दिल्‍ली में शुरू की जा रही हैं। सुश्री भारती ने बताया कि इन परियोजनाओं में घाटों का नवीनीकरण, सीवेज ट्रीटमेंट संयंत्रों का पुनर्वास- विकास, वृक्षारोपण एवं जैव विवि‍धता संरक्षण शामिल है। 

मंत्री महोदया ने बताया कि उत्‍तराखंड के देहरादून, गढ़वाल, टीहरी गढ़वाल, रूद्र प्रयाग, हरिद्वार और चमोली जिलों में 47 परियोजनाएं शुरू की जाएगी। मुख्‍य कार्यक्रम हरिद्वार में आयोजित होगा जिसमें मंत्री महोदया के साथ उत्‍तराखंड के मुख्‍यमंत्री श्री हरीश रावत और केंद्रीय मंत्री श्री नि‍तिन गडकरी, चौधरी बीरेन्‍दर सिंह और श्री महेश शर्मा मौजूद रहेंगे। 

नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत 20 परियोजनाएं पश्चिम बंगाल के उत्‍तरी 24 परगना, नदिया, दक्षिण 24 परगना और हावड़ा जिलों में शुरू की जाएंगी। मुख्‍य कार्यक्रम बजबज में आयोजित होगा। बिहार के बक्‍सर, वैशाली, सारण, पटना और भागलपुर जिलों में 26 परियोजनाएं शुरू की जाएगी। मुख्‍य कार्यक्रम पटना में आयोजित होगा। उत्‍तर प्रदेश के अमरोहा, बिजनौर, हापुड़, मुजफ्फरनगर, मेरठ, मथुरा, इलाहाबाद, वाराणासी, फरूखाबाद और कानपुर जिलों में 112 परियोजनाएं शुरू की जाएंगी। नरोरा, मथुरा, वाराणसी और कानपुर में मुख्‍य कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। 

गंगा ग्राम योजना का उल्‍लेख करते हुए सुश्री भारती ने कहा कि इस योजना के पहले चरण में गंगा के तट पर बसे 400 गांवों का विकास किया जाएगा। उन्‍होंने बताया कि देश के 13 भारतीय प्रौद्योगिकी संस्‍थानों ने ऐसे 5-5 गांवों का विकास करने की जिम्‍मेदारी ली हैं। सुश्री भारती ने कहा कि इन गांवों के 328 सरपंचों को अब तक पंजाब के सींचेवाल गांव ले जाया गया है जहां उन्‍होंने सींचेवाल के विकास की जानकारी ली। मंत्री महोदया ने बताया कि गंगा के किनारे आठ जैव विविधता संरक्षण केंद्रों का विकास किया जाएगा। ये केंद्र ऋषिकेश, देहरादून, नरोरा, इलाहाबाद, वाराणासी, भागलपुर, साहिबगंज और बैरकपुर में स्‍थापित किए जा रहे हैं। 

राष्‍ट्रीय स्‍वच्‍छ गंगा मिशन घाटी आधारित समग्र दृष्टिकोण अपनाते हुए राष्‍ट्रीय गंगा नदी प्राधिकरण के अंतर्गत आने वाले पांच राज्‍यों में प्रदूषण नियंत्रण, जलीय संसाधन संरक्षण और संस्‍थागत विकास परियोजनाओं को लागू करने का निरंतर प्रयास कर रहा है। इन्‍हीं प्रयासों के अंतर्गत ग्रामीणों की सक्रिय भागीदारी को सुनिश्चित करने हेतु गंगा के किनारे बसे शहरों एवं 1657 ग्राम पंचायतों के ग्राम प्रधानों के साथ जन जागरूकता बढ़ाने के लिए राष्‍ट्रीय स्‍वच्‍छ गंगा मिशन द्वारा नियमित संवाद किया जा रहा है तथा उन्‍हें नमामि गंगे कार्यक्रम के अंतर्गत क्रियान्वित की जा रही विभिन्‍न गति‍विधियों से अवगत कराया जा रहा है। 

पटना में गंगा नदी पर चार लेन वाले महात्‍मा गांधी सेतु के पुनर्निर्माण को मंजूरी


प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी की अध्‍यक्षता में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने आज बिहार के पटना में एनएच-19 पर गंगा नदी के उपर 5.575 किलोमीटर लम्‍बे चार लेन वाले महात्‍मा गांधी सेतु के पुनर्निर्माण संबंधी परियोजना को मंजूरी दे दी। नये निर्माण के लिए पुल के इस क्षतिग्रस्‍त ढांचे को ढहाया जाएगा और उसके बाद स्‍टील ट्रस के साथ इसकी री-डैकिंग की जाएगी। यह परियोजना इंजीनियरिंग, खरीद एवं निर्माण (ईपीसी) मोड में होगी। इस पर 1742.01 करोड़ रुपये की लागत आने का अनुमान है। 

यह परियोजना पटना-हाजीपुर क्षेत्र को कवर करते हुए उत्‍तर और दक्षिण बिहार को जोड़ेगी। यह परियोजना यातायात, विशेषकर उत्‍तर और दक्षिण बिहार के बीच चलने वाले भारी यातायात के समय और लागत में कमी लाने के अलावा राज्‍य में बुनियादी ढांचे में सुधार की प्रक्रिया में तेजी लाएगी। महात्‍मा गांधी सेतु के पुनर्निर्माण से राज्‍य के इस क्षेत्र की सामाजिक आर्थिक स्थिति के उत्‍थान में भी मदद मिलेगी। 

पृष्‍ठभूमि :

पटना में गंगा नदी के ऊपर चार लेन वाले महात्‍मा गांधी सेतु का निर्माण 1980 के दशक में बिहार की राज्‍य सरकार ने किया था। बदहाल हालत में पहुंच चुका यह पुल उत्‍तर और दक्षिण बिहार के बीच बहुत ही महत्‍वपूर्ण कड़ी है और कई आर्थिक, साथ ही साथ सामाजिक, राजनीतिक गतिविधियों का मार्ग भी है। नेपाल और भूटान का कारोबार भी इसी संपर्क के माध्‍यम से होता है। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय पिछले 15 वर्षों से इस पुल के पुनर्निर्माण के प्रयास कर रहा है, लेकिन उसके प्रयास सफल नहीं हो सके हैं। राष्‍ट्रीय और अंतरराष्‍ट्रीय विशेषज्ञों द्वारा काफी अध्‍ययन किए जाने बाद अब यह तय किया गया कि इस पुल की मौजूदा संरचना को ढहाया जाए और उसके बाद स्‍टील ट्रस के साथ इसकी री-डैकिंग की जाए। तदनुसार, पटना में महात्‍मा गांधी सेतु की संरचना के पुनर्निर्माण के लिए विस्‍तृत प्राक्‍कलन तैयार किया गया। 

जल संसाधन तथा गंगा संरक्षण मंत्रालय के बजट में 168% की बढ़ोतरी


जल संसाधन मंत्रालय का कुल संसाधन आबंटन 2015-16 के 7,431 करोड़ रुपये की तुलना में 2016-17 के बजट में बढ़ाकर 12, 517 करोड़ रुपये कर दिया गया है। यह बजटीय समर्थन और बाजार उधार से हुआ है । यह 168 प्रतिशत से अधिक वृद्धि है ।

यह जानकारी आज नई दल्ली में संवाददाताओं से बातचीत करते हुए जल संसाधन, नदी विकास तथा गंगा संरक्षण मंत्री सुश्री उमा भारती ने दी। उन्होंने बताया कि भू-जल के आवंटन में 85 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और सतत भू-जल संसाधन के लिए 6,000 करोड़ रुपये के प्रमुख कार्यक्रम को स्वीकृति मिली है ।

सुश्री उमा भारती ने शीघ्र सिचांई लाभ कार्यक्रम (एआईबीपी) की चर्चा करते हुए बताया कि इस कार्यक्रम के तहत अब तक कुल 297 परियोजनाएं शुरू की गई हैं और जिनमें से अब तक 143 परियोजनाएं पूरी हो गई हैं। 149 चल रही परियोजनाओं में से 89 परियोजनाओं को सक्रिय पाया गया है और उनमें से 46 परियोजनाएं उच्‍च प्राथमिकता श्रेणी के तहत रखी गई हैं। ये परियोजनाएं संभवत: विभिन्‍न स्‍तरों में 2020 के अंत तक पूरी हो जाएंगी। इसके अतिरिक्‍त इन 46 परियोजनाओं में से आगे 23 परियोजनाओं को चुना गया है और इन्‍हें मार्च, 2017 तक पूरा करने का लक्ष्‍य रखा गया है। उन्होंने कहा कि इन परियोजनाओं पर कार्य मिशन मोड में किया जा रहा है ताकि परियोजनाएं निर्धारित समय तक पूरी हो जाएं और इन परियोजनाओं से कृषकों को पूर्ण लाभ प्राप्‍त हो सके। उन्होंने बताया कि इन परियोजनाओं के लिए निधि की व्‍यवस्‍था करने के लिए एक नवाचारी निधियन प्रणाली तैयार की गई है। केन्‍द्र और राज्‍यों के वार्षिक बजट से 10-20 वर्षों के बीच पुनर्भुगतान अनुसूची सहित बाजार ऋण से निधि‍की व्‍यवस्‍था की जाएगी। प्राथमिकता वाली परियोजनाओं को पूरा करने के लिए केन्‍द्र और राज्‍य दोनों मिलकर मिशन मोड में कार्य करेंगे। इस कार्य में और तेजी लाने के लिए तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और महाराष्‍ट्र के सिंचाई मंत्रियों सहित कुछ अन्‍य राज्‍यों के प्रधान सचिवों की एक समिति गठित की गई है। 

सुश्री भारती ने कहा कि भारत में भूमि जल संसाधनों के अतिदोहन, अस्‍थायी सिंचाई और जल गुणवत्‍ता गिरने से भूमि जल आपूर्ति की विश्‍वसनीयता को खतरा हो रहा है। भारत विश्‍व भर में भूमि जल का सबसे बड़ा प्रयोक्‍ता है। कुल उपलब्‍ध 433 क्‍यूबिक किलोमीटर पुनर्भरणीय स्रोतों में से प्रति वर्ष 245 क्‍यूबिक किलोमीटर भूमि जल दोहन का अनुमान है जो कि विश्‍व के कुल जल का एक चौथाई से अधिक है। ग्रामीण क्षेत्रों में 60 प्रतिशत से अधिक सिंचित कृषि और 85 प्रतिशत पेयजल आपूर्ति भूमि जल पर आधारित है। राष्‍ट्रीय भूमि जल प्रबंधन सुधार परियोजना में स्‍थायी भूमि जल संसाधन प्रबंधन और सुधारों के लिए एक वातावरण तैयार करने के लिए सहायता का प्रस्‍ताव है ।

उन्होंने बताया कि कुल वित्‍तीय परिव्‍यय 6000 करोड़ रूपये है जिसमें से 3000 करोड़ रूपये आईबीआरडी ऋण के रूप में मिलेंगे । परियोजना की अवधि 6 वर्ष है। परियोजना के चार प्रमुख घटक हैं- भूमि जल प्रबंधन के लिए निर्णय सहायता तंत्र, स्‍थायी भूमि जल प्रबंधन के लिए क्षेत्र विशिष्‍ट ढ़ांचा, भूमि जल पुनर्भरण को बढ़ाना और जल उपयोग दक्षता में सुधार, समुदाय आधारित प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए संस्‍थाओं का सुदृढ़ीकरण। परियोजना जल की कमी वाले पता लगाये गये 5 राज्‍यों (हरियाणा, राजस्‍थान, गुजरात, महाराष्‍ट्र और कर्नाटक) में कार्यान्वित की जानी है।

सुश्री भारती ने कहा कि सीजीडब्‍ल्‍यूबी ने विश्‍व भर में जलभृत्‍तों के मानचित्रण के संबंध में सबसे अधिक प्रयास किया है जिसके तहत देश में मानचित्र तैयार करने योग्‍य कुल क्षेत्र लगभग 23.25 लाख वर्ग किलोमीटर और कछारी क्षेत्र में इसका वर्टीकल विस्‍तार 300 मीटर और कठोर चट्टानी क्षेत्र में 200 मीटर है । जलभृत्‍त का विस्‍तार, उनकी क्षमता, संसाधन उपलब्‍धता, रासायनिक गुणवत्‍ता, उसके स्‍थायी प्रबंधन विकल्‍पों का पता लगाया जाएगा । उन्होंने कहा कि इस कार्यक्रम से किसानों के लाभ के लिए दीर्घकालीन स्‍थायित्‍व उपलब्‍ध कराने के हेतु भूजल के सहभागिता आधारित प्रबंधन में सहायता मिलेगी ।

सुश्री भारती ने बताया कि इस समय भूमि जल की कमी वाले 8 राज्‍यों पर ध्‍यान केन्द्रित किया गया है। इसमें हरियाणा, पंजाब, राजस्‍थान, गुजरात, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु और बुंदेलखंड का 5.25 लाख वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र शामिल हैं। 1.16 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का मानचित्रण पूरा हो गया है। शेष का मानचित्रण मार्च, 2017 तक पूरा किया जाना है। संपूर्ण देश में यह कार्य 2022 तक पूरा किया जाएगा। उन्होंने कहा कि 87 जिलों को शामिल करते हुए 10 राज्‍यों के 331 ब्‍लॉकों के अलग-थलग क्षेत्रों में आर्सेनिक संदूषण का पता लगा है। जलभृत मानचित्रण से गंगा के मैदानी क्षेत्रों में आर्सेनिक मुक्त गहरे जलभृतों का पता लगाने में सहायता मिली है। सीजीडब्ल्यूबी ने पिछले वर्ष के दौरान प्रभावित क्षेत्रों में 274 कुओं का निर्माण किया है जो स्वच्छ जल की आपूर्ति के लिए राज्य सरकार को निःशुल्क सौंप दिए गए थे। इससे लगभग 30 लाख लोग लाभान्वित हुए हैं। इस वर्ष सीजीडब्ल्यूबी ने पेयजल के लिए विशेष रूप से डिजाइन किए गए कुओं का निर्माण करके उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के चयनित क्षेत्रों में जोर देते हुए आर्सेनिक नियंत्रण कार्य शुरू किया है जिससे लगभग 8 लाख लोगों को लाभ होगा। उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के बैरिया ब्लॉक और गाजीपुर जिले के करंडा ब्लॉक के आर्सेनिक प्रभावित क्षेत्र में गहरे जलभृतों से जल का प्रयोग करते हुए 62 कुओं का निर्माण किया जा रहा है। 

उन्होंने कहा कि इसी प्रकार, ब्रह्मपुर ब्लॉक, बक्सर जिले (बिहार), साहिबगंज, राजमहल एवं उध्वा ब्लॉक, साहिबगंज जिले (झारखंड) और पंडुआ ब्लॉक, हुगली जिले (पश्चिम बंगाल) में 147 कुओं का निर्माण किया जाएगा।

उन्होंने कहा कि वर्ष 2015 में सीजीडब्ल्यूबी ने बीएआरसी और एनईईआरआई के साथ मिलकर जारी राष्ट्रीय जलभृत प्रबंधन परियोजना (एनएक्यूयूआईएम) के अंतर्गत हरियाणा, राजस्थान, गुजरात और उत्तर प्रदेश राज्यों के कुछ भागों में पालियो चैनलों के संबंध में स्थल विशिष्ट अध्ययन शुरू किए हैं। प्रो. वाल्डिया, पद्म भूषण की अध्यक्षता में पालियो चैनल/सरस्वती नदी के संबंध में उपलब्ध सूचना की समीक्षा करने के लिए प्रतिष्ठित शोधकर्ताओं को शामिल करते हुए राष्ट्र स्तरीय विशेषज्ञ समिति गठित की जा रही है

देश में सौ और बाढ़ पूर्वानुमान केंद्र होंगे स्थापित


जल संसाधननदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय के अधीन केंद्रीय जल आयोग 
(सीडब्ल्यूसी) मौजूदा पंचवर्षीय योजना के दौरान अरुणाचल प्रदेश (3), हिमाचल प्रदेश 
(1)केरल (2)राजस्थान (12), सिक्किम (8) और तमिलनाडु (14) में पहली बार 
बाढ़ पूर्वानुमान केंद्र स्थापित करेगा। इसके अतिरिक्त 60 और बाढ़ पूर्वानुमान केंद्र 
उन राज्यों में स्थापित किए जाएंगे, जहां पहले से ही ऐसे केंद्र हैं। ताकि उनके दायरे 
से बाहर के क्षेत्रों को इसकी सीमा में लाया जा सके।
           
सीडब्ल्यूसी को अन्य कामों के साथ-साथ भारत में बाढ़ पूर्वानुमान गतिविधियों का 
कार्य भी सौंपा गया है। इस उद्देश्य के लिए प्रमुख नदियों और उनकी सहायक नदियों 
पर 878 स्टेशनों का एक नेटवर्क स्थापित किया गया है। इस समय, अपने नेटवर्क से 
प्राप्त हाइड्रोलॉजिकल डेटा और भारत के मौसम विभाग (आईएमडी) के बाढ़ मौसम विज्ञान 
संगठन (एफएमओ) से प्राप्त मात्रात्मक वर्षा पूर्वानुमान (क्यूपीएफ) का इस्तेमाल कर 
176 स्टेशनों के लिए (148 स्तर पूर्वानुमान और 28 अंतर्वाह यानी इनफ्लो पूर्वानुमान) 
बाढ़ का पूर्वानुमान जारी किया जाता है। सीडब्ल्यूसी के मौजूदा बाढ़ पूर्वानुमान नेटवर्क 
में 19 राज्य/संघ शासित क्षेत्र/राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र10 प्रमुख नदी घाटियों (बेसिन) 
और 72 उप-घाटियों (सब-बेसिन) को शामिल किया गया है।

अब तक 445 स्टेशनों का स्वत: डेटा संग्रह और ट्रांसमिशन सिस्टम के लिए 
आधुनिकीकरण किया गया है। झेलमअलकनंदाभागीरथीगंगाब्रह्मपुत्रयमुनाचंबलबैतरणीवमसाधारासुवर्णरेखा,
महानदीतापीगोदावरी और कृष्णा नदियों पर गणितीय मॉडल विकसित किया गया है। 
इन पूर्वानुमानों को ईमेलएसएमएस और वेबसाइट सुविधाओं का उपयोग कर फैलाया जाता है।

इस नेटवर्क के आधुनिकीकरण में स्वतः सेंसर आधारित डेटा संग्रह और सेटेलाइट आधारित 
डेटा ट्रांसमिशन प्रणाली की स्थापना करना शामिल है। ताकि समय रहते बाढ़ पूर्वानुमान और 
प्रभावी बाढ़ पूर्वानुमान के लिए एक आयामी गणितीय मॉडलिंग उपकरण का उपयोग कर 
72 घंटे के चेतावनी समय के साथ मध्यम दूरी के हाइड्रोलॉजिकल और हाइड्रोलिक मॉडल 
का विकसित किया जा सके।

जल संसाधननदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय ने 2014 के बाढ़ के मौसम के दौरान 
नई बाढ़ पूर्वानुमान वेबसाइट ई-सरफेस जल सूचना प्रणाली (ई-स्विसशुरू की थी, जिसने 
ईमेल/एसएमएस के जरिए समय पर पूर्वानुमान के प्रसार में मदद की है। नेटवर्क में शामिल 
पूर्वानुमान स्टेशनों पर पिछले 72 घंटों के दौरान नदी के जल के स्तर के रुझान भी 
वेब पोर्ट्ल (http://india-water.gov.in//ffs) पर आम जनता के लिए उपलब्ध हैं। 
इसके अलावा चेतावनी को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए गूगल के आम चेतावनी प्रोटोकाल 
यानी कॉमन एलर्टिंग प्रोटोकाल (सीएपी) का उपयोग कर बाढ़ चेतावनी संदेश प्रचारित किए 
जा रहे हैं।

 सीडब्‍ल्‍यूसी के मौजूदा और प्रस्‍तावित बाढ़ पूर्वोनुमान केंद्रों के वितरण का राज्‍यवार ब्‍यौरा 
क्रम सं.
राज्‍य/केंद्रशासित प्रदेश का नाम
मौजूदा बाढ़ पूर्वानुमान केंद्र 
12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान प्रस्‍तावित बाढ़ पूर्वानुमान केंद्र
स्‍तर
अंतर्वाह इंफ्लो)
कुल
स्‍तर
अंतर्वाह (इंफ्लो)
कुल
1
आंध्र प्रदेश
5
3
8
4
5
9
2
अरूणाचल प्रदेश
0
0
0
2
1
3
3
असम
24
0
24
5
0
5
4
बिहार
32
0
32
2
0
2
5
छत्‍तीसगढ़
1
0
1
0
0
0
6
गुजरात
6
5
11
0
1
1
7
हरियाणा
0
1
1
1
0
1
8
हिमाचल प्रदेश
0
0
0
1
0
1
9
जम्‍मू एवं कश्‍मीर
1
0
1
5
0
5
10
झारखंड
1
4
5
1
14
15
11
कर्नाटक
1
3
4
0
4
4
12
केरल
0
0
0
0
2
2
13
मध्य प्रदेश
2
1
3
0
1
1
14
महाराष्‍ट्र
7
2
9
0
1
1
15
ओडिशा
11
1
12
0
2
2
16
राजस्‍थान
0
0
0
2
10
12
17
सिक्किम
0
0
0
3
5
8
18
तमिलनाडु
0
0
0
5
9
14
19
तेलंगाना
4
4
8
2
3
5
20
त्रिपुरा
2
0
2
0
0
0
21
उत्‍तर प्रदेश
34
1
35
4
1
5
22
उत्‍तराखंड
3
0
3
1
3
4
23
पश्चिमी बंगाल
11
3
14
0
0
0
24
राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्‍ली
2
0
2
0
0
0
25
दादर एवं नागर हवेली
1
0
1
0
0
0

कुल
148
28
176
38
62
100
घाटी (बेसिन) वार आधारित मौजूदा बाढ़ पूर्वानुमान केंद्र
क्रम सं.
नदी तंत्र का नाम
बाढ़ पूर्वानुमान केंद्रों की संख्‍या
स्‍तर
अंतर्वाह (इंफ्लो)
कुल
1
गंगा और उसकी सहायक नदियां
77
10
87
2
ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियां
27
-
27
3
बराक-सिस्‍टम              
05
-
05
4
पूर्वोत्‍तर की नदियां
08
01
9
5
महानदी
03
01
04
6
गोदावरी
14
04
18
7
कृष्‍णा
03
06
09
8
पश्चिम की ओर बहने वाली नदियां
09
06
15
9
पेन्‍नार
01
-
01
10
सिंघु (झेलम)
01
-
01
कुल
148
28
176



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