भारत और चीन की सेनाओं ने लद्दाख में संयुक्त सामरिक अभ्यास #HADR किया


सीमा रक्षा सहयोग समझौता 2013 के तहत भारत और चीन के मध्य संपर्क और सहयोग बढ़ाने की पहल के एक हिस्से के रूप में भारत और चीन की सेनाओं ने दूसरे संयुक्त अभ्यास “चीन - भारत सहयोग 2016” में भाग लिया। यह मोल्डो गैरीसन के चीनी ट्रूप्स के साथ पूर्वी लद्दाख के चुशूल गैरीसन में सीमा कर्मियों की बैठक हट के क्षेत्र में 06 फरवरी, 2016 को आयोजित पहले संयुक्त अभ्यास का ही परिणाम है। 

मानवीय सहायता और आपदा राहत (एचएडीआर) के बारे में दिन भर चले अभ्यास के दौरान एक भारतीय सीमावर्ती गांव में भूकंप आने की स्थिति की कल्पना की गई। इसके बाद संयुक्त टीमों ने बचाव कार्य, निकासी और चिकित्सा सहायता प्रदान करने के कार्य किए। 

संयुक्त अभ्यास के लिए भारतीय टीम का नेतृत्व ब्रिगेडियर आर. एस. रमन ने किया और चीनी टीम का नेतृत्व सीनियर कर्नल फैन जुन ने किया। यह अभ्यास बहुत सफल रहा। और इसने न केवल प्राकृतिक आपदा के मामले में सीमा पर रहने वाले लोगों को राहत पहुंचाने के लिए किए गए कार्य को परिष्कृत किया बल्कि पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा के साथ दोनो देशों की सीमा की रखवाली करने वाले बलों के मध्य सहयोग और विश्वास के स्तर को भी बढ़ाया है। भारत और चीन के मध्य संयुक्त अभ्यास की इस श्रृंखला का उद्देश्य भारत और चीन के सीमावर्ती क्षेत्रों में दोनों देशों द्वारा सहयोग बढ़ाने, शांति और सौहार्द बनाए रखने का प्रयास करना है। 

भारत और चीन के बीच हैंड इन हैंड की शानदार शुरूआत

भारत और चीन के बीच चौथे संयुक्‍त प्रशिक्षण अभ्‍यास हैंड इन हैंड 2014 की पुणे में औंध सैनिक छावनी में शानदार शुरूआत हुई। इस संयुक्‍त अभ्‍यास का उद्देश्‍य आतंकवाद के माहौल की पृष्‍ठ भूमि में दोनों देशों की सेनाओं को एक दूसरे की कार्य संचालन प्रक्रिया से अवगत कराना है। 

इससे पहले, 16 नवम्‍बर को 13 ग्रुप आर्मी, चेंगदु सैनिक क्षेत्र की चीनी टुकड़ी चीन से सीधा लोहेगांव वायुसैनिक अड्डे पर उतरी। दो आईएल- 76 विमानों में इनके साथ पैदल सेना की एक कंपनी और अन्‍य कर्मचारी भी पहुंचे। 12 दिन का अभ्‍यास बाधाओं से निपटने, विशेष हेलीबोर्न ऑपरेशन, विभिन्‍न हथियारों को चलाने, विस्‍फोटक सामग्री के प्रबंधन तथा विद्रोही और आतंकवादी गतिविधियों में घेरो और तलाशी कार्रवाई पर केन्द्रित होगा। 

समारोह की शुरूआत औंध सैनिक शिविर में परेड ग्राउंड पर हुई। इसमें भारतीय सेना के कोर कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल बॉबी मैथ्‍यूज, और पीपल्‍स लिबरेशन आर्मी की चेंगदु सैनिक कमान के उप कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल श्री चेंग युवान के अलावा दोनों देशों के अनेक वरिष्‍ठ सैनिक अधिकारी शामिल हुए। 

इस प्रशिक्षण का उद्देश्‍य दोनों देशों की सेनाओं के बीच विश्‍वास बढ़ाना है। 

किन्नौर में चीन के जासूस, चीन का ट्रांसमीटर मिला

किन्नौर के अकपा में रेडियो ट्रांसमीटर मिलने से हिमाचल पर ड्रैगन का खतरा मंडराने लगा है। भारतीय सेना की अकपा चैकपोस्ट के समीप लगाए गए रेडियो ट्रांसमीटर में चीनी जासूसों के हाथ होने का अंदेशा है। खुफिया एजेंसियों को शक है कि कहीं किन्नौर में चीन के जासूस भी छिपे हो सकते हैं, जिन्होंने गोपनीय ढंग से मुरांग के तितलीधार में एक पेड़ पर खुफिया जानकारी लेने के लिए रेडियो ट्रांसमिटर यानी (वीएचएफ सेट) स्थापित किया है। अकपा में मिले रेडियो ट्रांसमीटर के बाद देश की सुरक्षा एजेसियां जांच में जुट गई हैं। आईटीबीपी, आईबी सेना व प्रदेश पुलिस पता लगा रही है कि आखिर एक ट्रांसमीटर की कितनी फ्रीक्वेंसी है और इसके जरिए कितनी दूरी तक संदेश भेजे जा सकते हैं। 

सीजैड एच-15ए मॉडल वाला बीएचएफ सेट चालू हालत में बताया जा रहा है। सेट के साथ एक बैटरी, एंटीना व सोलर चार्ज भी मिला है, जो कि सेट के साथ पेड़ पर ही लगाया गया था। बताया जा रहा है कि सेना की अकपा चैकपोस्ट के पास मिले इस रेडियो ट्रांसमीटर की 87 से 108 मेगा हर्ट्ज की क्षमता बताई जा रही है, जिसके जरिए कई किलोमीटर दायरे में संदेश पहुंचाया जा सकता है। ऐसे में सुरक्षा एजेंसी को शक है कि कहीं इस सेट के जरिए चीन के लिए खुफिया जानकारी तो नहीं भेजी जाती थी। चूंकि जहां पर यह मुरांग में यह सैट मिला है, वहां से तिब्बत बार्डर भी 10 से 15 किलोमीटर की आकशीय दूरी पर है। 

यह रेडियो ट्रांसमीटर किस मकसद से सोरंग के तितलधार के पेड़ पर लगाया गया था, इसकी कितनी फ्रिकवेंसी है। इसके पीछे किसका हाथ है। कहीं यह सेट सेना के वाकी-टाकी सेट को कैच तो नहीं करता था, जिसकी खुफिया जानकारी लेने के लिए इसे सेना अकपा कैंप के समीप लगाया गया है। तकनीकी जानकारों का मानना है कि रेडियो ट्रांसमीटर मिलना देश व प्रदेश के लिए एक बेहद संवेदनशील है। सीआईडी का मानना है कि यह एक रेडियो ट्रांसमीटर (ट्रैकर) लगता है। अंदेशा है कि किसी विदेशी पर्यटक ने इसे फिट किया है। चार दिसंबर को किन्नौर में भारतीय सेना के अकपा कैंप से एक किलोमीटर की दूरी पर मुरांग क्षेत्र के तितलीधार में एक पेड़ पर फिट किया गया था।

कांग्रेस की घातक तुष्टीकरण नीति के कारण देश की अखण्डता खतरे में


असम में हिंसा पर उतारू बंगलादेशी मुस्लिम घुसपैठियों का कहर अभी भी जारी है और वोटों के सौदागर सेकुलर राजनेता तथा केन्द्र सरकार इन सामूहिक नृशंस हत्याओं पर घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं। सभी जानते हैं कि पहले पूर्वी पाकिस्तान और बाद में बंगलादेश ने सुनियोजित ढंग से घुसपैठ कर असम को मुस्लिमबहुल बनाने की नीति को साकार करने में काफी हद तक सफलता प्राप्त कर ली है। असम में अब 40 से ज्यादा विधानसभा क्षेत्र मुस्लिमबहुल बना दिए गए हैं। यहां घुसपैठिये अपना विधायक चुनकर लोकतंत्र को खुली चुनौती देते हैं। पाकिस्तान व बंगलादेश से प्रेरित मुस्लिम युनाइटेड लिबरेशन टाइगर्स आफ असम (मुल्टा) काफी समय से हिन्दू युवतियों को प्रेमजाल में फंसाने और फिर उनका जबरन मतांतरण कराने के दुष्कृत्य में संलग्न है। अधिकांश गांवों से बोडो हिन्दुओं को आतंकित कर खदेड़ने में भी इन मुस्लिम घुसपैठियों ने सफलता प्राप्त की है।

10 अप्रैल, 1992 को असम विधानसभा में तत्कालीन मुख्यमंत्री हितेश्वर सैकिया ने स्वीकार किया था कि 1981 के बाद से असम में 35 लाख बंगलादेशी घुसपैठिये प्रवेश कर चुके हैं। पश्चिम बंगाल में भी तब 44 लाख घुसपैठियों ने अवैध घुसपैठ करने में सफलता पाई थी। सेकुलर राजनीतिक दलों और उसके नेताओं में वोट बैंक बढ़ाने के लालच में इन घुसपैठियों के राशन कार्ड बनवाने तथा मतदाता सूची में उनके नाम दर्ज कराने की होड़-सी लगी रहती है। 1992 से लेकर अब तक इन घुसपैठियों की संख्या में कई गुना वृद्धि हो जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। मुस्लिम कट्टरवादियों द्वारा सुलगाई गई आग में अब असम जल रहा है और राज्य तथा केन्द्र की कांग्रेस सरकारें हिंसा के इस नग्न तांडव की भी अनदेखी कर असम की आग में राजनीतिक रोटियां सेंकने की कोशिश कर रही हैं।

वस्तुत: असम को मुस्लिमबहुल बनाने का षड्यंत्र अविभाजित भारत में सन् 1941 में बंगाल और असम के मुस्लिम लीग के मंत्रिमंडल ने रचा था। असम के तत्कालीन मुख्यमंत्री मियां सादुल्ला खां ने घोषणा की थी असम में खाली जमीन पड़ी है, उस पर खेती के लिए बंगाल से जो भी मुस्लिम आकर यहां बसना चाहें, उन्हें मुफ्त में जमीन दी जाएगी। लार्ड वेवल ने अपनी डायरी में लिखा, 'सादुल्ला खां का यह आह्वान अधिक अन्न उत्पादन की आड़ में असम को मुस्लिमबहुल बनाने के लिए था।' उधर शुरू में ब्रिटिश सरकार ने बोडो हिन्दुओं की गरीबी का लाभ उठाकर उन्हें ईसाई बनवाया, बाद में मुस्लिम लीग ने उन्हें मुसलमान बनाने के लिए कुटिल योजना बनाई। 1944 में कांग्रेसी नेता गोपीनाथ बारदोलोई के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने पंचगनी जाकर गांधी जी को सूचना दी थी कि असम को मुस्लिमबहुल बनाने के लिए मुस्लिम लीग हर तरह के हथकंडे अपना रही है। उस समय अपने लेख में गांधी जी ने इस षड्यंत्र पर चिंता व्यक्त की थी। मुस्लिम लीग ने भारत विभाजन के दौरान असम व बंगाल को मुस्लिमबहुल बताकर पाकिस्तान में शामिल किए जाने की मांग की थी। डा.श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इसका विरोध करते हुए कहा था, 'असम हिन्दूबहुल क्षेत्र है तथा बंगाल का अधिकांश भाग भी हिन्दूबहुल ही है’ भारत विभाजन के दौरान असम के सिलहट जिले को मुस्लिमबहुल मानकर पाकिस्तान में मिला दिया गया था, किन्तु शेष असम हिन्दूबहुल होने के कारण भारत में ही रहा।

मोहम्मद अली जिन्ना ने भी उस समय लिखे एक लेख में कहा था 'यदि मुस्लिम लीग के नेता कुछ साल पहले से इस दिशा में प्रयास करते तो पूरे असम को मुस्लिमबहुल बनाया जा सकता था। अब भी अगले कुछ वर्षों में हम पूरे असम को मुस्लिमबहुल बना सकते हैं’ फजलुल हक, सुहरावर्दी तथा मौलाना मसानी ने पूर्वी पाकिस्तान के मुसलमानों को असम व बिहार में घुसपैठ कर बसने की अपील की थी, जिससे इन्हें मुस्लिमबहुल क्षेत्र बनाया जा सके।

जुल्फिकार अली भुट्टो ने अपनी एक पुस्तक में साफ लिखा था, 'पाकिस्तान के लिए केवल कश्मीर ही नहीं, असम भी महत्वपूर्ण है। जब तक असम हमें नहीं मिलेगा हम चैन से नहीं बैठेंगे. सूचना और प्रसारण मंत्रालय के विज्ञापन और प्रचार विभाग द्वारा 1963 में प्रसारित एक लेख में कहा गया था, 'सरकार के पास पूरे प्रमाण हैं कि किस प्रकार पूर्वी पाकिस्तान से सीमा पार कराकर असम में अवैध प्रवेश कराया जाता है। इन घुसपैठियों ने सीधे-सादे असमी किसानों की जमीन-जायदाद हथियाई है। यहां तक कि वे झूठे कागजात देकर उस जमीन के मालिकाना हक का दावा करने लगे हैं। स्थानीय अधिकारियों से साठगांठ करके उन्होंने सम्पत्ति पंजीकरण प्रमाण पत्र प्राप्त कर लिए हैं। राजनीतिक दलों ने वोटों के लालच में इन घुसपैठियों के नाम मतदाता सूचियों में चढ़वाने शुरू कर दिए हैं’

सितम्बर, 1978 में चुनाव अधिकारियों की एक बैठक में तत्कालीन चुनाव आयुक्त श्री श्यामलाल शकधर ने स्वीकार किया था, 'असम के राजनीतिक दलों के नेताओं ने ऐसे असंख्य लोगों के नाम मतदाता सूचियों में दर्ज करवा दिए हैं जो भारत के नागरिक नहीं हैं। चुनाव आयोग को ऐसे नाम तलाश कर सूची से हटाने चाहिए’ लेकिन चुनाव आयोग ने प्रयास किया तो सेकुलर राजनीतिक दलों के नेता नाम न हटाए जाने पर अड़ गए। सन् 1980 में लोकसभा के मध्यावधि चुनाव की घोषणा होते ही अखिल असम छात्र संघ (आसू) तथा असम गण परिषद (अगप) ने आंदोलन चलाकर मतदाता सूचियों में से बंगलादेशी नागरिकों के नाम हटाए जाने की मांग की। एक राष्ट्रवादी नेता ने तर्क दिया था कि यदि एक विदेशी घुसपैठिया चुनाव लड़कर सांसद बन गया तो क्या यह हमारे देश के लिए कलंक की बात नहीं होगी?

असम विधानसभा या लोकसभा चुनावों से पूर्व हर बार घुसपैठियों के नाम काटे जाने के लिए फामूले बनाए गए, किन्तु सेकुलर राजनीतिक दल घुसपैठियों को निकाले जाने का खुलकर विरोध करते रहे। बदरूद्दीन अजमल ने तो घुसपैठियों को निकाले जाने का खुलेआम विरोध किया था। इस घातक कुटिल नीति के परिणामस्वरूप असम में निरंतर बंगलादेशी मुसलमान घुसपैठ करते रहे। उन्होंने स्थानीय हिन्दू किसानों की जमीनों पर कब्जा करने में सफलता प्राप्त कर ली। इतना ही नहीं, बंगलादेशी घुसपैठियों ने सुनियोजित ढंग से असम से बाहर राजधानी दिल्ली तथा आसपास के क्षेत्रों यहां तक देश के विभिन्न भागों तक पहुंचकर वहां भी ठिकाने बना लिए हैं, जिनकी संख्या करीब 4 करोड़ आंकी जाती है। इनमें से अधिकांश आतंकवाद व अलगाववाद की घटनाओं में शामिल होने लगे। चोरी, लूट व हत्या आदि अपराधों व तस्करी में भी बंगलादेशी मुसलमान लिप्त पाए गए हैं।

असम की इस वर्तमान विकराल समस्या के लिए वास्तव में केवल वे सेकुलर दल दोषी हैं जो वोटों व सत्ता के लिए राष्ट्र की एकता व अखंडता की उपेक्षा करके बंगलादेशी घुसपैठियों का पालन-पोषण कर उन्हें असम में बसे रहने के लिए बेशर्मी से सक्रिय रहते हैं। तुष्टिकरण की यह नीति अत्यंत शर्मनाक है।

उधर, कश्मीर घाटी को योजनापूर्वक पाकिस्तानी आतंकवादियों का चरागाह बना दिया गया है। किसी आतंकवादी के मारे जाने पर उसे बेकसूर बताकर पाकिस्तान से प्रेरित तत्व सड़कों पर उतर कर सुरक्षा बलों के विरुद्ध प्रदर्शन करने लगते हैं। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला अन्य अलगाववादियों के स्वर में स्वर मिलाकर कश्मीर घाटी से सेना हटाने की मांग कर पाकिस्तान की कुटिल नीति को ही साकार करने का मार्ग प्रशस्त करने में लगे हैं। कश्मीरी वार्ताकारों ने जो रपट प्रस्तुत की है उसका गंभीरता से अध्ययन करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि वह कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाने के पाकिस्तानी एजेंडे का ही एक भाग है। इनमें से कई वार्ताकारों के चेहरे बेनकाब हो चुके हैं, क्योंकि वे पाकिस्तान के पक्ष में अंतरराष्ट्रीय मानस बनाने के लिए विदेशों में होने वाली गोष्ठियों में सक्रिय रहे हैं।

असम, त्रिपुरा, कश्मीर तथा अन्य क्षेत्रों में पनप रहे इस आतंकवाद का एकमात्र कारण वोटों के लिए मुस्लिम- तुष्टीकरण की नीति ही है। किसी भी तरह वोट बैंक बढ़ाकर सत्ता पर कब्जा करने की नीयत रखने वाले सेकुलर दलों में होड़ लगी हुई है कि राष्ट्रद्रोहियों, अलगाववादियों को, आतंकवाद को संरक्षण देने वालों को किस प्रकार संतुष्ट कर चुनावों में उनके वोट झटके जाएं। इसी स्वार्थ को पूरा करने की रणनीति के अन्तर्गत समय-समय पर हिन्दू आतंकवाद का झूठा षड्यंत्र रचकर निर्दोष साधु-साध्वियों को झूठे मामलों में फंसाकर मुस्लिमों को अपने पक्ष में करने की घातक नीति अपनाने में भी संकोच नहीं किया जाता।

स्वाधीनता से पूर्व कांग्रेस के अनेक वरिष्ठ नेता समय-समय पर यह चेतावनी देते रहे हैं कि यदि जिन्ना व मुस्लिम लीग के समक्ष कांग्रेस निरन्तर झुककर उनकी राष्ट्रघाती मांगें मानती रही तो एक दिन देश के विभाजन का दंश झेलना पड़ेगा। महामना मालवीय जी, डा.राजेन्द्र प्रसाद, राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन आदि ने कई बार यह चेतावनी दी थी। आचार्य कृपलानी ने 22 नवम्बर, 1946 को मेरठ में कांग्रेस के 54 वें अधिवेशन में अध्यक्ष पद से भाषण देते हुए कहा था, ‘¨मैं पहले भी कह चुका हूं कि कांग्रेस को अल्पसंख्यकों की उचित मांगों को स्वीकार करना चाहिए, पर देश का अहित करके नहीं। 

आज की अनेक कठिनाइयां पिछले दिनों गलत मांगें मानने से हुई हैं। यदि हमने पृथक निर्वाचन का जनतंत्र विरोधी सिद्धांत मानने से इनकार कर दिया होता तो वर्तमान उपद्रव नहीं होते। आज भी यदि हम दबाव में आकर राष्ट्रीयता की जड़ें काटने वाले सिद्धांत मान लें तो भले ही उपद्रव बंद हो जाएं, पर वह देश के साथ विश्वासघात होगा।' आचार्य कृपलानी कुछ ही दिन पूर्व पूर्वी बंगाल में हिन्दुओं के नरसंहार की घटनाओं का अवलोकन कर लौटे थे। उन्होंने कांग्रेस के अध्यक्षीय भाषण में कहा, 'मैं अभी बंगाल, बिहार से लौटा हूं।  ये लोग आग से खेल रहे थे। अहिंसक होते हुए भी मैं नहीं कह सकता कि उस अत्याचार के सामने यदि मैं होता तो मुझ पर क्या प्रतिक्रिया होती? इन उपद्रवियों ने मानवता को कलंकित किया है।'

राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन आचार्य कृपलानी के साथ नोआखली आदि उपद्रवग्रस्त क्षेत्रों में गए थे। श्री टंडन ने अपनी रपट में लिखा 'बंगाल को नोआखली ने कलंकित ही कर दिया। नोआखली आदि में जो कुछ हुआ है उसकी तुलना हीनतम नाजियों की क्रूरताओं के साथ ही हो सकती है। गुंडों के गिरोहों ने लोगों के जान-माल की होली जलाई है। इसे आचार्य कृपलानी, श्रीमती सुचेता कृपलानी, श्री शरत बोस तथा मैंने देखा है। हम कलकत्ता हवाई जहाज से पहुंचे तो अनेक नर-नारियों की आंखों में करुणा के आंसू थे। ज्योंही हम शरत बाबू के घर पहुंचे लोगों ने हमें घेर लिया। भयावह कथानक सुनाने वालों का तांता लग गया था’ राजर्षि टंडन आगे लिखते हैं, 'सायं को कोमिला पहुंचे। लोगों ने हमें घेर कर पूछा 'कांग्रेस हमारे लिए क्या कर रही है ?’ नोआखली में बताया गया, एक हिन्दू जान बचाने के लिए पेड़ पर चढ़ गया, भूखा-प्यासा लटका रहा। थक कर गिरा, बेहोश पड़ा था। हत्यारे पहुंचे, ताकि उसे जीवन बचाने की सजा दी जाए। उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिये गए ’

टंडन जी ने आगे लिखा, 'एक पीड़ित ने हमें बताया, 'हम रक्षा के लिए चिल्लाए। परंतु पुलिस की जगह लुटेरों, गुंडों के झुंड आ पहुंचे। उन्होंने बहनों के साथ भाइयों के सामने बलात्कार किया, पुत्रों के सामने माताओं को नंगा किया गया। उन्हें जमीन पर लिटाकर के बाद हलाल किया गया। फिर हाथों को खून से रंगकर उनकी महिलाओं के मुंह पर पोता गया। तत्पश्चात उनके साथ बलात्कार किया गया। यह सब मुस्लिम लीग के आगे आत्मसमर्पण करने की नीति का ही दुष्परिणाम है’ कांग्रेसी नेताओं द्वारा जिन्ना और मुस्लिम लीग को तुष्ट करने की आत्मघाती नीति का दुष्परिणाम भारत विभाजन के साथ- साथ लाखों हिन्दुओं के संहार के रूप में देश को भोगना पड़ा।

कांग्रेस के अन्य अनेक नेताओं ने भी चेतावनी दी थी कि भारत विभाजन से हिन्दू-मुस्लिम समस्या का स्थायी निदान कदापि नहीं होगा। समाजवादी नेता डा.राम मनोहर लोहिया की तो स्पष्ट चेतावनी थी कि भारत विभाजन के गुनाहगार कांग्रेसी नेता यदि सत्ता प्राप्ति के लिए अलगाववादियों को तुष्ट करने की घातक नीति का अनुसरण करते रहे तो पूरा देश एक दिन फिर अलगाववाद की गिरफ्त में आ जाएगा। आज उन महापुरुषों की भविष्यवाणी अक्षरश: सत्य सिद्ध हो रही है तथा पूरा देश आज अलगाववाद, आतंकवाद से घिर चुका है तथा हमारे देश के एक और विभाजन की साजिश सुनियोजित ढंग से रची जा रही है।

आज चीन-पाकिस्तान के साथ साठगांठ करके हमारे देश की अखंडता के लिए खुली चुनौती दे रहा है और हम इस भीषण खतरे को अनदेखा करते जा रहे हैं। चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी चाहे जब हमारी सीमा में घुसपैठ कर हमें आंखें दिखाने लगती है। चीन समय-समय पर भारत के राज्य अरुणाचल प्रदेश को चीन का हिस्सा बताता है तो हम विरोध पत्र भेजने के अलावा कोई ठोस कार्रवाई नहीं करते हैं। वह समय-समय पर झूठा आरोप लगाता है कि भारत ने सिक्किम व अरुणाचल क्षेत्र में चीन की 20 हजार वर्ग किलोमीटर भूमि दबाई हुई है। वह जम्मू-कश्मीर प्रदेश को मानचित्र पर पाकिस्तान का अंग दिखाकर हमें उत्तेजित करने का प्रयास करता रहता है।

पाकिस्तान द्वारा हमारे जिस कश्मीर के भू-भाग पर कब्जा किया हुआ है, उस स्कार्दू क्षेत्र में कारोकरम राजमार्ग के आसपास चीनी सैनिक अपने अड्डे बना चुके हैं। चीन पाकिस्तान तक अपनी सड़क बना चुका है, जो हमारे देश की सुरक्षा के लिए खतरा सिद्ध हो सकती है। नवम्बर, 2009 में लद्दाख में केन्द्र द्वारा प्रायोजित नरेगा योजना के अन्तर्गत बनाई जा रही सड़क के निर्माण में चीन ने न केवल व्यवधान डाला अपितु उसने नियंत्रण रेखा के अंदर पहुंचकर 54 किलोमीटर लम्बी अपनी सड़क बना डाली। समय-समय पर चीन और पाकिस्तान भारत में सक्रिय आतंकवादियों को शस्त्रास्त्र उपलब्ध कराते रहे हैं। उन्हें आतंकवादी घटनाओं और बम विस्फोटों का प्रशिक्षण देते हैं, यह अब किसी से छिपा नहीं है।

पं. नेहरू की चीन के प्रति दुर्बल नीति से ही चीन का दु:साहस निरंतर बढ़ता रहा। तिब्बत एक दीवार के रूप में हमारे देश की सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था। नेहरू जी ने मनमाने ढंग से 1951 में तिब्बत को एक तरह से चांदी की तश्तरी में रखकर चीन को उपहार में भेंट कर दिया। चीन ने कुछ ही समय बाद 1955 में भारत की सीमा में अतिक्रमण शुरू कर हमें आंखें दिखानी शुरू कर दी थीं। सीमा विवाद के हल के लिए चाऊ एन लाई को भारत आमंत्रित किया गया तो राजधानी दिल्ली को ‘हिंदी चीनी भाई भाई  के उद्घोषों से गुंजा दिया गया। चीन को तिब्बत उपहार में दिए जाने का समाजवादी नेता डा.राममनोहर लोहिया, आचार्य डा.रघुवीर तथा सुविख्यात राजनेता श्री कन्हैयालाल मणिकलाल मुंशी ने डटकर विरोध किया था।  अक्तूबर, 1962 में चीन ने खुले रूप में हमारी उत्तरी सीमा पर आक्रमण किया तो पूरा देश उद्वेलित हो उठा था। डा.सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने उस समय कहा था, 'हमारे अत्यधिक विश्वास और असावधानी के कारण ही हमें चीन के इस आक्रमण के रूप में इस घोर संकट का सामना करना पड़ा है’

डा. क.मा. मुंशी ने भवन जर्नल तथा भारती पत्रिका में ‘एक स्तंभ में लिखा था, 'पंचशील और भाई-भाई वाद के जादुई प्रभाव में हम पंडित नेहरू के शब्दों में, ‘हमारे ही रचे एक अवास्तविक वातावरण में, विस्तारवादी चीन के साथ हम सनातन मैत्री की दुहाई देते रहे। चीनी अजगर को संतुष्ट करने के लिए हम उसके द्वारा तिब्बत का निगल जाना भी शांति से देखते रहे।' श्री मुंशी आगे लिखते हैं, 'इस समय हमारी हजारों वर्ग मील भूमि चीन के कब्जे में है। आक्रांता को हटाने के लिए हमारे पास कोई निश्चित कार्यक्रम नहीं है। चीन के साथ हम कूटनीतिक व्यवहार अब भी इसी आशा में बनाए हुए हैं कि शायद यह अपना रवैया बदले। यह वैसा ही है जैसे नाग पंचमी के दिन सांपों को इस आशा से दूध पिलाना कि वे हमें काटेंगे नहीं ’

चीन के 1962 के आक्रमण के दौरान कम्युनिस्टों के एक गुट ने चीनी सेना को ‘¨शांति प्रिय  बताते हुए कहा था, चीन ने भारत पर कोई आक्रमण नहीं किया। हिन्दू महासभा के प्रखर सांसद श्री विशन चन्द्र सेठ ने पं. नेहरू को पत्र लिखकर कम्युनिस्ट पार्टी को राष्ट्रद्रोही करार देने की मांग की थी। उन्होंने 13 नवम्बर, 1962 को लोकसभा में भाषण में कहा था, ‘यदि वीर सावरकर की रणनीति-राजनीति के हिन्दूकरण और हिन्दुओं के  सिद्धांत को मान लिया गया होता तो चीन या पाकिस्तान कभी भी भारत पर आक्रमण का दु:स्साहस नहीं करते।' 

श्री सेठ ने निर्भीकता के साथ चीन के आक्रमण के लिए प्रधानमंत्री पं. नेहरू की ढुलमुल नीति को जिम्मेदार बताते हुए चेतावनी दी थी कि यदि यही नीति चलती रही तो भारत के एक और विभाजन की मांग उठेगी तथा हम मूकदर्शक बन सब कुछ सहन करते रहेंगे। महामना मालवीय, डा. राजेन्द्र प्रसाद, आचार्य कृपलानी, राजर्षि टंडन, डा. लोहिया, विशन चन्द्र सेठ सहित सभी राष्ट्रभक्त राजनेताओं की चेतावनियों की अनदेखी का ही परिणाम है आज का जलता असम। पर दुर्भाग्य यह कि इस आग की तपिश न सम्पूर्ण देशवासियों को उद्वेलित कर रही है और न ही सेकुलरों को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए विवश कर रही है।

- शिवकुमार गोयल (पाञ्चजन्य में)

केंद्र सरकार ने चीन से डरकर लद्दाख में कई प्रोजेक्ट्स का काम रोका

चीन की सीमा से सटे लद्दाख के डेमचेक इलाके मे बनाए जा राहे यात्री शेड पर चीन द्वारा आपत्ति जताने के बाद भारत ने प्रोजेक्ट का निमार्ण कार्य रोक दिया है। उधर चीन बेखौफ होकर भारतीय सीमा पर सड़क से लेकर बांध तक बनाए जा रहा है।

साल 2010 से ही डेमचेक इलाके में यात्री शेड का निर्माण किया जा रहा है। चीन ने 2010 में इस पर कड़ी आपत्ति जताई थी। गृह मंत्रालय द्वारा नवंबर 2010 में जम्मू कश्मीर सरकार को भेजे गए पत्र से खुलासा हुआ है कि केंद्र सरकार ने प्रोजेक्ट का कार्य रोकने के आदेश दिए थे। मंत्रालय ने लिखा था कि "आप डेमचेक इलाके में तब तक किसी भी प्रकार का कोई भी निर्माण कार्य नहीं कर सकते जब तक रक्षा मंत्रालय और विदेश मंत्रालय की क्लीसयरेंस न मिल जाए।"

लद्दाख ऑटोनोमस हिल डेवलेपमेंट काउंसिल (एलएचडीसी) में सरकार के इस फैसले के प्रति काफी नाराजी है। एलएचडीसी के सदस्य गुरमीत दोरजी सिंह ने कहा कि लद्दाख के लो सरकार के फैसले के बाद ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। एलएचडीयी के लोग अब वहां पर शत्री शेड तो क्या रक्षा मंत्रालय की अनुमति के बिना अपने घर तक नहीं बना पा रहे हैं।

गुरमीत
ने कहा कि चीन हमारी सीमाओं पर निमार्ण किए जा रहा है जबकि हमें यात्री शेड भी नहीं बनाने दिया गया। दिल्ली मे एयर कंडीशंन कमरों में बैठे लोग कैसे फैसला कर सकते हैं कि हमारे लोगों के लिए क्या उचित है और क्या अनुचित।

उधर मंत्रालय के बाद लद्दाख क्षेत्र में सभी सड़कों, स्कूलों और अस्पतालों का काम रोक दिया गया है। सरकार के इस फैसले पर क्षेत्र के लोग सवाल उठा रहे हैं।

भारत की धरा को चीन का दर्शाने पर महबूबा मुफ्ती को कोई अफ़सोस नहीं

अपने 'विजन ऑफ कश्मीर' नक्शे में अक्साई चिन कराकोरम क्षेत्र को चीन का हिस्सा बताने वाली पीडीपी को अपनी इस हरकत पर कोई अफसोस नहीं है। कश्मीर के मुख्य विपक्षी दल की नेता महबूबा मुफ्ती सोमवार को भी केवल अपने रुख पर कायम रहीं, बल्कि यहां तक कह दिया कि केंद्र को भी पीडीपी के रुख की सराहना करनी चाहिए।

वहीं, कांग्रेस ने विवादास्पद नक्शे को अत्यंत आपत्तिजनक बताते हुए पीडीपी को आड़े हाथों लिया। साथ ही कूटनीतिक और राजनीतिक गंभीरता के मद्देनजर जल्द से जल्द उसे वापस लेने की भी सलाह दी है।बकौल महबूबा, 'पीडीपी एक मात्र ऐसी पार्टी ने जिसने कश्मीर समस्या के समाधान संबंधी अपनी योजना में राज्य के उन क्षेत्रों को भी शामिल किया है, जिन्हें चीन अवैध तरीके से हथियाए हुए है।

केंद्र को हमारी इस दमदारी की प्रशंसा करनी चाहिए।'उन्होंने सवालिया अंदाज में पूछा, क्या जम्मू- कश्मीर के हथियाए गए हिस्से की वापसी की मांग करना नाजायज है। पीडीपी के नक्शे के बारे में गृह मंत्री पी चिदंबरम की टिप्पणी पर पीडीपी अध्यक्ष ने कहा,तथ्यों को जाने बगैर गृह मंत्री ने प्रतिक्रिया व्यक्त व्यक्त कर दी। महबूबा ने गृह मंत्री को नसीहत देते हुए कहा, बेहतर होता अगर वह अरुणाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के लोगों के लिए नत्थी वीजा जैसे चीन से जुड़े मुद्दों पर अपना ध्यान केंद्रित करते।

महबूबा के मुताबिक, चिदंबरम को पीडीपी की चिंता छोड़ कर लेह क्षेत्र में चीनी घुसपैठ को रोकने के लिए कुछ करना चाहिए। केंद्र को चीन के दबाव में नहीं आना चाहिए। उन्होंने कहा, पीडीपी को वैसा ही जम्मू-कश्मीर चाहिए, जो 1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के पूर्व था। यानी उन सभी हिस्सों के एकीकरण की पक्षधर है, जो पाकिस्तान और चीन के नियंत्रण में है।वहीं, कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने दिल्ली में कहा, पीडीपी को यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय संसद 22 फरवरी, 2004 को सर्वसम्मति से पारित प्रस्ताव में यह फिर से स्पष्ट कर चुकी है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है।

पीडीपी ने विजन ऑफ कश्मीर मैप [नक्शे] में पीले, हरे व लाल रंग में भारतीय भूभाग को चीन में दर्शाया है। यह अत्यंत आपत्तिजनक है। पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती जिस क्षेत्र की बात कर रही हैं, भारत के लिए उसका कूटनीतिक और राजनीतिक महत्व है। लिहाजा पीडीपी को तुरंत अपने उस नक्शे को वापस लेना चाहिए।गौरतलब है कि भारत सरकार जम्मू-कश्मीर के किसी भी हिस्से में अभी तक चीन का किसी प्रकार के दखल की बात को नहीं मानती है, जबकि पीडीपी ने अक्साई चिन व कराकोरम क्षेत्र में चीन का कब्जा बताया है।

अरुणाचल पर बोला चीन -अपने ही देश आने को वीजा की क्या जरुरत ?

अरुणाचल पर चीन ने अपना पुराना रुख फिर दोहरा दिया है. चीन ने ने अब कहा है कि अरुणाचल को विवादस्पद मानने की उसकी निति में कोई बदलाव नहीं आया है. कुछ दिन पहले ही चीन ने इस प्रदेश के दो खिलाड़ियों को नत्थी वीजा जारी किया था.

चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि पूर्वी क्षेत्र के विवादास्पद इलाके समेत चीन - भारत सीमा को लेकर चीन का रुख स्पष्ट और लम्बे समय से कायम है और भारतीय पक्ष इस बात को जानता है.

इस मुद्दे पर समाधान के लिए दोनों पक्ष अब तक 14 दौर की वार्ता कर चुकें हैं, लेकिन इसमें ज्यादा सफलता नहीं मिली है. ताज़ा मामले के मुताबिक अरुणाचल प्रदेश के दो खिलाड़ियों को चीन के फुजियान प्रान्त में वेटलिफ्टिंग ग्रां प्री में भाग लेने के लिए जाना था. चीन की ओर से उन्हें नत्थी वीजा जारी किया गया. इन दोनों को भारतीय आव्रजन अधिकारियों ने लौटा दिया था क्योकि भारत ऐसे वीजा को मान्यता नहीं देता.

चीन का मानना है कि अरुणाचल प्रदेश उसका अपना भाग है और इसलिए यहाँ के लोगों को वीजा की जरुरत ही नहीं हैं. चीन के सरकारी चाइना ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज विभाग के भारत मामलों के विशेषज्ञ रोग यिंग ने कहा कि मुझे लगता है कि चीन की निति में कोई बदलाव नहीं आया है, लेकिन उन्हें आने-जाने की सुविधा देना अच्छा है .

नितिन गडकरी को चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने आमंत्रित किया

चीन में सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी ने भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष नितिन गडकरी को बीजिंग आने का निमंत्रण दिया है ताकि दोनों दलों के बीच संबंधों को मजबूत बनाया जा सके।

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना के सूत्रों ने बताया कि गडकरी की ओर से निमंत्रण स्वीकार कर लिया गया है। सीपीसी की केंद्रीय समिति के अंतरराष्ट्रीय विभाग की ओर से गडकरी को को यह निमंत्रण भेजा गया था।

सीपीसी ने गडकरी को भेजे पत्र में कहा है, ‘‘भाजपा के अध्यक्ष के नेतृत्व में पार्टी का पहला प्रतिनिधिमंडल चीन का दौरा करेगा। आपके इस दौरे से सीपीसी और भाजपा के परस्पर संबंधों को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।’’ सीपीसी की केंद्रीय समिति के अध्यक्ष चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ हैं।

सूत्रों का कहना है कि गडकरी ने निमंत्रण स्वीकार कर लिया है और वह इस महीने के आखिर तक चीन पहुंच सकते हैं।

विनायक : नायक या खलनायक

छत्तीसगढ़ की एक अदालत ने मानवाधिकार कार्यकर्ता और पीपल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टीज के उपाध्यक्ष विनायक सेन को राजद्रोह के मामले में उम्र कैद की सजा सुनाई है। विनायक सेन को यह सजा नक्सलियों के साथ संबंध रखने और उनको सहयोग देने के आरोप साबित होने के बाद सुनाई गई है।

अदालत द्वारा विनायक सेन को उम्रकैद की सजा सुनाए जाने के बाद देशभर के चुनिंदा वामपंथी लेखक, बुद्धिजीवी आदोलित हो उठे हैं। इन्हें लगता है कि न्यायपालिका ने विनायक सेन को सजा सुनाकर बेहद गलत किया है और उसने राज्य की दमनकारी नीतियों का साथ दिया है। उन्हें यह भी लगता है कि यह विरोध की आवाज को कुचलने की एक साजिश है। विनायक सेन को हुए सजा के खिलाफ वामपंथी छात्र संगठन से जुड़े विद्यार्थी और नक्सलियों के हमदर्द दर्जनों बुद्धिजीवी दिल्ली के जंतर-मंतर पर इकट्ठा हुए और जमकर नारेबाजी की। बेहद उत्तेजक और घृणा से लबरेज भाषण दिए गए।जंतर-मंतर पर जिस तरह के भाषण दिए जा रहे थे वह बेहद आपत्तिजनक थे। वहा बार-बार यह दुहाई दी जा रही थी कि राज्य सत्ता विरोध की आवाज को दबा देती है और अघोषित आपातकाल का दौर चल रहा है।

वहा मौजूद एक वामपंथी विचारक ने शकर गुहा नियोगी और सफदर हाशमी की हत्या को सरकार-पूंजीपति गठजोड़ का नतीजा बताया। उनका तर्क था जब भी राज्य सत्ता के खिलाफ कोई आवाज अपना सिर उठाने लगती है तो सत्ता उसे खामोश करने का हर संभव प्रयास करता है।शकर गुहा नियोगी और सफदर हाशमी की हत्या तो इन वामंपंथी लेखकों-विचारकों को याद रहती है, उसके खिलाफ डंडा-झडा लेकर साल दर साल धरना प्रदर्शन और विचार गोष्ठिया भी आयोजित होती हैं, लेकिन उसी साहिबाबाद में नवंबर में पैंतालीस साल के युवा मैनेजर की मजदूरों द्वारा पीट-पीट कर हत्या किए जाने के खिलाफ इन वामपंथियों ने एक भी शब्द नहीं बोला।

मजदूरों द्वारा मैनेजर की सरेआम पीट-पीटकर नृशस तरीके से हत्या पर इनमें से किसी ने भी मुंह खोलना गंवारा नहीं समझा। कोई धरना प्रदर्शन या बयान तक जारी नहीं हुआ, क्योंकि मैनेजर तो पूंजीपतियों का नुमाइंदा होता है लिहाजा उसकी हत्या को गलत करार नहीं दिया जा सकता है।

परंतु हमारे देश के वामपंथी यह भूल जाते हैं कि गाधी के इस देश में हत्या और हिंसा को किसी भी तरह जायज नहीं ठहराया जा सकता है। शकर गुहा नियोगी या सफदर हाशमी की हत्या की जिसकी पुरजोर निंदा की जानी चाहिए और दोषियों को किसी भी कीमत पर नहीं बख्शा जाना चाहिए, लेकिन उतने ही पुरजोर तरीके से फैक्ट्री के मैनेजर की हत्या का भी विरोध होना चाहिए और उसके मुजरिमों को भी उतनी ही सजा मिलनी चाहिए जितनी नियोगी और सफदर के हत्यारे को।

दो अलग-अलग हत्या के लिए दो अलग-अलग मापदंड नहीं अपनाए जा सकते।ठीक उसी तरह से अगर विनायक सेन के कृत्य राजद्रोह की श्रेणी में आते हैं तो उन्हें इसकी सजा मिलनी ही चाहिए और अगर निचली अदालत से कुछ गलत हुआ है तो वह हाईकोर्ट या फिर सुप्रीम कोर्ट से निरस्त हो जाएगा। अदालतें सुबूत और गवाहों के आधार पर फैसला करती हैं। आप अदालतों के फैसले की आलोचना तो कर सकते हैं, लेकिन उन फैसलों को वापस लेने के लिए धरना प्रदर्शन करना घोर निंदनीय है।

भारतीय संविधान में न्याय की एक प्रक्रिया है और यदि निचली अदालत से किसी को सजा मिलती है तो उसके बाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का विकल्प खुला हुआ है। अगर निचली अदालत में कुछ गलत हुआ है तो ऊपर की अदालत उसको हमेशा सुधारती रही है। ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं जहा निचली अदालत से मुजरिम बरी करार दिए गए हैं, लेकिन ऊपरी अदालत ने उनको कसूरवार ठहराते हुए सजा मुकर्रर की है।दिल्ली के चर्चित मट्टू हत्याकाड में आरोपी संतोष सिंह को निचली अदालत ने बरी कर दिया, लेकिन उसे ऊपरी अदालत से जमानत मिली। ठीक इसी तरह से निचली अदालत से दोषी करार दिए जाने के बाद भी कई मामलों में ऊपर की अदालत ने मुजरिमों को बरी किया है।

लोकतंत्र में संविधान के मुताबिक एक तय प्रक्रिया है तथा संविधान और लोकतंत्र में आस्था रखने वाले सभी जिम्मेदार नागरिकों से उस तय संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करने की अपेक्षा की जाती है।विनायक सेन के मामले में भी उनके परिवार वालों ने हाईकोर्ट जाने का ऐलान कर दिया है, लेकिन बावजूद इसके यह वामपंथी नेता और बुद्धिजीवी अदालत पर दबाव बनाने के मकसद से धरना-प्रदर्शन और बयानबाजी कर रहे हैं।

दरअसल इन वामपंथियों के साथ बड़ी दिक्कत यह है कि अगर कोई भी संस्था उनके मन मुताबिक चले तो वह संस्था आदर्श है, लेकिन अगर उनके सिद्धातों और चाहत के खिलाफ कुछ काम हो गया तो वह संस्था सीधे-सीधे सवालों के घेरे में आ जाती है। अदालतों के मामले में भी ऐसा ही हुआ है जो फैसले इनके मन मुताबिक होते हैं उसमें न्याय प्रणाली में इनका विश्वास गहरा जाता है, लेकिन जहा भी उनके अनुरूप फैसले नहीं होते हैं वहीं न्यायप्रणाली संदिग्ध हो जाती है।

रामजन्म भूमि बाबरी मस्जिद विवाद के पहले यही वामपंथी नेता कहा करते थे कि कोर्ट को फैसला करने दीजिए वहा से जो तय हो जाए वह सबको मान्य होना चाहिए, जब इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला उनके मनमुताबिक नहीं आया तो अदालत की मंशा संदिग्ध हो गई। इस देश में इस तरह के दोहरे मानदंड नहीं चल सकते।

अगर हम वामपंथ के इतिहास को देखें तो उनकी भारतीय गणतंत्र और संविधान में आस्था हमेशा से शक के दायरे में रही है। जब भारत को आजादी मिली तो उसे शर्म करार देते हुए उसे महज गोरे बुर्जुआ के हाथों से काले बुर्जुआ के बीच शक्ति हस्तातरण बताया गया था।यह भी ऐतिहासितक तथ्य है कि कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया यानी सीपीआई ने फरवरी 1948 में नवजात राष्ट्र भारत के खिलाफ हथियारबंद विद्रोह शुरू किया था और उस पर काबू पाने में तकरीबन तीन साल लग गए थे और वह भी रूस के शासक स्टालिन के हस्तक्षेप के बाद ही संभव हो पाया था। 1950 में सीपीआई ने संसदीय व्यवस्था में आस्था जताते हुए आम चुनाव में हिस्सा लिया, लेकिन साठ के दशक के शुरुआत में पार्टी दो फाड़ हो गई और सीपीएम का गठन हुआ।

सीपीएम हमेशा से रूस के साथ-साथ चीन को भी अपना रहनुमा मानता आया है। तकरीबन एक दशक बाद सीपीएम भी टूटा और माओवादी के नाम से एक नया धड़ा सामने आया। सीपीएम तो सिस्टम में बना रहा, लेकिन माओवादियों ने सशस्त्र क्राति के जरिए भारतीय गणतंत्र को उखाड़ फेंकने का ऐलान कर दिया।

विचारधारा के अलावा भी वह हर चीज के लिए चीन का मुंह देखते थे।माओवाद में यकीन रखने वालों का एक नारा उस समय काफी मशहूर हुआ था कि चीन के चेयरमैन हमारे चेयरमैन। माओवादी नक्सली अब भी सशस्त्र क्राति के माध्यम से भारतीय गणतंत्र को उखाड़ फेंकने की मंशा पाले बैठे हैं। क्या इस विचारधारा को समर्थन देना राजद्रोह नहीं है?नक्सलियों के हमदर्द हमेशा से यह तर्क देते हैं कि वो हिंसा का विरोध करते हैं, लेकिन साथ ही वह यह जोड़ना नहीं भूलते कि हिंसा के पीछे राज्य की दमनकारी नीतिया हैं।

देश में हो रही हिंसा का खुलकर विरोध करने के बजाय नक्सलियों को हर तरह से समर्थन देना कितना जायज है इस पर राष्ट्रव्यापी बहस होनी चाहिए।एंटोनी पैरेल ने ठीक कहा है कि भारत के मा‌र्क्सवादी पहले भी और अब भी भारत को मा‌र्क्सवाद के तर्ज पर बदलना चाहते हैं, लेकिन वह मा‌र्क्सवाद में भारतीयता के हिसाब से बदलाव नहीं चाहते हैं। एंटोनी के इस कथन से यह साफ हो जाता है कि यही भारत में मा‌र्क्स के चेलों की सबसे बड़ी कमजोरी है।

विनायक सेन अगर बेकसूर हैं तो अदालत से वह बरी हो जाएंगे, लेकिन अगर कसूरवार हैं तो उन्हें सजा अवश्य मिलेगी। भारत के तमाम बुद्धिजीवियों को अगर देश के संविधान और कानून में आस्था है तो उनको धैर्य रखना चाहिए और अंतिम फैसले का इंतजार करना चाहिए। इसलिए न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े करने अथवा किसी तरह दबाव बनाने की राजनीति से बाज आना चाहिए और इसके लिए किए जा रहे धरने-प्रदर्शन को तत्काल बंद कर दिया जाए।

चीन ने कश्मीर के लिए स्टेपल वीजा बंद किया

जम्मू-कश्मीर के बाशिंदों के लिए चीन ने अब स्टेपल वीजा देना बंद कर दिया है। चीन ने यह कदम बिना किसी आधिकारिक घोषणा के उठाया है। आला सरकारी अधिकारियों के मुताबिक चीन ने इसकी आधिकारिक घोषणा इसलिए नहीं की है क्योंकि यह जाहिर नहीं होने देना चाहता है कि यह कदम भारत के दबाव में उठाया गया है।

नई दिल्ली में एक आला सरकारी सूत्र ने कहा है कि स्टेपल वीजा मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए भारत की ओर से भी इस बारे में आधिकारिक तौर पर बयान नहीं जारी किया जा रहा है।

चीन के प्रधानमंत्री वन च्या पाओ ने 15-17 दिसंबर के भारत दौरे में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से बातचीत के दौरान अपनी ओर से ही नत्थी वीजा के मसले को छेड़ा था और कहा था कि यह मसला अधिकारियों के बीच बातचीत में सुलझा लिया जाएगा। इस तरह चीनी प्रधानमंत्री वन च्या पाओ ने यह कहने की कोशिश की थी कि यह इतना बड़ा मसला नहीं है कि इस पर दो प्रधानमंत्रियों के बीच बातचीत हो। अब यहां आला अधिकारियों का कहना है कि चीन ने बिना किसी सार्वजनिक ऐलान के जम्मू-कश्मीर के बाशिंदों को सामान्य वीजा जारी करना शुरू कर दिया है।

वास्तव में, प्रधानमंत्री वन च्या पाओ के भारत आने के पहले ही चीन ने एशियाई खेलों के लिए गई जम्मू की एक कलाकार को सामान्य वीजा जारी किया था। लेकिन तब इसे एशियाई खेलों से जोड़कर देखा गया था और यहां चीनी दूतावास की प्रवक्ता ने इस बारे में जवाब दिया था कि चीन की वीजा नीति में कोई बदलाव नहीं आया है।

चीन ने पिछले कुछ सालों से जम्मू-कश्मीर के लोगों के पासपोर्ट पर नत्थी वीजा जारी करना शुरू किया था, क्योंकि चीन ने जम्मू-कश्मीर को एक विवादास्पद इलाका बताया था। लेकिन इसी साल जुलाई में जब थलसेना के उत्तरी कमांड के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल बी. एस. जसवाल को जम्मू-कश्मीर में तैनात होने की वजह से चीन ने स्टेपल वीजा देने की कोशिश की, तो भारत ने उनकी अगुवाई में चीन जा रहे सैन्य शिष्टमंडल का चीन दौरा रद्द कर दिया। इसके बाद भारत ने चीन के साथ रक्षा संबंध स्थगित करने की घोषणा की।

डॉ. कर्ण सिंह ने चीन का मैत्री पुरस्कार ठुकराया

वरिष्ठ नेता कर्ण सिंह ने चीन के प्रधानमंत्री वान च्यापाओ द्वारा दिए जाने वाले मैत्री पुरस्कार को लेने से इंकार कर दिया है। कर्ण सिंह खुद को चीन समर्थक के तौर पर प्रदर्शित नहीं करना चाहते हैं।

कर्ण सिंह का यह कदम ऐसे समय सामने आया है, जब भारत में चीन द्वारा कश्मीर के लोगों को नत्थी किया हुआ वीजा देने के कदम पर विरोध हो रहा है। चीन के इस कदम का मतलब उस चीन द्वारा कश्मीर के भारत में एकीकरण पर सवालिया निशान लगाया जाना माना जाता है।

राज्यसभा सदस्य और भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) के अध्यक्ष कर्ण सिंह पुरस्कार समारोह में शामिल नहीं हुए। समारोह में सीपीएम नेता सीताराम येचुरी को भी सम्मानित किया गया। उनके साथ ही प्रफेसर तान चुंग, जी. विश्वनाथन, जी. बनर्जी, एम. मोहंती, एस. चक्रवर्ती, भास्करन, शेरदिल और पल्लवी अय्यर को भी सम्मानित किया गया।

संपर्क किए जाने पर कर्ण सिंह ने इस मुद्दे पर कोई टिप्पणी करने से इंकार कर दिया।

बिहार की हार के बाद अब राहुल ने मोदी की तुलना माओ त्से-तुंग से की

बिहार में कांग्रेस को मिली शर्मनाक हार के बाद लगता है कि राहुल गांधी का मानसिक संतुलन गड़बड़ा गया है अब राहुल ने अपने गुजरात दौरे के दौरान राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी की तुलना क्रांतिकारी चीनी नेता माओ त्से-तुंग से कर डाली।

अहमदाबाद में कॉलेज स्टूडेंट्स से बातचीत के दौरान राहुल गांधी ने गुजरात के चीफ मिनिस्टर नरेंद्र मोदी की तुलना माओ से कर डाली। उन्होंने कहा कि माओ ने भी चीन का विकास किया, लेकिन देश का विनाश करके। हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि आखिर माओ ने चीन का विनाश कैसे किया।

बिहार चुनाव में कांग्रेस की शर्मनाक हार के बाद राहुल गांधी अहमदाबाद, बड़ौदा और राजकोट के दौरे पर गए थे। वहां उन्होंने कॉलेज छात्रों से बातचीत की। राहुल ने छात्रों के कई सवालों के जवाब भी दिए। अहमदाबाद की एक छात्रा निधि के राहुल से देश के 3 सबसे ईमानदार नेताओं के बारे में जानना चाहा, तो राहुल ने इस पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी और केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदम्बरम का नाम लिया। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भारतीय राजनीति का सबसे बेदाग व्यक्ति बताया।

राहुल की यह बैठक कांग्रेस पार्टी की छात्र इकाई 'नैशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया' (एनएसयूआई) की सदस्यता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से की गई थी। बैठक से पत्रकारों को दूर रखा गया था।

कौन थें माओ ?

माओ त्से-तुंग चीनी कम्यूनिस्ट नेता थे। उनका मानना था कि सत्ता बंदूक से हासिल की जाती है। उन्होंने सत्ता हासिल करने के लिए इसी रास्ते का इस्तेमाल भी किया। माओ ने तत्कालीन चीनी शासन के खिलाफ समाज के कमजोर वर्ग को इकट्ठा करके हिंसक आंदोलन चलाया और चीन में कम्यूनिस्ट शासन की स्थापना की। आज उनके द्वारा स्थापित कम्यूनिस्ट सरकार के नेतृत्व में चीन दुनिया की महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है।

भारत के लिए खतरे की घंटी, चीन ने किया तिब्बत में सैन्य अभ्यास

चीन ने भारत को भड़काने की एक और कोशिश की है। उसने भारत से सटे तिब्बत के इलाके में जमीनी और हवाई सेना का पहला साझा सैन्य अभ्यास किया। इसमें हथियारों का भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया। इस अभ्यास में लड़ाकू विमान, हमला करने वाले हेलीकॉप्टर और टैंकों के अलावा कई आधुनिक हथियारों का इस्तेमाल किया गया। इस अभ्यास के बारे में जानकारी उसने ऐसे समय सार्वजनिक की है, जब हनोई में चीनी और भारतीय प्रधानमंत्री की मुलाकात होनी है। इस मुलाकात में भारत तमाम विवादित मुद्दे उठाने की तैयारी में है।

चीन भारत के खिलाफ अपना रवैया लगातार आक्रमक कर रहा है। चीन ने मंगलवार को भारत को साफ कर दिया कि भारत के नियंत्रण वाले कश्मीर के नागरिकों को वीजा नीति में वह कोई बदलाव नहीं करेगा। इसके बाद चीन ने खुलासा किया कि उसने भारतीय सीमा के करीब तिब्बत में सैन्य अभ्यास किया है।

चीनी सेना के मुखपत्र 'लिबरेशन आर्मी डेली' में कहा गया है कि अभ्यास तिब्बत के पठारों में किया गया लेकिन उसमें स्थान की स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई है। अखबार के अनुसार सैन्य अभ्यास समुद्री सतह से 15,420 फीट की ऊंचाई पर किया गया।

चीनी सेना की तिब्बत में बड़े पैमाने पर उपस्थिति और सैन्य गतिविधियां भारत के लिए चिंता का विषय है। चीन ने भारत के साथ सीमा विवाद सुलझाने की कभी गंभीर कोशिश नहीं की। चीन भारत के हिस्से अरुणाचल प्रदेश को दक्षिणी तिब्बत मानता है, और इसपर दावा जताता है। चीन ने तिब्बत में न केवल सैन्य उपयोग के लिए हवाई अड्डे बनाए हैं, वह बड़े पैमाने पर वहां सड़क निर्माण भी कर रहा है।

भारत भी इस खतरे को भांप रहा है। भारत ने भी अपनी तरफ की सीमा पर सड़क निर्माण तेज किया है, लेकिन चीन अभी भी आगे है। चीन ने तिब्बत को अशांत इलाका बताते हुए बड़े पैमाने पर सुरक्षा बल तैनात किया है। लेकिन भारत समझता है कि इसका इस्तेमाल समय आने पर भारत के खिलाफ ही किया जाएगा। और अब इस इलाके में बढ़ता सैन्य अभ्यास खतरे की घंटी हो सकती है। तिब्बत और भारत की सीमाएं लगी हुई हैं और हाल ही में हुआ यह सैन्य अभ्यास भारत के लिए ही खतरा है।

जनरल वी. के. सिंह के बयान पर बडबडाया पाक

भारतीय सेना प्रमुख जनरल वी. के. सिंह के उस बयान पर पाकिस्तान ने उग्र प्रतिक्रिया व्यक्त की है, जिसमें उन्होंने कहा था, 'पाकिस्तान और चीन भारत की सुरक्षा के लिए बड़े खतरे हैं।'

पाकिस्तानी विदेश विभाग के प्रवक्ता ने शनिवार को जारी एक बयान में कहा है, 'भारतीय सेना प्रमुख द्वारा दिया गया बयान निराधार और सचाई से परे हैं। हम इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हैं।'

प्रवक्ता ने कहा, 'भारतीय सेना प्रमुख द्वारा क्षेत्र में संभावित परमाणु युद्ध संबंधित दिया गया बयान अति गैरजिम्मेदाराना है और दुनिया के इस हिस्से में शांति और सुरक्षा के लिए हानिकारक है।' प्रवक्ता ने कहा कि इस तरह के बयान देने से पहले अधिक परिपक्वता एवं संयम बरतना चाहिए।

गौरतलब है कि जनरल सिंह, सेना के थिंक टैंक सेंटर फॉर लैंड वॉरफेयर स्टडीज (सीएलएडब्ल्यूएस) की ओर से भारतीय सेना की उभरती भूमिकाएं और कार्य विषय पर आयोजित एक संगोष्ठी में शुक्रवार को ये बातें कही थी।

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