राजभाषा विभाग द्वारा ऑनलाइन अनुवाद-प्रशिक्षण प्‍लेटफार्म का लोकार्पण हुआ

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति प्रो. गिरीश्वर मिश्र द्वारा राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन केंद्रीय अनुवाद ब्‍यूरो द्वारा विकसित ऑनलाइन अनुवाद-प्रशिक्षण प्लेटफार्म का आज यहां लोकार्पण किया गया। इस मौके पर राजभाषा विभाग के सचिव श्री प्रभास कुमार झा, संयुक्‍त सचिव डॉ. बिपिन बिहारी सहित केंद्र सरकार के विभिन्‍न मंत्रालयों/उपक्रमों आदि के अधिकारी उपस्थित थे।

दो सत्रों में आयोजित इस कार्यक्रम के प्रथम सत्र में ऑनलाइन अनुवाद-प्रशिक्षण प्लेटफार्म का लोकार्पण किया गया तथा केंद्रीय अनुवाद ब्‍यूरो के निदेशक डॉ. एस एन सिंह द्वारा इस प्‍लेटफार्म से होने वाले लाभ की विस्‍तृत जानकारी दी गई। द्वितीय सत्र में प्रसिद्ध साहित्यकार पद्मश्री डॉ. नरेंद्र कोहली, भाषाविद् और तकनीकी विशेषज्ञ डॉ. ओम विकास, भाषा-विज्ञानी और हंगेरियन तथा हिंदी के प्रसिद्ध अनुवादशास्त्री डॉ. विमलेश कांति वर्मा द्वारा अनुवाद जैसे महत्‍वपूर्ण विषय पर वक्‍तव्‍य दिये गये।

ऑनलाइन अनुवाद-प्रशिक्षण प्‍लेटफार्म के लोकार्पण समारोह को सम्‍बोधित करते हुए प्रो. गिरीश्वर मिश्र ने कहा कि यह एक महत्‍वपूर्ण प्रयास है एवं एक नई पहल है। उन्‍होने कहा कि यह प्‍लेटफार्म सभी को उपलब्‍ध होगा। उन्‍होने कहा कि भारत जैसा देश जहां इतनी भाषाऐं बोली जाती हैं तथा विश्‍व में भी बहुत सी भाषाऐं उपलब्‍ध हैं, अनुवाद ही ऐसा माध्‍यम है जिससे हम विचार सांझा कर सकते हैं। प्रो. गिरीश्वर मिश्र ने कहा कि सरकार की विभिन्‍न योजनाओं की जानकारी भी जनता की भाषा में तथा सरल भाषा में उपलब्‍ध होनी चाहिए। उन्‍होने कहा की अनुवाद के माध्‍यम से इतिहास तथा विभिन्‍न संस्‍कृतियों का ज्ञान संभव है।

इस अवसर पर सम्‍बोधित करते हुए श्री प्रभास कुमार झा ने बताया कि राजभाषा शब्‍दावली का कार्य प्रारम्‍भ हो गया है। उन्‍होने कहा कि यह शब्‍दावली ऑनलाईन और पुस्‍तक के रूप में उपलब्‍ध होगी तथा इस शब्‍दावली में नये-नये शब्‍द भी शामिल किये जायेगें। उन्‍होने कहा कि राजभाषा शब्‍दावली लाखो शब्‍दों का शब्‍दकोष होगा।

इस प्‍लेटफार्म से होने वाले लाभ की विस्‍तृत जानकारी देते हुए डॉ. एस एन सिंह ने कहा कि इस प्‍लेटफोर्म में सरल और सुगम पाठ तैयार किये गए हैं जिससे सभी को लाभ होगा।

इस अवसर पर राजभाषा भारती के 150 वे अंक का विमोचन भी किया गया।

केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो वर्ष 1971 से सरकारी दस्तावेजों का अनुवाद तथा वर्ष 1973 से राजभाषा के कार्यान्वयन से जुड़े अधिकारियों और कर्मचारियों को पारंपरिक रूप से अनुवाद का प्रशिक्षण देने का कार्य करता आ रहा है।

भारत सरकार की “सुशासन: चुनौतियां और अवसर” कार्य योजना के अंतर्गत सरकारी तंत्र में विभिन्न क्षेत्रों के कौशल विकास पर बल दिया गया है। इसी को ध्यान में रखते हुए राजभाषा विभाग (गृह मंत्रालय) ने केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो को “अनुवाद कौशल के विकास” के लिए ‘ऑनलाइन अनुवाद प्रशिक्षण’ के “ई-लर्निंग प्लेटफार्म” तैयार करने का कार्य सौंपा है।

इस प्लेटफार्म का उद्देश्य केंद्र सरकार के कार्यालयों में राजभाषा कार्यान्वयन और अनुवाद कार्य से जुड़े अधिकारियों व कर्मचारियों के अनुवाद कौशल को विकसित करने के लिए अनुवाद का ऑनलाइन प्रशिक्षण देना है। इसके ज़रिए अनुवाद प्रशिक्षण की पहुँच व्यापक और सर्वसुलभ हो सकेगी और सरकारी कामकाज में प्रयुक्त प्रशासनिक शब्दावली और अभिव्यक्तियों के प्रयोग में एकरूपता सुनिश्चित हो सकेगी।

इस कार्य योजना के अंतर्गत, ब्यूरो में एक अनुसंधान एकक की स्थापना की गई है। इस एकक ने अनुवाद प्रशिक्षण के पहले चरण में, प्रशासनिक विषयों से संबंधित दस्तावेजों के अनुवाद के बारे में सरल और सुगम ढंग से पाठ तैयार किए हैं और उन्हें अनुवाद प्रशिक्षण के इच्छुक व्यक्तियों तक ऑनलाइन पहुंचाने का प्रयास किया है। 

इन पाठों में प्रशासन से जुड़े पत्राचार और उनके अनुवाद से संबंधित विषय शामिल हैं। छोटे-छोटे वीडियो के माध्यम से आसान भाषा में प्रशासनिक अनुवाद को समझाया गया है। इसके साथ ही, कुछ पाठों को प्रश्नोत्तरी के रूप में भी तैयार किया गया है। इन पाठों के माध्यम से इच्छुक प्रशिक्षार्थी प्रशासनिक विषयों के अनुवाद की बारीकियों को जानकर, इस क्षेत्र में अपने कौशल को निखार सकेंगे।

इस शृंखला के अंतर्गत भारत सरकार के मंत्रालयों/विभागों और कार्यालयों में प्रयुक्त होने वाली प्रशासनिक भाषा और उसके अनुवाद से संबंधित 21 पाठ तैयार किए गए हैं :-

अनुवाद प्रशिक्षण : परिचय, अनुवाद क्या है? अनुवाद कैसे करें? अनुवाद के सिद्धांत - पारंपरिक और आधुनिक दृष्टिकोण, अनुवाद क्या करें? अनुवाद में सहायक उपकरण, प्रशासनिक भाषा और शब्दावली, प्रशासनिक भाषा और अनुवाद, वैज्ञानिक और तकनीकी अनुवाद की समस्याएं, प्रशासनिक पत्र व्यवहार के प्रकार और उनका अनुवाद, प्रशासनिक अनुवाद में प्रयुक्त शब्दों के सूक्ष्म भेद, अर्द्ध-सरकारी पत्र और अंतर्विभागीय टिप्पणियां, जनसंपर्क के लिए प्रयुक्त दस्तावेजों, और फॉर्मों का अनुवाद, आदेश और कार्यालय आदेश का अनुवाद, टिप्पणी लेखन और अनुवाद, मुहावरों और लोकोक्तियों का अनुवाद, अनुवाद-पुनरीक्षण, मूल्यांकन और समीक्षा, व्यतिरेकी विश्लेषण और अनुवाद, हिंदी – अंग्रेजी वाक्य संरचना और अनुवाद, अनुवाद में सृजनशीलता, प्रयुक्ति की संकल्पना और अनुवाद।


राष्ट्रपति और मंत्रियों का हिंदी में भाषण देना अनिवार्य नहीं : वेंकैया नायडू


सूचना और प्रसारण मंत्री श्री वेंकैया नायडू का वक्तव्य – हिंदी थोपने के आरोप निराधार 

‘मुझे कुछ समाचार पत्रों में छपी कुछ रिपोर्टों को पढ़कर दुख हुआ है। इन खबरों में डीएमके नेता श्री एन. के. स्टालिन का हवाला देते हुए आरोप लगाया गया है कि केंद्र सरकार हिंदी थोप रही है।

श्री स्टालिन का हवाला देते इन खबरों में कहा गया कि संसदीय समिति (राजभाषा) ने हिंदी जानने वाले संसद सदस्यों और केंद्रीय मंत्रियों के लिए भाषणों और लेखों में हिंदी के उपयोग को अनिवार्य बनाने का प्रस्ताव किया। खबरों में आगे आरोप लगाया गया है कि इस संबंध में अध्यादेश जारी किया गया है यानी सरकार हिंदी थोप रही है।

मैं स्पष्ट करना चाहूंगा कि पूर्व गृह मंत्री श्री पी. चिदम्बरम के नेतृत्व में राजभाषा पर संसदीय समिति ने निम्नलिखित सिफारिश की और सिफारिश को 2 जून, 2011 को माननीय राष्ट्रपति को भेजा गया : - 

‘यह समिति हिंदी बोलने और पढ़ने वाले उच्च राजनीतिक पदों पर आसीन व्यक्तियों से अपने भाषण/ वक्तव्य हिंदी में देने का अनुरोध करती है। इस श्रेणी में माननीय राष्ट्रपति और सभी मंत्री आते हैं।

वर्तमान सरकार ने 31 मार्च, 2017 को इस सिफारिश को अधिसूचित किया।

यह दिखाता है कि राजभाषा पर संसदीय समिति के सुझाव का स्वभाव सिफारिशी है और अनिवार्य नहीं है। इस संबंध में अध्यादेश जारी करने का आरोप पूरी तरह निराधार और शरारतपूर्ण है।

याद रहे कि 2011 में डीएमके पार्टी भारत सरकार की सदस्य थी। उसी समय यह सिफारिश की गई और माननीय राष्ट्रपति को संसदीय समिति द्वारा सिफारिश भेजी गयी।

भारत सरकार का किसी भी व्यक्ति पर कोई भाषा थोपने की मंशा नहीं है’

हिंदी के प्रयोग से बढ़ता है देश का सम्मान : जुएल ओराम


जनजातीय कार्य मंत्रालय की राजभाषा सलाहकार समि‍ति‍ की बैठक 

केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री श्री जुएल ओराम ने कहा है कि‍ हिंदी के प्रयोग से हमारा ही नहीं बल्‍कि‍ देश का भी सम्मान बढ़ता है। हिंदी तो प्रेम की भाषा है, मिलाप की भाषा है और हमें हिंदी के साथ—साथ अन्य आदिवासी भाषाओं के साथ भी संवाद करना चाहिए। केंद्रीय मंत्री ने यह बात कल नई दि‍ल्‍ली में आयोजित केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय की राजभाषा सलाहकार समिति की बैठक में कही। उन्‍होंने राजभाषा में काम के नि‍यमि‍त नि‍रीक्षण और कार्यान्‍वयन समि‍ति‍ की नि‍यमि‍त बैठक आयोजि‍त करने पर जोर दि‍या ताकि‍ राजभाषा हिंदी के प्रगामी प्रयोग को बढ़ाया जा सके। श्री ओराम ने कहा कि‍ आम लोगों के साथ संवाद में हिंदी और अन्‍य क्षेत्रीय भाषाओं के अधि‍कतम प्रयोग से हम मंत्रालय की गति‍वि‍धि‍यों की जानकारी और सुगमता से उन तक पहुँचा सकेंगे। मंत्री महोदय ने यह भी सुझाव दि‍या कि‍ यदि‍ हिंदी के प्रयोग से संबंधि‍त रि‍क्‍त पदों को नि‍यमि‍त आधार पर तुरंत भरना संभव न हो तो संवि‍दा आधार पर कार्मि‍क रखे जाने पर वि‍चार कि‍या जाए।

समिति की बैठक में सदस्य एवं पत्रकार योगेश भारद्वाज ने कहा की सरकार के अधिकारी यदि फाइलों पर टि‍प्‍पणी लि‍खते समय हिंदी का प्रयोग करें तो इससे मंत्रालय के निर्णय को समझने में आसानी होगी। उन्‍होंने यह भी कहा कि‍ इस समिति की बैठक यदि‍ जनजातीय क्षेत्रों में आयोजित हो तो इससे आदिवासी भाषाओं को भी समझने में आसानी होगी। मंत्री महोदय ने यह आश्‍वासन भी दि‍या कि‍ आगे से  समिति की बैठक साल में कम से कम दो बार अवश्‍य आयोजि‍त होगी। एक अन्‍य सदस्‍य रीता दुबे के इस सुझाव पर की मंत्रालय हिंदी पर गोष्‍ठि‍यां आयोजि‍त करे, मंत्री महोदय ने अपनी सहमती व्यक्त की। एक सदस्‍य का सुझाव था कि‍ मंत्रालय में हिंदी की पुस्‍तकों की खरीद का प्रति‍शत बढ़ाया जाए। एक अन्‍य सदस्‍य ने मंत्रालय से हिंदी में एक पत्रि‍का नि‍कालने का सुझाव दि‍या। बैठक में मौजूद अन्‍य सदस्‍यों राजीव गुप्ता, अरुण जैमिनी, सिंकदर यादव, हरीश कुमार मलि‍क और हरेश कुमार टॉक आदि ने भी अपने महत्‍वपूर्ण सुझाव दिए।

बैठक में केंद्रीय जनजातीय कार्य राज्यमंत्री श्री जसवंत सिंह भाभोर और सचिव डॉ श्‍याम अग्रवाल समेत कई वरि‍ष्‍ठ अधि‍कारी मौजूद थे।

10वें विश्व हिंदी सम्मेलन में प्रधानमंत्री का पूरा भाषण


दुनिया के कोने-कोने से आए हुए सभी हिंदी-प्रेमी भाईयों और बहनों, 

करीब 39 देशों से प्रतिनिधि यहां मौजूद है एक प्रकार का ये हिंदी का महाकुंभ हो रहा है। अभी तो आप सिंहस्‍थ की तैयारी में हो लेकिन सिंहस्‍थ की तैयारी के पहले ही भोपाल की धरती में ये हिन्‍दी का महाकुंभ, उसके दर्शन करने का हमें अवसर मिला है। 

सुषमा जी ने सही बताया कि इस बार के अधिवेशन में हिन्‍दी भाषा पर बल देने का प्रयास है। जब भाषा होती है, तब हमें अंदाज नहीं होता है कि उसकी ताकत क्‍या होती है। लेकिन जब भाषा लुप्‍त हो जाती है और सदियों के बाद किसी के हाथ वो चीजें चढ़ जाती हैं, तो हर सबकी चिंता होती है कि आखिर इसमें है क्‍या? ये लिपि कौन सी है, भाषा कौन सी है, सामग्री क्‍या है, विषय क्‍या है? आज कहीं पत्‍थरों पर कुछ लिखा हुआ मिलता है, तो सालों तक पुरातत्‍व विभाग उस खोज में लगा रहता है कि लिखा क्‍या गया है? और तब जाकर के भाषा लुप्‍त होने के बाद कितना बड़ा संकट पैदा होता है उसका हमें अंदाज आता है। 

कभी-कभार हम ये तो चर्चा कर लेते है कि भई दुनिया में डायनासोर नहीं रहा तो बड़ी-बड़ी movie बनती है कि डायनासोर कैसा था, डायनासोर क्‍या करता था? जीवशास्त्र वाले देखते हैं कि कैसा था, कुछ artificial डायनासोर बनाकर रखा जाता है कि नई पीढ़ी को पता चले कि ऐसा डायनासोर हुआ करता था। यानि पहले क्या था, इसको जानने-पहचानने के लिए आज हमें इस प्रकार के मार्गों का प्रयोग करना पड़ता है। 

आज भी हमें सब दूर सुनने के लिए मिलता है कि हमारी संस्कृत भाषा में ज्ञान के भंडार भरे पड़े हैं, लेकिन संस्कृत भाषा को जानने वाले लोगों की कमी के कारण, उन ज्ञान के भंडारों का लाभ, हम नहीं ले पा रहे हैं, कारण क्या? हमें पता तक नहीं चला कि हम अपनी इस महान विरासत से धीरे-धीरे कैसे अलग होते गए, हम और चीजों में ऐसे लिप्त हो गए कि हमारा अपना लुप्त हो गया।..और इसलिए हर पीढ़ी का ये दायित्व बनता है कि उसके पास जो विरासत है, उस विरासत को सुरक्षित रखा जाए, हो सके तो संजोया जाए और आने वाली पीढियों में उसको संक्रमित किया जाए। हमारे पूर्वजों ने, वेद पाठ में एक परंपरा पैदा की थी कि वेदों के ज्ञान को पीढ़ी दर पीढ़ी ले जाने के लिए वेद-पाठी हुआ करते थे और लिखने-पढ़ने की जब सुविधा नहीं थी, कागज की जब खोज नहीं हुई थी तो उस ज्ञान को स्मृति के द्वारा दूसरी पीढ़ी में संक्रमित किया जाता था और पीढ़ियों तक, ये परंपरा चलती रही थी। और इस इतिहास को देखते हुए, ये हम सबका दायित्व है कि हमारे जितने भी प्रकार के... कि आज पता चले कि एक पंछी है, उसकी जाति लुप्त होते-होते 100-150 हो गई है तो दुनिया भर की एजेंसियां उस जाति को बचाने के लिए अरबों-खरबों रुपया खर्च कर देती हैं। कोई एक पौधा, अगर पता चले कि भई उस इलाके में एक पौधा है और बहुत ही कम specimen रह गए हैं, तो उसको बचाने के लिए दुनिया अरबों-खरबों खर्च कर देती है। इन बातों से पता चलता है कि इन चीजों का मूल्य कैसा है। जैसे इन चीजों का मूल्य है, वैसा ही भाषा का भी मूल्य है। और इसलिए जब तक हम उसे, उस रूप में नहीं देखेंगे तब तक हम उसके माहात्म्य को नहीं समझेंगे। 

हर पीढ़ी का दायित्व रहता है, भाषा को समृद्धि देना। मेरी मातृभाषा हिंदी नहीं है, मेरी मातृभाषा गुजराती है लेकिन मैं कभी सोचता हूं कि अगर मुझे हिंदी भाषा बोलना न आता, समझना न आता, तो मेरा क्या हुआ होता, मैं लोगों तक कैसे पहुंचता, मैं लोगों की बात कैसे समझता और मुझे तो व्यक्तिगत रूप में भी इस भाषा की ताकत क्या होती है, उसका भलीभांति मुझे अंदाज है और एक बात देखिए, हमारे देश में, मैं हिंदी साहित्य की चर्चा नहीं कर रहा हूं, मैं हिंदी भाषा की चर्चा कर रहा हूं। हमारे देश में हिंदी भाषा का आंदोलन किन लोगों ने चलाया, ज्यादातर हिंदी भाषा का आंदोलन उन लोगों ने चलाया है, जिनकी मातृभाषा हिंदी नहीं थी। सुभाषाचंद्र बोस हो, लोकमान्य तिलक हो, महात्मा गांधी हो, काका साहेब कालेलकर हो, राजगोपालाचार्य हो, सबने, यानि जिनका मातृभाषा हिंदी नहीं थी, उनको हिंदी भाषा के लिए, उसके संरक्षण और संवर्धन के लिए जो दीर्घ दृष्टि से उन्होंने काम किया था, ये हमें प्ररेणा देता है। और आचार्य विनोबा भावे, दादा धर्माधिकारी जी, Gandhian philosophy से निकले हुए लोग, उन्होंने यहां तक, उन्होंने भाषा को और लिपि को दोनों की अलग-अलग ताकत को पहचाना था। और इसलिए एक ऐसा रास्ता विनोबा जी के द्वारा प्रेरित विचारों से लोगों ने से डाला था कि हमें धीरे-धीरे आदत डालनी चाहिए कि हिंदुस्तान की जितनी भाषाएं हैं, वो भाषाएं अपनी लिपि को तो बरकरार रखें, उसको तो समृद्ध बनाएं लेकिन नागरी लिपि में भी अपनी भाषा लिखने की आदत डालें। शायाद विनोबा जी के ये विचार, दादा धर्माधिकारी जी का ये विचार, Gandhian मूल्यों से जुड़ा हुआ ये विचार, ये अगर प्रभावित हुआ होता तो लिपि भी, भारत की विविध भाषाओं को समझने के लिए और भारत की राष्ट्रीय एकता के लिए, एक बहुत बड़ी ताकत के रूप में उभर आई होती। 

उसी प्रकार से भाषा, हर पीढ़ी ने, देखिए भाषा... वो जड़ नहीं हो सकती, जैसे जीवन में चेतना होती है, वैसे ही भाषा में भी चेतना होती है। हो सकता है उस चेतना की अनुभूति stethoscope से नहीं जानी जाती होगी, उस चेतना की अनुभूति थर्मामीटर से नहीं नापी जाती होगी, लेकिन उसका विकास, उसकी समृद्धि, उस चेतना की अनुभूति कराती है। वो पत्थर की तरह जड़ नहीं हो सकती है, भाषा वो मचलता हुआ हवा का झोंका, जिस प्रकार से बहता है, जहां से गुजरता है, वहां की सुगंध की अपने साथ लेकर के चलता है, जोड़ता चला जाता है। अगर हवा का झोंका, बगीचे से गुजरे तो सुगंध लेकर के आता है और कहीं drainage के पास से गुजरे तो दुर्गंध लेकर के आता है, वो अपने आप में समेटता रहता है, भाषा में भी वो ताकत होती है, जिस पीढ़ी से गुजरे, जिस इलाके से गुजरे, जिस हालात से गुजरे, वो अपने आप में समाहित करती है, वो अपने आप को पुरुस्कृत करती रहती है, पुलकित रहती है, ये ताकत भाषा की होती है और इसलिए भाषा चैतन्य होती है और उस चेतना की अनुभूति आवश्यक होती है। 

पिछले दिनों जब प्रवासी भारतीय सम्मेलन हुआ था तो हमारे विदेश मंत्रालय ने एक बड़ा अनूठा कार्यक्रम रखा था कि दुनिया के अन्य देशों में, भारतीय लेखकों द्वारा लिखी गई किताबों का प्रदर्शन किया जाए और मैं हैरान भी था और मैं खुश था कि अकेले मॉरिशस से 1500 लेखकों द्वारा लिखी गई किताबें और वो भी हिंदी में लिखी गई किताबों का वहां पर प्रदर्शन हो रहा था। यानि दूर-सुदूर इतने देशों में भी हिंदी भाषा का प्यार, हम अनुभव करते हैं। हर कोई अपने आप से जुड़ने के क्या रास्ते होते हैं, कोई अगर इस भू-भाग में नहीं आ सकता है, आने के हालात नहीं होते, तो कम से कम हिंदी के दो-चार वाक्य बोलकर के भी, वो अपनी प्रतिबद्धता को व्यक्त कर देता है। 




हमारा ये निरंतर प्रयास रहना चाहिए कि हमारी हिंदी भाषा समृद्ध कैसे बने। मेरे मन में एक विचार आता है कि भाषाशास्त्री उस पर चर्चा करें। क्या कभी हम हिंदी और तमिल भाषा का workshop करें और तमिल भाषा में जो अद्धभुत शब्द हो, उसको हम हिंदी भाषा का हिस्सा बना सकते हैं क्या? हम कभी बांग्ला भाषा और हिंदी भाषा के बीच workshop करें और बांग्ला के पास, जो अद्भभुत शब्द-रचना हो, अद्भभुत शब्द हो, जो हिंदी के पास न हो क्या हम उनसे ले सकते हैं कि भई ये हमें दीजिए, हमारी हिंदी को समृद्ध बनाने के लिए इन शब्दों की हमें जरूरत है। चाहे जम्मू कश्मीर में गए, डोगरी भाषा में दो-चार ऐसे शब्द मिल जाए, दो-चार ऐसी कहावत मिल जाए, दो-चार ऐसे वाक्य मिल जाएं वो मेरी हिंदी में अगर fit होते हैं। हमें प्रयत्नपूर्वक हिंदुस्तान की सभी बोलियां, हिंदुस्तान की सभी भाषाएं, जिसमें जो उत्तम चीजें हैं, उसको हमें समय-समय पर हिंदी भाषा की समृद्धि के लिए, उसका हिस्सा बनाने का प्रयास करना चाहिए। और ये अविरत प्रक्रिया चलती रहनी चाहिए। 

भाषा का गर्व कितना होता है। मैं तो सार्वजनिक जीवन मैं काम करता हूं। कभी तमिलनाडु चला जाऊं और वाणक्कम बोल दूं, वाणक्कम और मैं देखता हूं कि पूरे तमिलनाडु में electrifying effect हो जाता है। भाषा की ये ताकत होती है। बंगाल को कोई व्यक्ति मिले और भालो आसी पूछ लिया, उसको प्रशंसा हो जाती है, कोई महाराष्ट्र का व्यक्ति मिले, कसाकाय, काय चलता है, एकदम प्रसन्न हो जाता है, भाषा की अपनी एक ताकत होती है। और इसलिए हमारे देश के पास इतनी समृद्धि है, इतनी विशेषता है, मातृभाषा के रूप में हर राज्य के पास ऐसा अनमोल खजाना है, उसको हम कैसे जोड़ें और जोड़ने में हिंदी भाषा एक सूत्रधार का काम कैसे करे, उस पर अगर हम बल देंगे, हमारी भाषा और ताकतवर बनती जाएगी और उस दिशा में हम प्रयास कर सकते हैं।

मैं जब राजनीतिक जीवन में आया, तो पहली बार गुजरात के बाहर काम करने का अवसर मिला। हम जानते हैं कि हमारे गुजराती लोग कैसी हिंदी बोलते हैं। तो लोग मजाक भी उड़ाते हैं लेकिन मैं जब बोलता था तो लोगों मानते थे और मुझे पूछते थे कि मोदी जी आप हिंदी भाषा सीखे कहां से, आप हिंदी इतनी अच्छी बोलते कैसे हैं? अब हम तो वही पढ़े हैं, जो सामान्य रूप से पढ़ने को मिलता है, थोड़ा स्कूल में पढ़ाया जाता है, उससे ज्यादा नहीं। लेकिन मुझे चाय बेचते-बेचते सीखने का अवसर मिल गया। क्योंकि मेरे गांव में उत्तर प्रदेश के व्यापारी, जो मुंबई में दूध का व्यापार करते थे, उनके एजेंट और ज्यादतर उत्तर प्रदेश के लोग हुआ करते थे। वो हमें गांव के किसानों से भैंस लेने के लिए आया करते थे और दूध देने वाली भैंसों को वो ट्रेन के डिब्बे में मुंबई ले जाते थे और दूध मुंबई में बेचते थे और जब भैंस दूध देना बंद करती थी और फिर वो गांव में आकर के छोड़ जाते थे, उसके contract के पैसे मिलते थे। तो ज्यादातर रेलवे स्टेशन पर ये मालगाड़ी में भैंसों को लाना-ले जाने का कारोबार हमेशा चलता रहता था, उस कारोबार को ज्यादातर करने वाले लोग उत्तर प्रदेश के हुआ करते थे और मैं उनको चाय बेचने जाता था। उनको गुजराती नहीं आती थी, मुझे हिंदी जाने बिना चारा नहीं था, तो चाय ने मुझे हिंदी सिखा दी थी। 

भाषा सहजता से सीखी जा सकती है। थोड़ा सा प्रयास करें, कमियां रहती हैं, जीवन के आखिर तक कमियां रहती हैं, लेकिन आत्मविश्वास खोना नहीं चाहिए। आत्मविश्वास रहना चाहिए, कमियां होंगी, थोड़े दिन लोग हसेंगे लेकिन फिर उसमें सुधार आ जाएगा। और हमारे यहां गुजरात का तो स्वभाव था कि दो लोगों को अगर झगड़ा हो जाए, गांव के भी लोग हो, वो गुजराती में झगड़ा कर ही नहीं सकते हैं, उनको लगता है गुजराती में, झगड़े में, प्रभाव पैदा नहीं होता है, मजा नहीं आता है। जैसे ही झगड़े की शुरुआत होती है, तो वो हिंदी में अपना शुरू कर देते हैं। दोनों गुजराती हैं, दोनों गुजराती भाषा जानते हैं, लेकिन अगर ऑटोरिक्‍शा वालों से भी झगड़ा हो गया, पैसों का, तो तू-तू मैं-मैं हिंदी में शुरू हो जाती है। उसको लगता है कि हां हिंदी बोलूंगा, तो उसको लगेगा हां ये कोई दम वाला आदमी है। 

मैं इन दिनों विदेश में जहां मेरा जाना हुआ, मैंने देखा है कि दुनिया में विदेश का कैसा प्रभाव हो रहा है और कैसे लोग विदेश में हमारी बातों को समझ रहे हैं, स्‍वीकार कर रहे हैं। मैं गया था, मॉरीशस। वहां पर विश्‍व हिंदी साहित्‍य का secretariat अब शुरू हुआ है। उसके मकान का शिलान्‍यास किया है और विश्व हिंदी साहित्य का एक center वहां पर, हम शुरू कर रहे हैं। उसी प्रकार से मैं उज्बेकिस्तान गया था, Central Asia में, उजबेकिस्तान में एक Dictionary को लोकापर्ण करने का मुझे अवसर मिला और वो Dictionary थी, Uzbek to Hindi, Hindi to Uzbek, अब देखिए दुनिया के लोगों का कितना इसका आकर्षण हो रहा है। मैं Fudan University में गया चीन में, वहां पर हिंदी भाषा के जानने वाले लोगों का एक अलग meeting हुआ और वो इतना बढ़िया से हिंदी भाषा में लोग, मेरे से बात कर रहे थे यानि उनको भी लगता था कि इसका माहात्म्य कितना है। मंगोलिया में गया, अब कहां मंगोलिया है, लेकिन मंगोलिया में भी हिंदी भाषा का आकर्षण, हिंदी बोलने वाले लोग, ये वहां हमें नजर आए और मेरा जो एक भाषण हुआ, वो हिंदी में हुआ, उसका भाषांतर हो रहा था लेकिन मैं देख रहा था कि मैं हिंदी में बोलता था, जहां तालियां बजानी थी, वो बजा लेते थे, जहां हंसना था, वो हंस लेते थे। यानि इतनी बड़ी मात्रा में दुनिया के अलग-अलग देशों में हमारी भाषा पहुंची हुई है और लोगों को उसका एक गर्व होता है। मैं Russia गया था, Russia में इतना काम हो रहा है हिंदी भाषा पर, आपको Russia भाषा में, आप जाएंगो तो सरकार की तरफ से इतना attendant रखते हैं, हिंदी भाषी Russian नागरिक को रखते हैं। 

यानि इतनी बड़ी मात्रा में वहां हिंदी भाषा और हमारी सिने जगत ने, Film industry ने करीब-करीब इन देशो में फिल्मों के द्वारा हिंदी को पहुंचाने का काम किया है। Central Asia में तो शायद आज भी बच्चे हिंदी फिल्मों के गीत गाते हैं। कहने का तात्पर्य ये है कि भाषा के रूप में आने वाले दिनों में हिंदी भाषा का माहात्म्य बढ़ने वाला है। जो भाषा शास्त्री है, उनका मत है कि दुनिया में करीब-करीब 6000 भाषाएं हैं और जिस प्रकार से दुनिया तेजी से बदल रही है, उन लोगों का अनुमान है कि 21वीं सदी का अंत आते-आते इन 6000 भाषाओं में से 90 प्रतिशत भाषाओं का लुप्त होने की संभावनाएं दिखाई दे रही हैं, ये भाषा शास्त्रियों ने चिंता व्यक्ति की है कि छोटे-छोटे तबके के लोगों की जो भाषाएं हैं और भाषाओं का प्रभाव और requirement बदलती जाती है, technology का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। विश्व की 6000 भाषाएं हैं, उसमें से 21वीं सदी आते-आते 90 प्रतिशत भाषाओं के लुप्त होने की संभावना हैं। अगर ये चेतावनी को हम न समझें और हम हमारी भाषा का संवर्धन और संरक्षण न करें तो फिर हमें भी रोते रहना पड़ेगा। हां भाई डायनासोर ऐसा हुआ करता था, फलांनी चीज ऐसी हुआ करती थी, वेद के पाठ ऐसे हुआ करते थे, हमारे लिए वो archeology का विषय बन जाएगा, हमारी वो ताकत खो देगा और इसलिए हमारा दायित्व बनता है कि हम हमारी भाषा को कैसे समृद्ध बनाएं और चीजों को जोड़ें, भाषा के दरवाजे बंद नहीं किए जा सकते हैं और जब-जब उसको एक दीवारों के अंदर समेट दिया गया तो भाषा भी बची नहीं और भारत भाषा-समृद्ध भी नहीं बनेगा। भाषा में वो ताकत होनी चाहिए जो हर चीजों को अपने आप में समेट ले और समेटना का उसका प्रयास होता रहना चाहिए और उस दिशा में होता है। 

विश्व में इन चीजों का असर कैसा होता है। कुछ समय पहले इजराइल का जैसे हमारे यहां नवरात्रि का festival होता है या दीपावली का festival होता है। वैसे उनका एक बड़ा महत्‍वपूर्ण festival होता है, Hanukkah। तो मैंने इजराइल के प्रधानमंत्री को social media के द्वारा twitter पर हिब्रू भाषा में Hanukkah की बधाई दी। तीन-चार घंटे के भीतर-भीतर इजराइल के प्रधानमंत्री ने इसको acknowledge किया और जवाब दिया और मेरे लिए खुशी की बात थी कि मैंने हिब्रू भाषा में लिखा था, उन्‍होंने हिंदी भाषा में धन्‍यवाद का जवाब दिया। 

इन दिनों दुनिया के जिन भी देशों से मुझे मिलने का होता है, वो एक बात अवश्‍य बोलते हैं सबका साथ, सबका विकास। उनकी टूटी-फूटी भाषा उनके उच्‍चार करने का तरीका कुछ भी हो, लेकिन सबका साथ, सबका विकास। ओबामा मिलेंगे तो वो भी बोलेंगे, पुतिन मिलेंगे तो वो भी बोलेंगे। कोशिश करते हैं हम अगर हमारी बातों को लेकर के जाते हैं, तो दुनिया इसको स्‍वीकार करने के लिए तैयार होती है। 

और इसलिए हमारी कोशिश होनी चाहिए कि हमारी भाषा को समृद्धि मिले, हमारी भाषा को ताकत मिले और भाषा के साथ ज्ञान का और अनुभव का भंडार भी होता है। अगर हम हिन्‍दी भी भूल जाते और रामचरितमानस को भी भूल जाते हैं तो हम, जैसे बिना जड़ के एक पेड़ की तरह खड़े होते। हमारी हालत क्‍या हो गई होती। हमारे जो साहित्‍य के महापुरुष हैं, अगर आप बिहार के फणीश्‍वरनाथ रेणु, उनको न पढ़े तो पता नहीं चलता कि उन्‍होंने बिहार में गरीबी को किस रूप में देखा था और उस गरीबी के संबंध में उनकी क्‍या सोच थी। हम प्रेमचंद को न पढ़े, तो पता तक नहीं चलता कि हम यू सोंचे कि हमारे ग्रामीण जीवन के aspirations क्‍या थी और values के लिए अपनी आशा-आकांक्षाओं को बलि चढ़ाने का कैसा सार्वजनिक जीवन का स्‍वभाव था। जयशंकर प्रसाद हो, मैथिलीशरण गुप्‍त हो, इसी धरती के संतान, क्‍या कुछ नहीं देकर गए हैं। लेकिन उन महापुरुषों ने तो हमारे लिए बहुत कुछ किया। साहित्‍य सृजनों ने जीवन में एक कोने में बैठकर के मिट्टी का दीया, तेल का दीया जला-जला करके, अपनी आंखों को भी खो दिया और हमारे लिए कुछ न कुछ छोड़कर गए। लेकिन अगर वो भाषा ही नहीं बची तो इतना बड़ा साहित्‍य कहां बचेगा, इतना बड़ा अनुभव का भंडार कहां बचेगा? और इसलिए भाषा के प्रति लगाव भाषा को समृद्ध बनाने के लिए होना चाहिए। भाषा को बंद दायरे में सिमटकर रह जाए, इसलिए नहीं होना चाहिए। 

आने वाले दिनों में Digital world हम सबके जीवन में एक सबसे बड़ा role पैदा कर रहा है और करने वाला है। बाप-बेटा भी आजकल, पति-पत्‍नी भी Whatsapp पर message convey करते हैं। Twitter पर लिखते हैं कि शाम को क्‍या खाना खाना है। इतने हद तक उसने अपना प्रवेश कर लिया है। जो technology का जानकार है, उनका कहना है कि आने वाले दिनों में Digital world में तीन भाषाओं का दबदबा रहने वाला है – अंग्रेजी, चाइनीज़, हिन्‍दी। और जो भी technology से जुड़े हुए हैं उन सबका दायित्‍व बनता है कि हम भारतीय भाषाओं को भी और हिन्‍दी भाषा को भी technology के लिए किस प्रकार से परिवर्तित करे। जितना तेजी से इस क्षेत्र में काम करने वाले experts हमारी स्‍थानीय भाषाओं से लेकर के हिन्‍दी भाषा तक नए software तैयार करके, नए Apps तैयार करके जितनी बड़ी मात्रा में लाएंगे। आप देखिए, ये अपने आप में भाषा एक बहुत बड़ा market बनने वाली है। किसी ने सोचा नहीं होगा कि भाषा एक बहुत बड़ा बाजार भी बन सकती है। आज बदली हुई technology की दुनिया में भाषा अपने आप में एक बहुत बड़ा बाजार बनने वाली है। हिन्‍दी भाषा का उसमें एक माहात्म्य रहने वाला है और जब मुझे हमारे अशोक चक्रधर मिले अभी किताब लेकर के उनकी, तो उन्‍होंने मुझे खास आग्रह से कहा कि मैंने most modern technology Unicode में इसको तैयार किया है। मुझे खुशी हुई कि हम जितना हमारी इस रचनाओं को और हमारे Digital World को, इंटरनेट को हमारी इन भाषाओं से परिचित करवाएंगे और भाषा के रूप में लाएंगे, हमारा प्रसार भी बहुत तेजी से होगा, हमारी ताकत भी बहुत तेजी से बढ़ेगी और इसलिए भाषा का उस रूप में उपयोग होना चाहिए। 

भाषा अभिव्‍यक्‍ति का साधन होती है। हम क्‍या संदेश देना चाहते हैं, हम क्‍या बात पहुंचाना चाहते हैं, भाषा एक अभिव्‍यक्‍ति का माध्‍यम होती है। हमारी भावनाओं को जब शब्‍द-देह मिलता है, तो हमारी भावनाएं चिरंजीव बन जाती है। और इसलिए भाषा उस शब्‍द-देह का आधार होता है। उन शब्‍द-विश्‍व की जितनी हम आराधना करे, उतनी कम है। 

और आज का ये हिन्‍दी का महाकुंभ विश्‍व के 39 देशों की हाजिरी में और भोपाल की धरती पर जिसने हिन्‍दी भाषा को समृद्ध बनाने में बहुत बड़ा योगदान किया है और अन्‍य भाषाएं जहां शुरू होती हैं, इसके किनारे पर हम बैठे हैं, उस प्रकार से भी ये स्‍थान का बड़ा महत्‍व है। हम किस प्रकार से सबको समेटने की दिशा में सोंचे। हमारी भाषा की भक्‍ति ऐसी भी न हो कि जो exclusive हो। हमारी भाषा की भक्‍ति भी inclusive होनी चाहिए, हर किसी को जोड़ने वाली होनी चाहिए। तभी जाकर के, तभी जाकर के वो समृद्धि की ओर बढ़ेगी, वरना हर चीज नाकाम हो जाती है। जब तक... जब तक ये मोबाइल फोन नहीं आए थे और मोबाइल फोन में जब तक कि contact list की, directory की व्‍यवस्‍था नहीं थी तब तक हम सबको, किसी को 20 टेलीफोन नंबर याद रहते थे, कभी किसी को 50 टेलीफोन नंबर याद रहते थे, किसी को 200 टेलीफोन नंबर याद रहते थे। आज technology आने के बाद, हमें अपने घर का टेलीफोन नंबर भी याद नहीं है। तो चीजों के लुप्‍त होने में देर नहीं होती है और जब ये इतनी बड़ी technology आ रही है तब चीजों को लुप्‍त होने से बचाने के लिए हमें बहुत consciously practice करनी होगी। (व्यवधान) इसलिए उन्हें अपने पास लाए, उससे सीखे, उसके समझे और समृद्धि की दिशा में बढ़ करके, उसको और ताकतवर बनाकर के हम दुनिया के पास ले जाएं, तो बहुत बड़ी सेवा होगी। 

मैं फिर एक बार इस समारोह को मरे हृदय से शुभकामनाएं देता हूं और जैसा सुषमा जी ने विश्‍वास दिलाया है कि हम एक निश्‍चित outcome लेकर के निकलेंगे और अगला जब विश्‍व हिन्‍दी सम्‍मेलन होगा तब हम धरातल पर कुछ परिवर्तन लाकर के रहेंगे, ये विश्‍वास एक बहुत बड़ी ताकत देगा। 

इसी एक अपेक्षा के साथ मेरी इस समारोह को बहुत-बहुत शुभकामनाएं, बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

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