कांग्रेस देश को बेचने पर उतारू - ममता बनर्जी
यूपीए सरकार की जन विरोधी नीतियों के विरोध में जंतर-मंतर पर सोमवार को आयोजित रैली में ममता बनर्जी ने खूब जहर उगला है।
उन्होंने कहा कि वह आम आदमी के लिए राजनीति कर रही है और यूपीए को आम आदमी विरोधी बतलाया। तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता ने केन्द्र सरकार द्वारा डीजल मूल्यों की गई वृद्धि, एलपीजी की राशनिंग और रिटेल क्षेत्र में एफडीआई के विरोध में कांग्रेस को आडे़ हाथो लिया और नीतियों को जन विरोधी बतलाया।
मालूम हो, टीएमसी सुप्रीमो औऱ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हाल ही में एफडीआई, डीजल मूल्यों में वृद्धि, और एलपीजी राशनिंग के विरोध में यूपीए-2 सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया था और केन्द्र से अपने सभी 6 मंत्रियों से इस्तीफा दिलवाया दिया था।
जंतर-मंतर पर लोगों को संबोधित करती हुईं ममता ने कहा कि वॉलमार्ट के लिए सरकार ने यह गलत कदम उठाया, जिसके विरोध की घोषणा उन्होंने अपने घोषणा पत्र में भी की थी।
बकौल ममता, यहां तक की अमेरिका ने भी वॉलमार्ट पर तमाम शर्तें लगा रखी हैं जबकि इसके उलट यूपीए सरकार ने वालमार्ट के लिए तमाम बंदिशें समाप्त कर दी हैं। केंद्र पर देश को बेचने का आरोप लगाते हुए ममता बनर्जी ने कहा कि अब देश में ऐसी सरकार की जरूरत नहीं है। ममता ने कहा, हमने चुनाव से पहले अपने घोषणापत्र में ही कह दिया था, हम रिटेल में एफडीआई का समर्थन नहीं करेंगे।
ममता ने आह्वान किया कि आगामी 19 नवंबर को उनकी पार्टी दिल्ली में फिर रैली करेंगे जबकि नंवबर महीने में ही एफडीआई समेत भी जन विरोधी नीतियो के खिलाफ लखनऊ, पटना और हरियाणा में भी रैली करेंगी और जनता को यूपीए सरकार के खिलाफ आगाह करेंगी।
ममता बनर्जी के मुताबिक दिल्ली में प्रदर्शन करने का मकसद साफ है कि कोई यह न समझे कि दिल्ली में हमें समर्थन नहीं है। यहां सिर्फ दिल्ली की जनता का समर्थन हासिल किया है।
केंद्र सरकार को ललकारते हुए ममता बनर्जी ने कहा कि यदि यूपीए आर्थिक सुधार के प्रति वाकई ईमानदार है, तो काले धन को देश में वापस लाने के लिए जतन क्यों नहीं कर रही। ममता ने कहा, अगर यूपीए सरकार देश को बेचेंगे, तो जनता सरकार को बाहर निकाल फेंक देगी, यही लोकतंत्र की खूबसूरती है। ममता ने कहा कि मुझे सरकार की ज़रूरत नहीं, मुझे देश की जनता को अपने साथ रखना है।
ममता बनर्जी ने कहा कि एफडीआई से नौकरियां खत्म होंगी, हमारे छोटे उद्योग प्रभावित होंगे और किसी सरकार को यह अधिकार नहीं है कि वह आम आदमी के जीवनयापन के साधन छीन ले। उन्होंने कहा कि तृणमूल कांग्रेस लोकतंत्र में विश्वास करती है, लेकिन केंद्र सरकार उसका दुरुपयोग कर रही है।
ममता का कहना है कि उन्होंने सरकार के साथ काम करने की कोशिश की, लेकिन वह सरकार की जनविरोधी नीतियों का समर्थन नहीं कर सकती थीं, क्योंकि मैंने राजनीति में प्रवेश देश सेवा के लिए लिया था, कुछ हासिल करने के लिए नहीं। सिलेंडरों पर केंद्र की राशनिंग की बात पर ममता ने कहा कि लगता है कि इन नेताओं के घर में खाना नहीं बनता है। सब बाहर से आता है। उनका कहना है कि सालभर में छह सिलेंडर से एक परिवार का काम नहीं चलता।
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प्रणब मुखर्जी ने गठबंधन दलों से धोका किया - ममता बनर्जी
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री व तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने दावा किया कि केंद्र सरकार प्रत्यक्ष विदेशी निवेश [एफडीआइ] मुद्दे पर अपने पुराने रुख से हट गई है। उन्होंने फेसबुक पर लिखा कि तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने सात दिसंबर, 2011 को लोकसभा में कहा था कि खुदरा क्षेत्र में एफडीआइ का फैसला राजनीतिक सर्वसम्मति के बाद ही लिया जाएगा।
ममता ने फेसबुक पर लिखा कि हमें बताइए कि केंद्र सरकार के इस बयान से कौन अलग हट गया?
इसके साथ ही ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार पर उनका फोन टेप कराने की तरफ इशारा किया है। ममता एवं केंद्र सरकार के रिश्ते आर्थिक सुधारों के मुद्दे पर पहले से ही तल्ख है।
ममता ने गुरुवार को कहा कि यदि केंद्र सरकार का नियंत्रण आपके हाथ में है तो आप फोन टेप कर सकते है। यह मेरे साथ पहले हो चुका है। मेरे पास तीन नंबर है। जब मैं नंदीग्राम या मिदनापुर जाती हू तो मैं अपने फोन का प्रयोग नहीं कर पाती क्योंकि इनका प्रयोग कोलकाता में होता है।
ममता ने कहा कि मैं केंद्र सरकार में रह चुकी हूं और मुझे ये सारे तौर तरीके मालूम हैं। मेरा मुंह खुलवाने की कोई जरूरत नहीं है।
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सरकार ने कहा था राष्ट्रपति के हस्ताक्षर जरूरत नहीं - एम के नारायणन
पश्चिम बंगाल की तृणमूल सरकार द्वारा तैयार 'सिंगुर भूमि पुनर्वास व विकास कानून-2011' को कलकत्ता हाई कोर्ट द्वारा असंवैधानिक करार देकर खारिज करने के तीन दिन बाद राज्यपाल एमके नारायणन ने अपने बयान से विवाद को गहरा दिया है। राज्यपाल ने सफाई देते हुए कहा कि उन्होंने जो किया वह राज्य सरकार के परामर्श से। उन्हें बताया गया था कि इस विधेयक के लिए राष्ट्रपति के हस्ताक्षर की जरूरत नहीं। यह बयान देकर उन्होंने राज्य सरकार से गलत सलाह मिलने की ओर इशारा किया है।
सोमवार को कोलकाता में पत्रकारों द्वारा सिंगुर प्रकरण की बाबत पूछे जाने पर नारायणन ने कहा कि वह कोर्ट के फैसले पर कोई मंतव्य नहीं देना चाहते। इसी बीच किसी ने कहा, आपने बिल पर हस्ताक्षर किया था जिसे हाई कोर्ट ने असंवैधानिक करार देते हुए रद कर दिया है, इसपर राज्यपाल ने कहा कि उन्होंने राज्य सरकार से परामर्श करने के बाद ऐसा किया था। उनसे कहा गया था कि इस बिल पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर की जरूरत नहीं है। उल्लेखनीय है कि माकपा समेत विभिन्न विपक्षी दल सिंगुर भूमि पुनर्वास बिल तैयार करने में राज्य सरकार पर संवैधानिक प्रक्रिया की अनदेखी कर जल्दबाजी करने का आरोप लगाते रहे हैं।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अब तक हाई कोर्ट के निर्णय पर मौखिक टिप्पणी नहीं की है, सिर्फ फेसबुक के जरिए मुहिम चला रही हैं, लेकिन राज्यपाल के बयान ने ममता के राजनीतिक विरोधियों को उन्हें घेरने का नया मौका दे दिया है।
कलकत्ता हाई कोर्ट ने गत शुक्रवार को सिंगुर भूमि पुनर्वास व विकास कानून को असंवैधानिक करार देते हुए खारिज कर दिया था। कोर्ट ने राष्ट्रपति द्वारा अनुमोदित नहीं होने के कारण इसे अवैधानिक करार दिया था।
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मुझे ममता जी का समर्थन मिलने की उम्मीद-संगमा
लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष पी.ए. संगमा ने शुक्रवार को राष्ट्रपति चुनाव में उनकी उम्मीदवारी को तृणमूल कांग्रेस का समर्थन मिलने का विश्वास जताया।
संगमा ने कहा है कि, "मैं लगातार उनके सम्पर्क में हूं। मैं अगले एक-दो दिन में उनसे मिलूंगा। मुझे उनका समर्थन मिलने की बहुत उम्मीद है।"
संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी के पक्ष में ज्यादा सदस्य होने के विषय में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, "चुनाव अनुच्छेद 55 के अनुसार होता है और इस अनुच्छेद में स्पष्ट है कि चुनाव गुप्त मतदान के जरिए होगा। इस समय संख्या का सवाल की नहीं उठता।"
उन्होंने कहा, "गुप्त मतदान का मतलब अंतरात्मा की आवाज सुनकर मतदान करना है और मैं अंतरात्मा की आवाज सुनकर मतदान करने में भरोसा करता हूं।"
संप्रग व वाम मोर्चे के विभाजन के सम्बंध में पूछने पर संगमा ने कहा, "लगभग हर राजनीतिक दल में विभाजन हो रहा है। जो बताता है कि यह चुनाव एक गम्भीर चुनाव है। यह उतना आसान नहीं है जितना कांग्रेस दावा कर रही है। विभाजन हो रहा है क्योंकि लोग इस सम्बंध में गम्भीरता से सोच रहे हैं। यह एक स्वागतयोग्य बदलाव है।"
उन्होंने कहा, "प्रणब मुखर्जी भी अविभाजित संप्रग के उम्मीदवार नहीं है। ममता भी संप्रग का हिस्सा हैं और उन्होंने अभी प्रणब को समर्थन नहीं दिया है।"
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने गुरुवार को ही संगमा को समर्थन देने की घोषणा की।
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पश्चिम बंगाल को अब 'पश्चिम बंग' के नाम से जाना जाएगा
पश्चिम बंगाल सरकार ने एक सर्वदलीय बैठक में तय किया है कि पश्चिम बंगाल को अब 'पश्चिम बंग' के नाम से जाना जाएगा.
बैठक में शामिल हुए मंत्रियों के मुताबिक़ नाम बदलने के फ़ैसले के दौरान प्रशासनिक, ऐतिहासिक और सामाजिक सभी आयामों का ध्यान रखा गया है.राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, संसदीय कार्यमंत्री पार्थ चटर्जी और विपक्षी नेता सूर्यकांत मिश्रा की मौजूदगी में राज्य के लिए कई नए नामों पर विचार किया गया.
इसके बाद सर्वसम्मति से राज्य के नाम को बदल 'पश्चिम बंग' किए जाने पर मुहर लगा दी गई.अलग-अलग दलों की ओर से बैठक में जिन नामों पर विचार किया गया उनमें बांग्ला, पश्चिम बंग, बांग्लाप्रदेश, बंगभूमि और गौरबंगा जैसे सुझाव शामिल थे.
भारत में पहले भी राज्यों के नाम बदले गए हैं. पहले कर्नाटक को मैसूर और तमिलनाडु को मद्रास कहा जाता था. भारत के पड़ोसी देशों बांग्लादेश और चीन ने भी अपनी राजधानियों पीकिंग और ढाका के हिज्जे बदले हैं.
कलकत्ता अब कोलकाता, मद्रास चेन्नई, पूना पुणे और बड़ोदा अब वडोदरा बन गए हैं.
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पूरा रेलवे बजट डाउनलोड करे (Download Railway Budget 2011-12
- रेलवे जोनों में टक्कर-रोधी उपकरण.
- पिछले पांच साल में रेल हादसे में कमी आई है.
- प्रभावित बस्तर-गढ़चिरौली के बीच रेल लाइन बनाई जाएगी.
- बनर्जी ने किया प्रधानमंत्री रेल विकास योजना का ऐलान.
- बिछाने का लक्ष्य 1000 किलोमीटर से घटाकर 700 किलोमीटर किया गया.
- जम्मू में सुरंग पुल बनाने का ट्रेनिंग कॉलेज बनाया जाएगा.
- मणिपुर में डीजल लोकोमेटिव सेंटर बनाया जाएगा.
- इंफाल को रेलवे नेटवर्क से जोड़ा जाएगा.
- उड़ीसा में भी कोच फैक्ट्री बनाई जाएगी.
- सिंगूर में मेट्रो कोच फैक्ट्री बनाई जाएगी.
- बोंगोईगांव और नंदीग्राम में औद्योगिक पार्क बनाया जाएगा.
- निजी निवेश से 85 प्रस्ताव आए हैं.: ममता बनर्जी
- गांवों को रेल से जोड़ने का प्रयास हो रहा है: ममता बनर्जी
- राय बरेली कोच फैक्ट्री का काम तेजी से हो रहा है: ममता
- ममता ने कहा, ज्यादा दे डिब्बे उपलब्ध कराने की योजना.
- ममता ने कहा, कर्मचारियों के काम की तारीफ नहीं होती.
- ममता ने कहा, रेलवे से देश में आर्थिक विकास हुआ.
- रेल कर्मचारियों पर मुझे गर्व है: ममता बनर्जी
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अपराधी को टिकेट नहीं तो करूँगा ममता की पार्टी का प्रचार - स्वामी रामदेव
योग गुरु स्वामी रामदेव अगले साल होने वाले राज्य विधानसभा के चुनाव में तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी के लिए प्रचार करेंगे। उन्होंने कहा कि वह ऐसा करने के लिए तैयार हैं, बशर्ते ममता यह वादा करें कि वह किसी आपराधिक छवि वाले व्यक्ति को चुनाव में टिकट नहीं देंगी।योग गुरु सोमवार को मर्चेट चैंबर ऑफ कामर्स की ओर से आयोजित प्रश्नोत्तर सत्र में पूछे गए एक सवाल का जवाब दे रहे थे। उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी के बारे में काफी सुना है। उनका राजनीतिक जीवन साफ-सुथरा है। वह चाहते हैं कि बंगाल में राजनीतिक सत्ता का परिवर्तन हो और राज्य के विकास का मार्ग प्रशस्त हो।स्वामी रामदेव ने कहा कि बंगाल पहले काफी शक्तिशाली हुआ करता था, लेकिन अब इसमें ठहराव आ गया है। लंबे समय से सत्ता में बने रहने के कारण वामो सरकार निरंकुश हो गई है।
उन्हें उम्मीद है कि 2011 में सत्ता परिवर्तित होगी। रविवार को ममता के बेहद करीबी पार्थ चटर्जी से बाबा रामदेव की फोन पर बात हुई थी।उन्होंने कहा कि ममता से वह आग्रह करेंगे कि अगले साल होने वाले राज्य विधान सभा चुनाव के लिए साफ छवि वाले लोगों को ही उम्मीदवार बनाएं। यदि ऐसा होता है तो वे बंगाल के गांवों में रहने वाले अपने अनुयायियों से तृणमूल का समर्थन करने के लिए कहेंगे। इतना ही नहीं वह खुद भी चुनाव प्रचार करेंगे।
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बुद्धदेव भट्टाचार्य के बयान पर भड़की ममता
तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने आज पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री के बयान के जवाब में राज्य के लोगों से विकास और माकपा में से किसी एक को चुनने के लिये कहा।दरअसल वाम दलों की कोलकाता में 30 नवंबर को हुई जनसभा में मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने राज्य के लोगों से ‘वाम दल या मौत’ में से किसी को चुनने के लिए कहा था।
ममता ने उत्सव मैदान में यहां अयोजित जनसभा में कहा, ‘‘यह किस तरह के मुख्यमंत्री हैं जो लोगों से वामदल और मौत में से किसी एक को चुनने के लिये कहते हैं । क्या उन्हें लोकतंत्र का जरा भी सम्मान है? हम कहते हैं कि चुनाव विकास या माकपा के बीच होना है ।’’ उन्होंने कहा कि पुलिस और हथियारों के बिना मदद के जंग होने दीजिये, फिर पता चलेगा कि माकपा के गुंडों और समर्पित तृणमूल कार्यकर्ताओं में कौन मजबूत है ।
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देगंगा के हिन्दू विरोधी दंगों का सच और मीडिया की नपुन्सिकता
विगत 5 सितम्बर की शाम से पश्चिम बंगाल के उत्तरी चौबीस परगना जिले के अल्पसंख्यक हिन्दू परिवार भय, असुरक्षा और आतंक के साये में रह रहे हैं। ये अल्पसंख्यक हिन्दू परिवार पिछले कुछ वर्षों से इस प्रकार की स्थिति लगातार झेल रहे हैं, लेकिन इस बार की स्थिति अत्यंत गम्भीर है। सन् 2001 की जनगणना के मुताबिक देगंगा ब्लॉक में मुस्लिम जनसंख्या 69% थी (जो अब पता नहीं कितनी बढ़ चुकी होगी)।


(चित्र : खाली पड़ी सरकारी भूमि जहाँ से विवाद शुरु किया गया)
पश्चिम बंगाल का यह इलाका, बांग्लादेश से बहुत पास पड़ता है। यहाँ जितने हिन्दू परिवार बसे हैं उनमें से अधिकतर या तो बहुत पुराने रहवासी हैं या बांग्लादेश में मुस्लिमों द्वारा किये गये अत्याचार से भागकर यहाँ आ बसे हैं। उत्तरी 24 परगना से वर्तमान में तृणमूल कांग्रेस से हाजी नूर-उल-इस्लाम सांसद है, और तृणमूल कांग्रेस से ही ज्योतिप्रिया मलिक विधायक है। 24 परगना जिले में भारत विभाजन के समय से ही विस्थापित हिन्दुओं को बसाया गया था,
लेकिन पिछले 60-65 साल में इस जिले के 8 ब्लॉक में मुस्लिम जनसंख्या 75% से ऊपर, जबकि अन्य में लगभग 40 से 60 प्रतिशत हो चुकी है, जिसमें से अधिकतर बांग्लादेशी हैं और तृणमूल और माकपा के वोटबैंक हैं।
5 तारीख (सितम्बर) को देगंगा के काली मन्दिर के पास खुली ज़मीन, जिस पर दुर्गा पूजा का पंडाल विगत 40 वर्ष से लग रहा है, को लेकर जेहादियों ने आपत्ति उठाना शुरु किया और उस ज़मीन की खुदाई करके एक नहर निकालने की बात करने लगे ताकि पूजा पाण्डाल और गाँव का सम्पर्क टूट जाये जिससे उस ज़मीन पर अवैध कब्जे में आसानी हो, उस वक्त स्थानीय पुलिस ने उस समूह को समझा-बुझाकर वापस भेज दिया। 6 सितम्बर की शाम को इफ़्तार के बाद अचानक एक उग्र भीड़ ने मन्दिर और आसपास की दुकानों पर हमला बोल दिया।
माँ काली की प्रतिमा तोड़ दी गई, कई दुकानों को चुन-चुनकर लूटा गया और धारदार हथियारों से लोगों पर हमला किया गया। चार बसें जलाई गईं और बेराछापा से लेकर कदमगाछी तक की सड़क ब्लॉक कर दी गई। भीड़ बढ़ती ही गई और उसने कार्तिकपुर के शनि मन्दिर और देगंगा की विप्लबी कालोनी के मन्दिरों में भारी तोड़फ़ोड़ की।
देगंगा पुलिस थाने के मुख्य प्रभारी अरुप घोष इस हमले में बुरी तरह घायल हुए और उनके सिर पर चोट तथा हाथों में फ़्रेक्चर हुआ है (चित्र – जलाये गये मकान और हिन्दू संतों की तस्वीरें)।
जमकर हुए बेकाबू दंगे में 6 सितम्बर को 25 लोग घायल हुए। 7 सितम्बर को भी जब हालात काबू में नहीं आये तब रैपिड एक्शन फ़ोर्स और सेना के जवानों को लगाना पड़ा, उसमें भी तृणमूल कांग्रेस की नेता रत्ना चौधरी ने पुलिस पर दबाव बनाया कि वह मुस्लिम दंगाईयों पर कोई कठोर कार्रवाई न करे, क्योंकि रमज़ान का महीना चल रहा है, जबकि सांसद हाजी नूर-उल-इस्लाम भीड़ को नियंत्रित करने की बजाय उसे उकसाने में लगा रहा।
बेलियाघाट के बाज़ार में RAF के 6-7 जवानों को दंगाईयों की भीड़ ने एक दुकान में घेर लिया और बाहर से शटर गिराकर पेट्रोल से आग लगाने की कोशिश की, हालांकि अन्य जवानों के वहाँ आने से उनकी जान बच गई (चित्र – सांसद नूरुल इस्लाम)। 7 सितम्बर की शाम तक दंगाई बेलगाम तरीके से लूटपाट, छेड़छाड़ और हमले करते रहे, कुल मिलाकर 245 दुकानें लूटी गईं और 120 से अधिक व्यक्ति घायल हुए। प्रशासन ने आधिकारिक तौर पर माना कि 65 हिन्दू परिवार पूरी तरह बरबाद हो चुके हैं और उन्हें उचित मुआवज़ा दिया जायेगा।
जैसी कि आशंका पहले ही जताई जा रही थी कि बंगाल के आगामी चुनावों को देखते हुए माकपा और तृणमूल कांग्रेस में मुस्लिम वोट बैंक हथियाने की होड़ और तेज़ होगी, और ऐसी घटनाओं में बढ़ोतरी होना तय है। घटना के तीन दिन बाद तक भाजपा के एक प्रतिनिधिमण्डल को छोड़कर अन्य किसी भी पार्टी के कार्यकर्ता या नेता ने वहाँ जाना उचित नहीं समझा, क्योंकि सभी को अपने वोटबैंक की चिंता थी।
राष्ट्रीय मीडिया की ऐसी ही “घृणित और नपुंसक चुप्पी” हमने बरेली के दंगों के समय भी देखी थी, जहाँ लगातार 15 दिनों तक भीषण दंगे चले थे और हेलीकॉप्टर से सुरक्षा बलों को उतारना पड़ा था। उस वक्त भी “तथाकथित राष्ट्रीय अखबारों” और “फ़र्जी सबसे तेज़” चैनलों ने पूरी खबर को ब्लैक आउट कर दिया था…। यहाँ सेना के फ़्लैग मार्च और RAF की त्वरित कार्रवाई के बावजूद आज एक सप्ताह बाद भी मीडिया ने इस खबर को पूरी तरह से दबा रखा है। 24 सितम्बर को आने वाले अयोध्या के निर्णय की वजह से मीडिया को अपना “सेकुलर” रोल निभाने के कितने करोड़ रुपये मिले हैं यह तो पता नहीं, अलबत्ता “आज तक” ने संतों के स्टिंग ऑपरेशन को “हे राम” नाम का शीर्षक देकर अपने “विदेश में बैठे असली मालिकों” को खुश करने की भरपूर कोशिश की है।
ऐसी ही एक और भद्दी लेकिन “सेकुलर” कोशिश ममता बैनर्जी ने भी की है जब उन्होंने हिज़ाब में नमाज़ पढ़ते हुए अपनी फ़ोटो, रेल्वे की एक परियोजना के उदघाटन समारोह के विज्ञापन हमारे टैक्स के पैसों पर छपवाई है और पश्चिम बंगाल के मुसलमानों से अघोषित वादा किया है कि “यह रेल तुम्हारी है, रेल सम्पत्ति तुम्हारी है, मैं नमाज़ पढ़ रही हूं, मुझे ही वोट देना, माकपा को नहीं…”। फ़िर बेचारी अकेली ममता को ही दोष क्यों देना, जब वामपंथी बरसों से केरल और बंगाल में यही गंदा खेल जारी रखे हुए हैं और मनमोहन सिंह खुद कह चुके हैं कि “देश के संसाधनों पर पहला हक मुस्लिमों का है…”, तब भला 24 परगना स्थित देगंगा ब्लॉक के गरीब हिन्दुओं की सुनवाई कौन और कैसे करेगा? उन्हें तो मरना और पिटना ही है…।
जिस प्रकार सोनिया अम्मा कह चुकी हैं कि भोपाल गैस काण्ड और एण्डरसन पर चर्चा न करें (क्योंकि उससे राजीव गाँधी का निकम्मापन उजागर होता है), तथा गुजरात के दंगों को अवश्य याद रखिए (क्योंकि भारत के इतिहास में अब तक सिर्फ़ एक ही दंगा हुआ है)…
ठीक इसी प्रकार मनमोहन सिंह, दिग्विजय सिंह, ममता बनर्जी, वामपंथी सब मिलकर आपसे कह रहे हैं कि, बाकी सब भूल जाईये, आपको सिर्फ़ यह याद रखना है कि हिन्दुओं को एकजुट करने की कोशिश को ही “साम्प्रदायिकता” कहते है…
सुरेश चिपलूनकर (प्रखर राष्ट्रवादी लेखक और चिन्तक)
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तुझसे नाराज़ नहीं चिदंबरम हैरान हूँ मैं - मनमोहन सिंह
ममता बनर्जी केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम को लगातार झूठा साबित करती आ रही है और माओवादियों के लिए उनके दिल में अपार प्रेम हैं और इससे भी ज्यादा विचित्र बात यह है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह चिदंबरम की बजाय ममता बनर्जी का साथ देने में लगे हैं। इसी सप्ताह ममता बनर्जी से मिलने के लिए प्रधानमंत्री ने अपने दो बड़े कार्यक्रम टाले जिसमें एक राजनयिक रात्रिभोज भी था। ममता बनर्जी देर तक प्रधानमंत्री के साथ रही और उन्होंने माओवादियो से निपटने की गृह मंत्रालय की शैली की आलोचना की। खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की राय यही है। माओवादियों से वे बार बार हर संभव मौके पर अपील कर रहे हैं कि वे बातचीत के लिए सामने आए और हिंसा का रास्ता छोड़ दे। प्रधानमंत्री तो यहां तक कह चुके हैं कि माओवादी हमारे अपने ही आदमी है और उनसे उनके दुख के कारण पूछे जा सकते हैं।
उधर चिदंबरम प्रधानमंत्री की इस परम नरम मुद्रा से काफी दुखी है। उन्होंने बार बार ऐलान किया है कि ऑपरेशन ग्रीन हंट के जरिए उन्होंने माओवादियों से आर पार की लड़ाई का जब ऐलान कर ही दिया है तो माओवादियों के प्रति इतना प्यार दिखा कर प्रधानमंत्री आखिर साबित क्या करना चाहते हैं?
मगर प्रधानमंत्री की नाराजगी चिदंबरम के साथ माओवाद को ले कर ही नहीं है, वे भगवा आतंकवाद के नाम पर दिए गए चिदंबरम के बयान से भी काफी आहत है। आज तक जब इस देश में आतंकवाद को मुस्लिम या इस्लामी नहीं कहा गया तो फिर भगवा या हिंदू आतंकवाद शब्द कहां से आ गया और उसे खुद गृह मंत्री ने मान्यता क्यों दे दी? यूपीए सरकार के खिलाफ भाजपा का यह अब एक सबसे नया हथियार है और यह हथियार चिदंबरम की मेहरबानी से मिला है।
दरअसल प्रधानमंत्री ममता बनर्जी से मिलने के बाद चिदंबरम को बुलाते समय इतनी नाराजगी में थे कि चिदंबरम ने खुद प्रणब मुखर्जी और एके एंटनी से अनुरोध किया कि वे भी इस बैठक में आए। प्रधानमंत्री पहले ही इन दोनों का बुला चुके थे। चिदंबरम ने ममता बनर्जी की शिकायत को नाजायज बताया जिसमें ममता ने कहा था कि माओवादियों के खिलाफ जो केंद्रीय अर्धसैनिक बल आए हैं उनका फायदा वामपंथी उठा रहे हैं। वैसे भी ममता बनर्जी लालगढ़ की अपनी चर्चित रैली में माओवादियों के नेता आजाद की मौत को ले कर इसे फर्जी मुठभेड़ कह चुकी है और इसकी जांच की मांग भी कर चुकी है।
इस बात की संभावना कम है कि चिदंबरम को हटाया जाएगा या उनकी जगह कोई नया गृह मंत्री ला कर उन्हें किसी दूसरे विभाग में भेजा जाएगा लेकिन उन पर निगरानी करने के लिए बहुत सारे उपाय सोचे गए हैं और इन उपायों के पीछे प्रधानमंत्री ने यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी से अपने तर्कों के आधार पर अनुमति भी ले ली है।
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लालगढ़ के बयान पर संसद में भी घिरीं ममता

लालगढ़ में माओवादियों के समर्थन में दिए बयान को लेकर रेल मंत्री ममता बनर्जी को सड़क से लेकर संसद तक विपक्ष के जबरदस्त विरोध का सामना करना पड़ रहा है. संसद में विपक्षी दलों ने ममता के मंत्री होने तक पर सवाल उठा दिया.
गुरूवार को संसद की कार्यवाही शुरू होते ही राज्यसभा में बनर्जी को समूचे विपक्ष ने जमकर घेरा. वामदलों ने तो इसे कैबिनेट मंत्री के तौर पर ममता को मिले अधिकारों के हनन का मामला तक बता दिया. पिछले सोमवार को ममता ने अपने गृह राज्य पश्चिम बंगाल के नक्सली हिंसा से प्रभावित लालगढ़ में तृणमूल कांग्रेस की रैली में माओवादियों की तरफदारी में भाषण दिया था.
उन्होंने हाल ही में पुलिस मुठभेड़ का शिकार बने शीर्ष माओवादी नेता आजाद की मौत को हत्या बताया था. ममता ने कहा, "जिस तरह आजाद को मारा गया, वह सही नहीं था और इसकी जांच होनी चाहिए." बुधवार को ममता ने अपने बयान से पीछे नहीं हटने की भी बात कह डाली. गौरतलब है कि माओवादियों का प्रवक्ता आजाद 2 जुलाई को आंध्र प्रदेश के आदिलाबाद जिले में सुरक्षाबलों के साथ हुई मुठभेड़ में मारा गया था.
ममता के बयान का विरोध करते हुए सीपीएम नेता और राज्यसभा सदस्य सीताराम येचुरी ने उन पर माओवादियों का पक्ष लेने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि सरकार का एक मंत्री कैसे खुलकर उन माओवादियों का साथ दे सकता है जिन्हें खुद प्रधानमंत्री ने देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया है.
येचुरी ने कहा कि मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक रेल मंत्री ने सरकारी एजेंसियों को हत्यारा बताया है. उन्होंने कहा कि ममता ने अपने भाषण में माओवादियों के साथ जुड़ने पर गर्व होने की बात भी कही थी जो कि निहायत शर्मनाक है.
बीजेपी के प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने भी सदन में ममता की निंदा की. उन्होंने कहा कि एक केन्द्रीय मंत्री का सरकार के खिलाफ सार्वजनिक तौर पर बयान देना गंभीर बात है.
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