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कांग्रेस ने तो पटेल को बौना ही किया - तवलीन सिंह

इस साल दिवाली की रोशनियां धीमी क्यों पड़ीं, उसको अगर मेरे राजनीतिक पंडित बंधु समझने की कोशिश करते, तो शायद मालूम हो जाता कि क्यों नरेंद्र मोदी को देखने-सुनने लाखों लोग जुट रहे हैं उनके जलसों में। पटना में उनकी रैली में सुबह से खबर रही होगी विस्फोटों की, क्योंकि पहला धमाका तो बहुत पहले हुआ था रेलवे स्टेशन पर, फिर भी लोग गांधी मैदान में इकट्ठा होते रहे। फिर खबर मिली कि मैदान के आसपास, मंच के करीब हो रहे हैं धमाके, तब भी लोग बैठे रहे, क्यों?

मैंने अपने आप से जब यह सवाल किया, तो याद आई वह बात, जो मुझे एक बुजुर्ग कानपुरवासी ने कही थी। मैंने उनसे पूछा कि वह मोदी को पसंद क्यों करते हैं, तो उन्होंने कहा, क्योंकि हमको उम्मीद है कि अगर मोदी प्रधानमंत्री बनते हैं, तो उत्तर प्रदेश में विकास लाने का काम करेंगे, जैसे गुजरात में उन्होंने किया है। ऐसी ही बातें मैंने राजस्थान के गांवों में सुनी थी। अर्थव्यवस्था का जो कबाड़ा सोनिया-मनमोहन की सरकार के शासन काल में हुआ है, उसका एहसास लोगों को पूरी तरह से हो रहा है अब। महंगे सिर्फ प्याज नहीं हुए हैं, महंगा हो गया है रोजमर्रा के जीवन का सारा सामान इतना कि दिवाली की जो हलचल, जो तामझाम हर साल दिखता है बाजारों में, इस साल नहीं दिखा।

इस निराशा का कारण जानने के बदले राजनीतिक पंडित बेकार मुद्दों के विश्लेषण में लगे रहते हैं। मोदी के विरोधी हर दूसरे दिन एक नया नुक्स उनमें ढूंढ निकालते हैं। सो पिछले सप्ताह पहले तो हम पंडितों ने बिहार के मुख्यमंत्री के उस भाषण का खूब विश्लेषण किया, जिसमें उन्होंने मोदी का मजाक उड़ाया था। मोदी को इतिहास के बारे में इतना कम पता है, नीतीश कुमार ने कहा कि चंद्रगुप्त का वंश उन्होंने गुप्त बताया, जबकि चंद्रगुप्त मौर्य वंश के थे। सिकंदर कभी गंगा नदी तक पहुंचे ही नहीं थे, पर मोदी को यह भी नहीं मालूम और न ही उनको मालूम है कि तक्षशिला का प्राचीन विश्वविद्यालय बिहार का कभी हिस्सा नहीं था।

नीतीश कुमार के इस भाषण का खूब विश्लेषण हुआ और इसके फौरने बाद मोदी ने सरदार वल्लभ भाई पटेल के बारे में कह दिया डॉ. मनमोहन सिंह के सामने कि अगर वह बने होते, भारत के पहले प्रधानमंत्री, तो इस देश की 'तस्वीर अलग होती, तकदीर भी अलग होती।' अपने प्रिय डॉ. साहिब वैसे तो ज्यादा बोलना पसंद नहीं करते हैं, पर यह बात सुनकर कैसे चुप रहते, सो सुना दिया मोदी को कि सरदार सेक्यूलर थे यानी आप जैसे सांप्रदायिक राजनेता को उनके बारे में बोलने का कोई अधिकार नहीं। स्पष्ट शब्दों में तो नहीं कही प्रधानमंत्री जी ने यह बात, पर उनके मंत्रियों और कांग्रेस प्रवक्ताओं ने बिल्कुल स्पष्ट शब्दों में यह बात कही और हम राजनीतिक पंडित लग गए इस नए मुद्दे का विश्लेषण करने में।

बेमतलब थी सारी बहस, क्योंकि पटेल की विरासत पर हम सबका उतना ही हक है, जितना गांधी जी के विरासत पर है। कांग्रेस के प्रवक्ता, जो आजकल सरदार पटेल को अपनाने की कोशिश कर रहे हैं, भूल रहे हैं शायद कि इसी राजनीतिक दल ने सरदार को बौना करने का काम किया है दशकों से, ताकि नेहरू परिवार का कद ऊंचा दिखे।

इतना वक्त अगर हम बेकार, बेमतलब मुद्दों पर बर्बाद न किए होते पिछले दिनों, तो शायद समझ पाते मोदी की बढ़ती लोकप्रियता के कारण। मेरी नजरों में, इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि मोदी ने अपनी सभाओं में वे मुद्दे उठाए हैं, जिनसे निराशा के इस माहौल में आशा की किरणें जग जाएं। जहां कांग्रेस के बड़े नेता आज भी सिर्फ बातें करते हैं गरीबी हटाने की, मोदी बातें करते हैं संपन्नता और समृद्धि की। ऐसी बातें करके उन्होंने जनता के सामने एक नया आर्थिक सपना रखने का काम किया है, जो बहुत सुनहरा लगता है लोगों को।

मोदी के विरोधियों ने कोशिश की है उनको सांप्रदायिकता के काले रंग में रंग डालने की, लेकिन अभी तक यह रंग उन पर टिका नहीं है। हम जैसे राजनीतिक पंडितों को सोचना चाहिए कि इतने बदनाम राजनेता पर हिटलर होने के इल्जाम,फासीवादी होने के इल्जाम टिक क्यों नहीं रहे हैं। लेकिन हम उलझे रहे हैं बेकार बातों में, जिनसे जनता को कोई मतलब ही नहीं।

स्पेन के जोड़े ने हिंदू परंपरा के अनुसार किया भारत में विवाह

वैदिक हिंदू संस्कृति का आकर्षण स्पेन के एक विवाहित जोड़े को फिर से विवाह रचाने के लिए उत्तरकाशी खींच लाया। उन्होंने शहर से सात किमी दूर नेताला में हिंदू परंपरा के अनुसार विवाह किया। विवाह समारोह में स्थानीय लोग भी शामिल हुए।

स्पेन के लापामा आईलैंड निवासी एदगार (42) व जोआ (32) ने शुक्रवार नेताला में हिंदू रीति-रिवाज से विवाह बंधन में बंधे। एदगार स्पेन में कंपनी में मैनेजर हैं जबकि जोआ पेशे से नर्स है। नैताला में शिक्षक कृष्णानंद बिजल्वाण ने अपने घर पर दोनों के मेजबानी की। विवाह समारोह के लिए घर के बाहर वेदी सजाई गई थी। वर-वधु के वेदी पर पहुंचने के साथ ही पंडित रविंद्र प्रसाद भट्ट ने मंत्रोच्चार के साथ विवाह की रस्म शुरू की। दोनों ने अग्नि के फेरे लेकर सात जन्मों तक एक-दूसरे का साथ निभाने का वचन दिया। स्थानीय युवक आमोद पंवार ने वधु बनी जोआ का भाई बनकर कन्यादान किया। 

स्पेनी जोड़े के साथ आए मनेलो, अमालिया, रोज व हैंक विवाह के अनूठे तरीके से अभीभूत नजर आए। विवाहित जोड़े ने बताया कि दोनों ने अपने धर्म के रीति-रिवाज के अनुसार विवाह किया था, लेकिन हिंदू विवाह पद्धति से आकर्षित होकर उन्होंने हिंदू परंपरा के मुताबिक दोबारा शादी का फैसला लिया। जोआ व ऐदगार 31 अक्टूबर को उत्तरकाशी पहुंचे थे। 11 नवंबर को स्पेन लौट जाएंगे..

बंटवारे के लिए सिर्फ नेहरू थे जिम्मेदार : मौलाना आजाद


मिस्टर जिन्ना सन् 1946 के आरंभ में अखंड भारत के लिए तैयार हो गये थे, पर उसी साल के मध्य में जवाहर लाल नेहरू ने एक ऐसा बयान दे दिया कि जिन्ना ने डायरेक्ट एक्शन का नारा देकर पाकिस्तान बनवा लिया। यह बात आजाद भारत के पहले शिक्षा मंत्री अबुल कलाम आजाद ने लिखी है। अपनी आत्मकथा ‘आजादी की कहानी’ में आजाद ने लिखा कि ब्रिटिश सरकार के कैबिनेट मिशन, कांग्रेस महासमिति और मुस्लिम लीग परिषद के बीच इस बात पर आपसी सहमति बन चुकी थी कि अखंड आजाद भारत की केंद्रीय सरकार के अधीन तीन विषय होंगे-रक्षा, विदेश और संचार। राज्यों को तीन श्रेणियों में बांट दिया जाएगा। उन्हें स्वायतता रहेगी। ‘बी’ श्रेणी के राज्यों में पंजाब, सिंध, उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत व ब्रिटिश बलोचिस्तान शामिल किए जाएंगे। ‘सी’ श्रेणी के राज्यों में बंगाल और असम शामिल थे। बाकी राज्य ‘ए’ श्रेणी में रखे गये थे। कैबिनेट मिशन का ख्याल था कि इस भावी व्यवस्था से मुसलमान अल्पसंख्यक वर्ग को पूरी तरह से इतमिनान हो जाएगा।

याद रहे कि आजादी के लिए हिंदुस्तान के प्रतिनिधियों से विचार-विमर्श की खातिर ब्रिटिश सरकार ने कैबिनेट मिशन भारत भेजा था। मौलाना आजाद ने लिखा कि ‘मिशन ने मेरी यह बात भी मान ली थी कि अधिकतर विषय प्रांतीय धरातल पर संभाले जाएंगे। इसलिए बहुमत वाले राज्यों में मुसलमानों को प्रायः पूरी स्वायत्तता प्राप्त होगी। बी और सी श्रेणियों के राज्यों में मुसलमानों का बहुमत था। इस तरह वे अपनी सारी औचित्यपूर्ण आशाओं को सफल बना सकते थे।’

‘शुरू- शुरू में मि. जिन्ना ने इस योजना का घोर विरोध किया। मुस्लिम लीग स्वतंत्र देश की अपनी मांग को लेकर इतना आगे बढ़ चुकी थी कि उसके लिए कदम वापस लौटाना मुश्किल था। पर कैबिनेट मिशन ने बहुत ही साफ -साफ और असंदिग्ध शब्दों में कह दिया कि वह देश के बंटवारे का सुझाव कभी नहीं दे सकता। मिशन के सदस्य लाॅर्ड पेथिक लारेंस और सर स्टैफर्ड क्रिप्स ने बार- बार कहा कि हमारी समझ में नहीं आता कि मुस्लिम लीग जिस पाकिस्तान सरीखे राज्य की कल्पना कर रही है, वह कैसे जियेगा, कैसे बढ़ेगा और कैसे स्थायी होगा? उनका ख्याल था कि मैंने जो सूत्र दिया है, वही समस्या का हल है। मंत्रिमंडलीय मिशन का ख्याल था कि इसमें कोई हर्ज नहीं है ।’

मौलाना आजाद ने लिखा कि ‘मुस्लिम लीग परिषद की तीन दिन तक बैठक हुई। तब कहीं जाकर वह किसी फैसले पर पहुंच सकी। आखिरी दिन जिन्ना को यह तसलीम करना पड़ा कि मिशन की योजना में जो हल प्रस्तुत किया गया है, अल्पसंख्यकों की समस्या का उससे अधिक न्यायपूर्ण हल और कोई नहीं हो सकता। और उन्हें इससे अच्छी शर्तें मिल ही नहीं सकतीं। उन्होंने परिषद को बताया कि मंत्रिमंडल मिशन ने जो योजना प्रस्तुत की है, उससे और कुछ भी ज्यादा मैं नहीं कर सकता। इसलिए उन्होंने मुस्लिम लीग को योजना मान लेने की सलाह दी और लीग परिषद ने सर्वसम्मति से उसके पक्ष में वोट दिया।’

इस संबंध में कांग्रेस के फैसले के बारे में मौलाना आजाद ने लिखा कि ‘कांग्रेस कार्य समिति में जो विचार विमर्श हुआ, उसमें मैंने कहा कि कैबिनेट मिशन की योजना मूलतः वही है जो कांग्रेस पहले स्वीकार कर चुकी है। ऐसी हालत में योजना में जो प्रमुख राजनीतिक हल प्रस्तुत किया गया था, उसे मान लेने में कार्यसमिति को कोई मुश्किल नहीं हुई। 26 जून, 1946 के अपने प्रस्ताव में कांग्रेस कार्य समिति ने भविष्य के संबंध में कैबिनेट मिशन की योजना स्वीकार कर ली-यद्यपि उसने अंतरिम सरकार का सुझाव मानने में अपनी असमर्थता प्रकट की। कैबिनेट मिशन योजना का कांग्रेस व मुस्लिम लीग दोनों के द्वारा स्वीकार कर लिया जाना हिंदुस्तान के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास की एक गौरवमय घटना थी। यह भी लगा मानो हम आखिरकार सांप्रदायिक कठिनाइयों को भी पीछे छोड़ आए हैं। मि. जिन्ना बहुत खुश न थे, लेकिन और कोई रास्ता न था, इसलिए योजना मानने के लिए उन्होंने खुद को तैयार कर लिया था।’

पर इस पूरी योजना को पलीता लगाने वाली घटना की चर्चा करते हुए मौलाना अबुल कलाम आजाद ने लिखा कि ‘तभी एक ऐसी दुःखद घटना घटी जिसने इतिहास का क्रम ही बदल दिया। दस जुलाई को कांग्रेस अध्यक्ष जवाहर लाल नेहरू ने बम्बई में एक संवाददाता सम्मेलन बुलाया। वहां उन्होंने एक बयान दिया जिस पर शायद सामान्य परिस्थितियों में कोई ध्यान भी न देता। पर उस बयान ने शंका और घृणा के तत्कालीन वातावरण में बड़े ही दुर्भाग्यपूर्ण परिणामों के एक क्रम को जन्म दिया।’

‘कुछ पत्र प्रतिनिधियों ने उनसे सवाल किया, ‘क्या कांग्रेस कार्य समिति के प्रस्ताव पास कर देने का मतलब यह है कि कांग्रेस ने योजना को पूर्ण रूप से स्वीकार कर लिया है जिसमें अंतरिम सरकार के गठन का सवाल भी निहित है ?’

जवाब में जवाहर लाल ने कहा कि कांग्रेस करारों की बेड़ियों से बिलकुल मुक्त रह कर और जब जैसी स्थिति पैदा होगी, उसका मुकाबला करने के लिए स्वतंत्र रहते हुए, संविधान सभा में जाएगी।’ पत्र प्रतिनिधियों ने फिर पूछा कि क्या इसका मतलब यह है कि कैबिनेट मिशन योजना में संशोधन किए जा सकते हैं?

जवाहर लाल बड़ा जोर देकर जवाब दिया कि कांग्रेस ने सिर्फ संविधान सभा में भाग लेना स्वीकार किया है और वह मिशन योजना में जैसा उचित समझे, वैसा संशोधन-परिवर्तन करने के लिए अपने आपको स्वतंत्र समझती है।मौलाना आजाद ने लिखा कि ‘मैं यह कह दूं कि जवाहर लाल का बयान गलत था।

यह कहना सही न था कि कांग्रेस योजना में जो चाहे संशोधन करने के लिए स्वतंत्र है। असल में यह तो हम मान चुके थे कि केंद्रीय सरकार संघीय होगी ।’ (आजादी की कहानी:मौलाना अबुल कलाम आजाद की आत्म कथा-पृष्ठ-173)

आजाद के शब्दों में ‘जवाहर लाल नेहरू के इस बयान से मि. जिन्ना भौंचक रह गये। उन्होंने तुरंत एक बयान जारी किया कि कांग्रेस अध्यक्ष के इस वक्तव्य से सारी स्थिति पर फिर से विचार करना जरूरी हो गया है। जिन्ना ने लियाकत अली खान से लीग परिषद की बैठक बुलाने के लिए कहा और अपने बयान में कहा कि मुस्लिम लीग परिषद ने दिल्ली में कैबिनेट मिशन की योजना इसलिए स्वीकार कर ली थी कि यह आश्वासन दिया गया था कि कांग्रेस ने भी उसे स्वीकार कर लिया है और यह योजना हिंदुस्तान के भावी संविधान का आधार होगी। अब चूंकि कांग्रेस अध्यक्ष ने यह एलान किया है कि कांग्रेस संविधान सभा में अपने बहुमत से योजना को बदल सकती है, इसलिए इसका मतलब यह हुआ कि अल्पसंख्यक वर्ग बहुसंख्यक की दया पर जियेगा।

उसके बाद मुस्लिम लीग की बैठक 27 जुलाई को बम्बई में हुई। अपने उद्घाटन भाषण में मिस्टर जिन्ना ने फिर से पाकिस्तान की मांग की और कहा कि मुस्लिम लीग के सामने यही एक रास्ता रह गया है। तीन दिनों की बहस के बाद लीग परिषद ने मिशन योजना को अस्वीकार करते हुए एक प्रस्ताव पास कर दिया। उसने पाकिस्तान की मांग पूरी कराने के लिए ‘सीधी कार्रवाई’ करने का भी फैसला किया।’

मौलवी ने नाबालिग बच्चे से किया कुकर्म

राजस्थान में झुंझुनूं जिले के बिसाऊ कस्बे में स्थित एक मदरसे के मौलवी पर एक छोटे से बच्चे ने कुकर्म करने का आरोप लगाया है। पीडित ने मौलवी पर गत २२ अक्टूबर से उसके साथ कुकर्म करने का आरोप लगाया है।मामला तब उजागर हुआ जब बच्चा उसके चंगुल से बचकर किसी तरह अपने घर पहुंचा और आपबीती सुनाई।

चनाना गांव के निजामपुर का यह बच्चा बिसाऊ कस्बे में संचालित मदरसे में पिछले १४ माह से रहता था। वह मंगलवार को मौलवी के चंगुल से भागकर परिजनों के पास पहुंचा तथा आप बीती सुनाई।

पुलिस के सामने मामला आने पर उन्होंने पीडित बच्चे का झुंझुनूं के बीडीके अस्पताल में मेडिकल कराया। हालांकि मामला थाने में दर्ज नहीं हुआ है।

देश के नब्बे प्रतिशत लोग मोदी के पक्ष में नहीं - जावेद अख्तर

राज्यसभा सांसद और प्रसिद्ध गीतकार जावेद अख्तर ने भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के समर्थकों पर गुस्सा उतारते हुये पूछा है कि मोदी की खिलाफत करना यदि राष्ट्र विरोधी है तो क्या नब्बे प्रतिशत भारतीय राष्ट्र विरोधी हैं। 

अख्तर ने ट्विटर पर लिखा है कि कुछ लोगों को मानना है कि मोदी का विरोध करना राष्ट्र विरोधी कार्रवाई है। तो क्या उनकी नजर में हम नब्बे प्रतिशत भारतीय राष्ट्र विरोधी हैं। इस ट्वीट के जरिये अख्तर ने एक तरह से दावा किया है कि देश के नब्बे प्रतिशत लोग मोदी के पक्ष में नहीं हैं।

उल्लेखनीय है कि अख्तर ने गत माह कहा था कि मोदी एक अच्छे प्रधानमंत्री नहीं हो सकते। एक तो उन पर सांप्रदायिक दंगे का दाग है तथा वह लोकतांत्रिक व्यक्ति भी नहीं हैं। उसके बाद से मोदी समर्थकों ने सोशल मीडिया पर अख्तर के विरुद्ध अभियान छेड़ दिया था और उन्हें भद्दे संदेश भेजे जा रहे थे।
इस पर अख्तर ने ट्वीट किया था कि मोदी समर्थकों की ओर से जिस तरह के भद्दे और अश्लील संदेश भेजे जा रहे हैं उससे उनके घटिया स्तर का पता चलता है।

मोदी का पटना का भाषण इतिहास की द्रष्टि से बिलकुल सही

राजनीति इतिहास के बिना नहीं चलती। एक स्थापित मान्यता है कि आज की राजनीति कल का इतिहास है और बीते हुए कल की राजनीति आज का इतिहास है। इसलिए राजनीति और इतिहास का चोली-दामन का साथ है।

विपिनचंद्र पाल ने तो यहाँ तक कहा था कि यदि कोई देश अपने इतिहास का बार-बार स्मरण नहीं करता तो वो रास्ता भटक जाता है।

कोई राजनेता अपने श्रोताओं के सामने इतिहास का उपयोग करे तो मुझे इसमें कुछ भी अनुचित नहीं लगता।

ध्यान देने की बात यह है कि वो इतिहास के जिन तथ्यों को प्रस्तुत कर रहा है वो सही हैं या ग़लत।

इसलिए नरेंद्र मोदी के पटना भाषण का भी इसी आधार पर मूल्यांकन होना चाहिए।

जहाँ तक नरेंद्र मोदी द्वारा अपने भाषण में ग़लत तथ्यों के इस्तेमाल की बात है तो यह ऐतिहासिक तथ्य है कि सिकन्दर पोरस से युद्ध के बाद वापस नहीं गया था, झेलम नदी के तट पर कई विकट युद्धों और नदियों को पार करने के बाद वो व्यास नदी तक पहुँचा था। यह बात सत्य है कि वो बिहार कभी नहीं गया।

लेकिन जो मोदी का भाषण है उसमें इस प्रसंग को जिस रूप में प्रस्तुत किया गया है उसे इतिहास के तथ्यों के आलोक में समझने की आवश्यकता है। सिकंदर व्यास नदी के पार जाना चाहता था, लेकिन उसके सेनापतियों ने विद्रोह कर दिया था। उसके सैनिकों ने कहा था कि व्यास नदी तक पहुँचने में हमें बहुत संघर्ष करना पड़ा। व्यास नदी के उस पार नंदों का साम्राज्य है।

ग्रीक इतिहासकारों के मुताबिक सिकंदर प्रतिरोध के बाद शिविर में चला गया और उसने खाना-पीना छोड़ दिया। फिर उसे मनाया गया, उससे कहा गया कि विजेता वही होता है जो विजय के क्षणों को पहचानकर पराजय को टालने के लिए वापस लौटे।

नंद का जो साम्राज्य था उसकी राजधानी पाटलिपुत्र थी, बिहार की शक्ति उसके पीछे थी।

इसलिए मोदी का बिहार की जनता के सामने यह कहना कि बिहार के लोगों ने सिकंदर को भगा दिया, एक इतिहासकार की दृष्टि से मुझे इसमें कुछ असत्य नहीं लगता।

भाषणों में निष्कर्ष प्रस्तुत किया जाता है न कि इतिहास की पूरी जानकारी दी जाती है। मोदी ने भी अपने भाषण में यही किया।

इतिहास का सत्य यही है कि नंद वंश की शक्ति से भयभीत होकर सिकंदर भारत से वापस लौटा। इसके बाद वह पिछले रास्ते से न लौटकर दक्षिण यानी सिंध से होकर वापस लौटा।

इतिहास लोकमानस से विच्छिन्न होकर खड़ा नहीं रह सकता। यह निर्णय करना बहुत कठिन है कि कहाँ पर माइथॉलजी है और कहाँ इतिहास है।

डॉक्टर राम मनोहर लोहिया की ये बात ज़्यादा उचित है कि, ''मुझे इससे संबंध नहीं है कि राम पैदा हुए या नहीं या कृष्ण पैदा हुए या नहीं। मैं ये जानता हूँ कि भारत की वर्तमान चेतना के निर्माण में जितना योगदान राम और कृष्ण का है उतना और किसी का नहीं है। राम ने भारत को उत्तर से दक्षिण को जोड़ा और कृष्ण ने पूर्व से पश्चिम को जोड़ा।'' इतिहास और माइथॉलजी को देखने की ये भी एक दृष्टि है।

मैं समझता हूँ कि कौटिल्य के काल को शोषणकारी राज्य कहना भी गलत है।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में करनीति के अध्याय-दो, प्रकरण-17 में लिखा है कि मौर्य काल में किसानों को किस प्रकार प्रोत्साहन मिलना चाहिए।

इस अध्याय में लिखा है, "किसान ने अगर स्वयं मेहनत करके ऊसर या बंजर ज़मीन को खेती योग्य बनाया है तो राजा को चाहिए कि ऐसी जमीन को कभी वापस न ले, ऐसी जमीनों पर किसानों का पूर्ण अधिकार होना चाहिए। यदि कोई किसान खेती योग्य भूमि को बिना जोते परती ही रखता है तो राजा को चाहिए ऐसी भूमि को उस किसान से लेकर किसी ज़रूरतमंद किसान को दे दे और ऐसे किसी ज़रूरतमंद किसान के न मिलने पर उसे उस गाँव के मुखिया या व्यापारी को खेती करने के लिए दे दे।"

मैं नहीं मानता कि कोई शोषक राज्य ऐसा करेगा।

प्रोफ़ेसर डीएन झा ने कौटिल्य के काल को स्वर्णकाल कहे जाने पर एतराज़ जताया है और इसके प्रमाण के तौर पर कहा है कि उस युग में किसानों से उनकी उपज का एक चौथाई हिस्सा कर के रूप में ले लिया जाता था। इसके प्रमाण के तौर पर वो सम्राट अशोक की उस घोषणा का ज़िक्र करते हैं जिसमें किसानों की उपज पर टैक्स एक चौथाई से कम करके एक बटा छह कर दिया गया था।

सम्राट अशोक बौद्ध संघ की दीक्षा लेने के बाद तीर्थयात्रा के लिए लुम्बिनी गए थे और इसी खुशी में उन्होंने ये घोषणा की थी।

तीर्थयात्रा पर जाने पर वहाँ के लोगों को कुछ राहत देना उनकी अध्यात्मिक चेतना की अभिव्यक्ति थी, इसे राज्य की नीति से जोड़ना अन्याय है। अगर ये राज्य की नीति का अंग होता तो पूरे राज्य के अन्दर वो नई नीति की घोषणा करते।

प्रोफ़ेसर झा ये भी कहते हैं कि कौटिल्य ने गाँवों में शूद्रों की बड़ी संख्या को ये कहते हुए अच्छा बताया है कि उनसे काम लेना आसान होता है।

कौटिल्य अर्थशास्त्र के सबसे बड़े जानकार आर.पी. कांगले के अनुसार नए जनपद को बसाने के लिए पर्याप्त संख्या में किसान और शूद्र होने चाहिए। लेकिन इसमें कहीं भी शोषण शब्द या उस भावना का संकेत नहीं मिलता।

देवेन्द्र स्वरूप, इतिहासका के मुताबिक "ऐतिहासिक तथ्यों के साथ जो पक्षपात पूर्ण प्रतिपादन है ये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है और वामपंथी इतिहासकारों ने इसमें बहुत अनर्थ किया है उन्होंने पुराने पीढ़ी के इतिहासकार जैसे जैसे आर.सी.मजूमदार, के.एन. शास्त्री उन सबको रद्दी की टोकरी में फेंक दिया।"

कौटिल्य ने शूद्र की जो व्याख्या की है उसके अनुसार शिल्प का काम करने वालों को शूद्र कहा जाता था। जो लोग खेती और शिल्प का काम करते थे उन्हें नए जनपद के लिए बसाना ज़रूरी बताया गया था।

जहाँ तक राजनेताओं की ओर से ऐतिहासिक तथ्यों के इस्तेमाल की बात है, ख़ासकर चुनावी परिप्रेक्ष्य में, तो इतिहासकार इसे अलग-अलग दृष्टि से देखते हैं।

अगर नरेंद्र मोदी वामपंथी पार्टी से जुड़े नेता होते तो डीएन झा इन्हीं तथ्यों का समर्थन करते।

ये बात मेरे बारे में भी कही जा सकती है पर मेरे तर्क का आधार ऐतिहासिक तथ्य हैं और कौटिल्य का अर्थशास्त्र है। तथ्यों के आधार पर मैं इस मुद्दे पर डीएन झा से बात करने को तैयार हूँ।

कौटिल्य ने अर्थशास्त्र के नौवें अधिकरण में पूरे भारत, उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में समुद्र तक की एकता की व्याख्या की है।

वास्तव में जो स्वप्न कौटिल्य ने प्रस्तुत किया उसी की पूर्ति चन्द्रगुप्त मौर्य ने की, न कि अशोक ने।

ऐतिहासिक तथ्यों का पक्षपात पूर्ण प्रतिपादन बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है और वामपंथी इतिहासकारों ने इसमें बहुत अनर्थ किया है।

वामपंथियों ने आरसी मजूमदार, केएन शास्त्री जैसे पुराने पीढ़ी के इतिहासकारों को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया।

- प्रोफेसर देवेन्द्र स्वरूप

भाजपा की जीत वाली गोल्डमैन सैक्स की रिपोर्ट पर जल-भुन गई कांग्रेस

कॉमर्स और इंडस्ट्री मिनिस्टर आनंद शर्मा ने 'देश की अंदरूनी राजनीति को लेकर बयान देने पर' गोल्डमैन सैक्स की कड़ी आलोचना की है। ऐसा बहुत कम हुआ है, जब किसी सीनियर मिनिस्टर ने ग्लोबल इनवेस्टमेंट बैंक के बारे में इस तरह की बात कही हो। गोल्डमैन सैक्स ने कहा था कि बीजेपी की लीडरशिप वाला एनडीए अगले लोकसभा चुनाव में जीत हासिल कर सकता है।

इस हफ्ते गोल्डमैन सैक्स ने नरेंद्र मोदी फैक्टर की वजह से भारत की रेटिंग 'अंडरवेट' से बढ़ाकर 'मार्केटवेट' करने का फैसला किया था। 'मोदी-फाइंग आवर व्यू' रिपोर्ट गोल्डमैन ने कहा था, 'अभी भारत उच्च राजस्व घाटा, ज्यादा महंगाई दर और सख्त मॉनेटरी पॉलिसी जैसी मुश्किलों का सामना कर रहा है। हालांकि, अगले साल केंद्र में सत्ता बदलने की उम्मीद इन पर भारी पड़ रही है। माना जा रहा है कि मई 2014 में लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी की अगुवाई में केंद्र में एनडीए की सरकार बनेगी।' बैंक के अनालिस्टों ने इनवेस्टर्स को भेजे नोट में लिखा है, 'इक्विटी इनवेस्टर्स बीजेपी को बिजनेस-फ्रेंडली मानते हैं। वे समझते हैं कि बीजेपी के पीएम कैंडिडेट नरेंद्र मोदी बदलाव के प्रतीक हैं।'

इस रिपोर्ट पर मोदी या बीजेपी की ओर से प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन शेयर बाजार में हवा मजबूत हुई है कि 2014 लोकसभा चुनाव में मोदी की जीत हो सकती है। कांग्रेस की लीडरशिप वाले यूपीए और उसके मंत्रियों को यह बात नागवार गुजरी है। ओपियन पोल में भी बीजेपी को जीतता हुआ दिखाने पर कांग्रेस ने इस विषय पर टीवी चर्चाओं का बॉयकॉट कर दिया है। गोल्डमैन सैक्स की रिपोर्ट को खारिज करते हुए यूपीए सरकार ने कहा है कि भारतीय इकॉनमी की खराब हालत ग्लोबल फैक्टर्स के चलते है। सरकार ने अपनी तरफ से हालात सुधारने के लिए हर कोशिश की है। शर्मा ने कहा कि चुनाव और राजनीति को वोटरों पर छोड़ देना चाहिए।

शर्मा ने इकनॉमिक टाइम्स को दिए इंटरव्यू में कहा, 'मुझे लगता है कि गोल्डमैन सैक्स जैसे बैंकों को उसी काम पर ध्यान देना चाहिए, जो उन्हें आता है।' शर्मा ने कहा, 'गोल्डमैन ने इंडियन इकॉनमी पर जो हालिया रिपोर्ट दी है, उससे खास नेता (नरेंद्र मोदी) और उनकी पार्टी को आगे बढ़ाने की बेताबी नजर आती है। गोल्डमैन ने दिखा दिया है कि उसे यहां की इकॉनमी की बुनियादी समझ नहीं है। इससे उसकी विश्वसनीयता और मकसद पर शक होता है।'

आनंद शर्मा ने सवाल किया कि क्या गोल्डमैन सैक्स या किसी रेटिंग एजेंसी ने पूरी दुनिया को प्रभावित करने वाले आर्थिक संकट को लेकर सटीक भविष्यवाणी की है? उन्होंने कहा, 'क्या गोल्डमैन ने कई इंश्योरेंस कंपनियों और बैंकों के डूबने की भविष्यवाणी की थी? इसलिए सबको पता है कि गोल्डमैन सैक्स जैसे संस्थानों की विश्वसनीयता क्या है। भारतीय राजनीति के बार में बोलकर वे छीछालेदर ही करवाएंगे।'

ब्राम्हण को फेंकेंगे, पूजा और मंदिर जाना बंद करेंगे तब संघ समाप्त होगा: ज्ञानेश महाराव, संपादक चित्रलेखा

चित्रलेखा’के संपादक एवं धर्मद्रोही ज्ञानेश महाराव ने ३१ अक्तूबर को हिंदुओं पर अश्लाघ्य आलोचना करते हुए कहा कि समाज को अपनी अयोग्यता छिपाने हेतु पत्थर के भगवान की आवश्यकता है । वे किसी की प्रेतयात्रा में नहीं जाते हैं; परंतु भगवान गणपति के (गणेश चतुर्थी को) एक मिट्टी के गोले को पहुंचाने हेतु भारी संख्या में जाते हैं, इस बात की उन्हें लज्जा आनी चाहिए । जिस दिन आप ब्राम्हण को फेंकेंगे, पूजन-अर्चन तथा मंदिर में जाना बंद करेंगे, उस दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समाप्त होगा ।

हिंदुओ, आप धर्मशिक्षा लेकर संगठित न होनेके कारण ही हिंदूद्रोही स्पष्ट रूपसे आपके धर्म के विषयमें इतने निम्न स्तर पर जाकर आलोचना करने का साहस कर रहे हैं । क्या उनके लिए मुसलमान अथवा ईसाईयों के विरुद्ध इस प्रकार भाष्य करने का साहस दिखाना कभी संभव था ? इससे शिक्षा लेकर अब तो धर्मरक्षा के लिए संगठित होकर वैधानिक मार्ग से धर्मद्रोहियों को फटकारें ...

अखिल भारतीय अंधश्रद्धा निर्मूलन समितिके प्रवक्ता एवं पत्रकार पुरुषोत्तम आवारे-पाटिल लिखित 'रोखठोक' दीपावली अंक के प्रकाशन के कार्यक्रम में महाराव बोल रहे थे । इस अवसर पर 'रोखठोक' दीपावली अंक में प्रकाशित 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ – किसका शत्रु ? किसका त्राता ?' प्रमुख विषय पर चर्चासत्र आयोजित किया गया था । इस अवसर पर महाराव के साथ भाजपा के महाराष्ट्र प्रवक्ता श्री. माधव भंडारी, रा.स्व. संघके कोकणप्रांत प्रचार प्रमुख श्री. प्रमोद बापट, लेखक संजय सोनावनी, कार्यक्रम के अध्यक्ष एवं लेखक चंद्रकांत वामनखेडे, एस.एन.डीटी महाविद्यालय की प्रा. नम्रता गन्नेरी, पत्रकार प्रमोद चुंचूवार एवं आवारे-पाटिल चर्चासत्र में सम्मिलित हुए थे । इस अवसरपर साप्ताहिक 'कलमनामा' के संपादक युवराज मोहिते भी उपस्थित थे । इस अवसरपर जैसे तैसे ५० नागरिक उपस्थित थे । अधिकांश सभागृह रिक्त ही था ।

निम्न स्तर पर जाकर वक्तव्य देने वाले ज्ञानेश महाराव की कुछ और टिप्पणियां :

१.'सनातन वैदिक धर्म के प्रमुख शंकराचार्य ही होते हैं । वह परस्त्रीगामी, गंजेडी, हत्यारा हो, तो भी शंकराचार्य ही प्रमुख होता है; क्योंकि वह ब्राह्मण होता है । (शंकराचार्य के विषयमें इस प्रकार निम्न स्तर के विशेषण प्रयुक्त कर महारावने अपनी खोखली / निम्नस्तरीय नैतिकता का ही परिचय दिया है । इस व्यक्ति को सुधारक  कहते हैं ! परंतु महाराव ने जो विशेषण बताए हैं, उन विशेषणों से पूरी तरह संपन्न लोग दोनों कांग्रेस में विद्यमान हैं । महारावने उनके विरुद्ध कभी ऐसा वक्तव्य दिया है अथवा अपने नियतकालिकमें कभी लिखा है, ऐसा नहीं दिखाई दिया है । ) वहां दलित अथवा महिला शंकराचार्य नहीं चलता । 

एक बार ब्राह्मण महामंडलेश्वर महिलाने कहा, ‘मैं  शंकराचार्य बनूंगी’ । उस समय कभी एकत्रित न आने वाले चारों शंकराचार्यों ने एकत्रित आकर कहा कि महिला शंकराचार्य नहीं बन सकती । आदिमाता, भूमाता, गोमाता कहनेवाले शंकराचार्यों को महिला क्यों नहीं चलती ? (हिंदुओं के शंकराचार्यों की ऐसी निंदा करने वाले कभी ईसाईयों के पोप अथवा मुसलमानों के धर्मगुरुके संदर्भ में वहां महिला अथवा दलित चाहिए ऐसी मांग क्यों नहीं करते ? उसी प्रकार अंनिस एवं वामपंथी लोग इस बात का उत्तर दें कि वे स्वयं निवृत्त होकर अपने पदों पर प्रथम महिलाओं की नियुक्ति क्यों नहीं करते ? । 'लोगोंको बताएं ब्रह्मज्ञान, परंतु स्वयं कोरे पाषाण' इस कहावत के अनुसार आचरण करनेवाले विश्वासघाती लोगों का षडयंत्र विफल करें ! )  क्या ये लोग पिता की कोख से बाहर आए हैं । मां क्यों नहीं चलती ? ये सब लोग झूठे हैं । संघ भी वैसा ही है । उनमें सर्वत्र बाह्मण लोग ही प्रमुख हैं । तावडे-मुंडे आदि मराठे-बहुजन केवल नचवाने के लिए ही हैं । (हिंदुओ, यह ध्यान रखें कि यह आपके धर्म के विषय में बुद्धिभेद कर आपमें अंतर करने हेतु किया गया सुनियोजित षडयंत्र है !)

२. संघ क्यों बढ रहा है, तो समाज की अयोग्यता के कारण । संघ के अनेक लोग भगवान को नहीं मानते; परंतु भगवान को मानने हेतु अन्य लोगों को विवश करने का कार्य करते हैं । संघ का सेवाकार्य एवं अन्य कार्य प्रचुर मात्रा में है; तो भी इन लोगोंने ८८ वर्षोंमें विविध प्रकार से अत्यधिक संपत्ति जुटाई है । वह देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि और ५०० वर्षों तक संघ समाप्त नहीं होगा । (क्या संघ इस विषय में कुछ भाष्य करेगा ? )

३. हिंदू नाम की कोई बात शेष नहीं है । हिंदुओं की वैचारिक सुंथा हुई है तथा हिंदुओं का सांस्कृतिक बाप्तिस्मा हुआ है । संघवाले केवल लोगों को फंसाने हेतु हिंदू हिंदू कहते हैं । (रा.स्व. संघके कार्यसे भारतमें कुछ तो हिंदू संस्कृति जीवित है । रा.स्व. संघका द्वेष करनेवाली कांग्रेस एवं साम्यवादियोंने विदेशी कुप्रथाओंको प्रोत्साहित कर भारतके हिंदुओंको अपनी संस्कृतिसे दूर किया है । )

संघ के विषय में अपप्रचार करने हेतु वामपंथियों द्वारा सुनियोजित अंतर्राराष्ट्रीय षडयंत्र रचा गया है ! - श्री. माधव भंडारी, प्रदेश प्रवक्ता, भाजपा

१. दीपावली अंक पढने पर ध्यान में आया कि लेखक ने संघ के विषय में क्या फैलाना है, क्या उत्तर देना है, यह पूर्व से ही निश्चित किया एवं उसके  पश्चात उस पर प्रश्न निकाले हैं ।

२. संघ ने ठाणे जनपद के अनेक आदिवासी क्षेत्रों में अच्छा कार्य किया है । अतः वहां अब तक नक्सलवाद को पांव रखना संभव नहीं हुआ । इसी प्रकार जहां कहीं भी संघ ने कार्य किया है, वहां नक्सलवाद बढना संभव नहीं हुआ । यह बात जिसको पसंद नहीं आई, वे संघ की निंदा करने हेतु ऐसी पुस्तकें प्रकाशित कर रहे हैं ।

३. इस पुस्तक के ११९ पृष्ठपर संगणकीय फेरफार कर दंगा करते समय का झूठा छायाचित्र रेखांकित कर जानबूझकर संघ का अनादर किया गया है । संपादकीय नीतिमत्ताको अलग रखकर एक षडयंत्र द्वारा चित्र सिद्ध किया गया है । ऐसा होते हुए भी बौद्धिक चर्चाका प्रयास क्यों किया जाता है ?

४. आयोजकों पर अप्रत्यक्ष आलोचना करते समय भंडारी ने कहा कि भारत में स्वयं को निरपेक्षतावादी (निधर्मी ) कहलाने वाला एक विलक्षण एवं अंतिम  विचारांध वर्ग है । धर्मांध समान वह अत्यधिक कटू नहीं है, तो भी ‘कोई अस्पृश्यता का पालन न करे’ ऐसा कहते हुए यह वर्ग वैचारिक, बौद्धिक एवं सामाजिक अस्पृश्यता का पालन करने का कार्र्य अत्यंत कटुता के साथ कर रहा है । यह वर्ग जानबूझ कर इतिहास तथा वस्तुस्थिति का विकृतीकरण, कल-परसों घटित घटनाओंके भी विकृतीकरण का कार्य कर रहा है । उसी प्रकार मैं जो कहता हूं, उसे सत्य में साकार करता हूं । वह आप की सुनता नहीं, क्योंकि आप निरपेक्षतावादी नहीं हो । इस प्रकार का वैचारिक प्रदूषण पैâलाने का कार्य करता है ।

५. ब्रिटेन की गुप्तचर संस्था में रूस की केजीबी गुप्तचर संस्था के दलाल मिलनेके पश्चात उसके लिए एक आयोग स्थापित किया गया । इस आयोग ने अपने ब्यौरे में कहा कि यदि ब्रिटेन में साम्यवादियों को चुनाव में मतपेटी के माध्यम से सत्ता नहीं मिली, तो वे शिक्षा, प्रसार माध्यम एवं कामगार अभियानमें प्रवेश कर देशका वातावरण परिवर्तित करने के लिए आरंभ करेंगे । आज भारत में यही स्थिति है । विदेशके लेखक मित्र किनाई की पुस्तकमें कहा है कि केजीबी ने १९७७ में भारत के कांग्रेस एवं मित्र पक्ष के २२ उम्मीदवारों पर व्यय किया था । उसी प्रकार रूस की महिला पत्रकार बोरीस वेलसिन ने, स्टेट विदिन स्टेट पुस्तक में शासकीय जानकारी के आधार पर केजीबी ने, भारत के राजघरानों को कितने  धन की आपूर्ति की, इस बात की जानकारी दी है । ये तीन उदाहरण इसलिए दिए कि संघों के विरोध में जो प्रचार चल रहा है, वह इस प्रकार सुनियोजित पद्धति से किया गया दुष्प्रचार है । यह दीपावली अंक उसका ही एक उदाहरण है । यह जानबूझकर चूक चित्र निर्माण किया गया है ।

एक नया फतवा : मंगल पर जाने वाले इंसान हो जाएंगे तबाह

भारत ने जहां मंगलवार को मंगल ग्रह पर अपना यान भेज दिया है, वहीं इस ग्रह पर इंसानों को बसाने के कथित अभियानों के खिलाफ फतवा आया है। सऊदी अरब के धार्मिक विद्वानों की एक परिषद के सदस्य शेख अली अल हेमकी ने मंगल ग्रह पर कॉलोनी बसाने की कोशिश की तीखी आलोचना की है। मार्स वन प्रोजेक्ट के तहत २०२३ तक मंगल ग्रह पर लोगों को बसाने की कोशिश की जा रही है। इस प्रोजेक्ट में दुनिया भर के दो लाख से ज्यादा लोगों ने दिलचस्पी दिखाई है।

सऊदी अरब के अह हयात अखबार ने शेख अली अल हेमकी के हवाले से लिखा है, यह मिशन जिम्मेदार मुस्लिम रिवाजों के मुताबिक नहीं है। यह प्रयोग उन लोगों को तबाह कर देगा जो वहां जाने की कोशिश करेंगे। अगर ऐसा प्रयोग करना ही है तो यह जानवरों के साथ किया जाना चाहिए, इंसानों के साथ नहीं। 

फिल्मो में हिंदू धर्म को अपमानित करने पर हो सकता है सेंसर बोर्ड भंग

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने केंद्रीय फिल्म सेंसर बोर्ड को भंग कर उसे नियमानुसार पुनर्गठित करने के आग्रह वाली एक जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रखा। याचिका में मौजूदा समय में सेंसर बोर्ड से पास की जा रही फिल्मों में खास तौर से हिंदू धर्म की मान्यताओं और महापुरुषों के नामों को अपमानित करने समेत अपशब्दों का प्रयोग करने का आरोप लगाया है।

न्यायमूर्ति इम्तियाज मुर्तजा और न्यायमूर्ति देवेंद्र कुमार उपाध्याय की खंडपीठ के सामने हिन्दू पर्सनल लॉ बोर्ड की तरफ से दायर इस याचिका पर सुनवाई हुई। याचिकाकर्ता हिन्दू पर्सनल ला बोर्ड के अध्यक्ष अशोक पाण्डेय का तर्क था कि जल्द रिलीज होने वाली फिल्म 'रामलीला' के अलावा पूर्व में रिलीज हो चुकी फिल्में - 'ओंकारा', 'गंगाजल' आदि के संवादों में धडल्ले से अपशब्दों का प्रयोग किया गया है. साथ ही हिन्दू महापुरुषों श्रीराम और श्रीकृष्ण की वास्तविक लीलाओं को ना दिखाकर उनके पात्रों के जरिए दूसरी अश्लीलतापूर्ण कहानियां पेश की गई हैं। इससे हिंदू जनमानस को आघात पहुंचा है। इसके साथ ही खासतौर से बच्चों समेत पूरे समाज पर इसका खराब असर पड़ रहा है। 

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि फिल्मों में ऐसी आपत्तिजनक सामग्री होने के बावजूद सेंसर बोर्ड उनके प्रदर्शन की मंजूरी दे रहा है। ऐसे में बोर्ड को भंग करके उसका पुनर्गठन किया जाना चाहिए। उधर फिल्म सेंसर बोर्ड की तरफ से दलील दी गई कि यह जनहित याचिका सुनवाई के लायक नहीं है। इसे खारिज कर दिया जाना चाहिए। अदालत ने सुनवाई के बाद अपना फैसला सुरक्षित रखा। 

रूस के एक गाँव में खुदाई के दौरान भगवान् विष्णु जी की मूर्ती मिली

मास्को के वोल्गा भाग में बसे हुए प्राचीन स्तर के मायना गांव में उत्खनन के समय भगवान श्री विष्णु की प्राचीन मूर्ति पाई गई ।

उत्खनन के समय श्री विष्णु की प्राचीन मूर्ति लगभग सातवीं अथवा दसवीं शताब्दी की होगी ।

उत्खनन समूह के डॉ. कोजविन का कहना है कि यद्यपि मायना नामक गांव की लोकसंख्या ८ सहस्र है, तब भी ऐसा अनुमान है कि १ सहस्र ७०० वर्षों पूर्व वह बहुत अधिक होगी । अर्थात ये सर्व सिद्धांतोंपर आधारित है ।

डॉ. कोजवीन, इस क्षेत्र में ७ वर्षों से उत्खनन कर रहे हैं । अब तक किए गए उत्खनन में  उन्हें प्राचीन सिक्के, पदक, अंगूठियां और शस्त्र मिले हैं ।

इस प्राचीन गांव की वास्तविक उत्पत्ति कब और कैसे हुई, इसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक चर्चा सत्र का आयोजन किया गया है । उसमें श्री विष्णु की मूर्तिपर भी मतप्रदर्शन होनेवाला है ।

ऋग्वेद में इस भाग का उल्लेख ७२२ उडने वाले वाहनों का प्राचीन और पवित्र प्रदेश किया गया है ।

उत्खनन में मिली श्रीविष्णु की मूर्ति के कारण रूस की और भारत के रूस एवं भारत के प्राचीन काल में संबंध थे, इसकी भी पुष्टि हुई है ।

श्री विष्णु के मंदिर में जिस प्रकार पूजा की जाती है, वैसी ही पूजा-अर्चा रूस की चर्च में आज भी वहां की जाती है । वैकुंठ एकादशीके नामसे उनका भी एक उत्सव है ।

मेरा सिर काटने पर इनाम का ऐलान करने वाले से क्यों मिले केजरीवाल : तसलीमा नसरीन

आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल ने मंगलवार को विवादास्पद मौलाना तौकीर रजा खान से मिलकर अपने गुप्त एजेंडे को सार्वजनिक कर दिया. बीजेपी और कांग्रेस के बाद अब निर्वासित बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन भी केजरीवाल पर बरस पड़ी हैं.

मुलाकात के बाद से ही तसलीमा ट्विटर पर केजरीवाल के खिलाफ लिख रही हैं. एक अंग्रेजी अखबार से बातचीत में उन्होंने कहा, 'एक नेता ऐसे कट्टरपंथी से मिलने जाता है जिसने मेरा सिर काटने पर इनाम का ऐलान किया, यह जानते हुए भी कि यह गैरकानूनी और असंवैधानिक है. मुझे हैरत है कि नेता इनके पास क्यों जाते हैं? अगर उन्हें मुसलमानों का समर्थन चाहिए तो वे आम मुसलमानों के पास क्यों नहीं जाते. मौलानाओं के पास जाने वाले नेता ही मुसलमानों के पिछड़ेपन की वजह हैं.'

गौरतलब है कि मौलाना तौकीर रजा खान उस बोर्ड के सदस्य रहे हैं जिसने 2007 इस्लाम विरोधी गतिविधियों के लिए तसलीमा और पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश का सिर कलम करने वाले को 5 लाख रुपये का इनाम देने का फतवा जारी किया था. मौलाना तौकीर पर दंगे करवाने का भी आरोप है. उनके पोते सैयद अहमद रजा खान को 2010 के बरेली दंगों के मामले में गिरफ्तार किया गया था.

आम आदमी पार्टी धर्म की राजनीति से दूर रहने का दावा करती है, लेकिन केजरीवाल की इस मुलाकात से विरोधी दलों को विवाद खड़ा करने का मौका मिल गया है.

उधर बीजेपी ने केजरीवाल पर 'सांप्रदायिक कार्ड' खेलने का आरोप लगा डाला है. वहीं कांग्रेस ने हमेशा की तरह 'आप' को भाजपा की 'बी' टीम कहा है.

आप प्रमुख केजरीवाल ने इस मुलकात को तवज्जो न देने की कोशिश करते हुए कहा कि वह एक धार्मिक यात्रा पर बरेली गए थे और मौलाना से इसलिए मिले थे क्योंकि वह शहर में एक सम्मानित व्यक्ति हैं. केजरीवाल ने कहा कि उन्हें नहीं पता था कि तसलीमा नसरीन के खिलाफ मौलाना ने फतवा जारी किया था.

उन्होंने कहा, 'मैं भ्रष्टाचार मुक्त भारत के लिए जियारत करने दरगाह पर गया था और मौलाना रजा साहब से मुलाकात की क्योंकि वह वहां बहुत सम्मानित व्यक्ति हैं. मैंने उनसे मुलाकात की और उनसे अपील की कि हर किसी को देश को बचाने के लिए एकजुट होना चाहिए क्योंकि यह एक संवेदनशील दौर से गुजर रहा है.'

केजरीवाल ने बताया, 'मैंने उनसे बात की और उन्होंने मुझसे कहा कि वह कभी भी फतवा जारी नहीं कर सकते क्योंकि फतवा मुफ्ती जारी करते हैं. उन्होंने मुझसे कहा कि सैकड़ों लोगों के एक बोर्ड के प्रमुख ने फतवा जारी किया था. कुछ साल पहले वह भी इस बोर्ड के सदस्य थे. 

उन्होंने मुझसे कहा कि सिर्फ इसलिए कि वह ज्यादा जाने-माने हैं और लोगों के बीच सम्मानित हैं, उनका नाम सामने आ गया.' केजरीवाल ने कहा कि वह और उनकी पार्टी के समर्थक हिंसा की राजनीति में यकीन नहीं करते और वे लोग इसे बदलने के लिए ही राजनीति में शामिल हुए हैं.

मुलायम ने मुस्लिम वोट बैंक के लिए कारसेवकों पर गोली चलवाई थी - मोहसीन रजा

उत्तर प्रदेश के मशहूर क्रिकेट खिलाड़ी और अब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता मोहसीन रजा ने कहा है कि समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने मुसलमानों की नजर में मसीहा बनने के लिए कारसेवकों पर गोली चलवाई थी। वह आज तक मुसलमानों की बेहतरी के लिए कुछ नहीं कर पाए। मोहसीन ने दावे के साथ कहा कि हिंदुओं और मुसलमानों के बीच दरार पैदा करने का काम वर्ष 1990 में मुलायम सिंह ने किया था।

उप्र की ओर से रणजी ट्रॉफी के कई मैच खेल चुके मोहसीन रजा ने आईएएनएस के साथ विशेष बातचीत के दौरान मुलायम और कांग्रेस पर जमकर प्रहार किया। मोहसीन ने सवाल किया कि मुलायम ने आज तक मुसलमानों की बेहतरी के लिए क्या किया है?

उन्होंने कहा कि हिंदुओं और मुसलमानों के बीच नफरत की बड़ी लकीर खींचने का काम सबसे पहले मुलायम ने ही वर्ष 1990 में किया था। वर्ष 1990 में कारसेवकों पर गोली चलवाकर मुसलमानों का रहनुमा बनने का दावा करने वाले मुलायम ने अपने राजनीतिक फायदे के लिए मुसलमानों का हमेशा ही इस्तेमाल किया। मुसलमानों के विकास से उनका कोई लेनादेना नहीं है।

मोहसीन कहते हैं, "यदि उन्हें मुसलमानों से लगाव होता तो आज सपा में सिर्फ चंद मुस्लिम नेता ही नजर नहीं आते। वर्ष 1990 में कारसेवकों पर हुई गोलीबारी की वजह से ही उसकी प्रतिक्रिया वर्ष 1992 में एक बड़े आंदोलन के रूप में हुई।"

मोहसीन ने कहा कि यदि देश का विकास होता है, तो उसका फायदा हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी लोग उठा रहे हैं। गुजरात के विकास का फायदा मुसलमानों को मिल रहा है, इसलिए वहां का मुसलमान भी नरेंद्र मोदी के पक्ष में खड़ा है।

उन्होंने कहा, "देश का विकास नरेंद्र मोदी के माध्यम से होगा तो क्या उसका लाभ देश के अल्पसंख्यकों को नहीं मिलेगा? और उनका विकास नहीं होगा? मुसलमानों के भीतर सिर्फ मोदी के नाम का खौफ  पैदा किया जा रहा है।"

मुसलमानों के बीच मोदी को लेकर डर पैदा किए जाने के सवाल पर उन्होंने कहा, "यह वही लोग कह रहे हैं जो मुस्लिम समुदाय को सिर्फ अपने राजनीतिक फायदे के लिए यूज करते हैं। सही बात यह है कि मोदी को लेकर मुसलमानों के भीतर कोई डर नहीं है।"

मोहसीन ने कहा कि मोदी के डर को लेकर कई मुस्लिम धर्मावलंबी अपना मत दे चुके हैं। शैक्षणिक रूप से पिछड़े मुसलमानों के भीतर ही मोदी का डर पैदा करने की कोशिश की जा रही है, क्योंकि ऐसा करने वालों को पता है कि पढ़े-लिखे मुसलमान इस बात को समझते हैं और वे उनके बहकावे में नहीं आएंगे।

मोहसीन ने कहा कि यदि कोई हिंदू राष्ट्रवादी हो सकता है तो मुसलमान भी राष्ट्रवादी हो सकता है। देशभक्ति का जज्बा सभी समुदायों के भीतर है लेकिन कुछ लोग इसका गलत मतलब निकाल रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि मोहसीन रजा ने अपने क्रिकेट करियर की शुरुआत वर्ष 1981-82 में की थी। वह प्रथम श्रेणी क्रिकेट में लगातार 20 वर्षो तक खेलते रहे। मोहसीन उप्र किक्रेट टीम के कोच भी रह चुके हैं और अपने दिशा-निर्देशन में पीयूष चावला, सुदीप त्यागी, सुरेश रैना, आरपी सिंह और तन्मय श्रीवास्तव जैसे खिलाड़ियों की प्रतिभा को निखार चुके हैं।

हिंदू समाज के जागृत होने पर नरेंद्र मोदी कामयाब हो सकते हैं - स्वामी वासुदेवानंद

ज्योर्तिमठ बद्रिकाश्रम के जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती का कहना है कि हिंदू समाज के जागृत होने पर नरेंद्र मोदी कामयाब हो सकते हैं। मोदी के हृदय में हिंदुत्व के साथ देश का विकास का संकल्प है। शंकराचार्य के अनुसार हिंदू धर्म को मानने वाले बहुत कम वोट करते हैं। इसे वजह राष्ट्रवादी ताकतें कमजोर होती जा रही है। 

हिन्दुओं को अब संकोच छोड़कर एकजुटता से वोट देने जाना चाहिए, तभी सुशासन आ सकेगा। देश के युवाओं को प्रेम और करुणा जैसे गुणों को आत्मसात करते हुए सच्चाई का मार्ग अपनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि आसाराम प्रकरण में दाल में कुछ काला जरूर है क्योंकि जो संत अभी तक सभी के लिए पूज्य थे एक दिन में कैसे दोषी हो गए। गुण-दोष तो सृष्टि के गुण हैं। संत आसाराम ने कुछ किया हो या नहीं, लेकिन उनकी वजह से संतों का अपमान हुआ है। 

नेहरू ने सरदार पटेल को 'पूरी तरह सांप्रदायिक' बताया था - आडवानी

वरिष्ठ बीजेपी नेता लौह पुरुष लाल कृष्ण आडवाणी ने देश के पहले गृह मंत्री सरदार पटेल को लेकर एक नया ही खुलासा किया है. उन्होंने एक किताब के हवाले से कहा है कि पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने सरदार पटेल को 'पूरी तरह सांप्रदायिक' बताया था.

आडवाणी ने दावा किया कि आजादी के बाद जब पटेल ने भारत में हैदराबाद के विलय के लिए सेना भेजने का सुझाव दिया तो प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें 'पूरी तरह साम्प्रदायिक' कहा था. आडवाणी ने अपने ब्लॉग पर एम के के नायर की किताब 'द स्टोरी ऑफ एन एरा टोल्ड विद आउट इल विल' के हवाले से यह बात कही.

इस किताब में हैदराबाद के खिलाफ पुलिस कार्रवाई से पहले हुई कैबिनेट की बैठक में नेहरू और पटेल के बीच हुई तीखी बातचीत का जिक्र किया गया है. आडवाणी ने लिखा है कि हैदराबाद का निजाम पाकिस्तान में शामिल होना चाहता था और उसने पड़ोसी देश में एक दूत भी भेजा था और उसने वहां की सरकार को काफी पैसा भी हस्तांतरित किया था. निजाम के अधिकारी स्थानीय लोगों पर कथित रूप से अत्याचार कर रहे थे.

आडवाणी ने नायर की किताब के हवाले से लिखा, कैबिनेट की एक बैठक में पटेल ने ये बातें बताईं और मांग की कि हैदराबाद के आतंक भरे शासन को खत्म करने के लिए सेना भेजी जाए. आम तौर पर विनम्रता और शिष्टाचार के साथ बात करने वाले नेहरू ने आपा खोते हुए कहा था, 'आप पूरी तरह से सांप्रदायिक हैं. मैं आपकी सिफारिश कभी नहीं मानूंगा.'

आसाराम बापू के महिला आश्रम पर बेबुनियाद और असत्य आरोप - गुजरात महिला आयोग

आसाराम जी द्वारा स्थापित किए गए महिला आश्रमपर किए गए गंभीर आरोपों की पूछताछ के लिए १२ अक्टूबर २०१३ को, गुजरात महिला आयोग का एक पथक बिना कोई पूर्व सूचना दिए आश्रम पहुंच गया । इस पथक ने आश्रम में रहने वाली साधिकाओं से सामूहिक एवं व्यक्तिगत पूछताछ की । तीन घंटों की पूछताछ के उपरांत गुजरात महिला आयोग की अध्यक्षा श्रीमती लीला अन्कोलिया ने बताया, ‘हमने प्रत्येक साधिका की एकांत में व्यक्तिगत पूछताछ की । किसी पर कोई दबाब है, ऐसा प्रतीत नहीं हुआ । किसी भी साधिका के साथ कभी कोई कुकर्म नहीं हुआ है । साधिकाओं के साथ हुई सर्व तथाकथित घटनाएं असत्य हैं । मीडिया में जिस प्रकारके स्वच्छंद, अपमानजनक और लज्जाजनक समाचार प्रसारित हो रहे हैं, वे यदि सत्य होते तो ३६ वर्षोंतक इतनी भारी संख्या में महिला आश्रम में नहीं होतीं ।’

वर्ष १९७६ में महिलाओं के सर्वांगीण विकास के लिए एवं कल्याण के लिए आसाराम जी बापूने महिला उत्कर्ष आश्रम की स्थापना की । गत ३६ वर्षों में इस आश्रम में लाखों महिला साधना करने के लिए और सत्संग का लाभ लेने के लिए आकर गर्इं । वर्तमान में २५० से अधिक महिला निवास कर रही हैं । इनमें से अनेक महिला डॉक्टर, अभियंता, लेखपाल, पदव्युत्तर और पदवीधारक हैं । आश्रम में रहकर शांतिपूर्ण जीवनयापन करने का निर्णय उन्होंने स्वयं ही लिया है । वे सतत समाजसेवा कार्य कर रहीं हैं । यहां रहकर वे स्वयं को संपूर्ण सुरक्षित और पहले के जीवन से भी अधिक उन्नत, स्वतंत्र एवं सुदृढ अनुभव कर रही हैं । 

यहां किसी भी महिला के साथ कभी कोई अभद्र व्यवहार, लैंगिक शोषण अथवा गर्भपात नहीं किया गया है । यहां पर वास्तव्य की हुई सैकडों महिलाएं इस बात की साक्षि हैं । महिला आश्रम की ओर से ‘महिला उत्कर्ष आश्रम’द्वारा ‘गर्भपात रोको’, मुहिम चलाई जाती है । इस मुहिम में आश्रम की साधिका गांव-गांव जाकर महिलाओं को गर्भपात के दुष्परिणाम समझाकर बताती हैं और उन्हें सतर्क करती हैं । आसाराम जी बापू अपने सत्संगों में अनेक वर्षों से बता रहे हैं कि गर्भपात एक ऐसा महापाप है, जिसके लिए कोई प्रायश्चित नहीं है ।

मंगलयान की लॉन्चिंग से पहले इसरो चेयरमैन तिरुपति बालाजी की शरण में

मंगलयान की लॉन्चिंग की उलटी गिनती जारी है। यह काउंटडाउन मंगलवार दोपहर दो बजकर 38 मिनट पर खत्‍म होगा, जब भारत मंगलग्रह के लिए अपना अंतरिक्ष यान लॉन्‍च करेगा। इसरो के इस मिशन का आधिकारिक नाम 'मार्स आर्बिटर मिशन' है जिसे मंगलयान कहा जा रहा है। 

इस अभियान की कमान संभाल रहे इसरो चेयरमैन डॉ. के राधाकृष्णन ने मिशन की शुरुआत से पहले शनिवार को तिरुपति बालाजी के मंदिर में भगवान से प्रार्थना की। दूसरी ओर नासा ने भी इसरो मिशन की कामयाबी के लिए शुभकामनाएं भेजी हैं। 

इस अभियान में 1000 वैज्ञानिकों की टीम लगी है। 1350 किलो के इस सैटेलाइट को 15 महीने के रिकॉर्ड टाइम में तैयार किया गया है।

पीएसएलवी सी-25 रॉकेट भारत के पहले मंगलयान को लेकर आंध्र प्रदेश स्थित श्रीहरिकोटा सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से अंतरिक्ष में जाएगा। अगर भारत इस अंतरिक्ष यान को मंगल ग्रह की मुख्य कक्षा में पहुंचाने में सफल रहा तो भारत ऐसी उपलब्धि हासिल करने वाला एशिया में पहला देश बन जाएगा।

मंगलयान को 35 करोड़ किलोमीटर की यात्रा कर मंगल तक पहुंचने में करीब एक साल (320 दिन) लगेगा। अनुमान है कि 24 सितंबर 2014 को यह अंतरिक्ष यान  मंगल ग्रह तक पहुंचेगा। इससे पहले इसरो का सबसे लंबी दूरी वाला अभियान चंद्रयान था। 2008 में भारत के इस अभियान के तहत अंतरिक्ष यान  को साढ़े तीन हजार किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ी थी।

मंगलयान लॉन्‍च करने वाला भारत चौथा देश बन जाएगा। इससे पहले अमेरिका, रूस और यूरोप मंगल के लिए अभियान लॉन्‍च कर चुके हैं। उनके मंगल यान पर 2393 करोड़ रुपए से लेकर 41669 करोड़ रुपए खर्च हुए जबकि हमारे मंगलयान की लागत सिर्फ 450 करोड़ रुपए आई है। यानी यह अभी तक का सबसे कम लागत का मंगल मिशन होगा। 

यह मंगल ग्रह पर जमीन, हवा और खनिज पदार्थों का अनुसंधान करेगा। यह मंगल का नक्शा भी बनाएगा और इससे जुड़े डेटा को वापस भेजेगा। सर्वे का काम करीब छह महीने तक चलेगा। यह यान पता लगाएगा कि मंगल पर पानी क्यों खत्म हुआ। साथ ही वह इस लाल ग्रह पर जीवन की संभावना भी तलाशेगा। 

2003 में जापान और 2011 में चीन मंगलयान भेजने की नाकाम कोशिश कर चुके हैं। मंगल ग्रह पर अनुसंधान की होड़ 1960 में शुरू हुई थी जब पहले तत्कालीन सोवियत संघ और बाद में अमेरिका ने यान भेजने की नाकाम कोशिश की। 1971 में जाकर पहले ऑर्बिटर मिशन को सफलता मिली। मंगल की कक्षा में घूमने वाले उपग्रह, लैंडर और रोवर भेजने के कुल 51 मिशन हुए हैं, जिनमें से 21 ही सफल हो सके हैं। कुछ प्रक्षेपण के स्तर पर ही नाकाम रहे तो कुछ का जमीन से संपर्क टूट गया और कुछ मंगल की कक्षा की ओर बढ़ते समय भटककर अंतरिक्ष में लुप्त हो गए।

बांग्लादेश में फिर हिन्दूओं का कत्लेआम मंदिर भी तोड़े गए

बांग्लादेश के पाबना जिले के एक गांव में अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय के एक लड़के के ईशनिंदा करने की खबरों के बाद एक भीड़ ने हिंदू बहुल इलाके में जमकर तोड़फोड़ की। देश के हाईकोर्ट ने 24 घंटे के भीतर हमलावरों को गिरफ्तार करने का आदेश दिया है।

भीड़ ने शनिवार को पाबना जिले के संथिया उपजिला के बोनोग्राम गांव के हिंदू इलाके में हमला कर 26 घरों में तोड़फोड़ की, जिसमें देवी देवताओं की मूर्तियां क्षतिग्रस्त हो गईं और करीब 150 परिवारों को इलाके से भागने के लिए मजबूर होना पड़ा।

हाईकोर्ट ने मामले का संज्ञान लेते हुए पुलिस महानिदेशक से 24 घंटे के भीतर दोषियों को पकड़ने और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए इलाके में पर्याप्त पुलिसबल तैनात करने के आदेश दिए।

स्थानीय पुलिस थाने के प्रभारी अधिकारी रेजाउल करीम ने कहा कि हमने पिछले दो दिन में हमले के नौ दोषियों को गिरफ्तार कर लिया और बाकी को पकड़ने में लगे हुए हैं। उन्होंने कहा कि अधिकतर संदिग्ध मुख्य विपक्षी दल बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी या उसके महत्वपूर्ण सहयोगी जमाते इस्लामी के समर्थक या कार्यकर्ता हैं।

यह गांव जमाते इस्लामी के अध्यक्ष मतिउर रहमान निजामी का घर है। निजामी पर 1971 के युद्ध को लेकर मानवता के खिलाफ अपराध का मामला चल रहा है। करीम ने कहा कि यहां हालात अब नियंत्रण में हैं।

हाईकोर्ट ने साथ ही पुलिस प्रमुख से हमले की जांच शुरू करने और हिंदुओं को हुए नुकसान का पता करने एवं इसकी रिपोर्ट पेश करने के लिए भी कहा है।

और भारत की हिन्दू विरोधी केंद्र सरकार हाथ पर हाथ रखे बैठी है ... 

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