मालेगांव ब्लास्ट केस में बॉम्बे हाईकोर्ट से साध्वी प्रज्ञा को मिली राहत


आवेदन में साध्वी ने ट्रायल कोर्ट यानि स्पेशल एनआईए कोर्ट द्वारा उसके केस से डिस्चार्ज एप्लीकेशन को रद्द किए जाने वाले आर्डर को चुनौती दी है.

आज 30 जुलाई 2018 को सन 2008 में हुए मालेगांव ब्लास्ट केस में आरोपी साध्वी प्रज्ञा सिंह को बॉम्बे हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है. बॉम्बे हाईकोर्ट ने साध्वी प्रज्ञा सिंह की डिस्चार्ज एप्लीकेशन को स्वीकार कर लिया. साध्वी ने 2008 मालेगांव ब्लास्ट केस से खुद को मुक्त करने के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी . सोमवार को जस्टिस आरवी मोरे और जस्टिस अनूजा प्रभुदेसाई की बेंच के सामने साध्वी प्रज्ञा सिंह का आवेदन सुनवाई के लिए आया. आवेदन में साध्वी ने ट्रायल कोर्ट यानि स्पेशल एनआईए कोर्ट द्वारा उसके केस से डिस्चार्ज एप्लीकेशन को रद्द किए जाने वाले आर्डर को चुनौती दी है.

कोर्ट ने साध्वी प्रज्ञा सिंह के साथ इस मामले में एक दूसरे आरोपी समीर कुलकर्णी की भी याचिका दायर कर ली है. बॉम्बे हाई कोर्ट कर्नल पुरोहित समेत साध्वी प्रज्ञा सिंह और समीर कुलकर्णी की इस याचिका पर अब एक साथ सुनवाई करेगी . इस दौरान कर्नल पुरोहित भी सोमवार को हाईकोर्ट में मौजूद रहे.

कर्नल पुरोहित की पहले से ही मंजूर की गयी डिस्चार्ज ऍप्लिकेशन पर सुनवाई होनी थी लेकिन हाईकोर्ट ने मामले से जुड़े रिकॉर्ड को ट्रायल कोर्ट में वापस भेज दिया, जिसके चलते सोमवार को कर्नल पुरोहित की एप्लीकेशन पर सुनवाई नहीं हो पायी. अब तीनो आरोपियों की डिस्चार्ज एप्लीकेशन पर एक साथ सुनवाई होगी जो 13 अगस्त से शुरू हो जायेगी .

साध्वी के वकील प्रशांत मग्गू के मुताबिक चूँकि केस में कर्नल पुरोहित की डिस्चार्ज एप्लीकेशन पहले ही मंजूर की जा चुकी इसलिए अब साध्वी की भी एप्लीकेशन मंजूर की गयी है, हाईकोर्ट द्वारा यह याचिका मंजूर हो जाना काफी राहत की बात है. बता दें 29 सितंबर 2008 में हुए मालेगांव ब्लास्ट में छह लोगों की मौत हुई थी और 101 से ज्यादा लोग घायल हुए थे. जिसके बाद नवंबर 2008 में एटीएस ने 11 लोगों को गिरफ्तार किया था.

मालेगांव विस्फोट मामले में साध्वी प्रज्ञा को 9 साल बाद मिली जमानत


बंबई उच्च न्यायालय ने 2008 मालेगांव बम विस्फोट की साजिश रचने में कथित तौर पर फँसाई गई साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को आज जमानत दे दी लेकिन सह आरोपी और पूर्व ले. कर्नल प्रसाद पुरोहित को कोई राहत देने से इनकार कर दिया।  

अदालत ने साध्वी को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को अपना पासपोर्ट सौंपने और सबूतों से छेड़छाड़ नहीं करने का निर्देश दिया है। उसे यह भी निर्देश दिया गया है कि जब भी जरूरत हो वह एनआईए अदालत में रिपोर्ट करे।

न्यायमूर्ति रंजीत मोरे और न्यायमूर्ति शालिनी फनसाल्कर जोशी की खंड पीठ ने कहा, 'साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की अपील मंजूरी दी जाती है। याची (साध्वी) को पांच लाख रुपए की जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया जाता है। प्रसाद पुरोहित की ओर से दायर अपील को खारिज किया जाता है।'

न्यायमूर्ति मोरे ने कहा कि हमने अपने आदेश में कहा है कि पहली नजर में साध्वी के खिलाफ कोई मामला नहीं बनता है।

गौरतलब है कि 29 सितंबर 2008 को मालेगांव में एक बाइक में बम लगाकर विस्फोट किया गया था जिसमें आठ लोगों की मौत हुई थी और तकरीबन 80 लोग जख्मी हो गए थे। साध्वी और पुरोहित को 2008 में गिरफ्तार किया गया था और तब से वे जेल में हैं।     

मडगांव विस्फोट: न्यायालय ने कांग्रेस तथा पुलिस को नंगा किया !

31 दिसंबर 2013 को गोवा के विशेष न्यायालय ने मडगांव विस्फोट की घटना में सनातन के सभी छह साधकों को निर्दोष मुक्त किया । विस्फोट के समय सनातन की ‘सुपारी’ लेकर छाती पीटने वाले चैनलवालों के अभियोग का परिणाम सुनकर सधी चुप्पी तोडने तथा पुलिस के कान साफ करने हेतु यह लेख :

न्यायालय ने कांग्रेस तथा पुलिस को नंगा किया !

31 दिसंबर 2013  को मडगांव विस्फोट घटना के सारे छह आरोपियों को गोवा विशेष न्यायालय ने निर्दोष मुक्त किया । राष्ट्रीय अन्वेषण तंत्र इन आरोपियों के विरुद्ध कोई भी पक्का प्रमाण न्यायालय के सामने न ला सका । प्रथमदर्शी विवरण तो सनातन संस्था को लटकाने के उद्देश्य से ही लिखा गया है, यह बात न्यायालय ने विशेष रूप से निर्देशित की है ।

16 अक्तूबर 2009 को मडगांव विस्फोट के पश्चात पुलिस ने आगे-पीछे कुछ भी सोचे बिना सीधे सनातन आश्रम पर धावा बोल दिया । वहां कुछ भी न मिलनेके कारण पुलिस की नाक कट गई । अब घटी घटना से सनातन का संबंध जोडने हेतु कुछ तो करना ही चाहिए, इस सनातनद्वेषी विचार ने पुलिस एवं कांग्रेसी इन दानों को व्यथित कर दिया । उस व्यथित अवस्था में ही पुलिस तथा दिगंबर कामत प्रशासन ने अन्वेषण में बहुत परिश्रम किए; किंतु अंत में कांग्रेस तथा पुलिस दोनों को ही न्यायालय में ‘दिगंबर’ होना पडा !

चैनेलवालों में सनातन की निर्दोषता का वृत्त दिखाने का साहस नहीं !

मडगांव में विस्फोट हुआ । उसमें सनातन के दो कार्यकर्ता मारे गए । ऐसी स्थिति में सनातन को ही आरोपी के पिंजरे में खडा कर दिगंबर प्रशासन, पुलिस तथा उससे भी अधिक उत्साह से चैनेलवालों ने हमला करना प्रारंभ किया । आइ.बी.एन. लोकमत के संपादक निखिल वागले की नींद तो कब की उड चुकी थी ।8-10 दिनों पश्चात भी उनके चैनल पर चर्वण करने हेतु अन्य विषय ही नहीं था । चर्चा एवं आरोप बडी मात्रा में चल रहे थे । अब पृथ्वी का ही विस्फोट हो जाएगा, इस भाव से वागले की बकबक आरंभ थी । किंतु अभियोग के निर्णय से सबके निर्दोष छूटने पर एक भी चैनेल ने उस संदर्भ में चर्चा आयोजित नहीं की । अजी, चर्चा आयोजित करना तो बडी दूरकी बात हो गई, सनातन की निर्दोषता का केवल वृत्त दिखाने का साहस भी इन चैनेलवालों से हुआ नहीं । 

निरंतर वृत्तपत्र स्वतंत्रता का समर्थन करने वाले सारे बातूनी 31 दिसंबर को कहां छुप गए थे ? कहते हैं, एक हिंदुत्ववादी कार्यकर्ताने, ‘सनातन की निर्दोषताका वृत्त क्यों नहीं दिखाते ?’, ऐसा पूछने हेतु ‘आइ.बी.एन'. लोकमत के कार्यालय में फोन भी किया था । उस समय सामने से उत्तर आया कि, ‘आज थर्टीफस्र्ट' है, अत: वागले साहब नहीं आए हैं तथा दो दिन (होशमें ?) उनके आने की संभावना न होने के कारण कल भी आएंगे अथवा नहीं, कह नहीं सकते । अत: आप ३ जनवरी के पश्चात ही फोन करें । '

क्या चैनेलवालों को पुलिस बहनों की प्रतिष्ठा कौडी के मोल लगती है ?

पूर्व में 11 अगस्त को आजाद मैदान पर मुसलमानों ने दंगा किया । महिला पुलिस बहनों के कपडे फाडकर उनकी विडंबना की, ओ बी वेन जलाई; वे घटनाएं जब घट रही थीं, तो कुछ वाहिनियों ने ही यह वृत्त दिखाया । किंतु वागले नारायण राणे तथा ‘सिंचन’ के नामसे चैनेल पर चिल्ला रहे थे । इसका अर्थ है, वार्ताकारिता के कथित प्रेमियों को पुलिस बहनों की प्रतिष्ठा का कुछ भी मोल नहीं लगा । अथवा पुलिस बहनों की प्रतिष्ठा कौडी के मोल होती है, क्या इन्हें ऐसा लगता है ?

कुछ घंटों में ही तामिलनाडू पहुंचने वाले वार्ताकारों को आठ दिनों में भिवंडी नहीं मिली !

भिवंडी में दो पुलिसकर्मी को मुसलमान दंगाखोरों ने पत्थरों से मार दिया तथा उसके पश्चात पुलिस की ही गाडी में डालकर गाडी जला दी । उन दो पुलिसवालों के शवविच्छेदन का विवरण देखें । वह विवरण बताता है कि उन दो पुलिसवालों के नाखून उखाड दिए गए थे, उनकी आंखें फोड दी गर्इं, उनका लिंग काट दिया गया था, हाथ-पांव जोडों से तोडे गए थे । धर्मांधों ने पुलिस को इस पद्धति से मारा था । इस एक विवरण पर ही अनेक चर्चा आयोजित हो सकती थी; किंतु किसी ने भी साहस नहीं किया । उस समय भी वार्ताकारिता प्रेमी कहीं जाकर छुप गए ।

कांची कामकोटी पीठ के शंकराचार्य को बंदी बनाया गया था । उस समय ‘ब्रेकिंग न्यूज - जेल में जगद्गुरु' इस नाम से चैनल वाले ऊधम मचा रहे थे । मैंने स्वयं स्टार न्यूज के कार्यालय में दूरध्वनि किया तथा उनसे पूछा कि, `शंकराचार्य का वृत्त आप अनेक दिनों से दिखा रहे है; किंतु भिवंडी में घटी घटनाओं के विषयमें अपने चैनल वर केवल ‘तलटिपणी ’ भी क्यों नहीं दिखाते ?' इसपर उस ओर से एक बहन ने कहा कि `हमारे रिपोर्टर अभी भिवंडी नहीं पहुंचे हैं ।’ इसका अर्थ है, कुछ ही घंटों में इनके वार्ताकार कांची पीठ पहुंच गए; किंतु क्या ‘भिवंडी’ नाम की चीज उनके वार्ताकारों को मिली ही नहीं ? यह बात ध्यान में रखें !

सारे चैनलवाले तथा पुलिस अब तो कुछ सोचें । राजनीतिज्ञों की सुनकर पुलिस ने हम हिंदुओं पर झूठे अपराध प्रविष्ट किए, किंतु पुलिस की मां -बहनें हमारी भी मां-बहनें हैं, हम हिंदू यह कभी भी भूलेंगे नहीं; किंतु जिन धर्मांधों को प्रसन्न करने हेतु आप हम पर झूठे अपराध प्रविष्ट करते हो, उनकी दृष्टि में आपकी मां -बहनें युद्ध में प्राप्त हुई लूट अथवा अपने हक की खेती हैं, यह न भूलें ।

धर्मांधों को प्रसन्न करने हेतु चैनेलवालों ने कितने भी प्रयास किए, तो भी धर्मांधों की  दृष्टि में चैनलवालों का मोल ही क्या है, यह 11 अगस्त को आप-हमने देखा है । इतना होने पर भी यह चापलूसी रुकने वाली न हो, तो 11 अगस्त तथा भिवंडी की घटनाओं की पुनरावृत्ति होती रहेगी; किंतु कुछ समय पश्चात हिंदू आपकी सहायता करने नहीं आएंगे, यह बात याद रखें।

पढ़िए साध्वी प्रज्ञा का न्यायाधीश को लिखा एक मार्मिक पत्र


सोनिया कांग्रेस के दरबारी महासचिव दिग्विजय सिंह ने एक जुमला उछाला 'भगवा आतंकवाद', तो सोनिया की अध्यक्षता वाली संप्रग सरकार ने उसे सिद्ध करने के लिए कुछ षड्यंत्र रचे। आतंकवाद विरोधी दस्ते (एंटी टेरेरिस्ट स्क्वाड-एटीएस) ने सरकार के इशारे पर समझौता एक्सप्रेस विस्फोट, मालेगांव विस्फोट, मक्का मस्जिद में धमाका आदि मामले दोबारा खंगाले और झूठी कहानी, झूठे सुबूत गढ़कर कुछ हिन्दुओं को पकड़ा, उनमें स्वामी असीमानंद और साध्वी प्रज्ञा सिंह प्रमुख हैं। 

हालांकि 5 साल बाद भी इनमें से किसी के भी खिलाफ पुख्ता जानकारी नहीं दी गई है, पर विचाराधीन कैदी बनाकर प्रताड़ित किया जा रहा है, ताकि 'भगवा आतंकवाद' के नाम पर कुछ भगवा वेशधारी चेहरों को प्रस्तुत किया जा सके। मालेगांव विस्फोट के संदर्भ में गिरफ्तार साध्वी प्रज्ञा सिंह इन दिनों बहुत बीमार हैं और उन्होंने जेल से ही न्यायाधीश महोदय को जो मार्मिक पत्र लिखा, उसे यहां हम प्रस्तुत कर रहे हैं, पूरी सच्चाई आपके समक्ष स्वत: ही आ जाएगी।




मा. न्यायाधीश महोदय,
उच्च न्यायालय, मुम्बई (महाराष्ट्र)
द्वारा- श्रीमान अधीक्षक, केन्द्रीय कारागृह भोपाल (म.प्र.)
विषय- स्वास्थ्य विषय से सम्बन्धित।

महोदय,

मैं, साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर मालेगांव विस्फोट प्रकरण (2008) में विचाराधीन कैदी हूं और अभी एक अन्य प्रकरण में मध्य प्रदेश की भोपाल स्थित केन्द्रीय जेल में हूं। आज दिनांक 16 जनवरी, 2013 को जो सज्जन मुझसे जेल भेंट करने आये उन्होंने आपके द्वारा आदेशित पत्र मुझे दिखाया, जिसमें आपने मेरी अस्वस्थता के उपचार हेतु उचित स्थान के चयन का निर्णय करने को कहा है। महोदय, मैं यह जानकर कि आपने मेरे स्वास्थ्य की संवेदनापूर्वक चिंता कर आदेश दिया, मैं आपकी बहुत-बहुत आभारी हूं। आपके आदेश से ही मुझे यह हौसला मिला है कि मैं आपसे अपनी मन:स्थिति व्यक्त करूं। मुझे लगता है कि आप मेरी सारी शारीरिक स्थिति, मानसिक स्थिति और विवशता को भली-भांति समझ सकेंगे। अत: मैं आपसे अपनी बात संक्षेप में कहती हूं, जो इस प्रकार है-

0 मैं बचपन से ही सत्यनिष्ठ, कर्तव्यनिष्ठ, सिद्वान्तवादी व राष्ट्रभक्त हूं। मेरे पिता ने मेरा निर्माण इन्हीं संस्कारों में गढ़कर किया है। मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता व देश की संभ्रांत नागरिक हूं।

0 मैं जनवरी, 2007 से संन्यासी हूं।

0 अक्टूबर, 2008 में मुझे सूरत से एटीएस इंस्पेक्टर सावंत का फोन आया कि आप कानून की मदद करिए, सूरत आ जाइये, मुझे आपसे एक 'बाइक' के बारे में जानकारी चाहिए। मैं कानून को मदद पहुंचाने व अपने कर्तव्य को निभाने हेतु 10 अक्टूबर सुबह सूरत पहुंची।

0 इं. सावंत ने अपने साथियों सहित अपने बड़े साहब के समक्ष पेश कर देने को कहकर 16 अक्टूबर की रात्रि को मुझे मुम्बई लाये। मुम्बई की काला चौकी में मुझे 13 दिनों तक गैरकानूनी रुप से रखा और भयानक शारीरिक, मानसिक व अश्लील प्रताड़नाएं दीं।

0 एक स्त्री होने पर भी मुझे बड़े-बड़े पुलिस अधिकारियों ने सामूहिक रुप से गोल घेरे में घेर कर बेल्टों से पीटा, पटका, गालियां दीं तथा अश्लील सी.डी. सुनवाई। उनका (एटीएस का) यह क्रम दिन-रात चलता रहा।

0 फिर पता नहीं क्यों मुझे राजपूत होटल ले गये और अत्यधिक प्रताड़ित किया जिससे मेरे पेट के पास फेफड़े की झिल्ली फट गयी। मेरे बेहोश हो जाने व सांस न आने पर मुझे एक प्राइवेट हास्पिटल  'सुश्रुशा' में आक्सीजन पर रखा गया। इसी हास्पिटल में झिल्ली फटने की रपट है। आपके आदेश पर वह रपट आपके समक्ष उपस्थित की जायेगी। दो दिन सुश्रुशा हास्पिटल में रखकर गुप्त रूप से फिर हास्पिटल बदल दिया और एक अन्य प्राइवेट हास्पिटल में आक्सीजन पर ही रखा गया। इस प्रकार 5 दिनों तक मुझे आक्सीजन पर रखा गया।

0 थोड़ा आराम मिलने पर पुन: काला चौकी के मि. सावंत के आफिस रूम में रखा गया तथा पुन: अश्लील गालियां, प्रताड़नाएं दी जाती रहीं।

0 फिर मुझे यहीं से रात्रि को लेकर नासिक गये, फिर 13 दिन बाद गिरफ्तार दिखाया गया। इतने दिनों मैंने कुछ खाया नहीं तथा प्रताड़नाओं और मुंह बांधकर रखे जाने से मैं बहुत ही विक्षिप्त अवस्था में आ गई थी।

0 इस बीच बेहोशी की अवस्था में मेरा भगवा वस्त्र उतार कर मुझे सलवार-सूट पहनाया गया।

0 बिना न्यायालय की अनुमति के, गैरकानूनी तरीके से मेरा नाकर्ो पौलिग्राफी व ब्रेन मैपिंग किया गया। फिर गिरफ्तारी के पश्चात पुन: ये सभी टेस्ट दोबारा किये गये।

0 जज साहब, इतनी अमानुषिक प्रताड़नाएं दिए जाने के कारण मुझे गम्भीर रूप से रीढ़ की हड्डी की तकलीफ व अन्य तकलीफें होने से मैं चलने, उठने, बैठने में असमर्थ हूं। इनकी (एटीएस की) प्रताड़नाओं से मानसिक रुप से भी बहुत ही परेशान हूंं। अब सहनशीलता की भी कमी हो रही है।

0 कारागृह में मुझे यह पांचवा वर्ष चल रहा है। इस कारागृही जीवन में भी मेरी सात्विकता नष्ट करने के लिये मुम्बई जेल में मेरे भोजन में अण्डा दिया गया। इस विपरीत वातावरण से मुझे अब और भी कोई गम्भीर बीमारियां हो गई हैं। अब मैं कैंसर (ब्रेस्ट) के रोग से भी ग्रस्त हो गयी हूं। परिणामस्वरुप मैं अब डाक्टरों के द्वारा बताया गया भोजन करने में भी असमर्थ हूं।

0 इन्ही तकलीफों के चलते मुझे इलाज के लिए, टेस्ट के लिये न्यायालय के आदेश पर मुम्बई व नासिक के अस्पताल भेजा जाता था, किन्तु वहां के पुलिसकर्मी जे.जे. हास्पिटल अथवा किसी सरकारी हास्पिटल अथवा आयुर्वेदिक हास्पिटल ले जाते, जहां न्यायालय का आदेश देखकर मुझे 'एडमिट' तो किया जाता था, कागजी कार्रवाई की जाती, किन्तु मेरा उपचार नहीं किया जाता था।

0 2009 में एक बार मेरा ब्रेस्ट का आपरेशन किया गया, 2010 में पुन: वहां तकलीफ हुई। मैं मकोका हटने पर नासिक के कारागृह में थी। वहां मुझे जिला अस्पताल भेजा गया। न्यायालय के आदेश पर एक टीम बनाई गई जिसने अपनी रपट में पुन:. आपरेशन की सलाह दी। किन्तु मकोका लगने पर मुझे पुन: मुम्बई ले जाया गया।

0  अभी मैं मार्च, 2012 से म.प्र. की भोपाल जेल में हूं। यहां मेरा स्वास्थ्य बिगड़ने पर जब अस्पताल भेजा गया तो वहां भी पुलिस वालों ने जबरन पेरशान किया। जेल प्रशासन इलाज करवाना चाहता था, किन्तु जो सुरक्षा अधिकारी मेरे साथ थे, वे अमानवीय गैरकानूनी व्यवहार करते रहे। अत: मुझे अस्पताल से बिना उपचार के वापस आना पड़ा। ऐसा कई बार हुआ।

0 ऐसा अभी तक निरन्तर होता आ रहा है। मैं इलाज लेना चाहती थी, टेस्ट भी करवाने अस्पताल गयी, किन्तु सरकारी रवैया, कोर्ट, कानून, पुलिस के झंझटों से डरकर कोई उपचार ही नहीं करना चाहता। अब मैं पांच वर्षों से इन सभी परेशानियों को झेलते-झेलते थक गई हूं।

0 महोदय मैंने अब यही तय किया कि संन्यासी जीवन के इस शरीर को तमाम बीमारियों से अब योग-प्राणायाम से जितने दिन चल जाये, उतना ठीक है, किन्तु अब जेल अभिरक्षा में रहते हुए कोई इलाज नहीं करवाऊंगी। महोदय, मैंने यह निर्णय स्वेच्छा से नहीं लिया है। कारागृही जीवन, तमाम प्रतिबन्धों के परिणामस्वरुप तनाव से शरीर पर विपरीत असर होने के चलते विवश होकर ही मैंने यह निर्णय लिया है। आप इसे अन्यथा न लें और मेरी भावना व परिस्थिति को समझें।

0 महोदय मैं एक संन्यासी हूं। हमारा त्यागपूर्ण संयमी जीवन होता है। स्वतंत्र प्रकृति से स्वतंत्र वातावरण में ही यह संभव होता है। 5 वर्षों से मेरी प्रकृति, दिनचर्या, मर्यादा, मेरे जीवन मूल्यों के विपरीत मुझे अकारण कारागृह में रखा गया है। अत: इन प्रताड़नाओं व अमानवीयता से एक संन्यासी का संवेदनशील जीवन असम्भव है।

0  मैंने सभी विपरीत परिस्थितियों से अपने को अलग करने का प्रयास कर इन शारीरिक कष्टों को सहते हुए अपने ठाकुर (ईश्वर) के स्मरण में ही अपने को सीमित कर दिया है। जितने दिन जिऊंगी, ठीक है, किन्तु उचित उपचार व जांच से दूर रहूंगी। यदि स्वतंत्र हुई तो अपनी पंसद का उपचार, बिना किसी बंधन के करवा कर इस शरीर को स्वस्थ करने तथा संन्यासी जीवन पद्धति से मन को ठीक कर कुछ समय जी सकूंगी।

0 महोदय आपसे अनुरोध है कि आप मेरे तथा भारतीय संस्कृति में एक संन्यासी जीवन की पद्धति व इसके विपरीत दुष्परिणामों को अनुभूत करेंगे। मेरे निर्णय को उचित समझकर मेरे निवेदन पर ध्यान देंगे। यदि मेरे लिये कानून के अन्तर्गत स्वतंत्रता (जमानत) का प्रावधान है, क्योंकि में अभी संशयित (विचारधीन) हूं, तो आप अपने विवेकीय मापदण्डों पर मुझे जमानत देने की कृपा करें।

0 मेरे द्वारा लिखे गये प्रत्येक कारण के लिखित सबूत हैं, यदि आपका आदेश हुआ तो वह सभी सबूत आपके समक्ष (मेरी रपट सहित) प्रस्तुत की जा सकती है। मैं कानून की धाराएं नहीं जानती हूं। बस इतना है कि मैंने कोई अपराध नहीं किया है। मैंने हमेशा एक राष्ट्रभक्तिपूर्ण, संवैधानिक, नियमानुसार जीवन जिया है, अभी भी जी रही हूं। आज तक मेरा कोई आपराधिक रिकार्ड नहीं है। मुझे मुम्बई एटीएस ने जबरन इस प्रकरण में फंसाया है।

निवेदक
प्रज्ञा सिंह

साभार : पाञ्चजन्य

राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने साध्वी प्रज्ञा की जमानत का विरोध किया


वर्ष 2008 में हुए मालेगांव बम धमाके की तहकीकात कर रही राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने बंबई उच्च न्यायालय को बताया कि वह हमले की मुख्य आरोपी साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की जमानत याचिका का विरोध कर रही है। प्रज्ञा ठाकुर ने चिकित्सीय आधार पर जमानत की अपील की है। 

साध्वी पिछले साल कैंसर से ग्रस्त हैं। उसने अपना इलाज कराने के लिए चिकित्सीय आधार पर जमानत मांगी है। उच्च न्यायालय ने इससे पहले एनआईए और साध्वी से साथ मिलकर मसले का हल निकालने के लिए कहा था। 

एनआईए ने साध्वी को मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल में भर्ती कराने की पेशकश की थी लेकिन साध्वी ने पुलिस की हिरासत में इलाज कराने से इंकार कर दिया और कहा कि वह पहले जमानत पर रिहा होना चाहती है। एनआईए की वकील रोहिणी सैलियन ने आज अदालत को बताया कि एजेंसी चिकित्सीय आधार पर और मामले में दम ना होने की वजह से साध्वी की जमानत याचिका का विरोध कर रही है। 

न्यायमूर्ति आरसी चव्हाण ने अंतिम सुनवाई के लिए 13 फरवरी का दिन निर्धारित किया है। 29 सितंबर, 2008 को मालेगांव में हुए बम विस्फोट के मामले में साध्वी मुख्यध आरोपियों में शामिल हैं। इस हमले में छह लोग मारे गए थे और 100 अन्य घायल हुए थे।

पुरोहित, सांध्वी प्रज्ञा को फिर न मिल सकी जमानत


सुप्रीम कोर्ट ने 2008 के मालेगांव विस्फोट के मामले में बृहस्पतिवार को सेना के पूर्व अधिकारी श्रीकांत प्रसाद पुरोहित, प्रज्ञा ठाकुर और अन्य आरोपियों को अंतिरम जमानत देने से इनकार कर दिया।

पुरोहित और अन्य की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता यू आर ललित ने न्यायामूर्ति एचएल दत्तू और न्यायमूर्ति सीके प्रसाद की दो सदस्यीय खंडपीठ के समक्ष दलील दी कि उनके मुवक्किल पिछले चार साल से जेल में हैं और उनकी जमानत याचिकाएं नहीं सुनी जा रही हैं।

उन्होंने कहा कि उनके मुवक्किलों को अब जमानत पर जेल से बाहर जाने की इजाजत दी जानी चाहिए। हालांकि उनकी दलीलों से असंतुष्ठ खंडपीठ ने यह कहते हुए अंतरिम जमानत पर उन लोगों को रिहा करने से मना कर दिया कि वह इस समय अंतरिम जमानत मंजूर नहीं कर सकती।

न्यायालय ने मामले की सुनवाई तीन सप्ताह के लिए स्थगित करते हुए पुरोहित से राष्ट्रीय जांच एजेंसी एनआईए द्वारा पूछताछ किए जाने पर रोक का अंतरिम आदेश अगली सुनवाई तक के लिए बढ़ा दिया। इसी साल चार जनवरी को उच्चतम न्यायालय ने आरोपियों से पूछताछ करने की इजाजत देने संबंधी बंबई हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी और पुरोहित की जमानत याचिका पर एनआई को भी पक्षकार बनाया था।

बीते साल 16 दिसंबर को पीठ ने उच्च न्यायालय के आदेश के अमल पर रोक लगाई थी। पुरोहित ने 20 अक्टूबर, 2011 को दिए गए उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने के लिए उच्चतम न्यायालय का रुख किया था। अपने आदेश में उच्च न्यायालय ने एनआईए को इस बात की इजाजत दी थी कि वह पुरोहित को न्यायिक हिरासत में लेकर पूछताछ करे।

पुरोहित की गिरफ्तारी और उसके खिलाफ आरोप पत्र 29 सितंबर, 2008 के बम विस्फोट के मामले में दाखिल किया गया है। महाराष्ट्र के मालेगांव में हुए इस विस्फोट में सात लोग मारे गए थे।

साध्वी प्रज्ञा ने एक बार फिर समता के आधार पर जमानत याचिका दी

साल 2008 के मालेगांव विस्फोट मामले में किसी साजिश के तहत गिरफ्तार साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने एक बार फिर 'समता के आधार' पर जमानत पाने के लिए नई जमानत याचिका दाखिल की है।

सर्वोच्च न्यायालय दो महीने पहले उनकी एक जमानत याचिका खारिज कर चुका है। इसी मामले के तीन अन्य सह-आरोपियों शिवनारायण कलसांगरा, श्याम साहू व अजय राहिरकर को बम्बई उच्च न्यायालय से अगस्त में ही जमानत मिल गई थी।

साध्वी प्रज्ञा के वकील गणेश सोवानी के मुताबिक उन्होंने मुम्बई की विशेष अदालत में जमानत याचिका दाखिल की है। सोवानी ने बताया कि साध्वी प्रज्ञा ने एक नियमित जमानत याचिका दाखिल की है और उनके खिलाफ दायर किए गए आरोप-पत्र के सकारात्मक और नकारात्मक तथ्यों पर चर्चा की है।

सोवानी ने बताया कि महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (मकोका) के विशेष न्यायाधीश वाई.डी. शिंदे ने मामले में सुनवाई के लिए पांच दिसंबर की तारीख तय की है और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) से मामले में जवाब दाखिल करने के लिए कहा है।

नासिक जिले के मुस्लिम बहुल मालेगांव शहर में 29 सितम्बर, 2008 को हुए विस्फोट में छह लोग मारे गए थे और सैकड़ों घायल हुए थे। महाराष्ट्र आतंकवाद-विरोधी दस्ते (एटीएस) ने इस मामले में 12 लोगों को पकड़ा था।

साध्वी प्रज्ञा ने अपनी नई जमानत याचिका में दावा किया है कि आतंकवाद के इस मामले में न तो उनकी विशेष भूमिका तय की गई है और न ही उनके पास से कोई आपत्तिजनक सामग्री बरामद की गई है।

दिग्विजय सिंह ने ही सुनील जोशी की हत्या कराई - साध्वी प्रज्ञा

मालेगांव बम विस्फोट मामले में जेल में बंद साध्वी प्रज्ञा सिंह ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे सुनील जोशी की हत्या कराने में कांग्रेस महासचिव और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के शामिल होने का आरोप लगाया।

सुनील जोशी हत्याकांड की कथित आरोपी प्रज्ञा सिंह को सोमवार को देवास की एक अदालत में पेश किया गया था। कोर्ट ने प्रज्ञा सिंह का तबियत बहुत खराब होने पर उन्हें अस्पताल ले जाने के आदेश दिए थे। इलाज के बाद स्वस्थ घोषित किए जाने के बाद मंगलवार सुबह मुबंई के लिए रवाना होने से पहले पत्रकारों से सवाल के जवाब में प्रज्ञा सिंह ने दिग्विजय पर यह आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि दिग्विजय ने ही सुनील जोशी की हत्या कराई है।

उन्होंने प्रदेश की बीजेपी सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए यह कहा कि महाराजा यशवंतराव अस्पताल के डॉक्टरों ने उनकी सही जांच नहीं करके उन्हें पूरी तरह से स्वस्थ घोषित कर दिया है।

प्रज्ञा सिंह ने अपने ऊपर लगे आरोपों को सिरे से नकारते हुए कहा, 'वह एक साध्वी हैं और हत्या जैसा कृत्य नहीं कर सकती हैं। वह देश के लिए जीना मरना चाहती हैं।' उन्होंने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) पर पूरा विश्वास जताया।

मालेगांव विस्फोट : मुस्लिमों युवकों की ज़मानत का सीबीआई ने किया विरोध

मालेगांव धमाकों में गिरफ्तार हैदराबाद के नौ मुस्लिमों युवकों की ज़मानत का सीबीआई ने विरोध किया है। सीबीआई ने कहा है कि असीमानंद के कबूलनामे की अभी जांच चल रही है।

मालेगांव धमाकों के सिलसिले में गिरफ्तार नौ मुस्लिम युवकों की रिहाई की याचिका का सीबीआई ने विरोध किया है। सीबीआई का कहना है कि धमाकों में अपना गुनाह स्वीकार करने वाले असीमानंद के कबूलनामे की अभी जांच चल रही है लिहाज़ा बाकी आरोपियों को अभी ज़मानत नहीं दी जानी चाहिए।

साध्वी प्रज्ञा के भाई की याचिका पर केंद्र सरकार और एनआईए को नोटिस

दिल्ली हाईकोर्ट ने मालेगांव विस्फोट की कथित आरोपी साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के भाई अनंत ब्रह्मचारी की याचिका पर केंद्र सरकार और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को नोटिस जारी किया है.

ब्रह्मचारी ने याचिका में खुद को प्रताडि़त किए जाने और अवैध रूप से हिरासत में रखे जाने का आरोप लगाया है। केंद्र सरकार और एनआईए को नोटिस जारी करते हुए न्यायमूर्ति नारायण ढींगरा ने छह अप्रैल तक जवाब मांगा है। ब्रह्मचारी को तलब करने के लिए एक जांच अधिकारी की खिंचाई करते हुए न्यायमूर्ति ढींगरा ने अगली सुनवाई में उसका भी जवाब मांगा है। ब्रह्मचारी से पूछताछ करना इस अधिकारी के अधिकार क्षेत्र में नहीं था।

अदालत ने एनआईए के वकील से कहा, ‘प्रथम दृष्टया नोटिस अवैध है। आप ऐसे किसी आदमी को कैसे बुला सकते हैं जो आपके अधिकार क्षेत्र में नहीं है? यदि किसी आदमी से पूछताछ की जरूरत है तो आपको उस स्थान पर जाना चाहिए था जहां वह रहता है।’

हाईकोर्ट ने जांच एजेंसी को यह भी निर्देश दिया कि वह ब्रह्मचारी को उस खर्चे का भुगतान करे जो मुम्बई से उनके पंचकूला, हरियाणा पहुंचने और फिर चार जनवरी को दिल्ली पहुंचने में लगा।

अदालत ने कहा, ‘प्रतिवादी (भारत संघ और एनआईए) मुम्बई से दिल्ली वाया पंचकूला सभी खर्च वापस करने के लिए जवाबदेह हैं।’

ब्रह्मचारी के वकील चेतन शर्मा ने कहा कि उनके मुवक्किल को दो विभिन्न स्थानों पंचकूला और दिल्ली में एक ही तारीख पांच जनवरी को जांच एजेंसी के समक्ष पेश होने के दो नोटिस जारी किये गये।

उन्होंने कहा कि उनका मुवक्किल मुम्बई में रहता है और नोटिस जांच अधिकारी (आईओ) द्वारा जारी किए गए जो उसके अधिकार क्षेत्र से परे है। हाईकोर्ट में याचिका दायर करने वाले ब्रह्मचारी ने दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के एक गेस्ट हाउस में पांच जनवरी को आत्महत्या की कोशिश की थी।

उन्होंने एनआईए पर प्रताडऩा का आरोप लगाया था। ब्रह्मचारी ने एनआईए पर उनके मौलिक अधिकारों का हनन करने का आरोप लगाया था और कहा था कि एजेंसी पूछताछ के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए दिशा निर्देशों का पालन नहीं कर रही है। ब्रह्मचारी के वकील ने याचिका में कहा था कि उनके मुवक्किल ने एनआईए की प्रताडऩा के चलते जहर पीकर आत्महत्या करने की कोशिश की थी।

ब्रह्मचारी ने अदालत से यह निर्देश देने का आग्रह भी किया कि उनसे दिल्ली में नहीं, बल्कि गंगोत्री के नजदीक पूछताछ की जानी चाहिए जहां वह रहते हैं।

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