#TheKashmirFiles पत्नी को खिलाए पति के खून से सने चावल, देखिए कश्मीरी हिंदुओं की दर्दनाक दास्तां


कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार और पलायन पर बेस्ड फिल्म 'द कश्मीर फाइल्स' (The Kashmir Files) इन दिनों चर्चा में है। थिएटर्स से फिल्म देखकर बाहर निकलने वाले लोग अपने आंसू नहीं रोक पा रहे हैं। ऐसे कई वीडियोज सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं। लोगों का कहना है कि बॉलीवुड में पहली बार किसी डायरेक्टर ने इतनी हिम्मत दिखाते हुए 32 साल पहले कश्मीरी हिंदुओं के साथ हुई बर्बरता की सच्चाई दिखाने की कोशिश की है। वहीं, दो साल पहले नवंबर, 2019 में पॉलिटिकल कमेंटेटर सुनंदा वशिष्ठ ने कश्मीरी हिंदुओं के खिलाफ 1990 में हुई दर्दनाक दास्तां को बयां किया था। 

मानवाधिकारों पर अमेरिकी कांग्रेस में हुई बैठक में सुनंदा वशिष्ठ ने एक ऐसी घटना को याद किया जिसे सुनकर सब शॉक्ड रह गए। उन्होंने 90 के दशक में कश्मीरी पंडितों के साथ आतंकवादियों की हैवानियत को बताया था। 

सुनंदा वशिष्ठ के मुताबिक, कश्मीर में उनका और उनके लोगों की पूरी जिंदगी कट्टरपंथी इस्लाम की वजह से बर्बाद हो गई। इतना ही नहीं, उन्होंने टीचर गिरिजा टिक्कू और बीके गंजू जैसे लोगों के साथ हुई अमानवीय घटनाओं का भी जिक्र किया।

सुनंदा वशिष्ठ के मुताबिक, आतंकियों ने बांदीपोरा की टीचर गिरिजा टिक्कू को पहले किडनैप किया और फिर उन्हें बर्बरता के साथ काट डाला। गिरिजा टिक्कू को मारने से पहले उनके साथ गैंगरेप भी किया गया। उनके साथ ऐसा करने वालों में वो लोग शामिल थे, जिन्हें गिरिजा टिक्कू ने पढ़ाया था। 

सुनंदा वशिष्ठ के मुताबिक, कश्मीरी पंडित (Kashmiri Pandit) बीके गंजू जैसे लोगों को पड़ोसियों पर विश्वास करने के बदले सिर्फ और सिर्फ धोखा मिला। बीके गंजू को आतंकवादियों ने कंटेनर में ही गोली मार दी थी। इसके बाद उनकी पत्नी को खून से सने चावल खिलाए थे। बीके गंजू के बारे में आतंकियों को पूरी जानकारी उनके पड़ोसियों ने दी थी। 

वैसे, कश्मीर घाटी (Kashmir Ghati) में हिंदुओं की हत्‍या का सिलसिला 1989 से ही शुरू हो चुका था। सबसे पहले पंडित टीका लाल टपलू की हत्‍या की गई। श्रीनगर में सरेआम टपलू को गोलियों से भून दिया गया। वह कश्‍मीरी पंडितों के बड़े नेता थे। आरोप जम्मू-कश्मीर लिब्रेशन फ्रंट के आतंकियों पर लगा लेकिन कभी किसी के खिलाफ मुकदमा नहीं हुआ। 

इसके डेढ़ महीने बाद रिटायर्ड जज नीलकंठ गंजू की हत्या कर दी गई। गंजू ने जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) के नेता मकबूल भट्ट को मौत की सजा सुनाई थी। गंजू की पत्नी को किडनैप कर लिया गया और उसके बाद वो कभी नहीं मिलीं।

4 जनवरी 1990 को श्रीनगर से छपने वाले एक उर्दू अखबार में हिजबुल मुजाहिदीन का एक बयान छपा। इसमें हिंदुओं को घाटी छोड़ने के लिए कहा गया था। इस वक्‍त तक घाटी का माहौल बेहद खराब हो चुका था। हिंदुओं के खिलाफ भड़काऊ भाषणों की भरमार थी। उन्‍हें खुलेआम कश्मीर छोड़ने या फिर इस्लाम कबूल करने की धमकियां दी जा रही थीं। 

इसके बाद वकील प्रेमनाथ भट को मार दिया गया। 13 फरवरी 1990 को श्रीनगर के टेलीविजन केंद्र के निदेशक लासा कौल की हत्या कर दी गई। ये तो वो लोग हैं, जो रसूख वाले थे। साधारण लोगों की हत्या की तो गिनती भी नहीं की जा सकती। एक तरफ कश्मीर घाटी में दहशत का माहौल था तो दूसरी तरफ फारुख अब्दुल्ला ने जम्मू कश्मीर में 70 अपराधी जेल से रिहा किए थे।

इसके बाद तो कश्मीरी हिंदुओं के मकानों व धर्मस्थलों पर हमले शुरू हो गए। कश्मीरी हिंदू नेताओं, बुद्धिजीवियों और यहां तक की महिलाओं को भी निशाना बनाया जाने लगा था। एक सर्वे के मुताबिक, कश्मीर में आतंकवाद का दौर शुरु होने से पहले वहां 1242 शहरों, कस्बों और गांवों में करीब तीन लाख कश्मीरी पंडित परिवार रहते थे। लेकिन कश्मीर में हिंदुओं के नरसंहार और पलायन के बाद 242 जगहों पर सिर्फ 808 परिवार रह गए हैं। 

#TheKashmirFiles : 17 सालों में कश्मीरी पंडित सिर्फ 399 जबकि मुस्लिम 15 हजार मारे गए : कांग्रेस


बॉलिवुड फिल्म 'कश्मीर फाइल्स' (Kashmir Files) के बहाने एक बार फिर से कश्मीरी पंडितों (Kashmiri Pandits) का मामला चर्चा में है। फिल्म को लेकर सोशल मीडिया पर जमकर बहस छिड़ी है। इसी बीच केरल कांग्रेस ने कश्मीरी पंडितों के जम्मू-कश्मीर से पलायन को लेकर कई ट्वीट किए हैं। कांग्रेस में कश्मीरी पंडित मुद्दे को लेकर कुछ फैक्ट रखे हैं और इसके जरिए उसने भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधा है। हालांकि, सोशल मीडिया पर कांग्रेस का यह दांव तब उल्टा पड़ गया, जब टि्वटर यूजर्स ने कांग्रेस की ओर से दिए जा रहे फैक्ट्स पर सवाल खड़े करने शुरू कर दिए।

दरअसल रविवार को केरल कांग्रेस ने कश्मीरी पंडितों को लेकर सिलसिलेवार तरीके से कई ट्वीट किए थे। कांग्रेस ने अपने ट्वीट में लिखा, 'वे आतंकवादी थे जिन्होंने कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाया। साल 1990 से लेकर 2007 के बीच के 17 सालों में आतंकवादी हमलों में 399 पंडितों की हत्या की गई। इसी समयांतराल में आतंकवादियों ने 15 हजार मुसलमानों की हत्या कर दी। कांग्रेस ने आगे लिखा कि घाटी से कश्मीरी पंडितों का पलायन तत्कालीन राज्यपाल जगमोहन के निर्देश पर हुआ था, जो कि आरएसएस के आदमी थे।

कांग्रेस ने आरोप लगाया कि पलायन बीजेपी के समर्थन वाली वीपी सिंह सरकार के समय में शुरू हुआ था। बीजेपी के समर्थन वाली वीपी सिंह सरकार दिसंबर 1989 में सत्ता में आई। पंडितों का पलायन उसके ठीक एक महीने बाद से शुरू हो गया। कांग्रेस ने कहा कि बीजेपी ने इस पर कुछ नहीं किया और नवंबर 1990 तक वीपी सिंह सरकार को अपना समर्थन देती रही। कांग्रेस ने दावा किया कि यूपीए सरकार ने जम्मू में कश्मीरी पंडितों के लिए 5242 आवास बनवाए। इसके अलावा पंडितों के प्रत्येक परिवार को 5 लाख रुपये की सहायता राशि दी, इसमें पंडितों के परिवार के छात्रों को स्कॉलरशिप और किसानों के लिए कल्याणकारी योजनाएं शामिल थीं।

कांग्रेस के ट्वीट पर जवाब देते हुए कई ट्विटर यूजर्स ने उससे तीखे सवाल भी किए। @पल्लवीसीटी नाम के यूजर ने लिखा, 'आप ऐसे बर्ताव कर रहे हैं जैसे कश्मीर 1990 के पहले जन्नत था। क्या आप इससे इंकार कर सकते हैं कि गवर्नर जगमोहन साल 1988 की शुरुआत से ही राजीव गांधी की सरकार को कश्मीर में आतंकवादियों के जुटने की चेतावनी दे देने लगे थे। विजय ने बताया कि जगमोहन ने केंद्र सरकार को लिखा था, 'आपके और आपके आसपास के लोगों के पास इन संकेतों को देखने के लिए ना तो समय था, न दिलचस्पी और न ही दृष्टि।

उन्होंने आगे लिखा है कि जगमोहन इतने ज्यादा स्पष्ट थे कि उनके उनकी उपेक्षा करना ऐतिहासिक दृष्टि से अपराध जैसा था। सुमित भसीन ने पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह के साथ यासीन मलिक की एक तस्वीर साझा करते हुए लिखा कि वह (कांग्रेस) इस पर कोई स्पष्टीकरण दें। कुमार 4018 नाम के एक यूजर ने लिखा कि इस तरह की चीजें एक दिन में नहीं होतीं। राजीव गांधी दिसंबर 1989 के मध्य तक प्रधानमंत्री थे। कश्मीर दंगे 1986 में शुरू हुए थे। तब राजीव गांधी की सरकार थी।

कश्मीरी हिन्दुओं के अच्छे दिन - विस्थापित विद्यार्थियों को दाखिले में 10 प्रतिशत की छूट

कश्मीरी हिन्दू विस्थापित विद्यार्थियों को विश्वविद्यालयों के सेशन 2015-16 के दाखिले के कट ऑफ में 10 फीसद तक की छूट मिलेगी. इतना ही नहीं उन्हें कश्मीर का डोमिसाईल सर्टिफिकेट भी नहीं देना होगा.

केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के निर्देश पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने देशभर के केन्द्रीय विश्वविद्यालयों को निर्देश जारी किए हैं.

यूजीसी द्वारा जारी निर्देश के अनुसार कश्मीर विस्थापित विद्यार्थियों को न सिर्फ कट ऑफ में किसी भी सब्जेक्ट के लिए तय न्यूनतम पर्सेटेज के स्तर पर दस फीसद तक की छूट मिल सकेगी, बल्कि उन्हें डोमिसाइल सर्टिफिकेट के लिए भी परेशान नहीं होना होगा.

साथ ही साथ विद्यार्थियों को अब स्ट्रीम की जगह कोर्स स्तर पर पांच फीसद का कोटा भी दिया गया है.

इस प्रकार प्रत्येक कोर्स में पांच फीसद अतिरिक्त सीटें मिल सकेगी. बता दें कि दिल्ली विश्वविद्यालय में फिलहाल कश्मीर विस्थापित विद्यार्थियों के लिए स्ट्रीम के आधार पर सीटें निर्धारित की गई हैं. अभी आर्ट्स, कॉमर्स व साइंस में एक-एक सीट का कोटा तय है.

इस प्रकार हर वर्ष सवा सौ से डेढ़ सौ सीटें ग्रेजुएशन के स्तर पर भरी जाती हैं. अब नए नियम के तहत सेशन 2015-16 में ज्यादा संख्या में कश्मीर विस्थापित विद्यार्थियों को दाखिला मिल सकेगा.

फिल्म हैदर- कश्मीर की आज़ादी की जंग या आतंकवादी बकवास?

मैं कोई नेता नहीं, कोई अभिनेता नहीं। मैं कोई कलाकार नहीं। ज्यादा कला नहीं जानता, फैशन नहीं जानता। कमरे में बैठ कर घरवालों के बीच गप्पें लड़ाने का, फिल्म देखने का, फिल्मों पर चटपटी बातें करने का कभी मौका नहीं मिला। मेरी एक ही पहचान है। दुश्मन की बन्दूक और इस देश के बीच जो दीवार खड़ी होती है, मैं उस दीवार की एक ईंट रहा हूँ। मैं एक फौजी हूँ।
नब्बे के दशक में कश्मीर में था। यही वक़्त था जब बर्फ से ढकी वादियाँ आग उगल रही थीं। हजारों मुजाहिदीन के जत्थे पाकिस्तान से तैयार होकर कश्मीर में आकर मिल रहे थे। मकसद था कश्मीर से कश्मीरी हिन्दू-सिखों और बाकी अल्पसंख्यक समुदाय का क़त्ल ए आम / नर संहार, उनका पलायन और अंत में कश्मीर को हिंदुस्तान से अलग करना। लश्कर ए तैय्यबा, हरकत उल मुजाहिदीन, हिज्ब उल मुजाहिदीन और ना जाने कितने आतंकवादी संगठन कश्मीर से लड़कों की भर्ती करते, उन्हें पाकिस्तान ट्रेनिंग के लिए भेजते और फिर वापस लाकर कश्मीर में खून बहाने के लिए खुला छोड़ देते।
और फिर अल्पसंख्यकों का क़त्ल ए आम, बलात्कार और पलायन शुरू हुआ। तीन से पांच लाख कश्मीरी हिन्दू सिख अपने अपने घर छोड़ कर कश्मीर वादी छोड़ने को मजबूर हुए। सैंकड़ों क़त्ल कर दिए गए। न जाने कितनी महिलाओं को क़त्ल करने से पहले नोच दिया गया, उनके सम्मान मिट्टी में मिलाये गए। दुधमुहे बच्चों से लेकर ३-४ साल तक के बच्चों के सर कुचले गए। पड़ोसी और दुश्मन में कोई फर्क नहीं बचा था, आम आदमी और आतंकवादी में फर्क करना मुश्किल था।
भारत- पाकिस्तान के क्रिकेट मैच होते थे। घाटी पाकिस्तान के झंडों से हरी हो जाती थी। कोई देशभक्त हिंदुस्तान के झंडे के साथ दिख नहीं सकता था। ये वक़्त था जब असली कश्मीरी कश्मीर से निकाले जा चुके थे और पाकिस्तानी मुजाहिदीन कश्मीर पर दावा ठोक रहे थे। और इस वक़्त भारत की सेना ने कश्मीर में लगी आग को अपने खून से बुझाया।
हकीकत में पूरी मानव जाति के इतिहास में भारत की सेना ने जितने मानव अधिकार उल्लंघन सहे उसके उदाहरण ज्यादा नहीं मिलेंगे। हमने अपने घर छोड़े। महीनों महीनों बन्दूक के साये में सोना, जागना, खाना, जीना और मरना। पत्थरों पर पत्थर बन कर कई दिन तक पड़े रहना ताकि सरहद पार से आने वाले आतंकवादियों को रोका जा सके।हममें से कुछ बम धमाकों में मारे जाते। लाश चिथड़े बनकर बिखर जाती और घर केवल खाली वर्दी भेजी जाती। मैंने अपना एक हाथ खोया। किसी ने आँखें किसी ने पैर और किसी ने सर। धमाके में मर जाना भी एक सुकून की बात थी। फौजी अगर मुजाहिदीन के हाथ लगते थे तो जिस्म के एक एक हिस्से को धीरे धीरे काट कर अलग किया जाता था। सब कुछ काट कर मरने के लिए छोड़ दिया जाता था।
कैप्टन सौरभ कालिया याद है? हिन्दुस्तान का फौजी था जो भारत माता के लिए टुकड़े टुकड़े कट कर मरा। जाहिर है किसी विशाल भारद्वाज या शाहिद कपूर जितना उसका नाम नहीं हो पाया। क्योंकि वो कोई फिल्म कलाकार नहीं था। उसके लिए कोई मोमबत्ती नहीं जली। कोई फिल्म नहीं बनी। उसे उसके पांच फौजी साथियों के साथ कश्मीर में पकड़ा गया। उन्हें सरहद पार ले जाया गया और फिर आतंकवादियों के मजहबी तौर तरीके से हलाल किया गया। उसके जिस्म को सिगरेट से दागा गया। कान के परदे गर्म सलाखों से फाड़े गए। आँखों को नोचकर बाहर निकालने से पहले सलाखों से फोड़ा गया। एक एक दांत और जिस्म की एक एक हड्डी को तोड़ा गया। सर फोड़ा, होंठ काटे, नाक काट कर फेंकी गयी, हाथ और पैर काट कर अलग किये गए। गुप्तांग काट कर अलग किया। बाकी के पांच हिन्दुस्तानी फौजियों के साथ भी यही हुआ। बाइस दिन तक यह सब करने के बाद आखिर में दया कर के इन्हें माथे में गोली मार दी गयी।
और इस तरह वो कातिल मुजाहिदीन गाज़ी कहलाये। कश्मीर की ‘आजादी’ के लिए लड़ने वाले इन हीरो गाजियों के लिए जन्नत की सबसे खूबसूरत हूरें इन्तजार करती हैं। गैर मजहबी बुतपरस्त को बेरहमी से क़त्ल करने पर जन्नत मिलेगी ऐसा मुजाहिदीन में मशहूर है। और अगर वो एक हिंदुस्तानी सिपाही है तो उससे बढ़कर क्या हो सकता है?
यह वो वक़्त था जब भारत की सेना ने इन गाज़ियों से कश्मीर, हिंदुस्तान और इंसानियत को बचाया। अपने हाथ, पैर, सर सब कुछ कटाकर बचाया। और यही वो वक़्त है जिस पर विशाल भारद्वाज, शाहिद कपूर और अलगाववादी जिहादी लेखक बशरत पीर ने अपनी फिल्म हैदर बनायी है।

कश्मीर की आज़ादी की जंग- सच्चाई या आतंकवादी बकवास?

कश्मीर की जमीनी हकीकत जानने वाला हर आदमी ये जानता है कि कश्मीर में कोई जंग आज़ादी की नहीं है। यह सिर्फ गैर मजहबी लोगों के खिलाफ नफरत, उनके क़त्ल ए आम और बलात्कार की लड़ाई है। क्योंकि पहला काम जो इस जंग के शुरू में किया गया वो था हजारों सालों से कश्मीर में बसने वाले, कश्मीर को बसाने वाले कश्मीरी हिन्दुओं को कश्मीर से बाहर निकालना। जिस को भी ‘कश्मीरियत’ की सच्चाई जाननी है वो दो दिन कश्मीर घाटी में बिता ले। गैर मजहबी लोगों से जिहादी नफरत का नाम इन्होंने कश्मीरियत रखा है। यह वही नफरत है जो अल क़ायदा और इस्लामिक स्टेट्स (ISIS) की गले काटने वाली वीडिओ में पायी जाती है।
कश्मीरी अलगाववादी और आतंकवादियों की जन्नत के रास्ते हिंदुस्तान की हार से गुजरते हैं। कभी जैश ए मोहम्मद के मौलाना मसूद अज़हर को सुनना। पता चलेगा ये कश्मीरियत और इसकी जंग क्या है। वह कहता है- जिहादी लश्कर हिंदुस्तान को फतह करेंगे ऐसा उसके पैगम्बर ने कहा है। जब तक हिंदुस्तान फतह नहीं होगा, जन्नत नहीं खुलेगी। मजहबी नफरत के इस जहर को कश्मीरियत बता कर कश्मीर की नस्लें बड़ी हुई हैं। मूर्ति पूजा (बुत परस्ती) करने वालों से लड़ो, उन्हें नेस्तो नाबूत करो, यही मजहब है, और मजहब ही कश्मीरियत है। जो इस मजहब में यकीन नहीं लाये, उसे क़त्ल करो। यह है कश्मीरियत जो जैश और लश्कर ने कश्मीरियों को पढ़ाई है।
भारत की सेना ने इस नफरत के जवाब में कभी आपा नहीं खोया। जान पर खेल कर कश्मीरियों की जान बचाई। पीठ पर औरतों, बच्चों, बूढ़ों और जवानों को लादकर बाढ़ से निकाला। फिर भी जवाब में अलगाववादियों की गोली खाई। पाकिस्तान ने सरहद पर गोलियां चलाईं, कश्मीर में ISIS के झंडे बुलंद हुए। जिस वक़्त फ़ौज को देश की सबसे ज्यादा जरुरत थी, उसी वक़्त इस देश ने उसकी पीठ में हैदर नाम का ख़ंजर घोंपा। इस फिल्म को ना सिर्फ प्रदर्शित किया, कुछ ने इसको कला का नमूना बताया। कुछ ने इसे कश्मीर की जमीनी हकीकत बताया। कुछ ने इसे मानवतावादी बताया। कुल मिलाकर फ़ौज पर पाकिस्तान, कश्मीरी आतंकवादी, ISIS और हिन्दुस्तान के अपने लोगों ने हमले किये। पर! मैं फौजी हूँ। जानता हूँ कि कोई फौजी हड़ताल नहीं करेगा। न ही कोई विरोध करेगा। वो नहीं पूछेगा कि वादी में ISIS के झंडे और मुल्क में हैदर का एक ही समय पर आना क्या महज इत्तेफ़ाक़ है? वो चुपचाप सब कुछ सुनेगा और अपनी छाती दुश्मन की गोली के आगे अड़ाए रखेगा।
मैं इन्तजार करता रहा कि कला के प्रदर्शन के नाम पर हुए इस भौंडे नंगे नाच हैदर को कोई रोकेगा, कोई सवाल करेगा। कोई तो होगा जो सौरभ कालिया के कटे हाथ, पैर, नाक, कान, गुप्तांग, फटे कान, नोच कर फोड़ी गयी आँख की आवाज बनेगा। कोई कश्मीर के असली पीड़ित हिन्दू-सिखों की आवाज बनेगा। जिहादी भेड़ियों के बीच रह कर इंसानियत को ज़िंदा रखने वाले फौजियों की आवाज बनेगा। पर मैं सोचता रहा। कोई नहीं आया।
मैं कला नहीं जानता। जिंदगी के मजे नहीं जानता। फैशन नहीं जानता। पर देश से प्यार क्या है, जानता हूँ। देश से गद्दारी क्या है, ये भी जानता हूँ। मुझे शब्दों से खेलना नहीं आता, पर मातृभूमि पर नजर डालने वाले की गर्दन तोड़ने की ट्रेनिंग है मेरी। शहीदों का अपमान करने वाले दुश्मन का हलक सुखाने की ताकत रखता हूँ। और अगर अंदर से भी देश पर हमले होंगे तो उनका जवाब भी लिख कर जरूर दूंगा।

हैदर- लघु विश्लेषण

मेरी नजर में हैदर देशद्रोह है। और देशद्रोह से पैसा कैसे कमाएँ, इसकी सीख है। अगर देशद्रोह में कोई कला प्रेमी कला देख सकता है तो असली खून से चित्र में लाली भरने वाले पागल चित्रकार, बच्चों से कुकर्म करने वाले, बलात्कार करने वाले सब कलाकार हैं क्योंकि वे सब कुछ हट के करते हैं।

हैदर- विस्तृत विश्लेषण

1. यह पहली भारत विरोधी फिल्म है जो खुद भारतीयों ने भारत में बनाई है। यह फिल्म फ़ौज को अपराधी घोषित करती है और मैं इसके बनाने वालों को जयचंद घोषित करता हूँ।
2. फिल्म एक जिहादी लेखक बशरत पीर ने लिखी है। यह शख्स वैसे तो कश्मीरी अलगाववादी है पर रहता न्यूयॉर्क में है और वहीं से आज़ादी की लड़ाई लड़ता है। यह हिंदुस्तान में पला, बढ़ा, पढ़ा, काबिल बना। और फिर बाकी एहसान फरामोश जिहादियों की तरह इसने हिन्दुस्तान को ही गाली दी। हिंदुस्तान का पासपोर्ट इसके लिए एक मजबूरी से ज्यादा कुछ नहीं है। यहाँ पढ़ें – http://blogs.wsj.com/indiarealtime/2010/08/11/my-nationality-a-matter-of-dispute-basharat-peer/
अपनी फिल्म लिखने के लिए ऐसे इंसान को चुनना फिल्म बनाने वाले को जानने के लिए काफी है।
3. हीरो हैदर का पिता एक डॉक्टर है जो आतंकवादियों के एक गुट का सदस्य है। वो एक आतंकवादी का इलाज अपने घर पर करता है। हैदर की माँ और चाचा इस बात की खबर फ़ौज को करते हैं। फ़ौज डॉक्टर को गिरफ्तार करती है और बाकी आतंकवादियों को मार देती है। हीरो हैदर इसका बदला लेने की कसम लेता है। पूरी फिल्म में हिंदुस्तान या फ़ौज का साथ देने वाले विलेन के तौर पर पेश किये गए हैं। वहीं फ़ौज के दुश्मन हीरो घोषित किये गए हैं।
4. फिल्म के हिसाब से भारतीय फ़ौज जालिमों की फ़ौज है जो मासूम कश्मीरियों के गुप्तांग काटती है। एक दृश्य में यह जानते हुए भी कि वो शख्स बेक़सूर है, फौजियों ने उसका गुप्तांग काट दिया। इस झूठ को तो कला के नाम पर दिखा दिया पर असल में पाकिस्तानी आतंकवादियों/सैनिकों के द्वारा हाथ, पैर और गुप्तांग कटवाने वाले सौरभ कालिया के लिए कुछ नहीं।
5. एक और दृश्य में फ़ौज अलगाववादियों को जय हिन्द बोलने को कहती है। हीरो हैदर का पिता साफ़ इंकार करता है और सजा भुगतता है। और इस बात की खबर वो हैदर तक पहुंचाता है और साथ ही इसका बदला लेने के लिए कहता है।बस इस तरह हीरो हैदर का सफर शुरू होता है। हर वो इंसान जो भारत के साथ है, वो हीरो हैदर का दुश्मन है। पूरी फिल्म के अंत तक यही चलता है।
फिल्म बनाने वाले कला प्रेमी ने यह नहीं बताया कि जिस वक़्त की बात उसने दिखाई है ये वो वक़्त था जब हजारों आतंकवादियों ने सरहद पार से कश्मीर पर चढ़ाई की थी, चुपचाप आकर आबादी में मिलकर, छुपकर फ़ौज और अल्पसंख्यकों पर हमले किये थे। उस वक़्त एक आम हिंदुस्तानी से एक आतंकवादी को अलग करने का तरीका यही था कि जो जय हिन्द से नफरत करता है वो हिंदुस्तानी नहीं है। जय हिन्द से नफरत बशरत पीर की तो समझी जा सकती है पर विशाल भारद्वाज और शाहिद कपूर क्यों? जिसे जय हिन्द से नफरत है वो हिन्दुस्तान में क्यों है? हम जय हिन्द के लिए ही जीते मरते हैं। यही हमारा मन्त्र, कलमा और नारा है। जय हिन्द से नफरत करने वाले को क्यों सजा नहीं मिलनी चाहिए?
6. अंत में मारकाट के बाद हीरो हैदर पाकिस्तान की तरफ रुख करता है।
7. एक दृश्य में हीरो हैदर श्रीनगर के लाल चौक पर भाषण करता है की किस तरह भारत ने कश्मीरियों को धोखा दिया और कश्मीर को दबोच लिया। फिर वो आजादी के नारे बुलंद करता है। शर्म की बात ये है कि भारत विरोधी यह दृश्य फिल्म की खूबसूरती के तौर पर पेश हुआ है।
8. दुःख की बात है कि कश्मीरी औरतों के चरित्र को इस फिल्म में गन्दा करके दिखाया है। शौहर को गिरफ्तार करवाकर हैदर की माँ अपने देवर के साथ सोने लगती है। और जब शौहर की मौत की खबर पक्की हो जाती है तो देवर से निकाह कर लेती है। इसके अलावा उसके अपने बेटे हैदर के प्रति भाव भी घिनौने हैं जो बहुत घटिया चुम्बन दृश्यों से प्रकट होते हैं।
9. एक और कश्मीरी औरत जो कि हीरो हैदर की दोस्त है, उसकी अपने मजहब से नफरत दिखाई गयी है। वो साफ़ तौर पर क़ुरान को छूने से मना कर देती है और फिर हीरो हैदर के साथ सोने जाती है जबकि उसके बाप और भाई मना करते रह जाते हैं। असल में फिल्म में यह लड़की भारत से प्यार और हैदर से प्यार के बीच फंसी हुई है जो हीरो हैदर के लिए मुश्किल पैदा करती है।
10. पूरी फिल्म में यही दो औरतें हैं। इससे पता चलता है कि हिन्दुस्तान से नफरत के साथ साथ बशरत पीर इस्लाम और कश्मीरी औरत दोनों से नफरत करता है। उसका मिशन असल में पाकिस्तान का मिशन है और यही वजह है की हीरो हैदर अपनी हिफाजत के लिए पाकिस्तान चला जाता है। जो भी मुसलमान हिंदुस्तान से जरा सी हमदर्दी रखता है, वो इस फिल्म में विलेन है।
11. फिल्म में दो चरित्र हैं जो सलमान खान की नक़ल करते हैं। वो हैदर के दोस्त हैं पर पुलिस का साथ देने की वजह से वो हैदर के दुश्मन हो जाते हैं और हैदर उन्हें क़त्ल करता है।
12. हैदर के दोस्त का पिता एक कमजोर पुलिस वाला है जो अंदर से हिंदुस्तान को गलत मानता है पर कश्मीरी आज़ादी के लड़ाकों के खिलाफ काम करता है। वही अंत में हैदर को मारने का हुक्म देता है।
13. एक बाजारू शब्द “Chutzpah” बार बार इस्तेमाल हुआ है। एक दृश्य में इसे AFSPA (Armed Forces Special Powers Act) के साथ मिलाया गया है और बताया गया है कि क्यों इन दोनों में ज्यादा फर्क नहीं है। शर्म की बात ये है कि जिस AFSPA की वजह से यह फिल्म शूट हो सकी है, उसी को इन्होने गाली दी है।
14. ‘बिस्मिल’ नाम के एक गाने में शैतान की मूर्ति अनंतनाग के मार्तण्ड मंदिर में दिखाई गईं और हीरो हैदर मंदिर के अंदर शैतानी नाच करता है। एक समुदाय के पवित्र स्थल सूर्य मंदिर को शैतान से मिलाना, फिर गाना ख़त्म होने पर अपने चाचा को मारने की कोशिश कला के नाम पर फूहड़पन और नफरत के अलावा कुछ भी नहीं । कुछ हिन्दू संगठनों ने इतने पुराने मंदिर के इस अपमान पर विरोध जताया है।
15. फिल्म में हीरो हैदर अनंतनाग को इस्लामाबाद कहता है। हिन्दू-सिखों के सफाये के बाद अब कश्मीर की जगहों के असली नामों पर भी इन कलाकारों को दिक्कत है। कश्मीर, अनंतनाग, श्रीनगर, कौसरनाग और सब हिन्दू नाम अलगाववादियों को तीर जैसे चुभते हैं, ये हमें पता है। पर फिल्म में कला के नाम पर इस अलगाववाद को बढ़ावा देना क्या गद्दारी नहीं?
16. इस फिल्म के बनाने वाले कश्मीर मुद्दे के बड़े मुरीद बने हुए हैं। जैसे कश्मीर का मुद्दा इनके जीने मरने का सवाल है। पर पता नहीं क्यों, हीरो हैदर की कहानी भारत के कश्मीर में शुरू होकर भारत के कश्मीर में ही ख़त्म हो जाती है जैसे कि कश्मीर केवल भारत के पास है! क्या पाकिस्तान वाला कश्मीर और चीन वाला कश्मीर कश्मीर नहीं है? अगर है तो वहाँ जमीन पर क्या हालात हैं? क्या विशाल भरद्वाज अपने कैमरे लेकर पाकिस्तान या चीन के कश्मीर में घुस सकते हैं और फिर वहां की फ़ौज के बारे में वो सब दिखा सकते हैं जो हिंदुस्तानी फ़ौज के बारे में दिखा दिया? यहीं से इस हैदर के बनाने वाले के घटिया इरादे जाहिर होते हैं। जिस भारतीय सेना ने इन साँपों को शूट करने की इजाज़त दी, इन्होने उसे ही डस लिया। जिन हाथों ने दूध पिलाया, इन साँपों ने उन्हें ही डसा। और जिन्होंने इन्हे घुसने भी नहीं देना उनके लिए एक शब्द भी इस फिल्म में नहीं कहा।
17. पूरी फिल्म में आतंकवादियों के इंसानियत के चेहरे दिखाए हैं, उन पर होने वाले फ़ौज के अत्याचार दिखाए हैं पर १९८९ में घाटी में ३-५ लाख हिन्दू सिखों का कत्ल ए आम, बलात्कार और पलायन एक बार भी नहीं दिखाया। उनके बारे में एक भी बार बात नहीं हुई। आतंकवादियों और अलगाववादियों के जिहादी जज्बात खुले आम बढाए गए हैं पर असली पीड़ित अल्पसंख्यक हिन्दू-सिख समुदाय की पीड़ा एक दृश्य में भी नहीं। क्या यही मिशन पाकिस्तान का भी नहीं?
हैदर के बनाने वालों को फ़ौज से दिक्कत है। क्योंकि फ़ौज ने कश्मीरियों से पूछताछ की, उन्हें दबाया और उन पर अत्याचार किये। बहुत अच्छा! अब ये भी बता देते कि फ़ौज क्या करती? लाखों अलगाववादी घाटी की सड़कों पर जब अल्पसंख्यकों के सर कुचल रहे थे, औरतों को नोच रहे थे, बच्चों को गोली मार रहे थे, आतंकवादियों को घरों में छुपा रहे थे, हिंदुस्तान को गाली दे रहे थे, तब फ़ौज क्या करती? कश्मीर पाकिस्तान के हवाले कर देती या अल्पसंख्यकों को इन जिहादी भेड़ियों के सामने अकेला छोड़ कर वापस आ जाती? जय हिन्द नहीं बोलने वालों की आरती उतारती? अलगाववादियों और आतंकियों के मानवाधिकार पर विधवा आलाप करने वालों! लाखों कश्मीरी हिन्दू-सिखों के अधिकारों और जीवन की रक्षा कौन करता? भारत माता के सम्मान की रक्षा कौन करता? तिरंगे की रक्षा कौन करता?
सीधे शब्दों में इस फिल्म का मकसद है हर उस शख्स के लिए नफरत पैदा करना
– जो देशभक्त मुसलमान है
– जो देशभक्त महिला है
– जो देशभक्त हिन्दू है
– जो देशभक्त फौजी है
– जो देशभक्त कश्मीरी है
निष्कर्ष
फिल्म पर रोक लगाने की मेरी मांग नहीं। रोक लगाकर किसी की आवाज बंद करने के जमाने अब जा चुके हैं। हाँ, इस फिल्म का इस्तेमाल देश को यह बताने में किया जा सकता है कि जब सैनिकों को मरने के लिए सीमा पर छोड़ दिया जाता है और कोई उनकी आवाज उठाने के लिए देश में नहीं होता तो फिर देशद्रोह का कैसा नंगा नाच घर घर में होता है। देशद्रोह को फूहड़पन, अवैध संबंधों और मजहब के मसाले में मिलाकर कैसे बेचा जा सकता है। कैसे आतंकवादियों के शुभ चिंतक फिल्म निर्माता सच्चे कश्मीरी, मुसलमान, हिन्दू और हिन्दुस्तान का मखौल उड़ा सकते हैं और फिर जमीनी हकीकत से बेखबर मासूम देशवासी कैसे इस घिनौने षड्यंत्र को कला मानकर ताली बजा सकते हैं। यह फिल्म यह भी स्पष्ट करती है कि बशरत पीर जैसे देशद्रोही और अलगाववादियों की पहुँच हिन्दी फिल्म उद्योग में कितनी गहरी है और उनके कौन कौन से दोस्त हमारे बीच हैं।
प्रिय भारत के लोगों! मैं नहीं जानता कि अल्पसंख्यकों और फौजियों के गले, हाथ, पैर और गुप्तांग काटने वालों के लिए विशाल भारद्वाज और शाहिद कपूर के मन में हमदर्दी क्यों है। पर मैं जानता हूँ कि जमीन पर ऐसे लोगों से कैसे बात की जाती है। जो भारत माता को गाली दे, झंडे फाड़े, फौजियों को क़त्ल करे, उनके लिए हमारी बंदूकें और छुरे तैयार रहने चाहियें। कातिलों को हिन्द की ताकत का एहसास रहना चाहिए। किसी फौजी के सर काटने से पहले उन्हें पता होना चाहिए कि जवाब में सर उनका भी जरूर कटेगा। अभी अभी पाकिस्तान की तरफ से हुई बमबारी का सुरक्षा बलों ने जो मुँहतोड़ जवाब दिया वैसा ही देश के अंदर बैठे आतंकवादियों को देना होगा।
रही बात कश्मीर की आजादी की, नेहरू के १९४८ के जनमत संग्रह के वादे की, ये सब अब कोई वजूद नहीं रखते। इस देश का बंटवारा अपने आप में एक भयानक गलती थी। माँ और मातृभूमि का बंटवारा नहीं होता, इतना भी जिसे नहीं पता उसके शब्दों की क्या कीमत है? इस देश की भौगोलिक सीमाएँ खुद प्रकृति ने बाँधी हैं। कश्मीर से कन्याकुमारी और अटक से कटक तक यह एक ही है। यही वो धरती है जिस पर मानवता ने सबसे पहले सभ्यता का स्वाद चखा और जो सबसे पुराने समय से लेकर आज तक भी मानव सभ्यता का केंद्र बिंदु है। इस धरती का और कोई विभाजन हमें स्वीकार नहीं। जिसे इस धरती से, इसकी सभ्यता से और इसके लोगों से नफरत हो, वो इसे छोड़ कर जा सकता है। पर अब ये धरती कहीं नहीं जायेगी।
कश्मीर भारत का हिस्सा था, है और रहेगा। ‘आजादी की लड़ाई’ का ढकोसला कुछ भी नहीं बस हिन्दुस्तान पर ISIS और मजहबी आतंकवादियों के कब्जे की लड़ाई है। पूरी दुनिया में इनकी आजादी की लड़ाई दुनिया देख रही है। अब समय है कि सब मानव शक्तियां इन को अपने पैरों तले रौंद डालें। और इनके कला प्रेमी साथियों को इनकी औकात का अंदाजा कराएं।
अंत में यही कहूँगा कि हैदर नाम की खुराफात देखने के बजाय आप वो पैसे भारतीय सेना या प्रधानमंत्री राहत कोष में जमा करा सकते हैं ताकि बाढ़ पीड़ितों की मदद हो सके। अग्निवीर बनो, इसे बढ़ाओ और देश की सेवा करो। जो सब कुछ छोड़ कर मरने के लिए सीमा पर चले जाते हैं, जो अपने अधिकार के लिए भी बोल नहीं सकते, उनकी आवाज बनो।जो धमाकों में चिथड़े बनकर हवा में मिल जाते हैं, जिनकी लाश भी नहीं मिलती, जिनके एक एक जिस्म के टुकड़े भारत माँ के लिए कट कर गिरे, उनके अधिकार के लिए लड़ो।
जो भी कुछ यहाँ लिखा गया है वो सब भारतीय सेना को समर्पित है जिसके कारण कश्मीर आज भी हिन्दुस्तान में है और सदा रहेगा।
जय हिन्द। वन्दे मातरम।
From : hindujagruti.org

कश्मीरी पंडितों को सात दिन के अंदर वादी छोड़ने का फरमान

उमर अब्दुल्ला सरकार पंडितों की वापसी लायक माहौल बनने के लाख दावे करे, लेकिन आतंकी संगठन जैश-ए-मुहम्मद ने कश्मीरी पंडितों को सात दिन के अंदर वादी छोड़ने का फरमान सुनाया है।

इस धमकी के बाद पुलिस ने सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर संदिग्ध तत्वों के खिलाफ अभियान छेड़ दिया है। इस बीच, आल पार्टी हुर्रियत कांफ्रेंस के दोनों गुटों ने कश्मीरी विस्थापितों को सुरक्षा का यकीन दिलाते हुए कहा कि वह इस धमकी को गंभीरता से न लें। 

यह किसी सुरक्षा एजेंसी की कश्मीरी पंडितों और कश्मीरी मुस्लिमों के बीच मतभेद पैदा करने की साजिश है। विभिन्न आतंकी संगठनों के साझा मंच यूनाइटेड जेहाद काउंसिल और हिजबुल मुजाहिदीन के सुप्रीमो सल्लाहुदीन ने भी कश्मीरी पंडितों को मिली इस धमकी की निंदा करते हुए इसे भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की साजिश करार दिया है।

आतंकी संगठन ने यह धमकी पोस्टर लगाकर नहीं बल्कि डाक के जरिये एक खत भेजकर दी है। यह खत बडगाम जिले के शेखपोरा इलाके में कश्मीरी पंडितों के लिए बनाई गई आवासीय कॉलोनी के अध्यक्ष के नाम भेजा गया है। जैश कमांडर जुबैर ने इस खत में कश्मीरी पंडितों को सात दिन के अंदर कश्मीर छोड़ने का फरमान सुनाया है। 

खत में कश्मीर में गैर इस्लामिक गतिविधियों को बढ़ावा देने और भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के साथ मिलकर जेहाद को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया गया है। इस धमकी के बाद न सिर्फ शेखपोरा में बल्कि वादी के अन्य हिस्सों में रह रहे कश्मीरी पंडितों में भी भय पैदा हो गया है।

गिलानी फिर भौंका - कश्मीरी पंडितों की कॉलोनियां नहीं बनने देंगे

कश्मीरी पंडितों को दिल से लगाकर रखने के जूठे दावे करने वाले कट्टरपंथी और बेहद ही कमीने नेता सैयद अली शाह गिलानी ने सोमवार को वादी में कश्मीरी विस्थापित पंडितों के लिए दी जा रही ट्रांजिट आवासीय सुविधा का विरोध किया है।

उसने कहा कि यह कश्मीर की मुस्लिम आबादी को अल्पसंख्यक बनाने की साजिश है। हम किसी भी सूरत में इन आवासीय कॉलोनियों को नहीं बनने देंगे।

वादी में वापस लौटने के इच्छुक कश्मीरी विस्थापित पंडितों के लिए राज्य सरकार ने प्रधानमंत्री पुनर्वास योजना के तहत कई इलाकों में ट्रांजिट आवास का निर्माण किया है। कुत्ते गिलानी ने इसका विरोध करते हुए कहा कि केंद्र सरकार सुनियोजित साजिश के तहत वादी में कुछ ऐसी कॉलोनियां बना रही है, जिनमें कश्मीरी पंडितों की आड़ में गैर-कश्मीरी और गैर-मुस्लिम लोगों को बसाया जाएगा।

इस साजिश में इजरायल की खुफिया एजेंसी भारत की मदद कर रही है। जिस तरह फलस्तीन में इजरायल ने यहूदियों की बस्तियां बनाई हैं, उसी तरह यहां गैर-मुस्लिम लोगों को बसाया जा रहा है। यह साजिश कामयाब हुई तो कश्मीर में गृहयुद्ध जैसे हालात पैदा हो जाएंगे। 

कश्मीर समस्या नेहरू परिवार का एक विशेष ‘तोहफा’ - आडवाणी

भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी का मानना है कि कश्मीर समस्या देश को दिया गया नेहरू परिवार का विशेषउपहारहै और विभाजन के समय इसका समाधान कर पाने में जवाहर लाल नेहरू की असफलता की देश भारी कीमत चुका रहा है।

आडवाणी ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि दुख की बात है कि न तो दिल्ली में नेहरू सरकार और न हीश्रीनगर में शेख अब्दुल्ला सरकार ने कभी इस बात को माना कि जम्मू-कश्मीर का भारत संघ में पूरी तरह एकीकरण करने की जरूरत है।

शेख अब्दुल्ला के मामले में समस्या यह थी कि उनकी एक तरह से स्वतंत्र कश्मीर का एकछत्र नेता बनने की महत्वाकांक्षा थी, जबकि नेहरूजी की ओर से इस मामले में साहस और दूरदर्शिता की कमी रही।

भाजपा नेता के मुताबिक, अनुच्छेद 370, जिसे पंडित नेहरू ने भी एक अस्थायी प्रावधान घोषित किया था, उसे अब तक रद्द नहीं किया गया है। इसी का परिणाम है कि पाकिस्तान के भारत विरोधी प्रतिष्ठानों द्वारा मदद पा रहे अलगाववादी बल कश्मीर में लगातार अपना जहरीला प्रचार कर रहे हैं। ये बल लगातार यह फैला रहे हैं कि भारत से जम्मू-कश्मीर का जुड़ना अंतिम नहीं था और खास तौर पर कश्मीर, भारत का भाग नहीं है।

आडवाणी ने लिखा है कि विभाजन के समय पर ही कश्मीर मुद्दे का समाधान कर पाने में नेहरू की असफलता की देश भारी कीमत चुका रहा है और नेहरू की इस भूल की उपेक्षा नहीं की जा सकती।

आडवाणी के मुताबिक, गौर करने वाली बात यह है कि गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल सभी दूसरी राजशाही वाली सियासतों का भारत संघ में एकीकरण करने में सफल रहे। जब उनमें से किसी ने दुविधा दिखाई या पाकिस्तान में शामिल होने की इच्छा जाहिर की, तो पटेल ने उन्हें उनकी जगह दिखा दी। उदाहरण के लिए, हैदराबाद के निजाम के सशस्त्र विद्रोह को कुचल दिया गया।

उन्होंने लिखा है कि जम्मू-कश्मीर राजशाही वाला एकमात्र ऐसा राज्य था, जिसे भारत से जोड़े जाने की प्रक्रिया सीधे प्रधानमंत्री नेहरू की देखरेख में हो रही थी। कश्मीर को पाने के लिए भारत के खिलाफ पाकिस्तान की 1947 की पहली जंग ने भी नेहरू सरकार को इस बात का बेहतरीन मौका दिया था कि वह न केवल हमला करने वालों को खदेड़ देती, बल्कि पाकिस्तान के साथ हमेशा के लिए कश्मीर मुद्दे को सुलझा देती।

भाजपा के वरिष्ठ नेता ने लिखा है कि भारत ने ऐसा दूसरा बड़ा मौका 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भी गंवाया, जिसमें भारत ने न केवल पाकिस्तान को हराया, बल्कि पाकिस्तान के लगभग 90000 युद्धबंदी भी भारत में आ गए।

आडवाणी ने लिखा है कि देश के लोगों को यह पता होना चाहिए कि कश्मीर समस्या देश के लोगों के लिए नेहरू परिवार का एक विशेष ‘तोहफा’ है। आडवाणी के मुताबिक, इस ‘तोहफे’ के छह परिणाम आज तक देखने को मिल रहे हैं। उन्होंने कहा कि इसका पहला परिणाम, पाकिस्तान की ओर से सबसे पहले कश्मीर और बाद में भारत के विभिन्न हिस्सों में सीमा पार से आतंकवाद का निर्यात है।

आडवाणी ने लिखा, ‘दूसरा, पाकिस्तान की ओर से कश्मीर और बाद में देश के दूसरे हिस्सों में फैले धार्मिक चरमपंथ का निर्यात। तीसरा, हमारे सुरक्षा बलों के हजारों जवानों और नागरिकों की मौत। चौथा, सैन्य और अर्धसैनिक बलों पर खर्च होने वाले हजारों करोड़ों रुपए। आडवाणी ने लिखा है कि इसी ‘तोहफे’ की बदौलत बाहरी ताकतें भारत और पाकिस्तान के तनावपूर्ण संबंधों का फायदा उठा रही हैं।

भाजपा नेता ने लिखा है कि इस तोहफे का अंतिम नुकसान कश्मीरी पंडितों के पूरे समुदाय को उठाना पड़ रहा है, जो अपनी जमीन से विस्थापित होकर अपनी ही मातृभूमि में शरणार्थी बनकर रहने को मजबूर हो गए हैं।

कश्मीर पंचायत चुनाव : एक कश्मीरी पंडित महिला ने एक मुस्लिम को हराया

आशा जी पहली कश्मीरी पंडित महिला हैं जो मुस्लिम बहुल और उग्रवाद प्रभावित कश्मीर घाटी में पंच चुनी गई हैं। उन्होंने मुस्लिम महिला प्रतिद्वंद्वी सर्वा बेगम को हराकर यह चुनाव जीता।

गौरतलब है कि कश्मीर में अल्पसंख्यक माने जाने वाले पंडित समुदाय के लोग 1989-90 में उभरी भारत विरोधी हिंसा के दौरान भारी संख्या में कश्मीर छोड़ने को मजबूर हो गए थे। लेकिन आशा का परिवार गांव के उन चार परिवारों में है जो अपनी पुरखों की जमीन छोड़ने को तैयार नहीं हुए।

श्रीनगर-गुलमर्ग रोड पर स्थित कुंजेर ब्लॉक के वुसन गांव में आशा जी का मुकाबला सरवा बेगम से था। इस सीधे मुकाबले में आशा जी को 55 वोट मिले जबकि सरवा बेगम को 42 वोट।

वुसन गांव में अपने पति राधाकृष्ण और दो बच्चों के साथ रह रहीं आशा बताती हैं कि ' मेरी इस जीत से देश के अलग-अलग हिस्सों में विस्थापित जीवन बिता रहे कश्मीरी पंडितों को यह संदेश जाएगा कि कश्मीर में अब पंडितों को कोई खतरा नहीं है। वे यहां अच्छी तरह रह सकते हैं। ' उन्होंने कहा कि ' गांव के मुस्लिम निवासियों ने मुझे वोट दिया है और मैं उनकी उम्मीदों पर खरा उतरने की पूरी कोशिश करूंगी बशर्ते कि सरकार संविधान के 74वें संशोधन के मुताबिक अधिकार पंचायतों को सौंपे। '

आशा का बड़ा सुरेश कुमार बेटा जम्मू कश्मीर पुलिस में कॉन्स्टेबल है जबकि छोटा बेटा गांव में पिता राधाकृष्ण की दुकान पर उनकी मदद करता है। आशा जी बताती हैं कि उन्हें चुनाव लड़ने के लिए गांव के नंबरदार अब्दुल हामिद वनी ने प्रोत्साहित किया, ' मुझे वनी साहब ने ही कहा कि मैं चुनाव लड़ूं।

उन्होंने
मेरा उत्साह बढ़ाया और कहा कि पंचायत चुनाव जीत कर मुझे अपने ब्लॉक का विकास करना चाहिए। ' आशा जी का मायका जम्मू के डोडा जिले में है और वह गर्व से बताती हैं कि वह गुलाम नबी आजाद (केंद्रीय मंत्री) के गांव की हैं।

खास बात यह कि वुसन गांव में सुरक्षा बलों का कोई कैंप तो नहीं ही है, कोई पुलिस पोस्ट भी नहीं है। हालांकि अलगाववादियों ने चुनाव के बहिष्कार का आह्वान किया था और आतंकवादियों ने चुनाव में बाधा पहुंचाने की भी कोशिश की।

गौरतलब है कि जम्मू कश्मीर में पंचायत चुनाव एक दशक बाद हुए हैं। पिछले पंचायत चुनाव 2001 में हुए थे।

जम्मू-कश्मीर सरकार कश्मीर पंडितों को झूठे सपने न दिखाए - सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर सरकार से कहा है कि वह कश्मीर पंडितों कोसपने दिखाने वाले प्रस्तावोंसे लुभाए। कोर्ट ने सवाल किया कि क्या आतंकवाद के डर से घाटी छोड़ने वाले हजारों कश्मीरी पंडितों में से किसी एक को भी सरकारी नौकरी दी गई? कोर्ट ने सरकार से इस बारे में आंकड़े उपलब्ध कराने को कहा है।

अखिल भारतीय कश्मीरी समाज की ओर से दायर याचिका में कहा गया है कि दो दशकों के दौरान कश्मीरी पंडितों की व्यथा पर न तो केंद्र और न ही राज्य सरकार ने कभी ध्यान दिया। चीफ जस्टिस एसएच कपाड़िया, जस्टिस केएस राधाकृष्णन और स्वतंत्र कुमार की बेंच ने सुनवाई करते हुए सोमवार को राज्य सरकार के अधिवक्ता से पूछा कि सरकार ने 15 हजार नौकरियां देने का वादा किया, लेकिन क्या एक भी नौकरी दी गई या एक भी घर मुहैया कराया गया? कोर्ट ने कहा कि हमें सरकार की योजनाओं से लेना-देना नहीं है। उस पर अमल कितना हुआ है, इसका जवाब चाहिए।

कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा ‘ क्या सरकार ने कश्मीरी पंडितों के खाली घरों की नीलामी के एक भी मामले को गैरकानूनी ठहराया है, जो उन्होंने 1990-1997 के दौरान छोड़ दिए थे? राज्य सरकार बताए कि ऐसे कितने घर कश्मीरी पंडितों को वापस लौटाए गए?’ राज्य सरकार के अधिवक्ता ने अगली सुनवाई पर इस मामले में जानकारी उपलब्ध कराने को कहा। कोर्ट ने मामले की सुनवाई चार महीने के लिए टाल दी है।

26 अक्टूबर को कश्मीर विलय दिवस मनाया जायेगा - आहलुवालिया

जम्मू कश्मीर के भारत में विलय कोपूर्ण एवं अंतिमबताते हुए कई राजनीतिक दलों और संगठनों ने 24 अक्टूबर को जम्मू ने रैलियां निकाली।

रैली का आयोजन जम्मू कश्मीर पीपुल्स फोरम ने किया था जिसमें भाजपा, विहिप, शिवसेना, संघर्ष समिति, आल इंडिया कश्मीरी पंडित कांफ्रेंस, रिवोल्यूशनरी पार्टी, डोगरा लिबरेशन फ्रांट और कई मजदूर संगठन शामिल हुए।

भाजपा सांसद एवं वरिष्ठ नेता एस एस आहलुवालिया ने यहां संवाददाताओं से कहा, ‘‘ जम्मू कश्मीर का भारत में विलय पूर्ण एवं अंतिम है। यह भारत का अविभाज्य और अभिन्न हिस्सा है जैसे जूनागढ़ और हैदराबाद है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘ हम जम्मू क्षेत्र के लोगों से 26 अक्तूबर को कश्मीर विलय दिवस मनाने और इस दौरान तिरंगा फहराने, क्षेत्र में रोशनी करने, पटाखा छोड़ने तथा मिठाइयां बांटने का आग्रह करते हैं।’’

जम्मू-कश्मीर के वार्ताकारों के विचार देश की भावनाओं से अलग - पनून कश्मीर

कश्मीरी पंडितों का मानना है कि जम्मू-कश्मीर के लिए निर्धारित वार्ताकारों के विचार देश की भावनाओं से बिलकुल अलग हैं। पनून कश्मीर (पीके) के अध्यक्ष अश्विनी कुमार श्रुंगू ने कहा कि वार्ताकारों ने जो कुछ भी विचार रखे, वे कश्मीर मामले में पूरे देश की भावनाओं से अलग हैं।

उन्होंने कहा कि वार्ताकारों में से एक, दिलीप पडगांवकर ने कश्मीर मामले को ‘विवाद’ की संज्ञा दी, जो किसी भी तरह से स्वीकार नहीं किया जा सकता।

कश्मीरी पंडितों ने वाशिंगटन में सौंपा एंटनी को ज्ञापन

अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन आधारित कश्मीरी पंडितों ने यहां आए रक्षा मंत्री एके एंटनी को एक ज्ञापन सौंपते हुए कहा है कि घाटी में इस समुदाय के लोगों को राजनीतिक, आर्थिक और शारीरिक सुरक्षा का माहौल न देकर भारत एक बड़ी गलती कर रहा है।

इंडो-अमेरिकन कश्मीर फोरम के अंतरराष्ट्रीय संयोजक विजय के साजवाल ने कहा केंद्र सरकार घाटी में कश्मीरी पंडितों के लिए राजनीतिक, आर्थिक और शारीरिक सुरक्षा का माहौल न देकर बहुत बड़ी गलती कर रही है। यह ज्ञापन कनाडा और ब्रिटेन के कश्मीरी पंडितों की ओर से भी सौंपा गया।

उन्होंने बताया इसके अलावा सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल ने भी कश्मीरी पंडितों से न मिलकर उनके अधिकारों की उपेक्षा की है। घाटी के इस समुदाय की मांग की बार-बार उपेक्षा की जा रही है। उन्होंने अपने पत्र में कहा है इसकी बजाए सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल ने घाटी के सिख समुदाय से मुलाकात की।

साजवाल के मुताबिक गृहमंत्री पी चिदंबरम ने घाटी में अशांति खत्म करने के लिए आठ सूत्रीय योजना की घोषणा की है, जिसे मंत्रिमंडल की सुरक्षा मामलों की समिति ने भी अनुमति दे दी है। हालांकि मैं एक तरफ आशा कर रहा हूं कि सरकार इस उद्देश्य में सफल हो, लेकिन वास्तविकता ये है कि इसमें कश्मीरी पंडितों की उपेक्षा करके यह योजना अपने व्यापक उद्देश्य में सफल नहीं हुई है और इसलिए हो सकता है कि यह असफल हो जाए।

पासवान ने गिलानी से उनके घर पर मुलाकात की

लोक जनशक्ति पार्टी के नेता राम विलास पासवान ने आज हुर्रियत के कट्टरपंथी नेता सय्यद अली शाह गिलानी से उनके घर पर मुलाकात की। पासवान ने इस दौरान घाटी में रह रहे अल्पसंख्यकों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर चिंता जाहिर की।

हुर्रियत सूत्रों ने बताया कि पासवान ने इस दौरान घाटी में रह रहे पंडितों और सिखों समेत अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर चिंता जाहिर की।

उन्होंने बताया कि गिलानी ने पासवान को आश्वासन दिया कि अल्पसंख्यक भी कश्मीरी समाज का भाग हैं और वे यहां सुरक्षित हैं।

गिलानी ने इस बात पर भी जोर दिया कि जहां-जहां मुस्लिम बहुसंख्यक हैं, वहां अल्पसंख्यकों की रक्षा करना मुस्लिमों का कत्र्तव्य है।

हुर्रियत अध्यक्ष ने कहा कि इस्लाम की छवि को अनावश्यक तौर पर धूमिल किया जा रहा है, जबकि इस्लाम जीवन, सम्मान और अल्पसंख्यकों की स्वतंत्रता का अधिकार देता है।

इस बैठक के दौरान गिलानी ने कश्मीर में नागरिकों की हत्या का मुद्दा भी उठाया।

पासवान ने गिलानी को आश्वासन दिया कि वह कश्मीर के लोगों की परेशानियों का मुद्दा संसद में उठाएंगे।

इसके पहले कल माकपा नेता सीताराम येचुरी के नेतृत्व में पांच सदस्यीय एक दल हुर्रियत नेता गिलानी से उनके घर में मिला था।

कश्मीरी पंडितों ने मनाया ‘काला दिवस’

कश्मीरी पंडितों ने जम्मू-कश्मीर में केन्द्र के सर्वदलीय शिष्टमंडल के आगमन पर आजकाला दिवसमनाया।

सिर तथा कंधों पर काला कपड़ा बांधे यूथ ऑल इंडिया कश्मीरी समाज :वाईएआईकेएस: के 900 से ज्यादा कार्यकर्ताओं ने शहर में धरना दिया और राज्य तथा केन्द्र सरकार विरोधी नारेबाजी की।

वाईएआईकेएस के अध्यक्ष आर. के. भट ने यहां संवाददाताओं से कहा ‘‘हम शिष्टमंडल की राज्य की यात्रा के इन दो दिनों को कालादिवस के तौर पर मनाएगा। हम आज से शुरू हुए दो दिवसीय धरने पर बैठे हैं।’’ उन्होंने आरोप लगाया ‘‘घाटी के हालात से मजबूती से निपटने के बजाय केन्द्र ने मुख्यमंत्री तथा अलगाववादियों के दबाव में कश्मीर मुद्दे पर सौदेबाजी के लिये प्रतिनिधिमंडल भेजा है।’’

कश्मीरी पंडितों के सब्र का बांध टूटा

कश्मीर की आग अब दिल्ली तक पहुंच गई है। हुर्रियत के कंट्टरवादी धड़े के नेता सैयद अली शाह गिलानी द्वारा दिए गए बयान पर रविवार को दिल्ली में रह रहे विस्थापित कश्मीरी पंडित उग्र हो उठे। उन्होंने जंतर मंतर पर प्रदर्शन कर रहे कंट्टरपंथी नेता समर्थकों पर हमले का प्रयास किया।

हालांकि पुलिस ने इससे पहले ही दो दर्जन के करीब कश्मीरी पंडितों को हिरासत में ले लिया। जिन्हें बाद में रिहा कर दिया गया। मालूम हो कि कश्मीर के मौजूदा हालात के विरोध में कंट्टरपंथी तथा विस्थापित कश्मीरी पंडितों का एक-एक वर्ग जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहा है। कंट्टरपंथी कश्मीर में हिंसा भरे माहौल के लिए सरकार पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगा रहे हैं। वहीं कश्मीरी पंडित शांति बहाली के लिए केंद्र के हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं।

शनिवार को संसद हमले में आरोपी रहे दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक प्रो. एसएआर गिलानी के जंतर-मंतर पर दिए गए भाषण से कश्मीरी पंडित बेहद आहत हैं। कश्मीरी पंडित समिति दिल्ली के अध्यक्ष राजेश कौल ने कहा कि सरकार की ढुलमुल नीति के कारण कश्मीर में हिंसा का माहौल पैदा हुआ है। गुरमीत सिंह ने कहा कि सियासी कारणों से कश्मीर समस्या पैदा की गई है। जम्मू-कश्मीर पीपुल्स फोरम के मीडिया कोआर्डिनेटर मनोज खंडेलवाल ने कहा कि आतंकवाद समर्थक जम्मू-कश्मीर को अस्थिर करने में लगे हैं। कश्मीरी पंडित समर्थक मुस्लिम मोर्चा के राष्ट्रीय संयोजक जमीर अहमद ने शायरी के माध्यम से अपनी बात रखी।

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