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#NCH - 14 राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन काउन्टर, 14 से 60 तक बढ़ाए गए


आगामी अक्टूबर से शुरू की जाने वाली 6 जोनल हेल्पलाइन्सः राम विलास पासवान 

14 राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन काउन्टर, 14 से 60 तक बढ़ाए गए

18 राज्यों को मार्च 2018 से राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन से जोड़ा जाएगा 

केन्द्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य व सार्वजनिक वितरण मंत्री श्री रामविलास पासवान ने नेशनल कन्जूमर हेल्पलाइन (एनसीएच) के बारे में बताने के लिए नई दिल्ली में पत्रकार सम्मेलन किया। मीडिया से बातचीत करते हुए श्री पासवान ने कहा कि आगामी अक्टूबर से 6 जोनल हेल्पलाइन्स शुरू की जाएगी। प्रत्येक जोनल हेल्पलाइन में 10 उपभोक्ता डेस्क होंगे। इस तरीके से 60 उपभोक्ता डेस्क, देश में राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन के अलावा अतिरिक्त कार्य करेंगे। 

श्री पासवान ने जानकारी दी कि पहले 14 एनसीएच काउन्टर्स, उपभोक्ताओं की जन-शिकायतों के समाधान का कार्य कर रहे थे, इसे अब 60 तक बढ़ा दिया गया है। उन्होने कहा कि पहले प्रतिक्रिया का औसत समय 7 मिनट के लगभग लिया जाता था, जो राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन में अब लगभग तुरन्त मिल जाता है।

श्री पासवान ने आगे बताया कि राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज करने वालों की संख्या तीन गुना बढ़ गई है। राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन में 2014 में उपभोक्ताओं से 1.30 लाख शिकायते प्राप्त की जो 2017 में बढ़ कर 3 लाख हुई।

मंत्री महोदय ने कहा कि मार्च 2018 से 18 राज्यों को राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन से जोड़ा जाएगा। 

#NFSM के तहत दालों के लिए 835 करोड़ रूपये राज्यों को दिए गए


वित्‍त वर्ष 2017-18 के लिए राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा अभियान (एनएफएसएम) के लिए 1720.00 करोड़ रूपये (भारत सरकार का हिस्‍सा) निर्धारित किए गए हैं। इसमें से अब तक देश में दालों का उत्‍पादन बढ़ाने के लिए एनएफएसएम दालों के लिए 834.71 करोड़ रूपये राज्‍यों को आं‍बटित किए जा चुके हैं तथा 169.28 करोड़ रूपये दाल कार्यक्रम लागू करने के लिए राज्‍यों को जारी किए जा चुके हैं। दालों की खेती के संदर्भ में किसानों में जागरूकता पैदा करने के लिए भारत सरकार ने कई कदम उठाए हैं। जैसे राज्‍य सरकार और कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के माध्‍यम से नवीनतम फसल उत्‍पादन प्रणाली आधारित सबूत प्रदर्शित करना तथा फसल उत्‍पादन प्रणाली आधारित प्रशिक्षण प्रदान करना आदि। इसके अतिरिक्‍त आईसीएआर संस्‍थाओं/कृषि विज्ञान केन्‍द्रों (केवीके)/राज्‍य कृषि विश्‍व विद्यालयों (एसएयू) द्वारा बीज केन्‍द्रों के माध्‍यम से दालों का बीज उत्‍पादन भी किया जा रहा है।

यह सूचना लोकसभा में एक प्रश्‍न के लिखित उत्‍तर में कृषि और किसान कल्‍याण राज्‍य मंत्री श्री एस.एस.आहलूवालिया द्वारा प्रदान की गई।

रेल क्लाउड परियोजना की शुरुआत हुई, पढ़िए क्या होंगे लाभ



रेल क्लाउड परियोजना:

निवारण-शिकायत पोर्टल (रेल क्लाउड के बारे में पहला आईटी एप्लीकेशन)
रेलवे के सेवानिवृत्त कर्मचारियों और उनके आश्रितों के लिए आपात स्थिति में कैशलैस इलाज योजना (सीटीएसई), पहला सीटीएसई कार्ड सौंपा


विभिन्न रेलवे पहलों की शुरूआत के मौके पर रेल राज्य मंत्री श्री राजेन गोहेन, रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष श्री ए.के. मित्तल, रेलवे बोर्ड के अन्य सदस्य वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद थे। रेल मंत्रालय ने अपने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम, रेलटेल कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड के सहयोग से रेल क्लाउड परियोजना शुरू की है।

इस अवसर पर रेल मंत्री श्री सुरेश प्रभु ने कहा कि समूची रेल प्रणाली को समन्वित डिजिटल मंच पर लाने के प्रयास किए जा रहे हैं। रेलवे के डिजिटलीकरण की दिशा में रेल क्लाउड एक अन्य कदम है। रेल क्लाउड लोकप्रिय क्लाउड कम्प्यूटिंग प्रणाली पर कार्य करता है। अधिकतर महत्वपूर्ण कार्य क्लाउड कम्प्यूटिंग के जरिए किए जाते हैं। इससे लागत कम होगी और सर्वर पर सुरक्षित आंकड़े सुनिश्चित हो सकेंगे। इसके साथ ही एक अन्य महत्वपूर्ण कदम आपात स्थिति में कैशलेस इलाज योजना है। लोगों का अनुमानित जीवन काल बढ़ने के कारण स्वास्थ्य संबंधित अनेक समस्याएं पैदा होती है इस योजना से रेलवे कर्मचारियों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिल सकेंगी।

शुरू की गई पहल की विशेषताएं-

रेल क्लाउड:

भारतीय रेलवे ने रणनीतिक आईटी पहल की है, जिसका उद्देश्य ग्राहक की संतुष्टि में सुधार करना, राजस्व बढ़ाना और प्रभावी, कुशल और सुरक्षित संचालन करना है। रेलवे के लिए एकल डिजिटल मंच के लक्ष्य को हासिल करने के लिए कुछ मौलिक परियोजनाओं को लागू करना जरूरी था और रेल क्लाउड की स्थापना इस तरह की परियोजना है। क्लाउड कम्प्यूटिंग तेजी से और मांग पर सर्वर संसाधनों को स्थापित करने के लिए उभरती हुई प्रौद्योगिकी है जिसके परिणामस्वरूप लागत कम होती है। तदनुसार रेल क्लाउड चरण-1 को 53.55 करोड़ रुपये की लागत पर मंजूरी दी गई। रेल क्लाउड लागू होने के बाद रेलवे को होने वाले संभावित लाभ इस प्रकार हैः-

एप्लीकेशन का तेजी से और मांग पर फैलाव- रेल क्लाउड एप्लीकेशन के तेजी से फैलाव (परम्परागत समय, सप्ताहों और महीनों की तुलना में 24 घंटे के भीतर) का मार्ग प्रशस्त करेगा, साथ ही क्लाउड हार्डवेयर और परिवेश नए एप्लीकेशन के परीक्षण के लिए उपलब्ध होगा।

सर्वर और स्टोरेज का अधिकतम इस्तेमाल- इस प्रौद्योगिकी से उपलब्ध सर्वर और स्टोरेज का अधिकतम इस्तेमाल हो सकेगा, जिसके परिणामस्वरूप उसी सर्वर की जगह पर अधिक आंकड़े और अधिक एप्लीकेशन समा सकेंगे।

क्लाउड के हिस्से के रूप में वर्तमान बुनियादी ढांचे का इस्तेमाल- रेलवे के पास उपलब्ध वर्तमान संसाधनों को रेल क्लाउड में मिला दिया जाएगा, ताकि नए संसाधन प्राप्त करने में होने वाले खर्च को कम किया जा सके।

त्वरित मापनीयता और लचीलापन- सर्वर और स्टोरेज की जगह मांग के अनुसार ऊपर-नीचे होगी, इससे सिस्टम अधिक मांग वाले घंटों में कम खर्च के साथ मांग को पूरा कर सकेगा।

आईटी सुरक्षा बढ़ाना और मानकीकरण- यह क्लाउड सरकार के नवीनतम दिशा-निर्देशों के अनुसार सुरक्षा विशेषताओं से लैस होगा। सुरक्षा विशेषताओं को क्लाउड में मौजूद सभी एप्लीकेशनों के लिए अद्यतन किया जा सकता है इसके परिणामस्वरूप अधिक सुरक्षा और स्थिरता कम खर्च में मिल सकेगी।

लागत में कमी- सर्वर और स्टोरेज बुनियादी ढांचा जरूरत के अनुसार लगाया जाएगा, जिससे रेलवे की बचत होगी और जरूरत पड़ने पर मंहगे सर्वर की खरीद पर धनराशि खर्च करने की बजाए इसका इस्‍तेमाल किया जा सकेगा।

बेहतर उपयोगकर्ता अनुभव- क्लाउड में सर्वर के संसाधन उपयोगकर्ताओं की संख्या के अनुसार ऊपर-नीचे होते है इससे ग्राहकों को बेहतर अनुभव मिलेगा।

निकट भविष्य में प्रबंधित नेटवर्क और वर्चुअल डेस्कटॉप इंटरफेस (वीडीआई) सेवाओं की योजना बनाई गई है ताकि प्रत्येक रेल कर्मचारी को तेजी से और अधिक प्रभावी कार्य का माहौल दिया जा सके।

निवारण- शिकायत पोर्टल रेल क्लाउड पर पहला आईटी एप्लीकेशन:

निवारण- शिकायत पोर्टल रेल क्लाउड पर पहला आईटी एप्लीकेशन है। यह वर्तमान और पूर्व रेलवे कर्मचारियों की शिकायतों के समाधान के लिए मंच है। वर्तमान एप्लीकेशन को परम्परागत सर्वर में डाला गया है। इससे राजस्व की बचत होगी और साथ ही उपयोगकर्ता को बेहतर अनुभव मिलेगा।

आपात स्थिति में कैशलैस इलाज योजना (सीटीएसई):

रेलवे स्वास्थ्य संस्थानों, रेफरल और मान्यता प्राप्त अस्पतालों के जरिए अपने कर्मचारियों को विस्तृत स्वास्थ्य सेवा सुविधा प्रदान करती है। लाभ लेने वालों में उसके सेवानिवृत्त कर्मचारी और उनके परिवार के सदस्य होते है। बड़ी संख्या में सेवानिवृत्त लाभार्थी विभिन्न शहरों के नव-विकसित उप-नगरों में रहते है। शहर के यह हिस्से अक्सर रेलवे स्वास्थ्य संस्थानों से दूर होते है आपात स्थिति में ऐसे लाभार्थियों के स्वर्णिम घंटे यात्रा में बर्बाद हो जाते है।

सेवानिवृत्त कर्मचारियों को स्वर्णिम घंटे में तत्काल चिकित्सा प्रदान करने के लिए रेलवे बोर्ड ने अपने सेवानिवृत्त कर्मचारियों और उनके आश्रितों के लिए सूची में सम्मिलित अस्पतालों में आपात स्थिति में कैशलैस इलाज की योजना शुरू की है। निजी अस्पतालों और रेलवे अधिकारियों के बीच एक वेब आधारित संचार प्रणाली विकसित की गई है जिसमें लाभार्थी की पहचान आधार सर्वर में दर्ज बायोमीट्रिक का इस्तेमाल करते हुए स्थापित की जाएगी, पात्रता रेलवे डेटाबेस का इस्तेमाल करते हुए पता लगाई जाएगी तथा आपात स्थिति की पुष्टि निजी अस्पताल की क्लिनिकल रिपोर्ट के आधार पर रेलवे चिकित्सा अधिकारी द्वारा की जाएगी। पूरी प्रणाली ऑनलाइन है और बिल भी ऑनलाइन तैयार होगा। इस योजना से जरूरत के समय सेवानिवृत्त रेलवे कर्मचारियों को मदद मिलेगी।

इस योजना से लाल फीताशाही को खत्म करने के लिए आईटी उपकरणों का इस्तेमाल और कैशलैस लेन-देन को बढ़ावा देने के सरकार के स्वीकृत उद्देश्यों को पूरा करने में मदद मिलेगी।

वर्तमान में यह योजना चार महानगरों दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई में शुरू की गई है। इस शहरों के अनुभव के आधार पर इस योजना को पूरे देश में लागू किया जा सकता है।

राजभाषा विभाग द्वारा ऑनलाइन अनुवाद-प्रशिक्षण प्‍लेटफार्म का लोकार्पण हुआ

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति प्रो. गिरीश्वर मिश्र द्वारा राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन केंद्रीय अनुवाद ब्‍यूरो द्वारा विकसित ऑनलाइन अनुवाद-प्रशिक्षण प्लेटफार्म का आज यहां लोकार्पण किया गया। इस मौके पर राजभाषा विभाग के सचिव श्री प्रभास कुमार झा, संयुक्‍त सचिव डॉ. बिपिन बिहारी सहित केंद्र सरकार के विभिन्‍न मंत्रालयों/उपक्रमों आदि के अधिकारी उपस्थित थे।

दो सत्रों में आयोजित इस कार्यक्रम के प्रथम सत्र में ऑनलाइन अनुवाद-प्रशिक्षण प्लेटफार्म का लोकार्पण किया गया तथा केंद्रीय अनुवाद ब्‍यूरो के निदेशक डॉ. एस एन सिंह द्वारा इस प्‍लेटफार्म से होने वाले लाभ की विस्‍तृत जानकारी दी गई। द्वितीय सत्र में प्रसिद्ध साहित्यकार पद्मश्री डॉ. नरेंद्र कोहली, भाषाविद् और तकनीकी विशेषज्ञ डॉ. ओम विकास, भाषा-विज्ञानी और हंगेरियन तथा हिंदी के प्रसिद्ध अनुवादशास्त्री डॉ. विमलेश कांति वर्मा द्वारा अनुवाद जैसे महत्‍वपूर्ण विषय पर वक्‍तव्‍य दिये गये।

ऑनलाइन अनुवाद-प्रशिक्षण प्‍लेटफार्म के लोकार्पण समारोह को सम्‍बोधित करते हुए प्रो. गिरीश्वर मिश्र ने कहा कि यह एक महत्‍वपूर्ण प्रयास है एवं एक नई पहल है। उन्‍होने कहा कि यह प्‍लेटफार्म सभी को उपलब्‍ध होगा। उन्‍होने कहा कि भारत जैसा देश जहां इतनी भाषाऐं बोली जाती हैं तथा विश्‍व में भी बहुत सी भाषाऐं उपलब्‍ध हैं, अनुवाद ही ऐसा माध्‍यम है जिससे हम विचार सांझा कर सकते हैं। प्रो. गिरीश्वर मिश्र ने कहा कि सरकार की विभिन्‍न योजनाओं की जानकारी भी जनता की भाषा में तथा सरल भाषा में उपलब्‍ध होनी चाहिए। उन्‍होने कहा की अनुवाद के माध्‍यम से इतिहास तथा विभिन्‍न संस्‍कृतियों का ज्ञान संभव है।

इस अवसर पर सम्‍बोधित करते हुए श्री प्रभास कुमार झा ने बताया कि राजभाषा शब्‍दावली का कार्य प्रारम्‍भ हो गया है। उन्‍होने कहा कि यह शब्‍दावली ऑनलाईन और पुस्‍तक के रूप में उपलब्‍ध होगी तथा इस शब्‍दावली में नये-नये शब्‍द भी शामिल किये जायेगें। उन्‍होने कहा कि राजभाषा शब्‍दावली लाखो शब्‍दों का शब्‍दकोष होगा।

इस प्‍लेटफार्म से होने वाले लाभ की विस्‍तृत जानकारी देते हुए डॉ. एस एन सिंह ने कहा कि इस प्‍लेटफोर्म में सरल और सुगम पाठ तैयार किये गए हैं जिससे सभी को लाभ होगा।

इस अवसर पर राजभाषा भारती के 150 वे अंक का विमोचन भी किया गया।

केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो वर्ष 1971 से सरकारी दस्तावेजों का अनुवाद तथा वर्ष 1973 से राजभाषा के कार्यान्वयन से जुड़े अधिकारियों और कर्मचारियों को पारंपरिक रूप से अनुवाद का प्रशिक्षण देने का कार्य करता आ रहा है।

भारत सरकार की “सुशासन: चुनौतियां और अवसर” कार्य योजना के अंतर्गत सरकारी तंत्र में विभिन्न क्षेत्रों के कौशल विकास पर बल दिया गया है। इसी को ध्यान में रखते हुए राजभाषा विभाग (गृह मंत्रालय) ने केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो को “अनुवाद कौशल के विकास” के लिए ‘ऑनलाइन अनुवाद प्रशिक्षण’ के “ई-लर्निंग प्लेटफार्म” तैयार करने का कार्य सौंपा है।

इस प्लेटफार्म का उद्देश्य केंद्र सरकार के कार्यालयों में राजभाषा कार्यान्वयन और अनुवाद कार्य से जुड़े अधिकारियों व कर्मचारियों के अनुवाद कौशल को विकसित करने के लिए अनुवाद का ऑनलाइन प्रशिक्षण देना है। इसके ज़रिए अनुवाद प्रशिक्षण की पहुँच व्यापक और सर्वसुलभ हो सकेगी और सरकारी कामकाज में प्रयुक्त प्रशासनिक शब्दावली और अभिव्यक्तियों के प्रयोग में एकरूपता सुनिश्चित हो सकेगी।

इस कार्य योजना के अंतर्गत, ब्यूरो में एक अनुसंधान एकक की स्थापना की गई है। इस एकक ने अनुवाद प्रशिक्षण के पहले चरण में, प्रशासनिक विषयों से संबंधित दस्तावेजों के अनुवाद के बारे में सरल और सुगम ढंग से पाठ तैयार किए हैं और उन्हें अनुवाद प्रशिक्षण के इच्छुक व्यक्तियों तक ऑनलाइन पहुंचाने का प्रयास किया है। 

इन पाठों में प्रशासन से जुड़े पत्राचार और उनके अनुवाद से संबंधित विषय शामिल हैं। छोटे-छोटे वीडियो के माध्यम से आसान भाषा में प्रशासनिक अनुवाद को समझाया गया है। इसके साथ ही, कुछ पाठों को प्रश्नोत्तरी के रूप में भी तैयार किया गया है। इन पाठों के माध्यम से इच्छुक प्रशिक्षार्थी प्रशासनिक विषयों के अनुवाद की बारीकियों को जानकर, इस क्षेत्र में अपने कौशल को निखार सकेंगे।

इस शृंखला के अंतर्गत भारत सरकार के मंत्रालयों/विभागों और कार्यालयों में प्रयुक्त होने वाली प्रशासनिक भाषा और उसके अनुवाद से संबंधित 21 पाठ तैयार किए गए हैं :-

अनुवाद प्रशिक्षण : परिचय, अनुवाद क्या है? अनुवाद कैसे करें? अनुवाद के सिद्धांत - पारंपरिक और आधुनिक दृष्टिकोण, अनुवाद क्या करें? अनुवाद में सहायक उपकरण, प्रशासनिक भाषा और शब्दावली, प्रशासनिक भाषा और अनुवाद, वैज्ञानिक और तकनीकी अनुवाद की समस्याएं, प्रशासनिक पत्र व्यवहार के प्रकार और उनका अनुवाद, प्रशासनिक अनुवाद में प्रयुक्त शब्दों के सूक्ष्म भेद, अर्द्ध-सरकारी पत्र और अंतर्विभागीय टिप्पणियां, जनसंपर्क के लिए प्रयुक्त दस्तावेजों, और फॉर्मों का अनुवाद, आदेश और कार्यालय आदेश का अनुवाद, टिप्पणी लेखन और अनुवाद, मुहावरों और लोकोक्तियों का अनुवाद, अनुवाद-पुनरीक्षण, मूल्यांकन और समीक्षा, व्यतिरेकी विश्लेषण और अनुवाद, हिंदी – अंग्रेजी वाक्य संरचना और अनुवाद, अनुवाद में सृजनशीलता, प्रयुक्ति की संकल्पना और अनुवाद।


#CRPF जवानों की हत्या पर मानवाधिकार कार्यकर्ता खामोश क्यों ? : वेंकैया नायडू

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सूचना एवं प्रसारण मंत्री श्री वेंकैया नायडू का बयान – सुकमा में सीआरपीएफ जवानों की कायरतापूर्ण हत्या पर मानवाधिकार कार्यकर्ता खामोश क्यों ?

24 अप्रैल, 2017 को छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में विकास कार्यों के लिए सड़कों को सुरक्षित बनाने के काम में लगे सीआरपीएफ जवानों की कायरतापूर्ण हत्या से राष्ट्र सदमे में है। अन्य कई घायल हुए हैं। भूमिगत उग्रवादी तत्वों द्वारा की जाने वाली इस तरह की कायरतापूर्ण कार्रवाई अत्यंत निंदनीय है।

सीआरपीएफ के जो जवान मारे गए और घायल हुए हैं वे देश की जनता की सेवा कर रहे थे और उन्होंने अपने जीवन को न्यौछावर कर दिया। राष्ट्र के लिए यह सर्वोच्च बलिदान है। वर्दी पहने हुए जो समर्पित जवान मारे गए और घालय हुए हैं उनके परिवारों के प्रति केंद्र और राज्य सरकार पूरी तरह से समर्पित हैं। केंद्र और राज्य सरकार पूरी दृढ़ता के साथ काम करती रहेंगी और इस तरह की हिंसात्मक कार्रवाइयों को समाप्त करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

पूरा राष्ट्र इस हत्या और हिंसा से सदमे में है, लेकिन कल से ही मानवाधिकार के तथाकथित हितैषी और आवाज उठाने वाले लोग चुप्पी साधे हुए हैं। अगर पुलिस द्वारा किसी आंतकवादी या उग्रवादी को मारा जाता तो ये कार्यकर्ता आवाज उठाते और हिंसात्मक प्रतिक्रिया करते। लेकिन, बड़ी संख्या में जवानों और निर्दोष लोगों को जब ऐसे लोग मारते हैं तब मानवाधिकार के कार्यकर्ता चुप्पी ओढ़ लेते हैं।

क्या मानवाधिकार केवल उन लोगों के लिए है जो अपनी अप्रासंगिक विचार धाराओं को आगे बढ़ाने के लिए हिंसा का सहारा लेते हैं? क्या मानवाधिकार सुरक्षाकर्मियों और साधारण लोगों के लिए नहीं है?

जब गैर कानूनी तत्व इस तरह की अमानवीय हरकत करते हैं, तो मानवाधिकार कार्यकर्ता क्यों खामोश हो जाते हैं?

मैं यह कहना चाहता हूं कि इस तरह की हिंसात्मक गतिविधियों को मानवाधिकार की वकालत करने वाले तथाकथित कार्यकर्ताओं का मौन समर्थन प्राप्त है। ऐसी कार्रवाई हताशा में की जाती है ताकि केंद्र और राज्य सरकार के विकास कार्यों का सकारात्मक प्रभाव रोका जा सके और तेज आर्थिक विकास का लाभ गरीबों तक न पहुंच पाए।

इस बात की अत्यंत आवश्यकता है कि प्रतिबंधित तत्वों और तथाकथित मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की हिंसात्मक गतिविधियों के विरूद्ध मजबूत जनभावना बनायी जाए। ऐसे तत्व दोहरे मानदंड वाले हैं और राष्ट्र विरोधी गतिविधियों का शिकार होने वाले सुरक्षाकर्मियों, उनके परिजनों और निर्दोष व्यक्तियों के लिए यह मानवाधिकार की बात नहीं करते। 

पलटवार : भारतीय हैकर्स ने पाकिस्तान की 500 से ज्यादा वेबसाइट हैक कीं

भारतीय हैकर्स ने पाकिस्तान की 500 से ज्यादा वेबसाइट हैक कीं

कथित भारतीय हैकर्स ने पाकिस्तान की 500 से ज्यादा वेबसाइट हैक कीं. भारतीय हैकर्स ने रैंजमवेयर के जरिए पाकिस्तान की वेबसाइट हैक कीं. हैकर्स ने पाकिस्तान की 'पाकिस्तान पीपल्स पार्टी' की वेबसाइट भी हैक करने का दावा किया है. इससे कुछ घंटे पहले ही पाकिस्तानी हैकर्स ने भारत की टॉप यूनिवर्सिटी के अकाउंट हैक किए थे.

भारत के कथित हैकर ग्रुप ने पाकिस्तान की 500 से ज्यादा वेबसाइट्स हैक करने का दावा किया है. इनमें वो वेबसाइट्स भी शामिल हैं जो HTTPS से सिक्योर हैं.

हैक की गईं वेबसाइट्स में से ज्यादातर वेबसाइट पाकिस्तान सरकार के अधीन आती हैं. दावा किया गया है कि टीम इंडियन ब्लैक हैट नाम के एक ग्रुप ने हैकिंग को अंजाम दिया. हालांकि हैक्ड वेबसाइट के होम पेज पर टीम केरला साइबर वॉरियर्स लिखा हुआ है.

'पाकिस्तान पीपल्स पार्टी' की वेबसाइट भी हैक:

हैकर्स ने पाकिस्तान की 'पाकिस्तान पीपल्स पार्टी' की वेबसाइट भी हैक करने का दावा किया है. इन वेबसाइट में वहां के सरकारी शिक्षण वेबसाइट्स भी शामिल हैं. इसके अलावा ट्रेड वेबसाइट्स और रुरल डेवेलपमेंट वेबसाइट्स भी शामिल हैं.

हमने हैकर ग्रुप से बात की तो उन्होंने बताया है कि ये सिर्फ एक ग्रुप ने नहीं किया है बल्कि कई ग्रु ने मिलकर किया है. इसमें Luzsecind, team black hats और United Indian hackers जैसे ग्रुप्स शामिल हैं. इनका कहना है कि आने वाले समय में वहां कि और भी वेबसाइट्स को हैक किया जाएगा.

ये कोई आम हैकिंग नहीं है. बल्कि इन्होंने रैंजमवेयर का इस्तेमाल किया है. रैंजमवेयर का मतलब वेबसाइट को हैकर के कब्जे से छुड़ाने के लिए पैसे देने होते हैं. इसके लिए वेबसाइट पर हैकर्स के फेसबुक पेज की डीटेल्स हैं जहां से वो पैसे के लेन देन की बात करेंगे.

हैक की गई वेबसाइट को देखकर लगता है कि केरल साइबर वॉरियर ने किया है. यहां एक बॉक्स है जिसमें Key डालने को कहा जा रहा है. आम तौर पर हैकर रैंजम मनी लेने के बाद एक Key देते हैं जिससे वेबसाइट को वापस लिया जा सकता है.

10 भारतीय यूनिवर्सिटी की वेबसाइट की थीं हैक:

मंगलवार को दिन के वक्त पाकिस्तानी हैकर्स ने भारत की 10 यूनिवर्सिटीज की वेबसाइट हैक की थीं. हैक की गई वेबसाइट्स में आईआईटी दिल्ली, आईआईटी भुवनेश्वर, दिल्ली यूनिवर्सिटी, नेशनल एयरोस्पेस लैबोरैट्रीज और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की वेबसाइट शामिल हैं. हैकर्स ने इन वेबसाइट्स को हैक करके उन पर पाकिस्तान जिंदाबाद लिखा था. इसके अलावा कश्मीर के बारे में भी लिखा गया था. हैक की गई वेबसाइट्स में ज्यादातर आर्मी और डिफेंस से जुड़ी शिक्षण संस्थान शामिल हैं. इन वेबसाइट्स की हैकिंग का दावा पाकिस्तान के PHC ग्रुप ने किया है.

मालेगांव विस्फोट मामले में साध्वी प्रज्ञा को 9 साल बाद मिली जमानत


बंबई उच्च न्यायालय ने 2008 मालेगांव बम विस्फोट की साजिश रचने में कथित तौर पर फँसाई गई साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को आज जमानत दे दी लेकिन सह आरोपी और पूर्व ले. कर्नल प्रसाद पुरोहित को कोई राहत देने से इनकार कर दिया।  

अदालत ने साध्वी को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को अपना पासपोर्ट सौंपने और सबूतों से छेड़छाड़ नहीं करने का निर्देश दिया है। उसे यह भी निर्देश दिया गया है कि जब भी जरूरत हो वह एनआईए अदालत में रिपोर्ट करे।

न्यायमूर्ति रंजीत मोरे और न्यायमूर्ति शालिनी फनसाल्कर जोशी की खंड पीठ ने कहा, 'साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की अपील मंजूरी दी जाती है। याची (साध्वी) को पांच लाख रुपए की जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया जाता है। प्रसाद पुरोहित की ओर से दायर अपील को खारिज किया जाता है।'

न्यायमूर्ति मोरे ने कहा कि हमने अपने आदेश में कहा है कि पहली नजर में साध्वी के खिलाफ कोई मामला नहीं बनता है।

गौरतलब है कि 29 सितंबर 2008 को मालेगांव में एक बाइक में बम लगाकर विस्फोट किया गया था जिसमें आठ लोगों की मौत हुई थी और तकरीबन 80 लोग जख्मी हो गए थे। साध्वी और पुरोहित को 2008 में गिरफ्तार किया गया था और तब से वे जेल में हैं।     

राष्ट्रपति और मंत्रियों का हिंदी में भाषण देना अनिवार्य नहीं : वेंकैया नायडू


सूचना और प्रसारण मंत्री श्री वेंकैया नायडू का वक्तव्य – हिंदी थोपने के आरोप निराधार 

‘मुझे कुछ समाचार पत्रों में छपी कुछ रिपोर्टों को पढ़कर दुख हुआ है। इन खबरों में डीएमके नेता श्री एन. के. स्टालिन का हवाला देते हुए आरोप लगाया गया है कि केंद्र सरकार हिंदी थोप रही है।

श्री स्टालिन का हवाला देते इन खबरों में कहा गया कि संसदीय समिति (राजभाषा) ने हिंदी जानने वाले संसद सदस्यों और केंद्रीय मंत्रियों के लिए भाषणों और लेखों में हिंदी के उपयोग को अनिवार्य बनाने का प्रस्ताव किया। खबरों में आगे आरोप लगाया गया है कि इस संबंध में अध्यादेश जारी किया गया है यानी सरकार हिंदी थोप रही है।

मैं स्पष्ट करना चाहूंगा कि पूर्व गृह मंत्री श्री पी. चिदम्बरम के नेतृत्व में राजभाषा पर संसदीय समिति ने निम्नलिखित सिफारिश की और सिफारिश को 2 जून, 2011 को माननीय राष्ट्रपति को भेजा गया : - 

‘यह समिति हिंदी बोलने और पढ़ने वाले उच्च राजनीतिक पदों पर आसीन व्यक्तियों से अपने भाषण/ वक्तव्य हिंदी में देने का अनुरोध करती है। इस श्रेणी में माननीय राष्ट्रपति और सभी मंत्री आते हैं।

वर्तमान सरकार ने 31 मार्च, 2017 को इस सिफारिश को अधिसूचित किया।

यह दिखाता है कि राजभाषा पर संसदीय समिति के सुझाव का स्वभाव सिफारिशी है और अनिवार्य नहीं है। इस संबंध में अध्यादेश जारी करने का आरोप पूरी तरह निराधार और शरारतपूर्ण है।

याद रहे कि 2011 में डीएमके पार्टी भारत सरकार की सदस्य थी। उसी समय यह सिफारिश की गई और माननीय राष्ट्रपति को संसदीय समिति द्वारा सिफारिश भेजी गयी।

भारत सरकार का किसी भी व्यक्ति पर कोई भाषा थोपने की मंशा नहीं है’

सरकार का स्पष्टीकरण : ताजमहल में धार्मिक चिन्ह ले जाने पर कोई रोक नहीं

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ताजमहल देखने आने वालों की पोशाक अथवा दुपट्टे, गमछे जैसे कपड़ों पर रंग अथवा कुछ धार्मिक नाम-प्रतीक लिखे होने पर उनके प्रवेश पर किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं 

समाचार पत्रों और दृश्य मीडिया के माध्यम से यह समाचार प्रकाशित और प्रसारित हो रहा है कि १९ अप्रैल २०१७ को ताज महल देखने आयी महिला पर्यटकों को राम नाम लिखे भगवा दुपट्टे उतरवा कर ही अन्दर जाने दिया गया था। 

प्रश्नगत विषय में सी.आई.एस.एफ के सुरक्षा कर्मियों तथा अधीक्षण पुरातत्त्वविद, भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण, आगरा से प्रतिवेदन प्राप्त किए गए हैं। प्राप्त रिपोर्टों के अनुसार उपर्युक्त कार्यवाही सी.आई.एस.एफ के किसी सुरक्षा कर्मी अथवा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के किसी कर्मी द्वारा नहीं की गयी है। इस विषय में समाचार में उद्धृत नियमावली में ऐसा करने का कोई प्रावधान नहीं है और न ही इस आशय का कोई परिपत्र भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण द्वारा परिचालित किया गया है, अथवा लागू है। कमांडेंट, सी.आई.एस.एफ ने यह भी अवगत कराया है कि सुरक्षा की दृष्टि से सिगरेट, लाइटर, च्युइंगम, चॉकलेट इत्यादि सरकारी लॉकर में जमा कराए गए थे लेकिन स्कार्फ/ दुपट्टा नहीं उतरवाया गया था। इससे सम्बंधित सी.सी. टी. वी. फूटेज उनकी अभिरक्षा में है। सी.सी. टी. वी. फूटेज में यह स्पष्ट है कि रामनाम लिखे भगवा दुपट्टे पहने महिला पर्यटक को ताज महल परिसर में प्रविष्टि मिली है। 

अधीक्षण पुरातत्त्वविद, भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण, आगरा ने पुष्टि की है कि टी. वी. चैनलों पर दिखाए जा रहे विचाराधीन घटना से सम्बंधित वीडियो में दिख रहे दुपट्टे उतरवाने वाले व्यक्ति ना तो भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के कर्मी हैं और ना सी.आई.एस.एफ के। प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि ये व्यक्ति उक्त पर्यटकों के साथ के ही कोई व्यक्ति (गाइड अथवा उनका कोई सहयोगी) हो सकते हैं। इस बारे में अलग से जांच भी की जा रही है। स्थानीय पुलिस को भी इस सम्बन्ध में जांच करने के निर्देश दिए जा चुके हैं। 

ताजमहल देखने आने वालों की पोशाक अथवा दुपट्टे, गमछे जैसे कपड़ों पर रंग अथवा कुछ धार्मिक नाम-प्रतीक लिखे होने पर उनके प्रवेश पर भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण द्वारा किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं लगाया गया है। 

अनुसूचित जातियों,अन्य पिछड़े वर्गों के विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति अब डिजिटल माध्यम से


अनुसूचित जातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के 3.54 करोड़ विद्यार्थियों को डिजिटल भुगतान के अंतर्गत 14 छात्रवृत्ति योजनाओं का लाभ 

अनुसूचित जातियों और अन्य पिछड़े वर्गों (अपिव)/विमुक्त, घुमंतु और अर्द्ध-घुमंतु जातियों के विद्यार्थियों के लिए 14 स्कालरशिप योजनाएं डिजिटल भुगतान के अंतर्गत संचालित की जा रही हैं, जिनका लाभ 3.54 करोड़ विद्यार्थियों को मिल रहा है। छात्रवृत्ति की समस्त राशि विद्यार्थियों के बैंक खातों में अंतरित की जा रही है और अजा विद्यार्थियों के 60 प्रतिशत बैंक खाते आधार से जुड़े हुए हैं। उन्होंने बताया कि छात्रवृत्तियों, विद्यार्थियों के लिए छात्रावासों, प्रशिक्षण सुविधाओं, परिसरों,संस्थानों के निर्माण/उन्नयन के लिए पूंजी प्रदान करने आदि उपायों के जरिए अनुसूचित जातियों से सम्बद्ध विद्यार्थियों का शैक्षिक सशक्तिकरण किया जा रहा है। यह जानकारी केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री श्री थावर चंद गहलोत ने “प्रमुख सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों” के बारे में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में दी। 

सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय अलग अलग तरह की सात छात्रवृत्तियां कार्यान्वित करता है, जिनमें मैट्रिक-परवर्ती और मैट्रिक-पूर्ववर्ती छात्रवृत्तियां, टॉप क्लास स्कालरशिप, राष्ट्रीय विदेश अध्ययन छात्रवृत्ति, अनुसूचित जातियों के लिए यूजीसी द्वारा संचालित राष्ट्रीय फेलोशिप, अस्वच्छ व्यवसायों में लगे व्यक्तियों के बच्चों के लिए प्री-मैट्रिक स्कालरशिप, अनुसूचित जातियों और अपिव के लिए निशुल्क कोचिंग (70 : 30 अनुपात में) और योग्यता उन्नयन छात्रवृत्तियां शामिल हैं। भारत सरकार का यह विश्वास है कि सब के लिए शिक्षा सशक्तिकरण की कुंजी है। सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय अपने बजट का करीब 54 प्रतिशत अनुसूचित जातियों के लिए छात्रवृत्तियों पर खर्च करता है। 

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की प्रत्‍येक शाखा को वित्‍त मंत्रालय द्वारा एक उद्यमी के रूप में कम से कम एक अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति के युवक की सहायता करने की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है जिससे कि उनके बीच अधिक रोजगार का सृजन किया जा सके। 

#EarthDay (पृ़थ्‍वी मातृ दिवस) पर विशेष लेख : भारत की पहल


पृथ्वी मातृ को बचाने के लिए भारत की पहल 

पृ़थ्‍वी मातृ दिवस, 22 अप्रैल, 2017


संयुक्त राष्ट्र 22 अप्रैल को एक विशेष दिवस के रूप में पृथ्वी मातृ दिवस मनाता है। 1970 में 10000 लोगों के साथ प्रारंभ किये गये इस दिवस को आज 192 देशों के एक अरब लोग मनाते  हैं। इसका बुनियादी उद्देश्य पृथ्वी की रक्षा और भविष्य में पीढ़ियों के साथ अपने संसाधनों को साझा करने के लिए मनुष्यों को उनके दायित्व के बारे में जागरूक बनाना है।

2017 के विषय "पर्यावरण और जलवायु साक्षरता" का उद्देश्य पृथ्वी माँ की रक्षा के लिए आम लोगों में इस मुद्दे के प्रति जानकारी को और सशक्त बनाया और उन्हें प्रेरित करना है।

आईपीसीसी (जलवायु परिवर्तन पर अंतर्राष्ट्रीय पैनल) के मुताबिक भारत जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के मामले में सबसे कमजोर है जो स्वास्थ्य, आर्थिक विकास और खाद्य सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।

जलवायु परिवर्तन की इस चुनौती के समाधान के लिए भारत ने 'राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित अंशदान (आईएनडीसी): जलवायु न्याय की दिशा में कार्य करने' के उद्देश्य से एक व्यापक योजना विकसित की है। इस दस्तावेज़ में इस मुद्दे के समाधान के लिए समग्र रूप से अनुकूलता के घटक, शमन, वित्त, हरित प्रौद्योगिकी और क्षमता निर्माण को शामिल किया गया है। इन लक्ष्‍यों के क्रियान्वयन के दौरान, विकासशील देशों के लिए स्थायी विकास और गरीबी उन्मूलन को प्राप्त करने के अधिकार के लिये न्यायोचित कार्बन उपयोग का भी आहवान किया गया है।

2030 तक 33 से 35 प्रतिशत तक कार्बन उत्सर्जन कम करने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए कई पहलों के माध्यम से अक्षय ऊर्जा हेतु 3500 मिलियन या 56 मिलियन अमरीकी डॉलर से 'राष्ट्रीय अनुकूलन कोष' के गठन से नीतियों की पहल की जायेगी।

इसका मुख्य केन्‍द्र बिन्‍दु वायु, स्वास्थ्य, जल और सतत कृषि की पुनः परिकल्‍पना के अतिरिक्त अभियान के साथ जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्यवाही (एनएपीसीसी) के अतंर्गत राष्ट्रीय अभियानों को फिर से प्रारंभ करना है।  

अनुकूलन रणनीति का उपयोग भूमि और जल संसाधन के स्थायी उपयोग के लिए किया जाता है। देश भर में मृदा स्वास्थ्य कार्ड के क्रियान्वयन, जलशोधन और जल कुशल सिंचाई कार्यक्रम के उपयोग से जोखिम रहित कृषि की दिशा का मार्ग प्रशस्त होगा। जलवायु परिवर्तन संबंधी आपदाओं से किसानों को बचाने की दिशा में फसलों का कृषि बीमा एक और महत्वपूर्ण पहल है।

2022 तक नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता को 35 गीगावॉट (गीगा वाट) से 175  गीगावॉट तक बढ़ाने के द्वारा स्वच्छ और हरित ऊर्जा का निर्माण शमन रणनीतियों में शामिल है। सौर ऊर्जा में पांच गुना वृद्धि के साथ इसे 1000 गीगावॉट तक बढ़ाना के लक्ष्य के साथ राष्ट्रीय सौर मिशन के अतिरिक्त देश भर में बिजली पारेषण और वितरण की दक्षता बढ़ाने के लिए स्मार्ट पावर ग्रिड को भी विकसित करना है। 10 प्रतिशत ऊर्जा खपत को बचाने हेतु ऊर्जा की खपत को रोकने के लिए ऊर्जा संरक्षण की दिशा में एक राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू किया गया है।

हालांकि ये जलवायु परिवर्तन के मुद्दे के समाधान की दिशा में सूक्ष्म स्तर की नीतियां हैं,  लेकिन भारत सरकार ने ऐसी सूक्ष्म परियोजनाओं की शुरुआत की है, जो न सिर्फ ऊर्जा बचाने के लिए महत्वपूर्ण हैं बल्कि सबसे गरीब समूहों के प्रत्यक्ष लाभ में भी योगदान कर रही हैं।

नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के तहत, उजाला योजना का शुभारंभ किया गया है जिसके अंर्तगत 22.66 करोड़ एलईडी बल्ब वितरित किए गए हैं इससे न सिर्फ 11776 करोड़ रुपये की बचत होगी बल्कि यह प्रतिवर्ष कार्बन उत्सर्जन में भी 24 मीट्रिक टन की कमी लाएगी।

इसी प्रकार से, बीपीएल कार्ड रखने वाली महिलाओं को पेट्रोलियम मुक्त एलपीजी कनेक्शन दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना पहले से ही 2 करोड़ घरों तक पहुंच चुकी है और इसे 2019 तक 8 करोड़ रूपए के परिव्यय के साथ 5 करोड़ घरों तक पहुंचाने का लक्ष्य है।

इसके उपयोग से ग्रामीण महिलाओं पर सीधे प्रभाव पड़ता है, इससे स्वच्छ ऊर्जा स्रोत तक न सिर्फ आसान पहुँच प्रदान करता है बल्कि उनके स्वास्थ्य में सुधार होता है और इसके साथ-साथ वन संसाधनों पर दबाव कम होने के अलावा कार्बन उत्सर्जन भी कम होता है।

स्वच्छ भारत मिशन की एक और रणनीति शहरी क्षेत्रों में अपशिष्ट से ऊर्जा पैदा करने की पहल भी है। इसी तरह देश भर में 816 सीवेज उपचार संयंत्रों में पुर्नचक्रण के माध्यम से अपशिष्ट जल का पुन: उपयोग करके प्रतिदिन 23,277 मिलियन लीटर पानी को स्वच्छ बनाना एक और पहल है।

बंजर भूमि का पुनरुद्धार करके वन की गुणवत्ता को बढ़ाने तथा 5 मिलियन हेक्टेयर भूमि को वन क्षेत्र में बदलने के वार्षिक लक्ष्य के साथ हरित भारत मिशन एक और पहल है जिससे प्रतिवर्ष 100 मिलियन टन कार्बन को कम किया जाएगा।

पारंपरिक भारतीय संस्कृति ने मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व की आवश्यकता पर जोर दिया है। "वसुदेव कुटंबकम" की अवधारणा के साथ पृथ्वी पर सभी जीव रूपों को एक परिवार माना जाता है और यह एक दूसरे पर निर्भरता की अवधारणा को मजबूत करता है। आधुनिक दुनिया में पृथ्वी मातृ दिवस के आगमन से पहले, वेद और उपनिषदों ने धरती को हमारी मां और मानव को बच्चों के रूप में माना है। जलवायु परिवर्तन के संकट के आगमन से पहले, हमारे पूर्वजों ने पर्यावरणीय स्थिरता की अवधारणा पर विचार किया और पृथ्वी को सुरक्षित बनाने के लिए भविष्य की पीढ़ियों तक इसे पहुँचाने का कार्य भी किया।

संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए उस वक्तव्य का स्मरण करना उचित होगा, जिसमें उन्होंने कहा कि, "हमें तकनीकी, नवीनता और वित्त पोषण के साथ सभी की पहुंच तक सस्ती, स्वच्छ और अक्षय ऊर्जा हेतु एक वैश्विक सार्वजनिक साझेदारी बनानी चाहिए। हमें अपनी जीवन शैली में समान रूप से बदलावों को देखना चाहिए जिससे ऊर्जा पर हमारी निर्भरता कम की जा सके और हमारे उपभोग अधिक दीर्घकालीन हों। यह एक वैश्विक शिक्षा कार्यक्रम को प्रारंभ करने के समान ही महत्वपूर्ण है जो हमारी धरती मां के संरक्षण और इसकी रक्षा के लिए हमारी अगली पीढ़ी को तैयार करता है।"

इस प्रकार से, यह पर्यावरण और जलवायु साक्षरता के माध्यम से ही संभव है, जिसके परिणामस्वरूप जीवन शैली में परिवर्तन से वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन में कमी लाकर हम पृथ्वी माँ को बचा सकते हैं।

 - पांडुरंग हेगड़े

राष्ट्रीय जलमार्ग -1 विकसित करने के लिए विश्व बैंक देगा 375 मिलियन डॉलर


देश की महत्वाकांक्षी जलमार्ग परियोजना को आगे बढ़ाने और नियत समय में इसे पूरा करने की दिशा में जलमार्ग विकास परियोजना के अंतर्गत राष्ट्रीय जलमार्ग -1 (National Waterway -1) की क्षमता में वृद्धि करने के लिए विश्व बैंक ने 375 मिलियन डॉलर की धनराशि को मंज़ूरी दी है।

सरकार हल्दिया से लेकर वाराणसी (1390 किलोमीटर) तक जलमार्ग विकास परियोजना के अंतर्गत 5369 करोड़ रुपये की लागत से एनडब्ल्यू-1 (गंगा नदी) को विकसित कर रही है। इस परियोजना को पूरा करने के लिए विश्व बैंक से तकनीकी एवं वित्तीय सहायता ली जा रही है। यह परियोजना 1500-2000 डीडब्ल्यूटी की क्षमता वाले जहाजों के व्यावसायिक नेविगेशन को सक्षम करेगी।

परियोजना के अंतर्गत, वाराणसी (उत्तर प्रदेश), साहिबगंज (झारखंड) और हल्दिया (पश्चिम बंगाल) में तीन बहुआयामी टर्मिनल स्थापित किए जाएंगे। वहीं दूसरी ओर कालुघाट और गाज़ीपुर में दो अंतर-मॉडल टर्मिनल, पांच रॉल ऑफ रॉल ऑन टर्मिनल (आरओ-आरओ), वाराणसी, पटना, भागलपुर, मुंगेर, कोलकाता और हल्दिया में नौका सेवा का विकास, और पोत मरम्मत और रख-रखाव की सुविधाएं विकसित की जाएंगी।

वाराणसी एवं साहिबगंज में बहु-मॉडल टर्मिनल और फरक्का में नवीन नेविगेशन लॉक को निर्मित करने के लिऑए अनुंबध किए जा चुके हैं, और इन साइटों पर काम शुरू किया जा चुका है, जबकि हल्दिया में बहु-आयामी टर्मिनल का निर्माण कार्य जल्द ही शुरू किया जाएगा। साहिबगंज में बनने वाले बहु-आयामी टर्मिनल की आधारशिला 06 अप्रैल 2017 को प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने रखी थी। अगस्त 2016 में सड़क परिवहन, राजमार्ग और जहाज़रानी मंत्री श्री नितिन गडकरी ने वाराणसी में बनाए जाने वाले बहु-आयामी टर्मिनल की आधारशिला रखी थी।

इसके अतिरिक्त, यह परियोजना भारत में पहली बार एनडब्ल्यू-1 पर गंगा सूचना सेवा प्रणाली को स्थापित करने के लिए आईडब्ल्यूए को सक्षम करेगी। नदी सूचना प्रणाली (आरआईएस) उपकरण, हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर आधारित सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) संबंधित सेवाएं हैं, जिसे अंतर्देशीय नेविगेशन में यातायात और परिवहन प्रक्रियाओं को अनुकूलित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

राष्ट्रीय जलमार्ग – 1 राष्ट्रीय महत्व का जलमार्ग है, जो उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल से होकर गुजरता है। यह इलाहाबाद, वाराणसी, गाज़ीपुर, भागलपुर, पटना, हावड़ा, हल्दिया और कोलकाता के प्रमुख शहरों सेवा में अग्रसर है और गंगा से सटे क्षेत्रों की औद्योगिक ज़रूरतों को पूरा करने में योगदान देता है। इस क्षेत्र में रेल और सड़क गलियारे काफी अधिक भरे हुए हैं। इसलिए, एनडब्ल्यू -1 का विकास, परिवहन के एक वैकल्पिक, व्यवहार्य, आर्थिक, कुशल और पर्यावरण-अनुकूल तरीके की सुविधा प्रदान करेगा।

सरकार ने वाहनों से सभी तरह की बत्तियां हटाने का फैसला किया

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देश में स्‍वस्‍थ लोकतांत्रिक मूल्‍यों को सशक्‍त बनाने के उद्देश्‍य से केंद्र सरकार ने आज एक और ऐतिहासिक कदम उठाया। प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी की अध्‍यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में देश में सभी श्रेणियों के वाहनों के ऊपर लगी सभी तरह की बत्तियां हटाने का फैसला किया। 

सरकार का स्‍पष्‍ट मानना है कि वाहनों पर लगी बत्तियां वीआईपी संस्‍कृति का प्रतीक मानी जाती हैं और लोकतांत्रिक देश में इसका कोई स्‍थान नहीं है। उनका कुछ भी औचित्‍य नहीं है। 

हालांकि आपातकालीन और राहत सेवाओं, एम्‍बुलेंस, अग्नि शमन सेवा आदि से संबंधित वाहनों पर बत्तियों लगाने की अनुमति होगी। इस फैसले को ध्‍यान में रखते हुए सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय कानून में आवश्‍यक प्रावधान करेगा।

गर्मियों में सुविधाजनक यात्रा के लिए रेलवे ने उठाये ये विशेष कदम


इस गर्मी के मौसम में सुविधाजनक यात्रा प्रदान करने के उद्देश्य से भारतीय रेलवे ने कई नई पहल की है 

रेलवे ने यात्रियों को अच्छी यात्रा की सुविधा प्रदान करने हेतु, भारतीय रेलवे ने यात्रियों के लिए कई कदम उठाये हैं। गर्मियों के दौरान पीक सीजन होने के कारण भारतीय रेलवे ने यात्रियों को सुविधाजनक यात्रा की पेशकश करने की तैयारी की है।


उपलब्ध स्थान का ज्यादा-से-ज्यादा उपयोग सुनिश्चित करने के उद्देश्य से भारतीय रेलवे ने निम्नलिखित पहल की है:-   

i) ट्रेन के प्रस्थान करने से 4 घंटे पूर्व पहले आरक्षण चार्ट को अंतिम रूप देना।
   
ii) पहला आरक्षण चार्ट तैयार हो जाने के बाद, दूसरा आरक्षण चार्ट तैयार होने तक वर्तमान टिकट बुकिंग सुविधा टिकट खिड़की तथा इंटरनेट दोनों माध्यमों से प्रदान करना।  
iii) दूसरा आरक्षण चार्ट तैयार होने के बाद उपलब्ध स्थानों (सीटों) का हस्तान्तरण अगले दूरवर्ती स्थान के टिकट के लिए करना।  

iv) निम्नलिखित सुविधाएं आईआरसीटीसी वेबसाइट के माध्यम से भी ऑनलाइन प्रदान की जाती हैं:

अ) जिन यात्रियों का टिकट प्रतीक्षा सूची में रह जाएगा उन्हें बिना किसी अतिरिक्त भार के दूसरे ट्रेन में विकल्प योजना के तहत स्थान उपलब्ध कराया जाएगा। यह सुविधा उन यात्रियों के लिए भी लागू होगी जिन्होंने अपना ई-टिकट 1 अप्रैल 2017 से पहले बुक कराया है।

ब) वैसे यात्री जिन्होंने अपना टिकट बुकिंग खिड़की से आरक्षित (बुक) कराया है वे भी आईआरसीटीसी की वेबसाइट या 139 के माध्यम से आरक्षित टिकट रद्द करा सकते हैं।

स) ई-टिकट वाले यात्री आईआरसीटीसी की वेबसाइट के माध्यम से ट्रेन प्रस्थान करने से 24 घंटे पूर्व बोडिंग स्थान भी बदल सकते हैं।      

द) व्हील चेयर के ऑनलाइन बुकिंग की सुविधा यात्रियों को मुफ्त में मुहैया कराई जाएगी।

य) आईआरसीटीसी की वेबसाइट के माध्यम से रिटायरिंग कक्षों की ऑनलाइन बुकिंग की सुविधा की शुरूआत की गई है।  

र) आईआरसीटीसी की वेबसाइट के माध्यम से डिस्पोजेबल बेडरोल्स खरीद जा सकते हैं।

ल) यात्रियों के लिए उपलब्ध भोजन के विकल्प को बढ़ाने हेतु ई-कैटरिंग की सुविधा की शुरूआत की गई है।  

#HIV #AIDS से संक्रमित लोगों को समान अधिकार के लिए विधेयक पास

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संसद ने एचआईवी एवं एड्स संक्रमित लोगों को उपचार कराने एवं उनके प्रति किसी भी प्रकार के भेदभाव को रोकने हेतु समान अधिकार सुनिश्चित करने के लिए एक महत्वपूर्ण विधेयक पारित किया है। लोकसभा द्वारा इस वर्ष 11 अप्रैल को एवं राज्यसभा द्वारा 21 मार्च को ह्यूमन इम्युनोडेफिसिएंसी वायरस (एचआईवी) एवं एक्वॉर्ड इम्युन डेफिसिएंसी सिंड्रम-एड्स (रोकथाम एवं नियंत्रण) विधेयक, 2017 पारित किया गया।

भारत में एचआईवी संक्रमण पहली बार 1986 में चेन्नई में महिला सेक्स वर्करों के बीच पाया गया। हालांकि पिछले दशक के दौरान एचआईवी की व्याप्ति में लगातार कमी आती जा रही है, फिर भी भारत अभी भी दक्षिण अफ्रीका एवं नाइजीरिया के बाद दुनिया में एचआईवी महामारी से ग्रसित तीसरा सबसे बड़ा देश है। भारत में अभी हाल में पारित किया गया एचआईवी विधेयक दक्षिण एशिया में अपनी तरह का पहला विधेयक है। दक्षिण अफ्रीका एवं नाइजीरिया ने भी भेदभाव के कुछ रूपों को प्रतिबंधित करते हुए कानून पारित किए हैं। भारत में एचआईवी से ग्रसित लोगों की अनुमानित संख्या लगभग 21 लाख है। भारत में 2015 में लगभग 86 हजार नए एचआईवी संक्रमण दर्ज किए गए जो कि वर्ष 2000 की तुलना में 66 प्रतिशत गिरावट को प्रदर्शित करता है। 2015 में एड्स से संबंधित बीमारियों से लगभग 68 हजार लोगों की मौत हुई। यह विधेयक नए संक्रमणों पर अंकुश लगाते हुए राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम को समर्थऩ देगा एवं 2030 तक इस महामारी को समाप्त करने के सतत विकास लक्ष्य अर्जित करने में मदद करेगा।

देश में ऐसे कानून की आवश्यकता के पीछे एक मुख्य वजह यह थी कि एचआईवी/एड्स को एक प्रकार के सामाजिक कलंक एवं भेदभाव की दृष्टि से देखा जाता है। हालांकि सरकार के प्रयासों एवं सिविल सोसायटी के योगदान की वजह से इस भेदभाव में बहुत कमी आई है पर अभी भी यह भेदभाव बना हुआ है। नया कानून इस भेदभाव को समाप्त करने में काफी कारगर साबित होगा। यह विधेयक भेदभाव की व्याख्या रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं, अचल संपत्ति को किराये पर देने या वहां निवास करने, सार्वजनिक या निजी कार्यालय, बीमा एवं सार्वजनिक सुविधाओं की मनाही या इन्हें समाप्त करने के रूप में करता है। सरकार या किसी व्यक्ति द्वारा इन वर्गों में से किसी में भी अनुचित बर्ताव को भेदभाव माना जाएगा और उस पर कार्रवाई हो सकती है।

विधेयक में कहा गया है कि रोजगार प्राप्त करने, स्वास्थ्य देखभाल या शिक्षा की सुविधा प्राप्त करने के लिए किसी का भी एचआईवी परीक्षण एक पूर्व आवश्यकता के रूप में नहीं किया जा सकता। यह किसी भी व्यक्ति द्वारा एचआईवी संक्रमित व्यक्तियों के खिलाफ सूचनाओं के प्रकाशन या नफरत की भावनाएं फैलाने को प्रतिबंधित करता है। गोपनीयता सुनिश्चित करने के लिए, यह विधेयक बिना सूचित सहमति के एचआईवी परीक्षण या चिकित्सा उपचार को प्रतिबंधित करता है। बहरहाल, सूचित सहमति में लाईसेंस प्राप्त ब्लड बैंकों द्वारा जांच, चिकित्सा अनुसंधान या कोई ऐसा उद्देश्य जहां परीक्षण गुमनाम हो और उसका उद्देश्य किसी व्यक्ति की एचआईवी स्थिति को निर्धारित करना ना हो, शामिल नहीं है। किसी एचआईवी संक्रमित व्यक्ति को उसकी एचआईवी स्थिति का खुलासा करने की आवश्यकता तभी पड़ेगी, जब उसके लिए न्यायालय का आदेश हो।

भेदभाव करने तथा गोपनीयता का उल्लंघन करने पर दंड के भी प्रावधान हैं। स्वास्थ्य मंत्री श्री जे.पी.नड्डा ने कहा “जो कोई विधेयक के प्रावधानों का अनुपालन नहीं करेगा, उसे दंडित किया जाएगा। ऐसे व्यक्तियों के खिलाफ दीवानी एवं आपराधिक कार्रवाई की जाएगी।” जो कोई विधेयक के कार्यान्वयन को रोकने का प्रयास करेगा, उसके खिलाफ भी कदम उठाए जाएंगे।

एचआईवी संक्रमित व्यक्तियों की गोपनीयता का उल्लंघन करने पर दो वर्ष तक की कैद और एक लाख रूपये तक का आर्थिक दंड लगाया जा सकता है।

हालांकि एड्स का उपचार या एंटी रेट्रोवायरल थेरेपी वर्तमान में सरकारी अस्पतालों में निःशुल्क है। इस विधेयक में संक्रमित लोगों के उपचार को एक कानूनी अधिकार माना गया है। इसमें कहा गया है कि, “सरकार की देखभाल और संरक्षण में प्रत्येक व्यक्ति के पास एचआईवी की रोकथाम, जांच, उपचार एवं परामर्शी सेवाओं को पाने का अधिकार होगा।” इसलिए, केंद्र एवं राज्य सरकारें संक्रमण प्रबंधन सेवाओं के साथ-साथ एड्स एवं अवसरजनित संक्रमणों के लिए उपचार उपलब्ध कराएंगी। केंद्र एवं राज्य सरकारें एचआईवी एवं एड्स के प्रचार को रोकने के लिए भी कदम उठाएंगी तथा एचआईवी या एड्स संक्रमित व्यक्तियों, विशेष रूप से महिलाओं एवं बच्चों तक कल्याणकारी योजनाओं की सुविधाएं उपलब्ध कराने में भी सहायता करेंगी। सरकार ने पिछले वर्ष एंटी रेट्रोवायरल थेरेपी पर 2 हजार करोड़ रूपये व्यय किए हैं।

ह्यूमन इम्युनोडेफिसिएंसी वायरस (एचआईवी) एवं एक्वार्ड इम्युन डेफिसिएंसी सिंड्रम-एड्स (रोकथाम एवं नियंत्रण) विधेयक, 2014 राज्यसभा में 11 फरवरी, 2014 को तत्कालीन स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री श्री गुलाम नबी आजाद द्वारा पेश किया गया था। इस विधेयक के संशोधन वर्तमान सरकार द्वारा पिछले वर्ष जुलाई में पेश किए गए थे। तब से मूल विधेयक में कई परिवर्तन किए जा चुके हैं। उदाहरण के लिए विधेयक ने “परीक्षण एवं उपचार” नीति अंगीकार किया है जिसका अर्थ यह है कि कोई भी संक्रमित व्यक्ति राज्य एवं केंद्र सरकार द्वारा निःशुल्क उपचार का हकदार होगा।

हाल में पारित विधेयक में एचआईवी संक्रमित व्यक्ति के संपदा अधिकारों के प्रावधान है। 18 वर्ष से कम उम्र के प्रत्येक एचआईवी संक्रमित व्यक्ति को एक साझा परिवार में रहने का तथा परिवार की सुविधाओं का आनंद उठाने का अधिकार है। इसमें यह भी कहा गया है कि एचआईवी संक्रमित व्यक्तियों से संबंधित मामलों का निपटान न्यायालयों द्वारा प्राथमिकता के आधार पर किया जाएगा। अगर कोई भी एचआईवी संक्रमित या प्रभावित व्यक्ति किसी कानूनी कार्रवाई में एक पक्षकार है तो न्यायालय आदेश पारित कर सकता है कि कार्रवाई का संचालन व्यक्ति की पहचान को गुप्त रखकर, बंद कमरे में किया जाए तथा किसी भी व्यक्ति को वैसी सूचना प्रकाशित करने से रोका जाए जो आवेदक की पहचान का खुलासा करता है। एचआईवी संक्रमित या प्रभावित किसी भी व्यक्ति द्वारा दायर रखरखाव आवेदन के संबंध में कोई भी आदेश पारित करते समय न्यायालय आवेदक द्वारा उठाए जाने वाले चिकित्सा व्ययों पर विचार करेगा।

विधेयक में प्रत्येक राज्य सरकार द्वारा अधिनियम एवं स्वास्थ्य देखभाल सेवाओँ के प्रावधान के उल्लंघन से संबंधित शिकायतों की जांच करने के लिए लोकपाल की नियुक्ति किए जाने की आवश्यकता व्यक्त की गयी है। लोकपाल प्राप्त आवेदनों की संख्या औऱ प्रकृति तथा की गयी कार्रवाई और पारित किए गए आदेशों के विवरण समेत प्रत्येक 6 महीने पर राज्य सरकार को एक रिपोर्ट पेश करेगा। अगर लोकपाल के आदेश का अनुपालन नहीं किया जाता है तो 10 हजार रूपये के आर्थिक दंड का भी प्रावधान है।

विधेयक के प्रारूप के निर्माण की प्रक्रिया 2002 में आरंभ हुई जब सिविल सोसायटी के सदस्यों, एचआईवी संक्रमित लोगों और सरकार द्वारा एक कानून बनाए जाने की आवश्यकता महसूस की गयी। यह विधेयक एक गैर-सरकारी संगठन लॉयर्स क्लेक्टिव की पहल है। यह 2006 में राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (एनएसओ) को प्रस्तुत किया गया था। इस विधेयक का प्रारूप एचआईवी संक्रमित व्यक्तियों, सेक्स वर्करों, समलैंगिकों, ट्रांसजैंडरों एवं नशीले पदार्थों का इस्तेमाल करने वालों, स्वास्थ्य कर्मचारियों, शिशु संगठनों, महिलाओं के समूहों, ट्रेड यूनियनों, वकीलों एवं राज्य एड्स नियंत्रण सोसायटियों समेत हितधारकों के साथ राष्ट्रव्यापी सलाह मशविरों के बाद बनाया गया था।


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