अनुसूचित जातियों,अन्य पिछड़े वर्गों के विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति अब डिजिटल माध्यम से


अनुसूचित जातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के 3.54 करोड़ विद्यार्थियों को डिजिटल भुगतान के अंतर्गत 14 छात्रवृत्ति योजनाओं का लाभ 

अनुसूचित जातियों और अन्य पिछड़े वर्गों (अपिव)/विमुक्त, घुमंतु और अर्द्ध-घुमंतु जातियों के विद्यार्थियों के लिए 14 स्कालरशिप योजनाएं डिजिटल भुगतान के अंतर्गत संचालित की जा रही हैं, जिनका लाभ 3.54 करोड़ विद्यार्थियों को मिल रहा है। छात्रवृत्ति की समस्त राशि विद्यार्थियों के बैंक खातों में अंतरित की जा रही है और अजा विद्यार्थियों के 60 प्रतिशत बैंक खाते आधार से जुड़े हुए हैं। उन्होंने बताया कि छात्रवृत्तियों, विद्यार्थियों के लिए छात्रावासों, प्रशिक्षण सुविधाओं, परिसरों,संस्थानों के निर्माण/उन्नयन के लिए पूंजी प्रदान करने आदि उपायों के जरिए अनुसूचित जातियों से सम्बद्ध विद्यार्थियों का शैक्षिक सशक्तिकरण किया जा रहा है। यह जानकारी केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री श्री थावर चंद गहलोत ने “प्रमुख सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों” के बारे में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में दी। 

सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय अलग अलग तरह की सात छात्रवृत्तियां कार्यान्वित करता है, जिनमें मैट्रिक-परवर्ती और मैट्रिक-पूर्ववर्ती छात्रवृत्तियां, टॉप क्लास स्कालरशिप, राष्ट्रीय विदेश अध्ययन छात्रवृत्ति, अनुसूचित जातियों के लिए यूजीसी द्वारा संचालित राष्ट्रीय फेलोशिप, अस्वच्छ व्यवसायों में लगे व्यक्तियों के बच्चों के लिए प्री-मैट्रिक स्कालरशिप, अनुसूचित जातियों और अपिव के लिए निशुल्क कोचिंग (70 : 30 अनुपात में) और योग्यता उन्नयन छात्रवृत्तियां शामिल हैं। भारत सरकार का यह विश्वास है कि सब के लिए शिक्षा सशक्तिकरण की कुंजी है। सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय अपने बजट का करीब 54 प्रतिशत अनुसूचित जातियों के लिए छात्रवृत्तियों पर खर्च करता है। 

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की प्रत्‍येक शाखा को वित्‍त मंत्रालय द्वारा एक उद्यमी के रूप में कम से कम एक अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति के युवक की सहायता करने की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है जिससे कि उनके बीच अधिक रोजगार का सृजन किया जा सके। 

#EarthDay (पृ़थ्‍वी मातृ दिवस) पर विशेष लेख : भारत की पहल


पृथ्वी मातृ को बचाने के लिए भारत की पहल 

पृ़थ्‍वी मातृ दिवस, 22 अप्रैल, 2017


संयुक्त राष्ट्र 22 अप्रैल को एक विशेष दिवस के रूप में पृथ्वी मातृ दिवस मनाता है। 1970 में 10000 लोगों के साथ प्रारंभ किये गये इस दिवस को आज 192 देशों के एक अरब लोग मनाते  हैं। इसका बुनियादी उद्देश्य पृथ्वी की रक्षा और भविष्य में पीढ़ियों के साथ अपने संसाधनों को साझा करने के लिए मनुष्यों को उनके दायित्व के बारे में जागरूक बनाना है।

2017 के विषय "पर्यावरण और जलवायु साक्षरता" का उद्देश्य पृथ्वी माँ की रक्षा के लिए आम लोगों में इस मुद्दे के प्रति जानकारी को और सशक्त बनाया और उन्हें प्रेरित करना है।

आईपीसीसी (जलवायु परिवर्तन पर अंतर्राष्ट्रीय पैनल) के मुताबिक भारत जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के मामले में सबसे कमजोर है जो स्वास्थ्य, आर्थिक विकास और खाद्य सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।

जलवायु परिवर्तन की इस चुनौती के समाधान के लिए भारत ने 'राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित अंशदान (आईएनडीसी): जलवायु न्याय की दिशा में कार्य करने' के उद्देश्य से एक व्यापक योजना विकसित की है। इस दस्तावेज़ में इस मुद्दे के समाधान के लिए समग्र रूप से अनुकूलता के घटक, शमन, वित्त, हरित प्रौद्योगिकी और क्षमता निर्माण को शामिल किया गया है। इन लक्ष्‍यों के क्रियान्वयन के दौरान, विकासशील देशों के लिए स्थायी विकास और गरीबी उन्मूलन को प्राप्त करने के अधिकार के लिये न्यायोचित कार्बन उपयोग का भी आहवान किया गया है।

2030 तक 33 से 35 प्रतिशत तक कार्बन उत्सर्जन कम करने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए कई पहलों के माध्यम से अक्षय ऊर्जा हेतु 3500 मिलियन या 56 मिलियन अमरीकी डॉलर से 'राष्ट्रीय अनुकूलन कोष' के गठन से नीतियों की पहल की जायेगी।

इसका मुख्य केन्‍द्र बिन्‍दु वायु, स्वास्थ्य, जल और सतत कृषि की पुनः परिकल्‍पना के अतिरिक्त अभियान के साथ जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्यवाही (एनएपीसीसी) के अतंर्गत राष्ट्रीय अभियानों को फिर से प्रारंभ करना है।  

अनुकूलन रणनीति का उपयोग भूमि और जल संसाधन के स्थायी उपयोग के लिए किया जाता है। देश भर में मृदा स्वास्थ्य कार्ड के क्रियान्वयन, जलशोधन और जल कुशल सिंचाई कार्यक्रम के उपयोग से जोखिम रहित कृषि की दिशा का मार्ग प्रशस्त होगा। जलवायु परिवर्तन संबंधी आपदाओं से किसानों को बचाने की दिशा में फसलों का कृषि बीमा एक और महत्वपूर्ण पहल है।

2022 तक नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता को 35 गीगावॉट (गीगा वाट) से 175  गीगावॉट तक बढ़ाने के द्वारा स्वच्छ और हरित ऊर्जा का निर्माण शमन रणनीतियों में शामिल है। सौर ऊर्जा में पांच गुना वृद्धि के साथ इसे 1000 गीगावॉट तक बढ़ाना के लक्ष्य के साथ राष्ट्रीय सौर मिशन के अतिरिक्त देश भर में बिजली पारेषण और वितरण की दक्षता बढ़ाने के लिए स्मार्ट पावर ग्रिड को भी विकसित करना है। 10 प्रतिशत ऊर्जा खपत को बचाने हेतु ऊर्जा की खपत को रोकने के लिए ऊर्जा संरक्षण की दिशा में एक राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू किया गया है।

हालांकि ये जलवायु परिवर्तन के मुद्दे के समाधान की दिशा में सूक्ष्म स्तर की नीतियां हैं,  लेकिन भारत सरकार ने ऐसी सूक्ष्म परियोजनाओं की शुरुआत की है, जो न सिर्फ ऊर्जा बचाने के लिए महत्वपूर्ण हैं बल्कि सबसे गरीब समूहों के प्रत्यक्ष लाभ में भी योगदान कर रही हैं।

नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के तहत, उजाला योजना का शुभारंभ किया गया है जिसके अंर्तगत 22.66 करोड़ एलईडी बल्ब वितरित किए गए हैं इससे न सिर्फ 11776 करोड़ रुपये की बचत होगी बल्कि यह प्रतिवर्ष कार्बन उत्सर्जन में भी 24 मीट्रिक टन की कमी लाएगी।

इसी प्रकार से, बीपीएल कार्ड रखने वाली महिलाओं को पेट्रोलियम मुक्त एलपीजी कनेक्शन दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना पहले से ही 2 करोड़ घरों तक पहुंच चुकी है और इसे 2019 तक 8 करोड़ रूपए के परिव्यय के साथ 5 करोड़ घरों तक पहुंचाने का लक्ष्य है।

इसके उपयोग से ग्रामीण महिलाओं पर सीधे प्रभाव पड़ता है, इससे स्वच्छ ऊर्जा स्रोत तक न सिर्फ आसान पहुँच प्रदान करता है बल्कि उनके स्वास्थ्य में सुधार होता है और इसके साथ-साथ वन संसाधनों पर दबाव कम होने के अलावा कार्बन उत्सर्जन भी कम होता है।

स्वच्छ भारत मिशन की एक और रणनीति शहरी क्षेत्रों में अपशिष्ट से ऊर्जा पैदा करने की पहल भी है। इसी तरह देश भर में 816 सीवेज उपचार संयंत्रों में पुर्नचक्रण के माध्यम से अपशिष्ट जल का पुन: उपयोग करके प्रतिदिन 23,277 मिलियन लीटर पानी को स्वच्छ बनाना एक और पहल है।

बंजर भूमि का पुनरुद्धार करके वन की गुणवत्ता को बढ़ाने तथा 5 मिलियन हेक्टेयर भूमि को वन क्षेत्र में बदलने के वार्षिक लक्ष्य के साथ हरित भारत मिशन एक और पहल है जिससे प्रतिवर्ष 100 मिलियन टन कार्बन को कम किया जाएगा।

पारंपरिक भारतीय संस्कृति ने मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व की आवश्यकता पर जोर दिया है। "वसुदेव कुटंबकम" की अवधारणा के साथ पृथ्वी पर सभी जीव रूपों को एक परिवार माना जाता है और यह एक दूसरे पर निर्भरता की अवधारणा को मजबूत करता है। आधुनिक दुनिया में पृथ्वी मातृ दिवस के आगमन से पहले, वेद और उपनिषदों ने धरती को हमारी मां और मानव को बच्चों के रूप में माना है। जलवायु परिवर्तन के संकट के आगमन से पहले, हमारे पूर्वजों ने पर्यावरणीय स्थिरता की अवधारणा पर विचार किया और पृथ्वी को सुरक्षित बनाने के लिए भविष्य की पीढ़ियों तक इसे पहुँचाने का कार्य भी किया।

संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए उस वक्तव्य का स्मरण करना उचित होगा, जिसमें उन्होंने कहा कि, "हमें तकनीकी, नवीनता और वित्त पोषण के साथ सभी की पहुंच तक सस्ती, स्वच्छ और अक्षय ऊर्जा हेतु एक वैश्विक सार्वजनिक साझेदारी बनानी चाहिए। हमें अपनी जीवन शैली में समान रूप से बदलावों को देखना चाहिए जिससे ऊर्जा पर हमारी निर्भरता कम की जा सके और हमारे उपभोग अधिक दीर्घकालीन हों। यह एक वैश्विक शिक्षा कार्यक्रम को प्रारंभ करने के समान ही महत्वपूर्ण है जो हमारी धरती मां के संरक्षण और इसकी रक्षा के लिए हमारी अगली पीढ़ी को तैयार करता है।"

इस प्रकार से, यह पर्यावरण और जलवायु साक्षरता के माध्यम से ही संभव है, जिसके परिणामस्वरूप जीवन शैली में परिवर्तन से वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन में कमी लाकर हम पृथ्वी माँ को बचा सकते हैं।

 - पांडुरंग हेगड़े

राष्ट्रीय जलमार्ग -1 विकसित करने के लिए विश्व बैंक देगा 375 मिलियन डॉलर


देश की महत्वाकांक्षी जलमार्ग परियोजना को आगे बढ़ाने और नियत समय में इसे पूरा करने की दिशा में जलमार्ग विकास परियोजना के अंतर्गत राष्ट्रीय जलमार्ग -1 (National Waterway -1) की क्षमता में वृद्धि करने के लिए विश्व बैंक ने 375 मिलियन डॉलर की धनराशि को मंज़ूरी दी है।

सरकार हल्दिया से लेकर वाराणसी (1390 किलोमीटर) तक जलमार्ग विकास परियोजना के अंतर्गत 5369 करोड़ रुपये की लागत से एनडब्ल्यू-1 (गंगा नदी) को विकसित कर रही है। इस परियोजना को पूरा करने के लिए विश्व बैंक से तकनीकी एवं वित्तीय सहायता ली जा रही है। यह परियोजना 1500-2000 डीडब्ल्यूटी की क्षमता वाले जहाजों के व्यावसायिक नेविगेशन को सक्षम करेगी।

परियोजना के अंतर्गत, वाराणसी (उत्तर प्रदेश), साहिबगंज (झारखंड) और हल्दिया (पश्चिम बंगाल) में तीन बहुआयामी टर्मिनल स्थापित किए जाएंगे। वहीं दूसरी ओर कालुघाट और गाज़ीपुर में दो अंतर-मॉडल टर्मिनल, पांच रॉल ऑफ रॉल ऑन टर्मिनल (आरओ-आरओ), वाराणसी, पटना, भागलपुर, मुंगेर, कोलकाता और हल्दिया में नौका सेवा का विकास, और पोत मरम्मत और रख-रखाव की सुविधाएं विकसित की जाएंगी।

वाराणसी एवं साहिबगंज में बहु-मॉडल टर्मिनल और फरक्का में नवीन नेविगेशन लॉक को निर्मित करने के लिऑए अनुंबध किए जा चुके हैं, और इन साइटों पर काम शुरू किया जा चुका है, जबकि हल्दिया में बहु-आयामी टर्मिनल का निर्माण कार्य जल्द ही शुरू किया जाएगा। साहिबगंज में बनने वाले बहु-आयामी टर्मिनल की आधारशिला 06 अप्रैल 2017 को प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने रखी थी। अगस्त 2016 में सड़क परिवहन, राजमार्ग और जहाज़रानी मंत्री श्री नितिन गडकरी ने वाराणसी में बनाए जाने वाले बहु-आयामी टर्मिनल की आधारशिला रखी थी।

इसके अतिरिक्त, यह परियोजना भारत में पहली बार एनडब्ल्यू-1 पर गंगा सूचना सेवा प्रणाली को स्थापित करने के लिए आईडब्ल्यूए को सक्षम करेगी। नदी सूचना प्रणाली (आरआईएस) उपकरण, हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर आधारित सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) संबंधित सेवाएं हैं, जिसे अंतर्देशीय नेविगेशन में यातायात और परिवहन प्रक्रियाओं को अनुकूलित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

राष्ट्रीय जलमार्ग – 1 राष्ट्रीय महत्व का जलमार्ग है, जो उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल से होकर गुजरता है। यह इलाहाबाद, वाराणसी, गाज़ीपुर, भागलपुर, पटना, हावड़ा, हल्दिया और कोलकाता के प्रमुख शहरों सेवा में अग्रसर है और गंगा से सटे क्षेत्रों की औद्योगिक ज़रूरतों को पूरा करने में योगदान देता है। इस क्षेत्र में रेल और सड़क गलियारे काफी अधिक भरे हुए हैं। इसलिए, एनडब्ल्यू -1 का विकास, परिवहन के एक वैकल्पिक, व्यवहार्य, आर्थिक, कुशल और पर्यावरण-अनुकूल तरीके की सुविधा प्रदान करेगा।

सरकार ने वाहनों से सभी तरह की बत्तियां हटाने का फैसला किया

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देश में स्‍वस्‍थ लोकतांत्रिक मूल्‍यों को सशक्‍त बनाने के उद्देश्‍य से केंद्र सरकार ने आज एक और ऐतिहासिक कदम उठाया। प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी की अध्‍यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में देश में सभी श्रेणियों के वाहनों के ऊपर लगी सभी तरह की बत्तियां हटाने का फैसला किया। 

सरकार का स्‍पष्‍ट मानना है कि वाहनों पर लगी बत्तियां वीआईपी संस्‍कृति का प्रतीक मानी जाती हैं और लोकतांत्रिक देश में इसका कोई स्‍थान नहीं है। उनका कुछ भी औचित्‍य नहीं है। 

हालांकि आपातकालीन और राहत सेवाओं, एम्‍बुलेंस, अग्नि शमन सेवा आदि से संबंधित वाहनों पर बत्तियों लगाने की अनुमति होगी। इस फैसले को ध्‍यान में रखते हुए सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय कानून में आवश्‍यक प्रावधान करेगा।

गर्मियों में सुविधाजनक यात्रा के लिए रेलवे ने उठाये ये विशेष कदम


इस गर्मी के मौसम में सुविधाजनक यात्रा प्रदान करने के उद्देश्य से भारतीय रेलवे ने कई नई पहल की है 

रेलवे ने यात्रियों को अच्छी यात्रा की सुविधा प्रदान करने हेतु, भारतीय रेलवे ने यात्रियों के लिए कई कदम उठाये हैं। गर्मियों के दौरान पीक सीजन होने के कारण भारतीय रेलवे ने यात्रियों को सुविधाजनक यात्रा की पेशकश करने की तैयारी की है।


उपलब्ध स्थान का ज्यादा-से-ज्यादा उपयोग सुनिश्चित करने के उद्देश्य से भारतीय रेलवे ने निम्नलिखित पहल की है:-   

i) ट्रेन के प्रस्थान करने से 4 घंटे पूर्व पहले आरक्षण चार्ट को अंतिम रूप देना।
   
ii) पहला आरक्षण चार्ट तैयार हो जाने के बाद, दूसरा आरक्षण चार्ट तैयार होने तक वर्तमान टिकट बुकिंग सुविधा टिकट खिड़की तथा इंटरनेट दोनों माध्यमों से प्रदान करना।  
iii) दूसरा आरक्षण चार्ट तैयार होने के बाद उपलब्ध स्थानों (सीटों) का हस्तान्तरण अगले दूरवर्ती स्थान के टिकट के लिए करना।  

iv) निम्नलिखित सुविधाएं आईआरसीटीसी वेबसाइट के माध्यम से भी ऑनलाइन प्रदान की जाती हैं:

अ) जिन यात्रियों का टिकट प्रतीक्षा सूची में रह जाएगा उन्हें बिना किसी अतिरिक्त भार के दूसरे ट्रेन में विकल्प योजना के तहत स्थान उपलब्ध कराया जाएगा। यह सुविधा उन यात्रियों के लिए भी लागू होगी जिन्होंने अपना ई-टिकट 1 अप्रैल 2017 से पहले बुक कराया है।

ब) वैसे यात्री जिन्होंने अपना टिकट बुकिंग खिड़की से आरक्षित (बुक) कराया है वे भी आईआरसीटीसी की वेबसाइट या 139 के माध्यम से आरक्षित टिकट रद्द करा सकते हैं।

स) ई-टिकट वाले यात्री आईआरसीटीसी की वेबसाइट के माध्यम से ट्रेन प्रस्थान करने से 24 घंटे पूर्व बोडिंग स्थान भी बदल सकते हैं।      

द) व्हील चेयर के ऑनलाइन बुकिंग की सुविधा यात्रियों को मुफ्त में मुहैया कराई जाएगी।

य) आईआरसीटीसी की वेबसाइट के माध्यम से रिटायरिंग कक्षों की ऑनलाइन बुकिंग की सुविधा की शुरूआत की गई है।  

र) आईआरसीटीसी की वेबसाइट के माध्यम से डिस्पोजेबल बेडरोल्स खरीद जा सकते हैं।

ल) यात्रियों के लिए उपलब्ध भोजन के विकल्प को बढ़ाने हेतु ई-कैटरिंग की सुविधा की शुरूआत की गई है।  

#HIV #AIDS से संक्रमित लोगों को समान अधिकार के लिए विधेयक पास

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संसद ने एचआईवी एवं एड्स संक्रमित लोगों को उपचार कराने एवं उनके प्रति किसी भी प्रकार के भेदभाव को रोकने हेतु समान अधिकार सुनिश्चित करने के लिए एक महत्वपूर्ण विधेयक पारित किया है। लोकसभा द्वारा इस वर्ष 11 अप्रैल को एवं राज्यसभा द्वारा 21 मार्च को ह्यूमन इम्युनोडेफिसिएंसी वायरस (एचआईवी) एवं एक्वॉर्ड इम्युन डेफिसिएंसी सिंड्रम-एड्स (रोकथाम एवं नियंत्रण) विधेयक, 2017 पारित किया गया।

भारत में एचआईवी संक्रमण पहली बार 1986 में चेन्नई में महिला सेक्स वर्करों के बीच पाया गया। हालांकि पिछले दशक के दौरान एचआईवी की व्याप्ति में लगातार कमी आती जा रही है, फिर भी भारत अभी भी दक्षिण अफ्रीका एवं नाइजीरिया के बाद दुनिया में एचआईवी महामारी से ग्रसित तीसरा सबसे बड़ा देश है। भारत में अभी हाल में पारित किया गया एचआईवी विधेयक दक्षिण एशिया में अपनी तरह का पहला विधेयक है। दक्षिण अफ्रीका एवं नाइजीरिया ने भी भेदभाव के कुछ रूपों को प्रतिबंधित करते हुए कानून पारित किए हैं। भारत में एचआईवी से ग्रसित लोगों की अनुमानित संख्या लगभग 21 लाख है। भारत में 2015 में लगभग 86 हजार नए एचआईवी संक्रमण दर्ज किए गए जो कि वर्ष 2000 की तुलना में 66 प्रतिशत गिरावट को प्रदर्शित करता है। 2015 में एड्स से संबंधित बीमारियों से लगभग 68 हजार लोगों की मौत हुई। यह विधेयक नए संक्रमणों पर अंकुश लगाते हुए राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम को समर्थऩ देगा एवं 2030 तक इस महामारी को समाप्त करने के सतत विकास लक्ष्य अर्जित करने में मदद करेगा।

देश में ऐसे कानून की आवश्यकता के पीछे एक मुख्य वजह यह थी कि एचआईवी/एड्स को एक प्रकार के सामाजिक कलंक एवं भेदभाव की दृष्टि से देखा जाता है। हालांकि सरकार के प्रयासों एवं सिविल सोसायटी के योगदान की वजह से इस भेदभाव में बहुत कमी आई है पर अभी भी यह भेदभाव बना हुआ है। नया कानून इस भेदभाव को समाप्त करने में काफी कारगर साबित होगा। यह विधेयक भेदभाव की व्याख्या रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं, अचल संपत्ति को किराये पर देने या वहां निवास करने, सार्वजनिक या निजी कार्यालय, बीमा एवं सार्वजनिक सुविधाओं की मनाही या इन्हें समाप्त करने के रूप में करता है। सरकार या किसी व्यक्ति द्वारा इन वर्गों में से किसी में भी अनुचित बर्ताव को भेदभाव माना जाएगा और उस पर कार्रवाई हो सकती है।

विधेयक में कहा गया है कि रोजगार प्राप्त करने, स्वास्थ्य देखभाल या शिक्षा की सुविधा प्राप्त करने के लिए किसी का भी एचआईवी परीक्षण एक पूर्व आवश्यकता के रूप में नहीं किया जा सकता। यह किसी भी व्यक्ति द्वारा एचआईवी संक्रमित व्यक्तियों के खिलाफ सूचनाओं के प्रकाशन या नफरत की भावनाएं फैलाने को प्रतिबंधित करता है। गोपनीयता सुनिश्चित करने के लिए, यह विधेयक बिना सूचित सहमति के एचआईवी परीक्षण या चिकित्सा उपचार को प्रतिबंधित करता है। बहरहाल, सूचित सहमति में लाईसेंस प्राप्त ब्लड बैंकों द्वारा जांच, चिकित्सा अनुसंधान या कोई ऐसा उद्देश्य जहां परीक्षण गुमनाम हो और उसका उद्देश्य किसी व्यक्ति की एचआईवी स्थिति को निर्धारित करना ना हो, शामिल नहीं है। किसी एचआईवी संक्रमित व्यक्ति को उसकी एचआईवी स्थिति का खुलासा करने की आवश्यकता तभी पड़ेगी, जब उसके लिए न्यायालय का आदेश हो।

भेदभाव करने तथा गोपनीयता का उल्लंघन करने पर दंड के भी प्रावधान हैं। स्वास्थ्य मंत्री श्री जे.पी.नड्डा ने कहा “जो कोई विधेयक के प्रावधानों का अनुपालन नहीं करेगा, उसे दंडित किया जाएगा। ऐसे व्यक्तियों के खिलाफ दीवानी एवं आपराधिक कार्रवाई की जाएगी।” जो कोई विधेयक के कार्यान्वयन को रोकने का प्रयास करेगा, उसके खिलाफ भी कदम उठाए जाएंगे।

एचआईवी संक्रमित व्यक्तियों की गोपनीयता का उल्लंघन करने पर दो वर्ष तक की कैद और एक लाख रूपये तक का आर्थिक दंड लगाया जा सकता है।

हालांकि एड्स का उपचार या एंटी रेट्रोवायरल थेरेपी वर्तमान में सरकारी अस्पतालों में निःशुल्क है। इस विधेयक में संक्रमित लोगों के उपचार को एक कानूनी अधिकार माना गया है। इसमें कहा गया है कि, “सरकार की देखभाल और संरक्षण में प्रत्येक व्यक्ति के पास एचआईवी की रोकथाम, जांच, उपचार एवं परामर्शी सेवाओं को पाने का अधिकार होगा।” इसलिए, केंद्र एवं राज्य सरकारें संक्रमण प्रबंधन सेवाओं के साथ-साथ एड्स एवं अवसरजनित संक्रमणों के लिए उपचार उपलब्ध कराएंगी। केंद्र एवं राज्य सरकारें एचआईवी एवं एड्स के प्रचार को रोकने के लिए भी कदम उठाएंगी तथा एचआईवी या एड्स संक्रमित व्यक्तियों, विशेष रूप से महिलाओं एवं बच्चों तक कल्याणकारी योजनाओं की सुविधाएं उपलब्ध कराने में भी सहायता करेंगी। सरकार ने पिछले वर्ष एंटी रेट्रोवायरल थेरेपी पर 2 हजार करोड़ रूपये व्यय किए हैं।

ह्यूमन इम्युनोडेफिसिएंसी वायरस (एचआईवी) एवं एक्वार्ड इम्युन डेफिसिएंसी सिंड्रम-एड्स (रोकथाम एवं नियंत्रण) विधेयक, 2014 राज्यसभा में 11 फरवरी, 2014 को तत्कालीन स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री श्री गुलाम नबी आजाद द्वारा पेश किया गया था। इस विधेयक के संशोधन वर्तमान सरकार द्वारा पिछले वर्ष जुलाई में पेश किए गए थे। तब से मूल विधेयक में कई परिवर्तन किए जा चुके हैं। उदाहरण के लिए विधेयक ने “परीक्षण एवं उपचार” नीति अंगीकार किया है जिसका अर्थ यह है कि कोई भी संक्रमित व्यक्ति राज्य एवं केंद्र सरकार द्वारा निःशुल्क उपचार का हकदार होगा।

हाल में पारित विधेयक में एचआईवी संक्रमित व्यक्ति के संपदा अधिकारों के प्रावधान है। 18 वर्ष से कम उम्र के प्रत्येक एचआईवी संक्रमित व्यक्ति को एक साझा परिवार में रहने का तथा परिवार की सुविधाओं का आनंद उठाने का अधिकार है। इसमें यह भी कहा गया है कि एचआईवी संक्रमित व्यक्तियों से संबंधित मामलों का निपटान न्यायालयों द्वारा प्राथमिकता के आधार पर किया जाएगा। अगर कोई भी एचआईवी संक्रमित या प्रभावित व्यक्ति किसी कानूनी कार्रवाई में एक पक्षकार है तो न्यायालय आदेश पारित कर सकता है कि कार्रवाई का संचालन व्यक्ति की पहचान को गुप्त रखकर, बंद कमरे में किया जाए तथा किसी भी व्यक्ति को वैसी सूचना प्रकाशित करने से रोका जाए जो आवेदक की पहचान का खुलासा करता है। एचआईवी संक्रमित या प्रभावित किसी भी व्यक्ति द्वारा दायर रखरखाव आवेदन के संबंध में कोई भी आदेश पारित करते समय न्यायालय आवेदक द्वारा उठाए जाने वाले चिकित्सा व्ययों पर विचार करेगा।

विधेयक में प्रत्येक राज्य सरकार द्वारा अधिनियम एवं स्वास्थ्य देखभाल सेवाओँ के प्रावधान के उल्लंघन से संबंधित शिकायतों की जांच करने के लिए लोकपाल की नियुक्ति किए जाने की आवश्यकता व्यक्त की गयी है। लोकपाल प्राप्त आवेदनों की संख्या औऱ प्रकृति तथा की गयी कार्रवाई और पारित किए गए आदेशों के विवरण समेत प्रत्येक 6 महीने पर राज्य सरकार को एक रिपोर्ट पेश करेगा। अगर लोकपाल के आदेश का अनुपालन नहीं किया जाता है तो 10 हजार रूपये के आर्थिक दंड का भी प्रावधान है।

विधेयक के प्रारूप के निर्माण की प्रक्रिया 2002 में आरंभ हुई जब सिविल सोसायटी के सदस्यों, एचआईवी संक्रमित लोगों और सरकार द्वारा एक कानून बनाए जाने की आवश्यकता महसूस की गयी। यह विधेयक एक गैर-सरकारी संगठन लॉयर्स क्लेक्टिव की पहल है। यह 2006 में राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (एनएसओ) को प्रस्तुत किया गया था। इस विधेयक का प्रारूप एचआईवी संक्रमित व्यक्तियों, सेक्स वर्करों, समलैंगिकों, ट्रांसजैंडरों एवं नशीले पदार्थों का इस्तेमाल करने वालों, स्वास्थ्य कर्मचारियों, शिशु संगठनों, महिलाओं के समूहों, ट्रेड यूनियनों, वकीलों एवं राज्य एड्स नियंत्रण सोसायटियों समेत हितधारकों के साथ राष्ट्रव्यापी सलाह मशविरों के बाद बनाया गया था।


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