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(सनसनी खेज खबर) भारतीय रूपये के प्रतीक चिन्ह चुनने में भी हुआ घोटाला

भारतीय मुद्रा के लिए एक आधिकारिक प्रतीक-चिह्न दिनांक १५ जुलाई, २०१० को चुन लिया गया था जिसे आईआईटी, गुवाहाटी के प्रोफेसर डी. उदय कुमार ने डिज़ाइन किया है। इसके लिए एक राष्ट्रीय प्रतियोगिता आयोजित की गई थी।

इसके अन्तर्गत सरकार को तीन हज़ार से अधिक आवेदन प्राप्त हुए थे।रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर की अध्यक्षता में गठित एक उच्चस्तरीय समिति ने भारतीय संस्कृति और भारतीय भाषाओं के साथ ही आधुनिक युग के बेहतर सामंजस्य वाले इस प्रतीक को अंतिम तौर पर चयन करने की सिफारिश की थी। इसे यूनीकोड मानक में शामिल करने हेतु आवेदन कर दिया गया है।

इस चिह्न को यूनीकोड में U+20A8 पर स्थान मिलेगा, जो पहले ही रुपये के Rs जैसे दिखने वाले चिह्न के लिए आवंटित है। फिलहाल इस चिह्न को कम्प्यूटर पर मुद्रित करने के लिये कुछ नॉन-यूनिकोड फॉण्ट बनाये गये हैं।

उपरोक्त बाते इस विषय का एक पहलु प्रस्तुत करतीं हैं और इसका एक और पहलु भी है जिससे शायद आपलोग परिचित नहीं होंगे - 

भारतीय रूपये के प्रतीक चिन्ह’ सहित कई अन्य राष्ट्रीय महत्त्व के Logo की चयन प्रक्रिया को दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी है |
दिल्ली उच्च न्यायालय ने आरटीआई कार्यकर्त्ता राकेश कुमार सिंह के द्वारा दायर याचिका को स्वीकार करते हुए गृह मंत्रालय से अपना पक्ष देने को कहा है | याचिका में राजभाषा अधिनियम १९६३ के प्रावधानों के अनुसार काम न करके ‘रूपये’ और अन्य प्रतीक चिन्हों को पक्षपातपूर्ण ढंग से मान्यता देने में हुए भ्रष्टाचार की बात कही गयी है ,जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया है |
इसके आलावा न्यायलय ने बगैर किसी समुचित दिशा –निर्देश के राष्ट्रीय महत्त्व के प्रतीकों के चयन पर भी सवाल खड़े किये हैं |
गौरतलब है कि ‘रूपये के प्रतीक चिन्ह’ के चयन में हुये भ्रष्टाचार का खुलासा राकेश कुमार सिंह की आरटीआई से हुआ था | आरटीआई में प्राप्त तथ्यों के आलोक में अधिक्वाकता कमल कुमार पाण्डेय पिछले साल से ही न्यायलय की शरण में हैं | अगस्त 2011 में दिल्ली हाईकोर्ट ने मामले में PIL दाखिल करने की अनुमति दे दी थी |
सम्बंधित आरटीआई के तहत रूपये एवं अन्य प्रतीक चिन्हों के चयन में धांधली के कुछ चौंकाने वाले तथ्य सामने आये हैं जो नीचे बिन्दुवार प्रस्तुत है :
1 ) डी.एम.के पार्टी के नेता के बेटे को पात्रता न होने के बावजूद विजेता घोषित कर दिया गया |[सबूत]
2 ) फ़ाइनल में जगह पाने वेले प्रतिभागियों में से एक नंदिता कोरिया के पिता चार्ल्स कोरिया ने प्रधानमंत्री एवं रिजर्व बैंक आफ इंडिया में पहले से ही सिफारिशी पत्र भेजा था |
3) डिजाइन कंसेप्ट को भारतीय रुपया प्रतीक चिन्ह के साथ जूरी के सामने नहीं रखा गया | RTI – Q. 7
पांच लोगो जिनको अंतिम पांच की सूचि में शामिल बताया गया
पांच लोगो जिनको अंतिम पांच की सूचि में शामिल बताया गया
4) शीर्ष पांच शोर्ट लिस्टेड प्रक्रिया में प्रतिभागियों जिनकी संख्या 2644 थी , को कोई अंक या ग्रेड नहीं दिए गए थे |.RTI – Q. 16 D
5) जूरी ने प्रत्येक डिजाइन को महज 20 सेकेण्ड में ही निपटा दिया | Hindustan Times report
6 ) 29 एवं 30 सितम्बर 2009  को हुई मीटिंग के दौरान तीन जूरी मेम्बर अनुपस्थित थे | RTI Q. 3
7 ) चयन प्रक्रिया के दौरान एक साथ सातों जूरी मेम्बरो ने कभी भाग नहीं लिया और न ही एक साथ कभी मिले |RTI Q. 4
8 ) जूरी के एक सदस्य जो कि संस्कृति मंत्रालय से थे , फ़ाइनल के दिन भी अनुपस्थित थे |
9) वित्त मंत्रालय के पास कोई भी रिकार्ड मौजूद नहीं है जो कि कुल प्रविष्टियों को दर्शाता है | RTI Q. 5
1० ) विज्ञापन सिर्फ अंगरेजी भाषा में ही छपवाए गए थे | RTI Q. 7
11 ) रूपये का प्रतीक संविधान के  351 वे अनुच्छेद  का उल्लंघन करता है |
12 ) रूपये के प्रतीक का जो आकार है , वह बहुत छोटा है और पढ़ने योग्य नहीं है | इसके आलावा कम्पूटर स्क्रीन पर पूर्णता: दिखाई नहीं पड़ता | DIT Doc.
अब जबकि मामला हाईकोर्ट में है , याचिकाकर्ता ने बेंच से अनुरोध किया है कि वह याचिका को जनहित याचिका में तब्दील करना चाहता है ताकि दिशा- निर्देशों तथा धांधली पर सवाल उठ सकें |
इसके मद्देनजर बुधवार को कार्यवाहक चीफ जस्टिस ए.के. सीकरी की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिका स्वीकार कर केंद्र सरकार के वकील जतन सिन्हा को चार सप्ताह के भीतर काउंटर हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया है |
अदालत ने गृह मंत्रालय से पूछा है कि अगर ऐसे प्रतीकों के चयन में सार्वजानिक प्रतियोगिताएं के आयोजन के दिशा-निर्देश हैं और यह सभी नागरिकों को सामान अवसर सुनिश्चित करता है तो कोर्ट को बताया जाये |
वहीँ राकेश कुमार सिंह ने रूपये के अलावा अन्य पांच प्रतीकों के चयन में भी हुई धांधली पर प्रकाश डाला है | उन्होंने कहा है कि इन प्रतीकों के चयन में लोकतान्त्रिक प्रक्रिया का अभाव है | ऐसे प्रतियोगिताओं में भागीदारी की कमी तथा एक विशेष समूह को लाभ दिया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है |
सिंह ने कहा कि इस सार्वजानिक प्रतियोगिता के लिए जो विज्ञापन जारी किये गए वह सिर्फ अंगरेजी में ही थे और यह राजभाषा अधिनियम का उल्लंघन है | इसके साथ-साथ यूआईडी प्रतीक के चयन में भी प्रविष्टियों को केवल ई -मेल द्वारा माँगा गया जिससे कम्पुटर की जानकारी नहीं रखने वाले लोग प्रतियोगिता से वंचित रह गए |
बहरहाल ,रूपये सहित अन्य पांच राष्ट्रीय महत्त्व के चिन्ह (LOGO) के चयन प्रक्रिया के विरुद्ध दायर याचिका का दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा स्वीकार करना मामले में न्याय की उम्मीद जगता है | लेकिन इस खबर को में स्ट्रीम मीडिया में कोई तवज्जो नहीं दिया जाना इस बात का प्रमाण है कि केन्द्रीय सत्ता का दबाव किस तरह से मीडिया को काबू में रखता है | 
(साभार : http://www.janokti.com)यह समाचार स्वंय श्री राकेश कुमार सिंह की अनुरोध पर प्रकाशित किया गया है)

मेरी बहन होती तो मैं गोली मार देता - डीआईजी, सहारनपुर

उत्तर प्रदेश सरकार ने विवादास्पद बयान देने वाले सहारनपुर परिक्षेत्र के पुलिस महानिरीक्षक एस.के माथुर को गुरुवार को पुलिस महानिदेशक मुख्यालय से सम्बद्ध कर दिया. 

बहन के लापता होने की शिकायत लेकर पहुंचे एक फरियादी को बहन को गोली मारने की नसीहत देने वाले माथुर के व्यवहार को विभिन्न राजनीतिक दलों ने दुर्भाग्यपूर्ण बताया है. 

प्रबुद्धनगर जिले के एक फरियादी ने डीआईजी माथुर से फरियाद लगाई कि उसकी बहन 24 घंटे से लापता है और पुलिस उसे ढूढ़ने के लिए कुछ नहीं कर रही है.

इस पर डीआईजी ने कहा, "जिसकी बहन चली जाती है उसके लिए तो बड़ी शर्म की बात होती है. तुम शर्म करो..मेरी बहन होती तो मैं गोली मार देता."

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने माथुर को तत्काल बर्खास्त करने की मांग करते हुए कहा था कि पीड़ित जब न्याय के लिए पुलिस के आला अधिकारी के पास जाता है तो उसकी मदद करने के बजाय उसे अपमानित किया जाता है, जो दुर्भाग्यपूर्ण है.

वाजपेयी ने कहा था कि आला अधिकारी का यह बयान बेतुका और कायरतापूर्ण है. ऐसे अधिकारी को तत्काल बर्खास्त कर पीड़ित की मदद की जानी चाहिए.

मोदी ने दंगों पर लगाम कसने के लिए हरसंभव कदम उठाए थे-एसआईटी

सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त विशेष जांच दल (एसआईटी) ने कहा है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2002 में गोधरा कांड के बाद भड़के दंगों पर लगाम कसने के लिए हरसंभव कदम उठाए थे। एसआईटी ने दंगों के चार साल बाद एक दंगा पीड़ित द्वारा मोदी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने के मकसद पर भी सवाल खड़ा किया।

जाकिया जाफरी की शिकायत पर निचली अदालत में पेश अपनी रिपोर्ट में एसआईटी ने कहा कि दंगों के दौरान मारे गये कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफरी की विधवा जाकिया द्वारा लगाया गया कोई आरोप विचारणीय नहीं है। घटना के चार साल बाद शिकायत दर्ज कराने के मकसद पर भी एसआईटी ने सवाल खड़ा किया। 

मोदी पर 27 फरवरी 2002 को एक बैठक में शीर्ष पुलिस अधिकारियों को हिंदुओं को गोधरा कांड के मद्देनजर अपना गुस्सा जाहिर करने देने के लिए कहने संबंधी आरोपों पर एसआईटी ने कहा कि इस तरह के आरोपों को लगाने का कोई आधार नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त एसआईटी ने यह भी कहा कि अगर इस तरह के आरोपों को दलीलों के लिहाज से मान भी लिया जाए तो कोई अपराध नहीं बनता। एसआईटी की रिपोर्ट न्यायमित्र राजू रामचंद्रन की रिपोर्ट के विरोधाभासी है। रामचंद्रन ने कहा था कि अलग-अलग समूहों के बीच शत्रुता फैलाने के मामले में मोदी पर मुकदमा चलाया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट के वकील रामचंद्रन ने निलंबित आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट की गवाही पर रिपोर्ट केंद्रित की थी। भट्ट ने शीर्ष अदालत में दाखिल हलफनामे में आरोप लगाया था कि मोदी ने शीर्ष पुलिस अधिकारियों को दंगाइयों पर नरमी बरतने का निर्देश दिया था।

एसआईटी रिपोर्ट के अनुसार, ‘मोदी ने कानून व्यवस्था की समीक्षा बैठकें कीं और हालात को संभालने के लिए सबकुछ किया गया।’ रिपोर्ट के अनुसार सांप्रदायिक हिंसा को रोकने के लिए समय पर सेना को बुलाया गया। एसआईटी ने कहा, ‘मोदी हालात पर लगाम लगाने, दंगा पीड़ितों के लिए राहत शिविर बनाने और स्थिति को शांतिपूर्ण एवं सामान्य करने के लिहाज से कदम उठाने में व्यस्त रहे।’

मुख्यमंत्री पर गैरकानूनी आदेश देने के आरोप के संबंध में रिपोर्ट में कहा गया है, ‘पुलिस अधिकारियों आरबी श्रीकुमार और संजीव भट्ट ने मुख्यमंत्री द्वारा कथित गैरकानूनी निर्देशों पर जो कहा है उसके संबंध में कोई आधार नजर नहीं आता।’ रिपोर्ट के अनुसार, ‘अगर दलीलों के लिए इन आरोपों को मान भी लें तो किसी कमरे की चार दीवारों में महज कथित शब्दों का बयान कोई अपराध नहीं तय करता।’

एसआईटी ने कहा, ‘विस्तृत जांच और शामिल लोगों के संतोषप्रद स्पष्टीकरण के मद्देनजर नरेंद्र मोदी के खिलाफ कोई आपराधिक मामला नहीं बनता।’ रामचंद्रन की रिपोर्ट के संबंध में सीबीआई के पूर्व निदेशक आरके राघवन की अध्यक्षता वाली एसआईटी ने कहा कि न्यायमित्र ने केवल भट्ट के बयानों पर किसी नतीजे पर पहुंचकर ‘भूल की’ है।

कांग्रेस को करार तमाचा-हरियाणा का वरिष्ठ नेता इनेलो में शामिल

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एंव कलायत विधानसभा क्षेत्र के पूर्व प्रधान तथा कुरूक्षेत्र विकास बोर्ड के सदस्य पारस मित्तल कांग्रेस का हाथ छोड़कर इनेलो का चश्मा पहनने जा रहे है, जिसकी घोषणा वह आगामी 25 मई माह को करेंगे। इसके लिए कैथल की अनाज मंडी में इनेलो की ओर से एक जनसभा का आयोजन भी किया जाएगा, जिसे पार्टी सुप्रीमो ओमप्रकाश चौटाला संबोधित करेंगे और वहीं पारस मित्तल को पार्टी में शामिल किए जाने की घोषणा औपचारिक रूप से करेंगे। यह आज पार्टी के कलायत से विधायक रामपाल माजरा ने भी जिला स्तरीय कार्यकत्र्ता सम्मेलन में स्पष्ट किया और कार्यकत्र्ताओं को आहवान किया की वह इस जनसभा को कामयाब बनाने के लिए कड़ी मेहनत करें।

 जानकारी के अनुसार पारस मित्तल कांग्रेस पार्टी से उम्मीद के अनुसार मान सम्मान न मिल पाने के कारण पिछले काफी दिनों से कांग्रेस से विमुख चल रहे है। यहां तक की वह गत चार अप्रैल को कलायत में हुई मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुडडा की जनसभा में भी शामिल नहीं हुए थे, जिसके बाद ही उनकी कांग्रेस से दूरी की चर्चा बढऩे लगी थी और कलायत क्षेत्र में उनका भरपूर समर्थन होने के बावजूद भी जनसभा में न आने पर उसी दौरान ही उनके द्वारा कांग्रेस से किनारा कर लिए जाने की उम्मीद की जाने लगी थी। 

इनेलो नेताओं के मुताबिक अब उन्होंने कांग्रेस से तौबा करने का मन बना लिया है, जिसके चलते ही वह न केवल इनेलो सुप्रीमो ओमप्रकाश चौटाला से भी मुलाकात कर चुके है बल्कि वह इनेलो में ही अपनी पूरी आस्था जताने की इच्छा भी जता चुके है हालांकि अभी पारस मित्तल ने यह स्पष्ट स्वीकार नहीं किया है लेकिन बताया जा रहा है कि वह इसकी घोषणा करने की तैयारियों को भी सिरे चढ़ाया जा रहा है, जिसके चलते आगामी 25 मई को नई अनाज मंडी में एक जनसभा का आयोजन किया जाएगा।

विदित रहे कि जिला भर में प्रमुख समाजसेवी के रूप में अपनी पहचान कायम कर चुके पारस मित्तल कांग्रेस पार्टी में जिला में अपना अहम महत्व रखते है और वह पार्टी से वर्ष 1997 से जुड़े हुए है जबकि वर्ष 2000 से लेकर वर्ष 2010 तक कलायत क्षेत्र का अध्यक्ष भी रहे है। उन्हें लगभग एक वर्ष पूर्व ही कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड का सदस्य भी बनाया गया था और उनके कलायत क्षेत्र में सक्रियता व पार्टी के प्रति अहम महत्व के बीच तीन विधान सभा चुनाव हो चुके है, जिनमें वह अपनी महत्ता दर्ज भी करवा चुके है।

उधर जहां पारस मित्तल ने इस संबध में खुले रूप से भले ही कुछ नहीं कहा, लेकिन कांग्रेस के प्रति अपनी नाराजगी अवश्य जाहिर की और बताया यहां उचित मान सम्मान नहीं मिल पाता है, जिसके चलते ही कई बार अन्य निर्णय लेने पर भी कोई कार्यकत्र्ता मजबूर हो जाता है।

लिब्रहान आयोग की रपट झूठ का पुलिंदा - सीबीआई

लिब्रहान आयोग की रपट को सीबीआई ने एक बार फिर से खारिज कर दिया है। सीबीआइ ने स्पष्ट कर दिया है कि अयोध्या के विवादित ढांचे को गिराने के लिए किसी साजिश के तहत धन जुटाए जाने की आयोग की आशंका निराधार है। सीबीआइ ने पिछले साल ही आयोग की रपट के आधार पर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी समेत कुछ अन्य भाजपा व संघ नेताओं की भूमिका की नए सिरे से जांच से इंकार कर दिया था, पर गृह मंत्री पी. चिदंबरम चाहते थे कि नए सिरे से जांच होनी चाहिए।

सीबीआइ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि गृह मंत्रालय के अनुरोध पर ढांचा ध्वंस के लिए जुटाए गए धन के स्रोतों की विस्तृत जांच की गई, लेकिन ऐसा कोई सुबूत नहीं मिला, जिससे पता चले कि साजिश के तहत बड़ी मात्रा में धन जुटाया गया था। उनके अनुसार, 6 दिसंबर, 1992 को कारसेवा के आयोजन से जुड़ी संस्थाओं एवं ट्रस्टों के सभी खातों की जांच कर ली गई है। कार सेवा के दौरान ट्रस्टों व संस्थाओं के खातों में महज कुछ लाख रुपये ही जमा थे, वो भी लंबे समय में धीरे-धीरे जमा हुए थे। उक्त तिथि को ही विवादित ढांचा गिराया गया था।

विवादित ढांचा गिराए जाने के सभी पहलुओं की जांच कर साजिश में शामिल भाजपा एवं विहिप नेताओं के खिलाफ 1993 में चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है और अदालती कार्रवाई भी चल रही है। लिब्रहान आयोग ने इनके साथ-साथ पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और अन्य कई भाजपा एवं संघ नेताओं की भूमिका की जांच करने की सिफारिश कर दी थी। अधिकारियों का मानना है कि ऐसा सिर्फ रिपोर्ट को सनसनीखेज बनाने के लिए किया गया है।

लिब्रहान आयोग :

गठन : विवादित ढांचा गिराए जाने के दस दिनों के भीतर 16 दिसंबर, 1992 में लिब्रहान आयोग का गठन किया गया।

सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश एम एस लिब्रहान के नेतृत्व में एक सदस्यीय आयोग को 3 माह के भीतर यानि 16 मार्च, 1993 को रिपोर्ट सौंपनी थी। आयोग तय समय सीमा में रिपोर्ट नहीं दे सका। लिहाजा, आयोग को बार-बार विस्तार दिया गया, अंतिम रूप से 30 जून, 2009 को न्यायाधीश लिब्रहान ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को रिपोर्ट सौंपी

वर्ष : 16 साल 7 माह [16 दिसंबर 1992-30 जून 2009]

विस्तार : 48 बार

बैठकें : 399

खर्च : करीब नौ करोड़

गांधी के रास्ते पर चलकर दाढ़ी-टोपी वालों की वकालत बंद हो- तोगडिय़ा

देश का प्रधानमंत्री महाराणा प्रताप जैसा होना चाहिए, जिन्होंने मुगलों के सामने कभी घुटने नहीं टेके..कभी सर्वस्वीकृति की परवाह नहीं की और कभी भी गौ-भक्षकों के साथ सद्भावना का प्रयास नहीं किया। आज तो कोई भी व्यक्ति प्रधानमंत्री पद की कतार में आता है तो तुरंत छवि बदलने और सर्वस्वीकृति बनाने के प्रयास शुरू कर देता है। 

यह कहना है विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. प्रवीण भाई तोगडिय़ा का। उन्होंने कहा कि गांधी ने सर्वस्वीकृति बनाने की लालसा में देश के टुकड़े करवाकर पाकिस्तान बनवा दिया। लोगों में फिर भी समझ नहीं आई। गांधी के रास्ते पर चलकर लोग दाढ़ी-टोपी वालों की वकालत करने लग गए हैं..तुष्टिकरण कर रहे हैं, जिन्होंने गोधरा में निर्दोष रामभक्तों को जला दिया, उनके साथ सद्भावना की कोशिश कर रहे हैं। ये लोग देश को फिर गर्त में पहुंचाने की तैयारी कर रहे हैं। गांधी ने गौ-भक्षकों के साथ सद्भावना करके पाकिस्तान बनवा दिया, अब फिर से कुछ लोग उसी रास्ते पर चल रहे हैं, यह ठीक नहीं है। यह धर्मविरोधी तथा राष्ट्रविरोधी है।

भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी तथा गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ विश्व हिंदू परिषद के संबंधों के सवाल को तो तोगडिय़ा टाल गए, लेकिन उनका नाम लिए बिना उनकी कार्यप्रणाली पर जमकर निशाना साधा। तोगडिय़ा ने बताया कि भाजपा, कांग्रेस सहित अनेक दलों में विहिप की विचारधारा के लोग हैं, जिनसे लगातार संपर्क किया जाता है। 

वर्तमान में कांग्रेस में भी अनेक सक्रिय लोग ऐसे हैं जो विहिप के लगातार संपर्क में हैं। तोगडिय़ा ने कहा कि कांग्रेसी प्रधानमंत्री पी. नरसिंहराव के शासनकाल में ही बाबरी ढांचा ध्वस्त हुआ। नरसिंहराव का परिवार वहां के निजाम के जेहादी व्यवहार से पीडि़त रहा है। वे इस व्यवस्था को ठीक प्रकार से समझते हैं। उनका परिवार हिन्दुत्ववादी है तथा कई लोग विहिप में पदाधिकारी भी हैं।

त्रिशूल दीक्षा के कार्यक्रमों में आई कमी पर तोगडिय़ा ने बताया कि विश्व हिन्दू परिषद लगभग दो दर्जन कार्यक्रम संचालित करती है। इनमें सत्संग, संस्कार केंद्र, गौशाला, सेवा कार्य प्रमुख हैं। संगठन को भी गांव-गांव तक पहुंचाने के प्रयास किए जा रहे हैं।

उन्होंने बताया कि विहिप की विचारधारा एवं कार्यप्रणाली पर चर्चा एवं विरोध करने वाले करते रहेंगे। विहिप को जब तक कुछ भी अनुचित नहीं लगेगा, तब तक कोई परिवर्तन नहीं होगा। उन्होंने कहा कि राजनीति से अलग रहकर पूरे देश में धर्मांतरण के विरुद्ध कार्य करने वाला तथा बड़े स्तर पर सेवा कार्य करने वाला विश्व हिंदू परिषद एकमात्र संगठन है।

अगले 10 सालों के लिए हज के लिए सब्सिडी बंद-सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने हज जाने वाले तीर्थयात्रियों को सब्सिडी मुहैया कराने वाली सरकारी नीति मंगलवार को नामंजूर कर दी. 

जस्टिस आफताब आलम की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सरकार को निर्देश दिया कि अगले 10 सालों के लिए हज तीर्थयात्रियों को सब्सिडी बंद कर दी जाए.

दरअसल, सरकार खुद ये प्रस्ताव लेकर सुप्रीम कोर्ट गई थी, जिसे आज मंजूर कर लिया गया.

एक अन्य महत्वपूर्ण निर्देश में कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि हर साल सरकार द्वारा मक्का भेजे जाने वाले सद्भावना शिष्टमंडल में अब केवल दो सदस्य ही शामिल होंगे. फिलहाल सद्भावना शिष्टमंडल में 30 सदस्य होते हैं.

न्यायालय ने राज्यस्तरीय हज समितियों और भारतीय हज समिति से इस बात का भी विवरण मांगा है कि कितनी सब्सिडी दी जाती है और इस पर कुल कितना खर्च आता है.

गर्भपात को गैरकानूनी घोषित कर देना चाहिए - शंकराचार्य

शंकराचार्य स्वामी स्वरुपानंद सरस्वती ने कहा है कि हिंदुस्तान में गर्भपात को गैरकानूनी घोषित कर देना चाहिए.

उनके मुताबिक, 'पहले हमारे भारत में कानून था कि भ्रूण हत्‍या को मनुष्‍य हत्‍या माना जाता था. चाहे वो लड़के की हत्‍या हो या लड़की की हत्‍या हो. सरकार ने ये गलती की कि भ्रूण हत्‍या को जायज घोषित कर दिया. अब आप ये कहने जा रहे हैं कि कन्‍य भ्रूण हत्‍या को रोको. तो कन्‍या शब्‍द जो आप लगाते हैं तो भ्रूण देखने के लिए वो कन्‍या को देख लेते हैं और जब कन्‍या का पता लग जाता है तो हत्‍या तो हो ही जाएगी. अगर आपको उसकी हत्‍या रोकनी है तो गर्भस्‍थ शिशु की हत्‍या रोक दीजिए.' 

अब सवाल यह है कि गर्भपात पर रोक लगाने की शंकराचार्य की मांग कितनी जायज है? दुनिया भर में इस मुद्दे पर लगभग एक ही राय है. चाहे अमेरिका, ब्रिटेन, चीन, रूस या जर्मनी जैसे देश हों हर जगह गर्भवती महिलाओं को कुछ खास शर्तों के साथ गर्भपात कराने का अधिकार है. खासकर तब जब कोख में पल रहे बच्चे की वजह से मां की जान खतरे में हो या बलात्कार की वजह से उसे अनचाहा गर्भ ठहरा हो. भारत में भी कुछ इसी तरह का कानून है.

भारत में गर्भवती महिलाओं को कुछ शर्तों के साथ गर्भ ठहरने के 20 हफ्ते तक गर्भपात कराने की इजाजत है. ये शर्तें इस प्रकार हैं:

अगर गर्भ धारण करने की वजह से मां की जान खतरे को खतरा हो. 
बलात्कार की वजह महिला को अनचाहा गर्भ ठहरा हो.
कोख में भ्रूण का सही विकास नहीं हो रहा हो.

इसके अलावा अगर किसी वजह से महिलाएं गर्भ धारण करने के 12वें हफ्ते से लेकर 20वें हफ्ते के बीच गर्भपात करना चाहती हैं तो उनके लिए दो मान्यता प्राप्त डॉक्टरों की लिखित सिफारिश जरूरी है.

यही नहीं कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए 1994 में भारत सरकार ने गर्भावस्था के दौरान भ्रूण के लिंग परीक्षण को भी गैरकानूनी करार दे दिया है. लेकिन इन सब के बावजूद भी देश में मां के कोख में ही बेटियों को बदस्तूर मारा जा रहा है.

पाकिस्तानी सैनिकों के सिर काटकर लकडी के खंभो पर टांग दिये

पाकिस्तान में कबायली क्षेत्र उत्तर वजीरिस्तान में तालिबानी आतंकवादियों ने आज दो पाकिस्तानी सैनिकों का सिर कलम करके उन्हें लकड़ी के खंभो पर टांग दिया। 

पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने यहां संवाददाताओं को बताया कि आतंकवादियों ने सैनिकों के सिर काटकर लकडी के खंभो पर टांग दिये थे। पाकिस्तानी तालिबान के एक कमांडर ने दावा किया कि सुरक्षा बलों द्वारा कल रात मीरानशाह में आतंकवादियों के खिलाफ छेड़े गए अभियान के दौरान इन सैनिकों को अगवा कर लिया गया।

मीरानशाह में आतंकवादियों के साथ संघर्ष में नौ जवानों और कम से कम तीन आतंकवादियों के मारे जाने के बाद यह अभियान छेड़ा गया था। आतंकवादियों ने सुरक्षा बलों के काफिले पर घात लगाकर हमला कर दिया जिसके बाद जवानों ने जवाबी कार्रवाई की। दोनों पक्षों के बीच संघर्ष में नौ जवान और कम से कम तीन आतंकवादी मारे गए।

अमेरिकी और अफगान अधिकारियों का मानना है कि अफगानिस्तान से सटा उत्तर वजीरिस्तान अल कायदा और तालिबानी आतंकवादियों का गढ है। ये आतंकवादी अफगानिस्तान में तैनात विदेशी सैनिकों पर आये दिन घातक हमले करते रहते हैं।

बाबरी विध्वंस मामले में आडवाणी पर मामला समाप्त नहीं-सीबीआई

अयोध्या में विवादित ढांचा गिराने के मामले को लेकर सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि वह आडवाणी के खिलाफ साजिश रचने का मामला समाप्त करने के खिलाफ है। सीबीआई ने कहा कि इस मामले में आडवाणी के साथ साथ अन्य नेताओं और कार सेवकों पर भी मामला चलें। विवादित ढांचा गिराने के मामले को लेकर दो एफआईआर दर्ज की गई है। 

एफआईआर नंबर 197/92 कारसेवकों के खिलाफ दर्ज की गई थी जबकि एफआईआर नंबर 198/92 में आडवाणी,मुरली मनोहर जोशी,उमा भारती,विनय कटियार,अशोक सिंघल,गिरिराज किशोर,विष्णु हरि डालमिया और साध्वी ऋतम्भरा का नाम है। इन सभी पर भड़काऊ भाषण के जरिए कार सेवकों को उकसाने का आरोप है। 

सीबीआई ने हाल ही में दायर शपथ पत्र में कहा कि यह संभव नहीं है कि पहली प्राथमिकी से कुछ को हटा दिया जाए,क्योंकि ढांचा गिराने में उनका सीधा हाथ नहीं था। दोनों एफआईआर अलग नहीं हैं।

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