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गाय को ‘राष्ट्रमाता’ का दर्जा दिलाने के लिए 07533007511 पर मिस कॉल करें - योगी

गोरखपुर के सांसद योगी आदित्यनाथ द्वारा शुरू किए गए संगठन हिंदू युवा वाहिनी की अलीगढ़ शाखा ने गाय को ‘राष्ट्र माता’ का दर्जा दिलाने के लिए एक आंदोलन शुरू किया है। इसके लिए एक नंबर 07533007511 जारी किया गया है और लोगों से इसमें मिस्ड कॉल देने की अपील की जा रही है।

विश्व हिंदू परिषद भी इस आंदोलन का समर्थन कर रहा है। अगर अलीगढ़ में इस आंदोलन की प्रतिक्रिया अच्छी मिली तो हिंदू युवा वाहिनी इसका विस्तार अलग-अलग राज्यों में करेगी।

हिंदू युवा वाहिनी के महंत कौशल नाथ ने कहा, ‘इस पहल को कई अन्य संगठनों का भी समर्थन है। हम भारत में गाय को ‘राष्ट्रमाता’ का दर्जा दिलाने की लड़ाई को जीतना चाहते हैं। लोगों को बस इस आंदोलन के समर्थन में मिस्ड कॉल देनी होगी और उन्हें तुरंत एक मैसेज मिलेगा। इस आंदोलन के जरिए लोगों में गाय की हालत को लेकर चेतना भी जगाना चाहते हैं।’

नाथ ने कहा, ‘हम लोगों को गायों को अपनाने, गौशाला में दान देने, उनके इलाज कराने, उन्हें घर देने के लिए प्रेरित करेंगे।’ उन्होंने बताया कि अभी तक अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है। हिंदू युवा वाहिनी के सदस्य सांसद योगी आदित्यनाथ के साथ अगले महीने मीटिंग करेंगे। इस मीटिंग में देश के अन्य राज्यों में भी इस आंदोलन के विस्तार की चर्चा होगी।

विश्व हिंदू परिषद के राम कुमार ने कहा, ‘हम गाय की सुरक्षा पर काम कर रहे हैं। हमारी अलीगढ़ शाखा की नजर गाय चोरों पर है। यह एक सामाजिक कार्य है और किसी को इसमें कोई आपत्त‍ि नहीं होनी चाहिए।’

साध्वी प्रज्ञा की रिहाई के लिए सरकार को एक करोड़ पत्र भेजेगी श्रीराम सेना

साध्वी प्रज्ञासिंह ठाकुर को झूठे आरोपों की आड में तत्कालीन कांग्रेस शासन द्वारा बंदी बनाया गया है। तत्पश्चात ६ वर्ष व्यतीत होते हुए भी अभी तक कारागृह में रखा गया है तथा उन के विरुद्ध अपराध भी प्रविष्ट नहीं किए गए है।

राष्ट्रीय अन्वेषण तंत्र, तथा ‘आय.एन.ए.’ ने भी स्पष्ट किया है कि साध्वी प्रज्ञासिंह निर्दोष है। इसलिए उन की मुक्ति के लिए श्रीराम सेना द्वारा राष्ट्रीय आंदोलन आरंभ किया जाएगा। इस आंदोलन के एक भाग के रूप में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री तथा महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को १ करोड पत्र भेजने वाले हैं, ऐसी जानकारी श्रीराम सेना के संस्थापक अध्यक्ष श्री. प्रमोद मुतालिक ने हुब्बळ्ळी की पत्रकार परिषद में दी।

श्रीराम सेना एवं हिन्दू जनजागृति समितिद्वारा यह पत्रकार परिषद आयोजित की गई।

इस अवसर पर सनातन की कर्नाटक राज्य प्रसार सेविका कु. प्रियांका स्वामी, हिन्दू जनजागृति समिति के राज्य समन्वयक श्री. गुरुप्रसाद, केसरी समाचारपत्र के संपादक श्री. राघवेंद्र कुलकर्णी, अधिवक्ता श्री. मनोज हानगल एवं श्री. राघवेंद्र कठारे उपस्थित थे। इस पत्रकार परिषद को सभी स्थानीय प्रसारमाध्यम एवं दूरचित्रप्रणालों के प्रतिनिधि उपास्थित थे।

क्या ऐसी आशा कर सकते है कि शासन इन १ करोड पत्रोंपर ध्यान देंगी ?

श्री माता अमृतानंदमयी देवी ने प्रधानमंत्री से मुलाकात की

श्री माता अमृतानंदमयी देवी ने आज प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी के आवास पर उनसे मुलाकात कर उन्‍हें आर्शीवाद दिया। 

श्री माता अमृतानंदमयी ने नमामि गंगे कार्यक्रम के प्रति अपनी गहरी रूचि दिखाई। प्रधानमंत्री ने स्‍वच्‍छ भारत अभियान में माता अमृतानंदमयी के महान सहयोग के लिए उनको धन्‍यवाद दिया और उनसे गंगा नदी के थाला क्षेत्रों के पांच राज्‍य के गांवों में शौचालय निर्माण परियोजना शुरू करने का आग्रह भी किया, जिस पर वे राजी हो गई। 


धर्म परिवर्तन कर चुके दलितों को आरक्षण का लाभ नहीं

केंद्र सरकार ने उस याचिका का विरोध करने का फैसला लिया है, जिसमें मांग की गई है कि हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई या इस्लाम धर्म अपनाने वाले दलितों का एससी का दर्जा बरकरार रखा जाए। सरकार का तर्क है कि जातिवाद और छुआछूत सिर्फ हिंदू धर्म में ही हैं और शेड्यूल्ड कास्ट्स नाम से अलग कैटिगरी इसी वजह से बनानी पड़ी है।

SC स्टेटस अभी यह सिर्फ हिंदुओं, सिखों और बौद्धों के लिए सीमित है। एक याचिका में मांग की गई है कि इस दर्जे को धर्म आधारित न रखते हुए उन हिंदू 'अछूतों' को भी दिया जाए, जो इस्लाम या ईसाई धर्म अपना लेते हैं।

इस मांग के विरोध में बीजेपी सरकार का कहना है कि 'छुआछूत' हिन्दू धर्म का एक बुरा पहलू थी और इसने प्रभावित जातियों को इज्जत, आत्म सम्मान और अन्य मानवीय अधिकारों से वंचित रखा। इस कुप्रथा को सिर्फ हिंदू धर्म से जोड़ते हुए सरकार कहती है कि 'सामाजिक पिछड़ापन' धर्मांतरण करने वालों को उन दलितों जैसी स्थिति में नहीं लाता, जो 'छुआछूत' की वजह से पिछड़ेपन के शिकार हुए हैं।

तर्क यह दिया गया है कि संविधान विधायिका में दलितों और आदिवासियों को आरक्षण इसलिए देता है, ताकि उनके साथ सदियों से हुए सामाजिक अन्याय की भरपाई की जा सके। और अगर इस बेनिफिट को धर्मांतरण करने वालों भी दिया जाने लगा, तो यह एससी और एसटी से संबंध रखने वाले लोगों के हितों पर कब्जा करने जैसा होगा।

बीजेपी सरकार ने इस मसले पर साफ स्टैंड ले लिया है, लेकिन यूपीए सरकार ने 2005 में इस मुद्दे की स्टडी के लिए नैशनल कमिशन बनाकर थोड़ा और टाइम लेने की रणनीति अपनाई थी। इसके बाद उसने 2011 में 'जाति और आर्थिक आधार पर जनगणना' के डेटा का इंतजार करने का फैसला किया था।

सामाजिक न्याय मंत्रालय ने केंद्रीय कानून मंत्रालय को विस्तृत डीटेल देते हुए कहा है कि धर्मांतरण करने वालों को एससी का दर्जा देने की मांग करने वाली याचिका का विरोध किया जाए।

हिंदू के धर्मांतरण का अर्थ ही उसके विरुद्ध हिंसा है - तरुण विजय

अगर हम गरीब हमेशा से ही थे तो हमें लूटने और आक्रमण करने क्यों लोग आए? अगर हम अंगरेजों के आने के बाद ही पढ़े-लिखे बने तो ताजमहल बनाने वाले, रामेश्वर और तंजौर के विश्व को चकित करनने वाले शिल्पों की नापजोख, आकार के प्रमाण और सदियों तक स्थिर रहने वाली निर्माण शैली किसने दी?

अगर भारत के हिंदू सांप्रदायिक, अल्पसंख्यक-विरोधी और घृणा में डूबे असहिष्णु थे तो सेंट थॉमस को केरल में किन लोगों ने सत्कार से रखा। किन्होंने पारसी, यहूदी और तिब्बती तमाम खतरे उठा कर भी अपनी आत्मीयता में संजो कर रखे और उनको भरपूर समान अवसर, समान अधिकार दिए?

आजादी के बाद वामपंथी बौद्धिकता का दंश इस कदर प्रभावी हुआ कि आत्मदैन्य और सरहद पार की वफादारी राजनीति का स्वीकार्य चलन बना गया, जो शिक्षा संस्थानों तक इतने गहरे उतरा कि दो-तीन पीढ़ियां स्वयं और अपने पुरखों के प्रति दीनता, हेयता, तिरस्कार से देखने लगीं। अंगरेजों ने रेललाइनें बिछा कर देश को एक किया, नहीं नहीं, एक देश बनाया, आइसीएस के लौह ताने-बाने ने प्रशासनिक इकाई मजबूत की, उन्होंने नक्शे दिए, भाषा दी, ज्ञान-विज्ञान दिया, तहजीब सिखाई, नई दिल्ली बना कर हमें सौंपी, यानी कि कुल जमा हमें आदमी बनाया।

जाहिर है कि जब गोरों ने हमें आदमी बनाया तो मुल्क में जो भी अच्छा, खराब हो, उसकी शिकायत या रपट तो अब्बा हुजूर से की ही जानी चाहिए। चर्चों पर हमले हुए तो अमेरिका, ब्रिटेन सहित ईसाई देश चौकन्ने हुए, उनके संवाददाता सब कुछ छोड़ कर बस ईसाइयों पर हिंदुत्ववादियों के आघात पर फोकस करने लगे। अभी मैं आदिस अबाबा से लौटा। वहां सब कुछ यानी विकास, नया तंत्र, नई आशा, नया विश्वास वगैरह सुनने के बाद जो सवाल पूछा गया, वह था- यदि मुंबई के पूर्व पुलिस प्रमुख जूलियो रिबेरो भी इस बुढ़ापे में, सिर्फ ईसाई होने के नाते स्वयं को असुरक्षित समझते हैं तो यह कैसी सुरक्षा है? कैसा विकास है?

क्या जवाब देंगे आप?

क्या रिबेरो साहब सच में असुरक्षित हैं? पांच लाख कश्मीरी हिंदू घर से बेइज्जत करके निकाले गए। उनकी स्त्रियों पर अंतहीन पाशविक अत्याचार हुए। कितने हिंदू अमेरिका और ब्रिटेन से मदद मांगने गए या भारत में असुरक्षित होने का बयान दिया? दिल्ली में छह-सात चर्चों पर हमले या चोरी और डकैती की खबरों के साथ ही दो सौ हिंदू मंदिरों में चोरी की खबरें भी आर्इं। एक थी खबर, दूसरी को खबर ही नहीं माना गया।

हमला चर्च पर हो तो भी, बाकी पर हो तो भी, एक भी हो तो भी बहुत है। बराबर का निंदनीय है और ईमानदारी से यह सुनिश्चित करना ज्यादा जरूरी है कि अल्पसंख्यकों पर न सिर्फ कोई भी हमला न हो, बल्कि अगर वे सबसे ज्यादा सुरक्षित हों तो उस राज में हों जिसे लोग साधारणत: बहुसंख्यकों के साथ जोड़ते हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो हम अपने धर्म, अपनी विचारधारा के प्रति न्याय नहीं करते।

लेकिन अभी तक चर्च पर हमलों और ईसाई आस्था की सम्मानजनक प्राणवाहिनी ननों पर हमले की जितनी खबरें आई हैं और उन हमलों में शामिल जो अभियुक्त पकड़े गए हैं उनमें से कितनों से यह पता चलता है कि वे दूसरी आस्था के हिंसक के लोगों की सुनियोजित योजना का परिणाम था? प्राय: सभी में, जिनमें बंगलुरु के अभियुक्तों में सभी के ईसाई आक्रामक होना भी सिद्ध हुआ। चोर, डकैत, घटिया, बीमार मानसिकता के लोग सामने आए।

हिंदुओं पर घृणा के हमले किसे लाभ पहुंचाते हैं? क्यों इस देश और उसकी छवि की रक्षा में सबकी समान दावेदारी और साझेदारी नहीं है? क्या रिबेरो साहब असुरक्षित महसूस करेंगे और यह हम सबके लिए सुखद होगा? जिन रिबेरो साहब को हमने देश की आन-बान, शान और कठोर प्रशासनका प्रतिमान माना, क्या उनकी सुरक्षा, उनकी संवेदना, उनके मन की भावना का अनादर करके हम अपनी भारतीयता को गौरवान्वित करेंगे? हठात तब महसूस होता है कि रिबेरो साहब ईसाई हैं।

अगर कोई यह मानता है कि हिंदू, हिंदुत्व पर आघात करके वह हिंदूनिष्ठ संगठनों पर राजनीतिक आघात कर रहा है, तो वह निहायत गलत सोचता है। हिंदू धर्म का गौरव सबकी साझी जिम्मेदारी है। कोई एक-दो या खास संगठन हिंदुओं की अकेली आवाज नहीं बन सकते, न बनना चाहिए। हिंदुओं का प्रतिशत निकाला जाए तो वैसे भी अधिकांश इन हिंदूनिष्ठ संगठनों के विपक्ष में भी मत देते हैं। दिल्ली में क्या हुआ? क्या यहां के हिंदुओं ने हिंदूनिष्ठ संगठनों के पक्ष में हिंदू होने के नाते मत दिया?

इसलिए कृपया अपनी राजनीतिक तीरंदाजी के लिए हिंदुओं के खिलाफ घृणा फैलाने और उन्हें राक्षसी मिजाज वाला सिद्ध करने की जल्दबाजी मत कीजिए। इससे देश का अहित ही होगा। अगर हिंदू सच में घृणा करने वाला अतिरेकी बनेगा तो फिर इस देश में कौन किसको बचाएगा, या बचा पाएगा यह बताइए?

घृणा और बर्बरता के आक्रमण झेलते आने के बावजूद अगर हिंदू ने घृणा और बर्बरता नहीं अपनाई तो इसी का नतीजा है कि भारत न तो थियोक्रेटिक स्टेट बना और जब तक हिंदू हैं वे इसे कभी भी वैसा बनने नहीं देंगे। यह गारंटी है।

लेकिन एक बार यह तो देखिए कि हिंदू ने क्या-क्या झेला है? अभी कुछ माह पूर्व तिरुपति-तिरुमाला में जो घटना हुई उस पर न तो कोई सेक्युलर बोला, न रिबेरो साहब जैसे बोले। वहां पास्टर सुधीर नामक पादरी पवित्र बालाजी मंदिर के स्वर्ण कलश की पृष्ठिभूमि में, सुरक्षा-दायरा तोड़ कर एक हिंदू को ईसाई बनाने पहुंचा। उसका वीडियो लिया। उसमें बोला कि तुम्हारा भगवान झूठा और शैतान है- इसलिए मैं तुम्हें सच्चे ईश्वर की शरण में ला रहा हूं। इस धर्मांतरण का वीडियो फेसबुक पर आते ही हंगामा हुआ, पादरी गिरफ्तार हुआ।

तो भी क्या कहीं इस पर आवाज उठी? शायद ज्यादा लोगों के ध्यान में भी यह घटना न होगी।

हिंदू के धर्मांतरण का अर्थ ही उसके विरुद्ध हिंसा है। जीजस के प्रति आदर और श्रद्धा का भाव तो रखते ही हैं। करुणा, दया, ममता, बलिदान, संघर्ष, अपनों के विश्वासघात के बावजूद सत्य की शरण के वे महान प्रतीक हैं। पर इसका अर्थ यह नहीं हो सकता कि हम चर्च के धर्मांतरण व्यापार का भी समर्थन करें। जीजस के प्रति सम्मान रखते हुए भी वैटिकन के षड्यंत्रों और धर्मांतरण का अपनी आखिरी सांस तक विरोध हमारा संवैधानिक अधिकार क्यों न माना जाए?

जब किसी हिंदू का धर्मांतरण होता है तो उसके देवी-देवता झूठे बताए जाते हैं। अचानक राम, कृष्ण, सीता, विष्णु, शिव, दुर्गा उसके लिए त्याज्य और तिरस्कार योग्य हो जाते हैं। जो शब्द, मंत्र, आस्था उसकी धमनियों में हजारों वर्ष से बहती आई, उसके विरुद्ध वह खराब, बहुधा आक्रामक अपशब्दों के साथ पुस्तकें, इश्तहार लिखता है। अचानक होली, दीवाली, दशहरा, रक्षाबंधन उसके लिए विदेशी, पराए और अंधविश्वास के खराब प्रतीक हो जाते हैं। अचानक उसे अमेरिका की सीनेट में अपने ही देश के खिलाफ गवाही देना उचित प्रतीत लगने लगता है। क्या यह स्वीकार करना मेरा सेक्युलरवाद होना चाहिए?

जनधन की कसौटी है पारस्परिक विश्वास और आत्मीयता। भारत के मन पर सिर्फ आस्था की संकीर्णता के कारण आघात हमारे सामाजिक सौमनस्य की चादर मजबूत नहीं कर सकते। आस्था पर चोट न इधर होनी चाहिए, न उधर। एकाध सिरफिरे, अधपढ़े लोग कहीं अर्थहीन बयान दें, तो उसे सवा अरब की आवाज मानना गलत होगा। अपनी आस्था का प्रथम बिंदु यदि भारत नहीं है, तो ऐसी आस्था हमें त्याज्य माननी चाहिए। भारत से बढ़ कर कुछ हो नहीं सकता- यह बात अपराक्रम्य है।

- लेखक : तरुण विजय

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