क्या #Covishield बनाने वाली #AstraZeneca ने सच में ब्रिटिश कोर्ट में साइड इफेक्ट की बात स्वीकार की है ?


कोरोना की दवा बनाने वाली ब्रिटेन की फार्मास्युटिकल कंपनी एस्ट्राजेनेका (AstraZeneca) ने पहली बार स्वीकार किया है कि उनकी कोविड-19 वैक्सीन से गंभीर साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं. एस्ट्राजेनेका ने यूके हाईकोर्ट में कबूल किया कि कोविड-19 वैक्सीन से थ्रोम्बोसाइटोपेनिया सिंड्रोम (TTS) जैसे साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं. 

थ्रोम्बोसाइटोपेनिया सिंड्रोम से शरीर में खून के थक्के जमने (Blood Clot) लगते हैं या बॉडी में प्लेटलेट्स तेजी से गिरने लगते हैं. बॉडी में ब्लड क्लॉट की वजह से ब्रेन स्ट्रोक या कार्डियक अरेस्ट की आशंकाएं बढ़ जाती हैं. 

एस्ट्राजेनेका ने इस साल फरवरी महीने में यूके हाईकोर्ट के समक्ष वैक्सीन के साइड इफेक्टस के आरोपों को स्वीकार किया. लेकिन साथ में कंपनी ने वैक्सीन के पक्ष में अपने तर्क भी रखे. बता दें कि कंपनी इस वैक्सीन को दुनियाभर में कोविशील्ड और वैक्सजेवरिया नाम से बेचती है. 

एस्ट्राजेनेका ने UK हाईकोर्ट के समक्ष असलियत में क्या-क्या कहा?

एस्ट्राजेनेका के खिलाफ ब्रिटेन के जेमी स्कॉट नाम के शख्स ने केस दर्ज कराया है. स्कॉट का नाम है कि कंपनी की कोरोना वैक्सीन की वजह से वह थ्रोम्बोसाइटोपेनिया सिंड्रोम की समस्या से जूझ रहे हैं. वह ब्रेन डैमेज का शिकार हो गए थे. 

कंपनी की कोरोना वैक्सीन के खिलाफ दर्जनभर से ज्यादा लोगों ने कोर्ट का रुख किया है. इन लोगों का आरोप है कि वैक्सीन लेने के बाद उन्हें साइड इफेक्ट्स का सामना करना पड़ा है. इन लोगों ने मुआवजे की मांग की है. ऐसे में एस्ट्राजेनेका ने कोर्ट में वैक्सीन के साइड इफेक्ट्स को लेकर क्या बातें कहीं? ये जान लेना बहुत जरूरी है:-

1)  एस्ट्राजेनेका ने कोर्ट के समक्ष दायर लीगल डॉक्यूमेंट में कहा है कि यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड के साथ मिलकर तैयार की गई कोरोना वैक्सीन से साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं. ये साइड इफेक्ट्स थ्रोम्बोसाइटोपेनिया सिंड्रोम जैसे हो सकते हैं. लेकिन ये बहुत दुर्लभ हैं

2) एस्ट्राजेनेका ने कोर्ट को बताया कि लेकिन ये जान लेना भी जरूरी है कि कोरोना वैक्सीन नहीं लगवाने की स्थिति में भी थ्रोम्बोसाइटोपेनिया सिंड्रोम हो सकता है. ऐसे में ये कहना कि वैक्सीन लगवाने के बाद लोग इस सिंड्रोम से जूझ रहे हैं, सही नहीं है.

3) कंपनी का कहना है कि कई स्वतंत्र स्टडीज में इस वैक्सीन को कोरोना से निपटने में बेहद कारगर बताया गया  है. ऐसे में किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले इन स्टडीज पर गौर करना जरूरी है.

4) कंपनी का मानना है कि वैक्सीन के साइड इफेक्ट्स बेहद दुर्लभ हैं. कंपनी ने कहा कि मरीज की सुरक्षा हमारी सर्वोपरि प्राथमिकता है. हमारी दवाएं उचित मानकों पर खरी उतरी हैं और हमने वैक्सीन सहित सभी दवाओं का सुरक्षित उपयोग सुनिश्चित किया है.

5) कंपनी ने कोर्ट के समक्ष कहा कि एस्ट्राजेनेका-ऑक्सफोर्ड वैक्सीन के क्लीनिकल ट्रायल और दुनियाभर में इसकी स्वीकार्यता से पता चलता है कि बड़े पैमाने पर टीकाकरण प्रोग्राम से लाभ हुआ है, जो वैक्सीन के संभावित साइड इफेक्ट्स के जोखिम को कम करता है.

6) कंपनी का कहना है कि कोविड-19 महामारी के दौरान वैक्सीन की मदद से दुनियाभर में 60 लाख लोगों की जिंदगियां बचाई गई हैं. 

7) एस्ट्राजेनेका का कहना है कि वैक्सीन लगने के बाद कई तरह की समस्याओं का दावा कर रहे लोगों की स्थिति से वे चिंतित हैं. लेकिन हम अभी भी अपने इस दावे पर कायम हैं कि इसके दुष्प्रभाव अति से अति दुर्लभ मामलों में ही सामने आ सकते हैं. 

एस्ट्राजेनेका ने सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एसआईआई) के साथ मिलकर भारत के पुणे में कोविशील्ड को तैयार किया था. कोरोना के बाद से ही देशभर में अचानक से लोगों के दम तोड़ देने की घटनाएं आम होने लगी हैं. ऐसे में कोरोना वैक्सीन को संदेह की नजरों से देखा जाने लगा. लेकिन अब एस्ट्राजेनेका के इस बयान के बाद कोर्ट में आगे की कार्यवाही क्या मोड़ लेगी. इस पर सभी की नजरें होगी. लेकिन भारत में विपक्ष पूरी बात को न जानतें हुए केंद्र सरकार के निर्णय पर सवाल उठा रहा है, जिसे #AstraZeneca के असली बयान के बाद पूरी तरह समझा जा सकता है. 

जेनरिक दवाओं के लिए अंतर्राष्ट्रीय केन्द्र बनाएं : उपराष्ट्रपति

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भारतीय चिकित्सा प्रणालियों को बढ़ावा दें; भारतीय चिकित्सा प्रणालियों के मानकीकरण के लिए काम करेः उपराष्ट्रपति 70वें भारतीय फॉर्मास्युटिकल कांग्रेस को संबोधित किया सभी प्रमुख दवा कम्पनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों से बातचीत की

उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडू ने दवा उद्योग का आह्वान करते हुए कहा कि वे भारत को जेनरिक दवाओं का एक अंतर्राष्ट्रीय केन्द्र बनाने की दिशा में कार्य करें।

उपराष्ट्रपति ने आज नोएडा में 70वें भारतीय फॉर्मास्युटिकल कांग्रेस को संबोधित करते हुए कहा कि भारत विश्वभर में जेनरिक दवाओं का सबसे बड़ा उत्पादक बन गया है। वैश्विक निर्यातों में भारत की जेनरिक दवाओं की 20 प्रतिशत हिस्सेदारी है। भारतीय दवा उद्योग गुणवत्ता और कीमत के मामले में बेहतर है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि जेनरिक दवाओं के मामले में वैश्विक तौर पर अग्रणी होने के साथ-साथ भारत को भारतीय चिकित्सा प्रणाली को भी बढ़ावा देना चाहिए। उन्होंने युवा अनुसंधानकर्ताओं का आह्वान करते हुए कहा कि वे भारतीय चिकित्सा प्रणाली के मानकीकरण की दिशा में कार्य करें और वैश्विक तौर पर स्थापित प्रयौगिक तौर-तरीके का इस्तेमाल करते हुए इन पारम्परिक चिकित्सा प्रणालियों को गुणात्मकता, वैधता और प्रभावोत्पादकता स्थापित करें।

उपराष्ट्रपति ने दवा कम्पनियों का आह्वान करते हुए कहा कि वे कॉरपोरेट-सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) से जुड़े नियमों से आगे जाकर लोगों की जान बचाएं और उन लोगों को अन्य अनिवार्य दवाएं उपलब्ध कराएं, जो उन्हें खरीद नहीं सकते। उन्होंने कहा कि भारत जैसे एक देश के लिए सस्ती दरों पर स्वास्थ्य सुविधाएं और दवाएं उपलब्ध कराना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि भारत विकासशील देशों में सस्ती दरों पर जीवन रक्षक दवाएं उपलब्ध करा रहा है।

इससे पहले, श्री नायडू ने सभी प्रमुख फॉर्मास्युटिकल कम्पनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों से बातचीत की। इस सम्मेलन के उद्घाटन अवसर पर देशभर से आए 5000 से अधिक प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।

इस अवसर पर उत्तर प्रदेश के उत्पाद और मद्य निषेध मंत्री श्री जय प्रताप सिंह और दवा उद्योग के अन्य अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।


#NPPA ने 30 जरूरी दवाओं के दाम घटाए, देखिये पूरी सूची


मरीजों को राहत देते हुए नेशनल फॉर्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (एनपीपीए) ने बुधवार 17 जनवरी 2018 को 30 जरूरी दवाओं की कीमतें घटा दी हैं। वहीं, 3 जरूरी दवाओं की कीमतें फिर से रिवाइज की गई हैं। इनमें डायबिटीज, कैंसर और हाई बीपी में इस्तेमाल होने वाली दवाएं शामिल हैं। बता दें कि एनपीपीए समय-समय पर दवाओं का मैक्सिमम प्राइज तय करती है, जिससे मरीजों को महंगी दवाओं से छुटकारा मिल सके। 

एनपीपीए ने एक नोटिफिकेशन जारी कर कहा, "ड्रग्स (प्राइस कंट्रोल) अमेंडमेंट ऑर्डर-2013 के तहत 30 दवाओं की कीमतें घटाई गई हैं। एनपीपीए ने नेशनल लिस्ट ऑफ इसेंन्शियल मेडिसिन 2015 के तहत अब तक 996 दवाओं के रेट घटाए हैं। दिसंबर तक 966 दवाओं के रेट एनपीपीए ने तय किए थे।

एनपीपीए ने कहा है, "मैन्युफैक्चरर्स तय कीमत से ज्यादा नहीं ले सकते हैं। अगर कंपनियां सीलिंग प्राइस और रूल्स का पालन नहीं करती हैं तो उन्हें वसूली गई एक्स्ट्रा कीमत ब्याज समेत जमा करानी पड़ेगी। कंपनियों को इन दवाओं की कीमतों में साल में 10% तक की ही बढ़ोतरी करने की इजाजत होगी।"

एनपीपीए ड्रग्स (प्राइस कंट्रोल) ऑर्डर-2013 के तहत शेड्यूल-1 में आने वाली जरूरी दवाओं की कीमत तय करता है। सरकार जरूरत के हिसाब से जरूरी दवाओं की लिस्ट तैयार करती है, जिसमें समय-समय पर नई दवाओं को शामिल किया जाता है। लिस्ट को नेशनल लिस्ट ऑफ एसेन्शियल मेडिसिन (एनएलईएम) कहा जाता है। इन लिस्ट में शामिल दवाइयों को काफी किफायती कीमत पर दिलाने की जरूरत होती है,  इसलिए समय-समय पर कीमतें कम की जाती हैं। इसका मकसद सभी ब्रांड की एक ही दवा की कीमत बराबर रखना है, जिससे कस्टमर्स अपनी सुविधा के अनुसार चुनाव कर सकें।  

दवाओं की सूची देखने के लिए नीचे दी गई लिनक्स पर जा सकतें हैं :

झूठे दावे की दवाओं के विज्ञापन पर पैनी नजर, होगी कठोर कार्यवाही


आयुष क्षेत्र में भ्रामक विज्ञापनों के सह-विनियमन के लिए आयुष मंत्रालय और भारतीय विज्ञापन मानक परिषद् (एएससीआई) के बीच समझौता 

आयुष औषधियों के विज्ञापनों में कदाचार गतिविधियों में कमी लाने के लिए आयुष मंत्रालय ने भारतीय विज्ञापन मानक परिषद् (एएससीआई) के साथ सहयोग के लिए समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। आयुर्वेद, योग व प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी औषधियों, उपचारों और संबंधित सेवाओं के संबंध में भ्रामक विज्ञापनों के मामलों से निपटने के लिए एएससीआई प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में इन विज्ञापनों की व्यापक रूप से निगरानी करेगी। इस समझौता ज्ञापन पर नई दिल्ली में आयुष मंत्रालय में सचिव श्री अजीत. एम. शरण की मौजूदगी में आयुष मंत्रालय में सलाहकार (आयुर्वेद) डॉ. डी. सी. कटोच और एएससीआई के अध्यक्ष श्री एस.के.स्वामी ने हस्ताक्षर किए।

आयुष मंत्रालय द्वारा एएससीआई को स्वतः निगरानी अधिदेश दिया गया है ताकि आयुष क्षेत्र में संभावित भ्रामक विज्ञापनों को अभिनिर्धारित कर इसकी उपभोक्ता शिकायत परिषद् (सीसीसी) के माध्यम से शिकायतों पर कार्रवाई की जाए। आयुष मंत्रालय भी भ्रामक विज्ञापनों के विरूद्ध प्राप्त शिकायतों को एएससीआई भेजेगा जिनकी एएससीआई नियमावली और दिशा निर्देशों का प्रयोग कर समीक्षा की जाएगी। समझौता ज्ञापन में यह भी अपेक्षित है कि एएससीआई औषधि एवं चमत्कारिक उपचार (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम, 1954 और इसके अंतर्गत बनाई गई नियमावली का संभावित रूप से उल्लंघन करने वाले सभी विज्ञापनों और एएससीआई की सीसीसी की सिफारिशों के अननुपालन को आयुष मंत्रालय को सूचित करेगा ताकि मंत्रालय आगे कार्रवाई कर सके।

इस साझेदारी पर टिप्पणी करते हुए श्री अजीत.एम.शरण, सचिव, आयुष मंत्रालय ने कहा, “भारतीय उपभोक्ताओं को सुरक्षित और प्रभावशाली औषधियों की पहुंच सुनिश्चित करने के लिए आयुष मंत्रालय द्वारा उठाया गया ये एक और महत्वपूर्ण कदम है। यह व्यवस्था सुनिश्चित करेगी कि रोगों और विकारों के लिए दावा करने वाला कोई भी विज्ञापन जो मौजूदा विनियमावली का उल्लंघन करता है, उसकी सूचना शीघ्र हमें दी जाए। ऐसे विज्ञापनों को प्रभावशाली रूप से हटाने के लिए हमने एएससीआई के साथ समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए हैं ताकि झूठे दावे करने वाले उत्पादों को बेचने वाले बेईमान विनिर्माताओं से उपभोक्ताओं को बचाया जा सके।”

श्री एस.के.स्वामी, अध्यक्ष, एएससीआई ने कहा, “आयुष उन 3 प्रमुख क्षेत्रों में से है जहां भ्रामक विज्ञापनों की घटनाएं अधिक हैं और आयुष क्षेत्र में औषधि एवं चमत्कारिक उपचार विनियमावली का उल्लंघन करते हुए कुछ रोगों के उपचार का दावा करने वाले कई विज्ञापन चिंता का विषय है। आयुष मंत्रालय के साथ एएससीआई की साझेदारी इस क्षेत्र में भ्रामक विज्ञापनों को प्रभावी रूप से रोकने में हमारे प्रयासों को आवश्यक सहायता प्रदान करेगी।”

#AYUSH और #USP के बीच औषधियों की गुणवत्ता के लिए समझौता हुआ

 

आयुष मंत्रालय के अधीनस्थ भारतीय औषधि एवं होम्योपैथी के औषधकोश आयोग और अमरीका फॉर्माकोपिएल कन्वेंशन ने आज नई दिल्ली में परम्परागत औषधि और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान, विकास और विज्ञान आधारित मापदंडों को बढ़ावा देने के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए सहमति के पत्र (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए। दोनों पक्षों के बीच हुए इस ऐतिहासिक समझौते का उद्देश्य परम्परागत दवाइयों और वनस्पति पूरक आहार की गुणवत्ता और सुरक्षा को बढ़ावा देना है। साथ ही इस समझौते का उद्देश्य दोनों देशों और वैश्विक स्तर पर मिलकर जन-स्वास्थ्य में बेहतरी लाना है। 

इस सहमति के पत्र पर भारतीय औषधि एवं होम्योपैथी के औषधकोश आयोग के निदेशक डॉ. राजीव कुमार शर्मा और यू.एस. फॉर्माकोपिएल कन्वेंशन के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट डॉ. के.वी सुरेन्द्रनाथ ने हस्ताक्षर किए। इस अवसर पर आयुष मंत्रालय में सचिव श्री अजीत मोहन शरण, आयुष मंत्रालय में संयुक्त सचिव श्री अनिल गनेरीवाला, श्री अनुराग श्रीवास्तव, संयुक्त सचिव आयुष, वैश्विक स्वास्थ्य केन्द्र, यू.एस. नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूड, राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान और दक्षिण एशियाई कार्यक्रम के निदेशक डॉ. प्रीथा राजारमन और अमरीकी दूतावास से वैश्विक मामलों के कार्यालय, स्वास्थ्य और जन-सेवाओं के विभाग में सलाहकार डॉ. विद नुकाला मौजूद थे। 

1. परम्परागत औषधि/जड़ी-बुटी और वनस्पति पूरक आहार उत्पादों की गुणवत्ता को लेकर जागरूकता बढ़ाना भी सहमति पत्र के उद्देश्यों में शामिल है। 

2. परम्परागत दवाइयों और वनस्पति आहार की उपलब्धता को बढ़ाकर जरूरतमंद लोगों तक इसकी पहुंच बनाना। 

भारतीय औषधि एवं होम्योपैथी का औषधकोश आयोग आयुष मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्त संस्था है जिसका मुख्य कार्य आयुर्वेद, सिद्ध, यूनानी और होम्योपैथी के अंतरगत इस्तेमाल होने वाली दवाइयों के लिए औषधकोश मापदंडों को विकसित करना है। 

वहीं, यू.एस. फॉर्माकोपिएल कन्वेशन (यूएसपी) एक वैश्विक स्वास्थ्य संगठन है, जोकि जन मापदंडों द्वारा जीवन को बेहतर बनाने का काम करता है और इस तरह का कार्यक्रम चलाता है, जिससे कि दवाइयों और खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता, सुरक्षा और फायदा सुनिश्चित हो सके। 

इस अवसर पर आयुष मंत्रालय में सचिव श्री अजीत मोहन शरण ने कहा कि यह एक ऐतिहासिक समझौता है, जिससे परम्परागत औषधियों के क्षेत्र में सहयोग और अधिक बढ़ेगा। 

#NRDC ने मधुमेह और मलेरिया के आयुर्वेदिक उपचार के लिए डाबर से किया समझौता


विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधीन वैज्ञानिक एवं अनुसंधान विभाग के राष्‍ट्रीय अनुसंधान विकास निगम (एनआरडीसी) ने मलेरिया के उपचार के लिए आयुष-64 और मधुमेह के उपचार के लिए आयुष-82 नामक आयुर्वेदिक दवाओं को बाजार में उतारने के लिए मैसर्स डाबर इंडिया लिमिटेड के सा‍थ एक लाइसेंस-समझौता किया है। 

इन दोनों दवाओं को आयुष (आयुर्वेद, योग और प्राकृतिक चिकित्‍सा, यूनानी, सिद्ध एवं होम्‍योपैथी) मंत्रालय की स्‍वायत्‍तशासी संस्‍था केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (सीसीआरएएस) ने विकसित किया है। उक्‍त लाइसेंस समझौते पर एनआरडीसी की तरफ से डॉ. एच. पुरुषोत्‍तम और डाबर इंडिया लिमिटेड की तरफ से वहां के स्‍वास्‍थ्‍य सुविधा अनुसंधान प्रमुख डॉ. जेएलएन शास्‍त्री ने हस्‍ताक्षर किए। 

दोनों समझौतों पर हस्‍ताक्षर होने के समय विज्ञान एवं औद्योगिक अनुसंधान विभाग के वैज्ञानिक (एफ) और एनआरडीसी बोर्ड  के निदेशक श्री बी.एन. सरकार तथा एनआरडीसी और डाबर के वरिष्‍ठ अधिकारी उपस्थित थे। समझौतों का आदान-प्रदान आयुष राज्‍य मंत्री श्री श्रीपद यस्‍सो नायक और आयुष सचिव श्री अजित एम.शरण की उपस्थिति में हुआ। उल्‍लेखनीय है कि प्रौद्योगिकी लाइसेंस एजेंसी ने अब तक सीसीआरएएस द्वारा विकसित 10 प्रौद्योगिकियों का लाइसेंस भारत में 30 से अधिक कंपनियों को दिया है।

देश में महामारी के रूप में फैलने वाले मलेरिया के प्रभावशाली उपचार के लिए सीसीआरएस द्वारा विकसित आयुर्वेदिक दवा आयुष-64 बहुत कारगर है। उल्‍लेखनीय है कि प्राचीन समय से आयुर्वेद के वैद्य इसका विषम ज्‍वर के रूप में उल्‍लेख करते रहे हैं। यह दवा कई तरह की जड़ी-बूटियों से तैयार की गई है और इसकी विस्‍तृत फार्माकॉलॉजिकल, टॉक्सिकॉलॉजिकल और क्‍लीनिकल जांच की गई है।

मधुमेह की दवा आयुष-82 को भी सीसीआरएएस ने विभिन्‍न जडि़यों के मिश्रण से तैयार किया है। ये दोनों दवाएं मलेरिया और मधुमेह के उपचार के लिए लाखों लोगों को सहायता देगी।

6 फार्मा पार्क 2 चिकित्सा उपकरण पार्क स्थापित किए जाएंगे: अनंत कुमार


रसायन एवं उर्वरक मंत्री श्री अनंत कुमार ने फार्मा क्षेत्र की दवा उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए कार्यबल की सिफारिशें जारी कर दीं है। इस अवसर पर उन्होंने कार्यबल की सराहना की कि उसने गहन विचार-विमर्श के बाद समय के अंदर अपनी रिपोर्ट पेश की है। श्री अनंत कुमार ने कहा कि देश का फार्मा उद्योग उभरता हुआ उद्योग है, जिसकी क्षमता 30 अरब डॉलर है। इसे वर्ष 2020 तक 55 अरब डॉलर तक बढ़ाने के लिए सरकार फार्मा उद्योग की हर संभव मदद करेगी। उन्होंने बताया कि सरकार लगभग 30 हजार करोड़ रुपये का निवेश कर के देश में 6 फार्मा पार्क और और 2 चिकित्सा उपकरण पार्कों की स्थापना करेगी। 

मंत्री महोदय ने कहा कि केंद्र सरकार के प्रोत्साहन से फार्मा उद्योग में आमूल बदलाव आया है। बल्क ड्रग के संबंध में कटोच समिति की सिफारिशों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इन सिफारिशो को जल्द लागू किया जाएगा। उन्होंने कहा कि दवा क्षेत्र में मानव संसाधन क्षमता निर्माण के लिए सरकार ने कई कदम उठाए हैं। उन्होंने कहा कि पिछले डेढ़ वर्षों के दौरान कई राष्ट्रीय औषधि विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (नाइपर) खोले गए हैं। मौजूदा बजट के तहत राजस्थान, छत्तीसगढ और महाराष्ट्र में तीन नए नाइपर खोले जाने की घोषणा की गई है, जबकि अगले वित्त वर्ष में मध्य प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश और कर्नाटक में इन संस्थानों के गठन का प्रस्ताव है।

औषधि विज्ञान विभाग के सचिव डॉ. वी के सुब्बाराज ने कहा कि भारत की आबादी बहुत बड़ी है और यहां विभिन्न प्रकार के रोग मौजूद हैं। उऩ्होंने कहा कि दवा निर्माण क्षमता और दवाओं के वितरण में सुधार की आवश्यकता है। डॉ. सुब्बाराज ने कहा कि माननीय प्रधानमंत्री के ‘मेक इन इंडिया’ विजन के अनुरूप सस्ती दवाओं तक लोगों की पहुंच बनाना प्रमुख ध्येय है। 

उल्लेखनीय है कि औषधि विज्ञान सचिव की अध्यक्षता में गठित कार्यबल ने नीति समर्थन, बुनियादी ढांचा, कौशल विकास, शुल्क ढांचा, दवा की कीमत संबंधी नीति, नियामक ढांचा और विभिन्न प्रकार के रोगों के बारे में सिफारिशें की हैं। 

#CAETS 2015: ऊर्जा,गतिशीलता व हेल्थकेयर इंजीनियरिंग पर सिफारिशें तैयार


ऊर्जा, गतिशीलता एवं हेल्थकेयर इंजीनियरिंग क्षेत्रों में स्थितरता पर आयोजित शिखर सम्मेलन- सीएटीएस 2015 की सिफारिशें सौंपने के लिए तैयार 

इंटरनेशनल काउंसिल ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्लोनोलॉजिकल साइंसेज की सिफारिशें सरकारों को सुपुर्द करने के लिए तैयार हैं। ‘पाथवेज टू स्सटैनबीलिटी फॉर एनर्जी, मोबेलिटी एंड हेल्थकेयर इंजीनियरिंग’, (सीएटीएस 2015) शिखर सम्मेलन का इस महीने के 13 से 15 के दौरान आयोजन किया गया। तीन दिवसीय कार्यक्रम में बेल्जियम, कनाडा, चीन, फ्रांस, जर्मनी, हंगरी, भारत, जापान, नीदरलैंड, दक्षिण अफ्रीका, स्पेन, स्वीडन, स्वीट्जरलैंड, ब्रिटेन, अमेरिका और उरुग्वे जैसे आदि देशों के प्रख्यात अंतरराष्ट्रीय विद्वानों ने ऊर्जा, गतिशीलता एवं हेल्थकेयर पर अपने विचार रखे। ‘सीएईटीएस कनवोकेशन-2015’ के रूप में इस कार्यक्रम का समापन किया गया। इस दौरान ये सिफारिशें तैयार की गईं। भारत में भारतीय राष्ट्रीय इंजीनियरिंग अकादमी द्वारा सिफारिंशें सरकार को सौंपी जाएंगी।

सामान्य रूप से दीर्घकालिक स्थिरता हासिल करने के लिए ऊर्जा, गतिशीलता और स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र में तकनीकी चुनौती प्रमुख हैं।

ये हैं सिफारिशें :

ऊर्जा:

ऊर्जा संसाधनों में 'स्थिरता और उनकी लागत क्षमता के लिहाज से कम कार्बन गैर जीवाश्म ऊर्जा प्रणालियां का ही दबदबा रहेगा।

वैश्विक ऊर्जा खपत 2010 से 2040 के दौरान 524 से 820 शंख बीटीयू तक चला जाएगा। इसकी वजह से सामान्य परिदृश्य के रूप में वर्तमान में जीएचजी उत्सर्जन वृद्धि दर बढ़कर 40 प्रतिशत तक पहुंच जाएगी। जनसंख्या एवं धन संवर्द्धन के लिहाज से उर्जा विकास की गतिशीलता संचालित हो रही है। इसकी वजह से दुनिया के विभिन्न देशों में इस गतिशीलता को बनाए रखना महत्वपूर्ण है।

ऊर्जा / उत्सर्जन में कमी के लक्ष्यों और समयसीमा स्थापित करने को लेकर कम कार्बन उत्सर्जन के लिए राष्ट्रीय स्तर पर वर्तमान ऊर्जा और उत्सर्जन के भार का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन की करने की आवश्यकता है।

उपयोग पर आधारित ऊर्जा परिदृश्यों का विकास भविष्य की ऊर्जा कुशल प्रणाली तैयार करने के लिए आवश्यक है। बिजली आपूर्ति प्रणाली, परिवहन एवं हिटिंग क्षेत्र इस एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।कोयला आधारित ऊर्जा ने इंजीनियरों को हमेशा से सफाई प्रणाली एवं जीएचजी उत्सर्जन को कम करने की प्रणाली विकसित करने को आकर्षित किया है। इसमें कोयला और बायोमास के लाभकारी उन्नयन, अल्ट्रा सुपर क्रिटिकल दहन और गैसीकरण के लिए एकीकृत गैस संयुक्त चक्र की अवधारणा, को-फायरिंग की प्रक्रिया आदि शामिल है। सिलिकॉन से परे अगली पीढ़ी के सौर सेल ऊर्जा सामग्री, संयुग्म ऑर्गेनिक्स, अकार्बनिक क्वांटम डॉट्स और मिश्रित अर्धचालक आक्साइड के लिए / पेरोक्साइड को स्वीकार किए जाने की जरूरत है।

इसी तरह की चुनौतियां ईंधन सेल्स के लिए उपलब्ध सामग्री और उच्च ऊर्जा घनत्व बैटरी के क्षेत्र में दिख रही है। प्रौद्योगिकी भविष्य की ऊर्जा कुशल प्रणाली को विकसित करने में एक प्रमुख भूमिका निभा सकती है। इसके लिए एकीकृत  फोटोनिक एवं बायो फोटोनिक प्रौग्योगिकी की जरूरत है।

इन मुद्दों पर विचार विमर्श करने वाले विशेषज्ञ समिति ने नैनो कंपोजिट और नैनो संरचित स्टील्स सहित उच्च शक्ति वाले हल्के वजन सामग्री विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया। जिसे निर्माण और परिवहन क्षेत्र में आसानी से स्वीकार किया जा सके।

गतिशीलता:

भविष्य में अर्ध या पूरी तरह से स्वचालित परिवहन के वाहन तैयार करना और भारी भार उठाने के लिए मल्टी एक्सल हाइड्रोलिक ट्रेलरों का निर्माण करना इंजीनियरिंग क्षेत्र के लिए चुनौती होगी। डिजिटल प्रौद्योगिकी क्षेत्र में तेजी से हो रहे विकास के कारण रेल के बिजलीकरण, हवाई, समुद्री यातायात वाहनों के लिए नए द्वार खुलेंगे।पांच डिजिटल शक्तियां जैसे कि कलाज कप्यूंटिंग, मोबाइल प्रौद्योगिकी, सोशल नेटवर्क्स, बिग डाटा एवं रोबोटिक्स इन विकास गतिविधियों पर बड़ा प्रभाव डालेंगे।

निर्माण के दौरान शहरी और ग्रामीण परिवहन के पुनर्गठन के साथ पुल के डिजाइन एवं निर्माण प्रौद्योगिकियों, आभासी गतिशीलता और कार्बन पदचिह्न न्यूनीकरण में ये रोमांचक गतिविधियां जगह ले रही हैं। पुरातन प्रौद्योगिकी के नवीकरण के लिए यह आवश्यक है। सिविल इंजीनियरों के लिए पुलों के डिजाइन, निर्माण, रखरखाव, जीर्णोद्धार भविष्य की प्राथमिकताएं होंगी।

चीन में हुए शहर की रैपिड रेल परिवहन प्रणाली में हाल के घटनाक्रमों को देखते हुए भारत और जापान ने भूमिगत सुरंगों और संरचनाओं के निष्पादन में योजना, डिजाइन और अधिग्रहीत नए इंजीनियरिंग कौशल को लेकर उत्सुकता दिखाई है। इंजीनियरिंग के नजरिये से देखा जाए तो पुर्नचक्रण एवं क्रियाशील सामग्री अनुप्रयोगों ही स्थायी रोडवेज में उच्च प्राथमिकता वाले क्षेत्रों रहे हैं। उभरती अर्थव्यवस्थाओं में जन परिवहन को लेकर कई दुविधाएं हैं। यह निर्बाध संपर्क, बेहतर गतिशीलता, उन्नत सुरक्षा उपायों के प्रवर्तन, वाहनों और समय संस्करण यातायात के कई मांगों को लेकर सड़क के लिए न्यायसंगत आवंटन पर विचार करने के लिए महत्वपूर्ण है।


स्वास्थ्य क्षेत्र:

नए डायग्नोस्टिक उपकरण, अगली पीढ़ी के चिकित्सा उपकरणों और सूचना एवं विश्लेषण के आवेदन के संदर्भ में इंजीनियरिंग चुनौतियों की स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र को इंतजार है।

हाल के नैनो के क्षेत्र में नैनो और डायग्नोस्टिक देखभाल के अग्रिम, बड़े पैमाने पर चिकित्सा एवं दूरदराज के नव निगरानी प्रणाली जल्दी और सुलभ निदान की संभावना में वृद्धि की है। इस व्यवस्था के लिए जमीनी तौर पर तैयार संरचनागत प्रणाली में सहयोगी हो सकता है। इसमें अग्रिम देश की इंजीनियर्स, प्रोडक्ट डिजायनर्स, बिजनेस एनालिस्ट और क्लीनिशियनों की बहुउद्देशीय टीम मददगार साबित हो सकती है।

टीसू इंजीनियरिंग, मैटेरियल साइंस, सेल फिजिक्स एवं डेवेलपमेंटल बॉयोलॉजी सहित रिजेनेरिटिव इंजीनियरिंग अगली पीढ़ी की मेडिकल उपकरण बनाने में कारगर हो सकती है। लोगों में बधिरता एवं दृष्टी दोष की बीमारी की समस्या से निपटने में बायोनिक इयर और आई तकनीकी ने काफी मदद की है। साथ ही इससे इस क्षेत्र में काफी प्रगति हुई है। संक्रामक एवं गैर संक्रामक रोगों के इलाज को लेकर हाल में तैयार सेंसर, दूरसंचार, गतिशीलता इंजीनियरिंग के लिए अगली पीढ़ी के उपकरण प्रौद्योगिकियां प्रमुख भूमिका निभाएंगी। सेंसिंग और डेटा विश्लेषणात्मक कौशल ने गहन स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र में नई परिवर्तनकारी सामग्री के अवसर मुहैया कराएंगे। उन्नत कंप्यूटर आधारित उपकरण सूक्ष्म बायोम डेटा विश्लेष्ण में भारी मात्रा में जैविक रूप से सार्थक अंतर्दृष्टि के लिए आवश्यक हैं।

विशेषज्ञों की एक समिति ने इंजीनियरिंग और स्वास्थ्य देखभाल विज्ञान के अभिसरण के मुद्दे की जांच की। अभिसरण के कारण स्वास्थ्य प्रणालियों में आईसीटी और बड़े एनालिटिक्स प्रभावशाली साबित हों, इसके लिए वे कुछ-कुछ कर रहे हैं। उनके बीच नई दवाओं की खोज में ग्रामीण और शहरी वातावरण और इंजीनियरों की भूमिका में अच्छी तरह से इंजीनियर प्रणालियों की खरीदने की क्षमता सहित कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई है।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी डॉ मंत्री हर्षवर्धन ने पिछले सप्ताह सप्ताह दीक्षांत समारोह का उद्घाटन किया। उन्होंने इन महत्वपूर्ण क्षेत्रों में स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए मजबूत रणनीति सुझाने को लेकर वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय से आग्रह किया है। मंत्री ने ‘ट्रांसिशिनिगं टू लोवर कार्बन इकोनॉमीः टेक्नोलॉजिकल एंड इंजीनियरिंग कंसीडिरेशंस फॉर बिल्डिंग एंड ट्रांस्पोर्टेशन सेक्टर्स’ पर आधारित सीएईटीएस के वर्जन की रिपोर्ट को भी औपचारिक तौर पर शुरू किया है।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव प्रोफेसर अशुतोष शर्मा ने विकासशील देशों में चुनिंदा विषयों के महत्वपूर्ण तथ्यों का उल्लेख किया है।

वैश्विक निकाय सीएईटीएस और कननोकेशन-2015 की अगुवाई करने वाले पहले भारतीय बने प्रख्यात परमाणु वैज्ञानिक डॉ. बलदेव राज को भारत में पहली बार इस तरह के प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय डोमेन विशेषज्ञों के अभिसरण की अनूठी विशिष्टता के साथ श्रेय दिया जाता है।

पेटेंटेड औषधियों को अनिवार्य लाइसेंस जारी होना शुरू हुआ

पेटेंड, डिजाइन और व्‍यापार चिह्न महानियंत्रक ने अभी तक एक औषधि विनिर्माता कंपनी अर्थात मैसर्स नैटको फार्मा लिमिटेड को कैंसर रोधी दवा के लिए अनिवार्य लाइसेंस प्रदान किया है। 

इस दवा में ‘सोराफिनीब टोसिलेट’ घटक मौजूद है और इसका गुर्दे और जिगर के कैंसर के इलाज में उपयोग किया जाता है। यह स्‍वीकृति पेटेंट अधिनियम 1970 (यथा संशोधित) की धारा-84 के तहत दी गई है। यह पेटेंट मूल रूप से भारतीय पेटेंट कार्यालय द्वारा मैसर्स बेयर कोरपोरेशन, यूएसए को दिया गया था। 

यह जानकारी वाणिज्‍य और उद्योग राज्‍य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्रीमती निर्मला सीतारमण ने  लोक सभा में दी। 
अनिवार्य लाइसेंस के प्रावधान पेटेंट अधिनियम में मौजूद हैं और ये प्रावधान उचित स्थिति में लागू किए जाएंगे। 

उन्‍होंने बताया कि स्‍वास्‍थ्‍य एवं परिवार कल्‍याण मंत्रालय ने जनवरी 2013 में भारत में औषधियों के अनिवार्य लाइसेंसिंग का प्रावधान शुरू करने के लिए गठित समिति की बैठक का कार्यवृत्‍त इस विभाग को भेजा था। इस कार्यवृत्‍त में सिफारिश की गई थी कि पेटेंट अधिनियम 1970 की धारा 92 के प्रावधानों के अनुसार तीन औषधियों- हर्सेप्टिन, डेसाटिनिब और एलजाबिपाइलोन को अनिवार्य लाइसेंसिंग के तहत लाया जाये। 

इस विभाग ने इस सिफारिश की विस्‍तृत जांच की और स्‍वास्‍थ्‍य और परिवार कल्‍याण मंत्रालय से संबंधित सूचना भेजने का अनुरोध किया। इसके बाद पेटेंटी ने हर्सेप्टिन के पेटेंट का नवीकरण नहीं किया तथा एलजाबिपाइलोन को स्‍वास्‍थ्‍य एवं परिवार कल्‍याण मंत्रालय द्वारा असुरक्षित पाया गया। इसके बाद स्‍वास्‍थ्‍य और परिवार कल्‍याण मंत्रालय से डेसाटिनिब के बारे में अतिरिक्‍त जानकारी मांगी गई। 

नई खोज : पैरासिटामोल से हो सकता है, ब्लड कैंसर

अगर आप सिर दर्द या बुखार में आंख बंद कर पैरासिटामोल लेते हैं तो आपको ब्लड कैंसर हो सकता है। नई रिसर्च के मुताबिक, इस दवा के अधिक सेवन से रक्त कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।

रिसर्चरों ने पाया कि पैरासिटामोल में एसिटामिनोफेन नामक रसायन पाया जाता है, जो कैंसर का मुख्य कारक है। स्टडी में दर्द निवारक दवा और उनसे कैंसर के खतरे की बात में एक नया मोड़ ला दिया है।

रिसर्च में शामिल सिएटल स्थित हचीसन कैंसर रिसर्च सेंटर की एमिली वाइट ने कहा, ' हमारे पास कुछ साक्ष्य मौजूद हैं जिनके आधार पर पता चलता है कि एसिटामिनोफेन से रक्त कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। शुरुआत में एसेटामिनोफेन को दमा के लिए जिम्मेदार समझा जाता था। '

रिसर्चरों ने वॉशिंगटन में 65 हजार लोगों पर की गई स्टडी में पिछले 10 वर्षों में उनके द्वारा इस्तेमाल की दर्दनिवारक दवाओं के बारे में पूछा। पहले इनमें किसी को भी कैंसर नहीं था। लेकिन पिछले छह सालों में इनमें से 577 लोगों में ब्लड कैंसर के लक्षण पाए गए। जिन लोगों में कैंसर के लक्षण पाए गए उनमें से 9 % ने इस दौरान काफी मात्रा में एसेटामिनोफेन का सेवन किया था।

हेड रिसर्चर डॉ. रेमंड ने कहा, 'एसिटामिनोफेन अन्य दर्दनिवारकों के मुकाबले अलग तरह से काम करता है। इसलिए इसका कैंसर पर अलग प्रभाव होता है। यह चौंकाने वाला तथ्य है कि एसिटामिनोफेन के इस्तेमाल से ब्लड कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।'

आयुर्वेदिक दवाओं की गुणवत्‍ता सुनिश्‍चित करेगी सरकार : डॉ. हर्षवर्धन

सरकार आयुर्वेदिक दवाओं के उत्‍पादन में मानकीकरण पर विशेष जोर देगी 
डॉ. हर्षवर्धन ने कहा, 'वैश्‍विक दवा क्षेत्र में ब्रांड इंडिया की अगुवाई आयुष करेगा'

केंद्रीय स्‍वास्‍थ्‍य एवं परिवार कल्‍याण मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने घोषणा की कि सरकार परंपरागत दवाओं के लिए जल्‍द ही अलग से एक केंद्रीय दवा नियंत्रक का गठन करेगी। इसका उद्देश्‍य उत्‍पादन के मानकों में गुणवत्‍ता सुनिश्‍चित करना है। 

डॉ. हर्षवर्धन ने आज यहां मंत्रालय के आयुष विभाग द्वारा आयोजित प्रथम 'आरोग्‍य एक्‍सपो' का उद्घाटन करते हुए कहा कि यह अफसोस की बात है कि परंपरागत दवाओं के क्षेत्र में भारत को जो अनुभव एवं ताकत हासिल है, वह वैश्‍विक परंपरागत दवा बाजार में भारत की बाजार हिस्‍सेदारी में तब्‍दील नहीं हो पाई है। यह एक्‍सपो विश्‍व आयुर्वेद कांग्रेस का ही एक हिस्‍सा है। 

उन्‍होंने कहा, 'चाहे इसे आयुर्वेदिक दवाएं या हर्बल दवाएं अथवा परंपरागत दवाएं कहें, इसका वैश्‍विक बाजार मौजूदा समय में तकरीबन 100 अरब डॉलर का है। इसमें भारत की हिस्‍सेदारी मामूली है क्‍योंकि गुणवत्‍ता मानकों को अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर के अनुरूप बरकरार नहीं रखा जा सका है। सरकार ने इस कमी को दूर करने का निर्णय लिया है।' 

स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री ने कहा कि नियामक प्राधिकरण को संस्‍थागत रूप देने के साथ-साथ केंद्रीय व राज्‍य स्‍तरीय प्रयोगशालाओं का सहयोग मिलने से स्‍वास्‍थ्‍य रक्षा की मुख्‍य धारा में परंपरागत एवं स्‍वदेशी दवाओं को गौरवमयी स्‍थान सुनिश्‍चित होगा। 

डॉ. हर्षवर्धन ने कहा कि आयुर्वेद के लिए उनका सम्‍मान भावनाओं के चलते नहीं, बल्‍कि वैज्ञानिक समझ के कारण उमड़ा है। उन्‍होंने कहा, 'आज के युग में दवा की कोई भी एकल धारा सर्वेसर्वा नहीं है। यह समग्र दवाओं का युग है और मैं इसमें भारत को बढ़त सुनिश्‍चित करने की कामना करता हूं।' डॉ. हर्षवर्धन ने कहा कि हम आयुर्वेद के जरिए ब्रांड इंडिया को विकसित करने के प्रति कटिबद्ध हैं। 

उन्‍होंने कहा कि राष्‍ट्रीय आयुष मिशन के शुभारंभ के साथ ही सरकार देश में तैयार की जाने वाली आयुर्वेदिक दवाओं का ब्रांड मूल्‍य बनाने पर अपना ध्‍यान केंद्रित करेगी। 

स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री ने कहा कि आयुष को संरक्षण एवं बढ़ावा देने के लिए नये सिरे से जो प्रयास किए जा रहे हैं उससे परंपरागत दवाओं के क्षेत्र में बूम आने की उम्‍मीद है। उन्‍होंने कहा कि प्रधानमंत्री इस मिशन पर विशेष जोर देते रहे हैं। इस क्षेत्र में विस्‍तार की जो भरपूर गुंजाइश नजर आ रही है उससे रोजगार सृजन की क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी। 

सरकार द्वारा आयोजित प्रथम आरोग्‍य एक्‍सपो का ऐसे सर्वाधिक बड़े औद्योगिक मेले में तब्‍दील होना तय है जिसमें आयुष क्षेत्र के पक्ष भी शामिल हैं। विश्‍व भर के व्‍यापार संगठनों द्वारा इसमें भाग लिए जाने की आशा है। 

दवाओं के गैर कानूनी परीक्षण पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को फटकार लगाईं


सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को नई दवाओं के अनियंत्रित ट्रायल पर चिंता जताई है। सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम आदेश में कहा कि नयी दवाओं के तमाम क्लिनिकल परीक्षण स्वास्थ्य सचिव की निगरानी में होने चाहिएं। 

कोर्ट ने केंद्र सरकार को इस बात के लिए डांट लगाई कि वह अवैध क्लीनिकल परीक्षणों को होने से रोकने में असमर्थ रही और कहा कि ऐसे दवा परीक्षणों पर रोक लगाई जाए ।

गौरतलब है कि देश में पिछले ढाई साल में दवा परीक्षण के दौरान 1,317 लोगों की मौत हुई। सरकार ने इसे गंभीरता से लेते हुए नये नियमों का प्रावधान करके मुआवजा प्रदान करने संबंधी मसौदा अधिसूचना जारी की। दवा परीक्षण के दौरान 2010 में 668, 2011 में 438 और जून 2012 तक 211 लोगों की मौत हुई। 2010 में तीन कंपनियों, 2011 में पांच कंपनियों और 2012 एक कंपनी पर क्लिनिकल परीक्षण के दौरान अनियमितता के आरोपों पर कार्रवाई की गई।

विकासशील देशों में 10 % दवाएं नकली हैं या घटिया

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक विकासशील देशों में बिक रही 10 प्रतिशत दवाएं या तो नकली हैं या फिर घटिया स्तर की हैं। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक सबसे ज्यादा नकली दवा मलेरिया के उपचार के लिए बिकने वाली दवाओं के रूप में हैं, क्योंकि एशिया और अफ्रीका के ज्यादातर हिस्से में इस बीमारी का सर्वाधिक प्रकोप है, इसलिए इसके उपचार की दवाओं की यहां सबसे ज्यादा मांग है। 

डब्ल्यूएचओ के मुताबिक विकासशील देशों के साथ ही नकली दवाओं के कारोबार का खतरा विकसित देशों में भी कम नहीं है। फार्मा कंपनी रोश की ओर से कैंसर के उपचार के लिए बनाई गई सबसे प्रभावी दवा एवास्टीन की नकल हाल ही में अमरीकी बाजार से बड़ी संख्या में जब्त की गई है। इसके अलावा मिनिंजाइटिस के उपचार के लिए लगाए जाने वाले स्टेरायड इंजेक्शन भी बड़ी संख्या में यहां नकली पाए गए हैं। 

यूरोपीय संघ की बात करें, तो यहां जब्त की जाने वाली नकली वस्तुओं में भी सबसे बड़ी संख्या नकली दवाओं की ही है। भारत का आरोप है कि उसके यहां बनने वाली जेनेरिक यानी कि सस्ती जीवन रक्षक दवाओं से मिल रही कड़ी प्रतिस्पर्धा को देखते हुए विदेशी मुल्कों की सरकारें अपने यहां की दवा कंपनियों को शह दे रही है  और इसी कारण बाजार में नकली दवाओं का कारोबार फल फूल रहा है। यही वजह है कि भारत ने अगले सप्ताह  ब्यूनस आयर्स में इस मसले पर डब्ल्यूएचओ की प्रस्तावित बैठक में दवा कंपनियों की भागीदारी पर सख्त एतराज किया है। ब्राजील ने भी इस मामले में भारत का समर्थन किया है। 

हालांकि इस बैठक में कई गैर सरकारी संगठन और विशेषज्ञ भी अपनी राय रखने के लिए लालायित हैं, लेकिन उन्हें इसमें शरीक नहीं किया जा रहा है। विशेषज्ञों और गैर सरकारी संगठनों का कहना है कि इस विचार मंथन से कुछ नहीं होने वाला। बैठक में सभी पक्षों की राय ली जानी चाहिए, ताकि नकली दवाओं का कारोबार रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी कानून बनाया जा सके।

भारत में दवाइयों के दामों में भारी गिरावट के संकेत

रोजमर्रा और जीवनरक्षक दवाइयों के दामों में भारी गिरावट के संकेत मिले है.इतना ही नहीं कुछ दवाइयों के दामों का निर्धारण खुले बाजार के हवाले करने का प्रस्ताव है. इससे महंगी दवाइयों के दामों में कम से कम 5 फीसद गिरावट आएगी. दवा मूल्यों के निर्धारण पर दवा उत्पादकों के एकाधिकार को समाप्त करने के लिए सरकार ने केंद्रीय मंत्रियों का एक समूह गठित किया था. इसकी बैठक बृहस्पतिवार को है.

कृषि मंत्री शरद पवार की अध्यक्षता में गठित इस समूह की बैठक पर पूरे दवा उद्योग जगत की नजर है. दवाइयों के मूल्य नियंतण्रएवं सस्ती दवाइयां उपलब्ध कराने के सरकारी एजेंडे को ध्यान में रखते हुए तमाम विशेषज्ञों की राय मांगी गई थी.

इसमें कई क्षेत्रों के वैज्ञानिक व अनुसंधानकर्ता भी शामिल थे जिन्होंने अंग्रेजी दवाइयों के बुनियादी तत्वों व रसायनों का जिक्र करते हुए कहा था कि जो तत्व दवाइयों में मिलाए जाते है उनका मूल्य इतना ज्यादा नहीं होता है जितना पैसा मरीजों से वसूला जाता है. दवा उद्योग जगत पर स्वास्थ्य मंत्रालय का कोई अंकुश नहीं है जबकि दवाइयों की खरीद-फरोख्त में सबसे बड़ा माध्यम अस्पताल और डाक्टर हैं. दवा उद्योग जगत पर रसायन और उर्वरक मंत्रालय का नियंतण्रहै.

यह पहला मौका है जब दवाइयों के मूल्य निर्धारण को लेकर स्वास्थ्य मंत्रालय को तवज्जो दी गई है और उसी की सिफारिशों के आधार पर मंत्रियों के समूह की बैठक का एजेंडा तैयार किया गया है. वैसे तो जीवनरक्षक एवं रोजमर्रा की सूची में 15 सौ से अधिक दवाइयों के नाम हैं मगर इनमें सर्वाधिक मांग एवं खपत वाली 348 ऐसी दवाइयों की पहचान की गई है जिनके मूल्यों को नियंत्रिश्वत करने का प्रस्ताव है.

ऐसा करने से इन दवाइयों के दामों में 50 फीसद से ज्यादा की गिरावट आ जाएगी. यह भी पता चला है कि तंबाकू लॉबी की ही तरह अंग्रेजी दवा उद्योग जगत भी सरकार पर दबाव बनाने में लगा हुआ है.

यह लॉबी चाहती है कि दवाइयों के मूल्य निर्धारण पर उसके एकाधिकार को न समाप्त किया जाए. मगर सरकार का मानना है कि जब ‘जन स्वास्थ्य औषधि योजना’ के तहत सरकारी क्षेत्र की दवा उत्पादक कंपनियां सस्ते मूल्य की दवाइयों का उत्पादन कर सकती हैं तो फिर निजी क्षेत्र की कंपनियों को परहेज क्यों है.

इस योजना के तहत जो दवाइयां बहुत कम मूल्य पर मिल जाती है वही दवाइयां ब्रांडेड कंपनियों में बहुत ही महंगी हैं. मंत्री समूह को यह जानकारी भी दी गई है कि हाल के वर्षो में योग एवं आयुव्रेद के क्षेत्र में आई क्रांति के चलते देशी दवाइयों की मांग बढ़ गई है और वे सस्ती भी हैं.

इसी तरह होम्योपैथी के विशेषज्ञों ने एक रिपोर्ट दी है जिसमें कहा गया था कि जिन रोगों के निवारण की दोनों पद्धतियों में दवाइयां है उनमें एलोपैथी के मुकाबले होम्योपैथी दवाइयां काफी सस्ती और सटीक हैं.

इन विशेषज्ञों ने होम्योपैथी और ऐलोपैथी दवाइयों के मूल्यों की तुलनात्मक रिपोर्ट भी दी है.

Google has been fined US$500m pharmacies ads

Google has been fined US$500m (£306m) by the US government for allowing online pharmacies in Canada to advertise unlicenced drugs to US customers.

The fine, one of the largest forfeitures ever in the US, represents the revenue received by the company as a result of Canadian pharmacies advertising through Goggle’s AdWords programme, plus gross revenue made by Canadian pharmacies from their sales to US customers.

The distribution of prescription drugs from pharmacies outside the US to customers in the US breaches the Federal Food, Drug and Cosmetic Act and the Controlled Substances Act.

The US Department of Justice (DoJ), which led the investigation, said that while Canada has its own regulatory rules for prescription drugs, Canadian pharmacies that ship prescription drugs to US residents are not subject to Canadian regulatory authority.

This means that many sell drugs obtained from countries other than Canada that lack adequate pharmacy regulations, which could be dangerous for US customers.

The DoJ said Google was aware as early as 2003 that it was illegal for pharmacies to ship controlled and non-controlled prescription drugs into the US from Canada, but had failed to take adequate action.

In fact from 2003 to 2009, the DoJ said that Google provided customer support to some of these Canadian online pharmacy advertisers to assist them in placing and optimising their AdWords advertisements, and in improving the effectiveness of their websites.

‘This investigation is about the patently unsafe, unlawful, importation of prescription drugs by Canadian online pharmacies, with Google’s knowledge and assistance, into the US, directly to US consumers,’ said US Attorney Peter Neronha.

‘It is about taking a significant step forward in limiting the ability of rogue online pharmacies from reaching US consumers, by compelling Google to change its behaviour.

‘It is about holding Google responsible for its conduct by imposing a $500m forfeiture, the kind of forfeiture that will not only get Google’s attention, but the attention of all those who contribute to America’s pill problem.’

The Partnership for Safe Medicines, a non-profit organisation dedicated to curbing counterfeit drugs, said the fine was a ‘welcome and long overdue development’.

‘We are hopeful the Google settlement sends a clear message to other large online advertising companies that this practice is dangerous and in most cases leads to unlawful activity,’ the organisation said.

‘Illicit internet vendors, who often are no more Canadian than their logo or IP address, ship consumers drugs that are at best not FDA-approved and at worst lethal. For several years, they have escalated use of social media channels to advertise to American consumers.

‘We are hopeful that this settlement will send a message to other online advertisers that policies need to be in place to prohibit this type of activity.’

निमेसुलाइड दर्द निवारक होगा प्रतिबन्घित

शीघ्र ही केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय बच्चों को दिए जाने वाली दर्द निवारक निमेसुलाइड सीरप सहित साइड इफेक्ट वाली चार दवाओं को प्रतिबन्घित कर बाजार से बाहर का रास्ता दिखा सकता है।भारत के ड्रग कंट्रोलर जनरल द्वारा स्वास्थ्य मंत्रालय को जिन चार दवाओं पर तत्काल रोक लगाने की सिफारिश की गई है उनमें निमेसुलाइड सीरप के अलावा एसिडिटी की दवा सिसाप्राइड, सर्दी-जुकाम, खांसी में उपयोग की जाने वाली फेनिलप्रोपेनोलामाइन और चर्म रोग अल्सर के इलाज में दी जाने वाली ह्यूमन प्लेसेंटा एक्सट्रैक्ट शामिल हैं

जनरल ने सिफारिश में मंत्रालय से तत्काल इन चारों दवाओं के प्रयोग पर प्रतिबन्ध लगाने की सिफारिश की है। सरकार इस बारे में दो सप्ताह में कोई फैसला कर सकती है।

बताया जाता है कि इस दवा के उपयोग से लीवर पर गंभीर दुष्प्रभाव होते हैं वहीं सिसाप्राइड भोजन नली और दिल पर गंभीर प्रभाव डालती है। चौंकाने वाली बात यह है कि निमेसुलाइड साल्ट सहित अन्य तीन दवाओं पर अमरीका, ब्रिटेन, जापान, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा सहित 168 देशों में बहुत पहले से ही प्रतिबन्ध लगाया हुआ है जबकि भारत में इनका धड़ल्ले से उपयोग किया जा रहा है।

निमेसुलाइड का भारत में चिकित्सा क्षेत्र में कितना ज्यादा उपयोग हो रहा है, इसका अंदाजा इसके सालाना कारोबार करीब 300 करोड़ रूपए की जानकारी से लगाया जा सकता है।

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