गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करो - गोपाल दास नीरज

गोमांस को लेकर हो रही राजनीति पर कवि गोपालदास नीरज और अयोध्या में बाबरी मस्जिद के मुद्दई हाशिम अंसारी आहत है। दोनों ने इसे राजनीति प्रेरित बताया है।

पद्म भूषण गोपाल दास नीरज ने आगरा में गाय पर हो रही राजनीति पर बेबाक टिप्पणी में कहा कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करना चाहिए। जिससे इसको मारने से पहले हजार बार विचार करें।


गोमांस पर हाय-तौबा के बीच हाशिम ने हिंदुओं को मुस्लिमों के हाथ गाय न बेचने की सलाह दी और कहा कि गोमांस एक कारोबार के तौर पर फैला है। इसे धार्मिक विद्वेष की भावना से जोड़ा जाना गलत है। गोमांस का कारोबार प्रतिबंधित करना है तो इसके निर्यात पर रोक लगानी होगी। केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार रहते हिंदू संगठनों को इस दिशा में प्रयास करने में कोई दिक्कत नहीं आनी चाहिए। 

यदि इस दिशा में हिंदू संगठन प्रयास नहीं करते हैं तो माना जाएगा कि वे गोहत्या रोकने के लिए गंभीर नहीं हैं और उनका मकसद महज मुस्लिमों के प्रति घृणा फैलाना है।

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का राजदीप सरदेसाई को करारा थप्पड़

प्रिय राजदीप, 

आम तौर पर मैं वरिष्ठ पत्रकारों के सार्वजनिक पत्रों का जवाब नहीं देता, लेकिन आपका पत्र पढ़ने के बाद सोचा कि अगर जवाब नहीं दिया तो गोबल्स नीति सफल हो सकती है। आपका पत्र यानी सही जानकारी न लेकर सरकार को फटकारने की शानदार मिसाल है।
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आपने मुझे 2010 में देखा है ऐसा कहा है पर मैं तो आपको 2000 से देख और सुन रहा हूं। एक साहसी पत्रकार कालांतर में निजी एजेंडे और विशिष्ट वैचारिक निष्ठा से अभिभूत होकर किस तरह बेहद पक्षपाती हो सकता है यह देखना वेदनापूर्ण है!
राज्य सरकार के नाम पर कई अच्छे कामों की मुहर लगने के बावजूद आप अपनी मर्जी से तीन मुद्‌दे चुनकर सरकार के कामकाज का मूल्यांकन करना चाहते हैं। पर मैं आपसे कहना चाहता हूं कि पिछली सरकार के गलत व भ्रष्ट कामों के बारे में ठोस भूमिका अपनाने के संकल्प से मैं जरा भी विचलित नहीं हुआ हूं। इसका अनुभव आपको राज्य भ्रष्टाचार प्रतिबंधक ब्यूरो की ओर से की जा रही कई मामलों की जांच से आसानी से मिल सकता है।

मांसाहार पर पाबंदी लगाने के बारे में मेरी सरकार ने कोई फैसला नहीं लिया। इस बारे में मेरे कार्यकाल से एक भी नया आदेश नहीं दिया गया। 2004 में कांग्रेस सरकार ने पर्यूषण पर्व के दौरान दो दिन कत्लखाने बंद रखने का फैसला किया था। मुंबई को लेकर ऐसे निर्णय पर 1994 से अमल किया जा रहा है। आश्चर्य है कि हमारे सत्ता में आने से पहले आप में से किसी ने आपत्ति नहीं जताई। यानी पहले की सरकार कितनी भी भ्रष्ट व अकार्यक्षम रही हो, उसकी ढोंगी एवं कथित धर्मनिरपेक्षता आपके विचारों से मेल खाती थी, इसलिए आपको आक्षेप नहीं था।

श्री राकेश मारिया के मामले में आप भ्रमित लगते हैं, इसीलिए दोनों तरह की बातें कह रहे हैं। पत्र के अंत में आपने लिखा, ‘चटपटी खबरों के पीछे पड़ा मीडिया भी उतना ही दोषी है। क्रूर हत्या के मामलों में उन्हें दिलचस्पी होती है, जबकी किसानों की मौत का जिक्र भी नहीं किया जाता।’ अब आप ही मुझे बताइए कि आप भी इसी कत्ल के मामले का संबंध पुलिस कमिश्नर के तबादले से कैसे लगा रहे हैं? पुलिस प्रमुख जांच अधिकारी नहीं होता। वह हमेशा नियंत्रक की भूमिका निभाता है। वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को उनकी तरक्की की तय तारीख से पहले उच्च पद पर नियुक्त करना नई बात नहीं है। सितंबर और अक्तूबर गणेश चतुर्दशी, बकरीद व नवरात्रि के होते हैं। त्योहार शुरू होने से पहले ही नया अधिकारी आए तो उसे सुरक्षा संबंधी योजनाएं बनाने के लिए समय मिलता है। योग्य फैसला करने का काम सरकार पर सौंप देना चाहिए।

आपकी राजद्रोह विषय पर लिखी टिप्पणी भी जानकारी के अभाव में तर्कहीन है। सरकार को आरोपी के पिंजरे में खड़ा करने की जिद में कोई व्यक्ति किस स्तर तक पक्षपाती बन सकता है, यह इसका उत्तम उदाहरण है। क्या माननीय हाईकोर्ट के किसी आदेश को पुलिस तक पहुंचाना गलत है? हमारी सरकार ने कोई भी फैसला नहीं किया। पिछली कांग्रेस सरकार ने मामले में माननीय हाईकोर्ट में एक हलफनामा पेश किया था। उस पर माननीय हाईकोर्ट ने विस्तार से फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट किया था कि राजद्रोह संबंधी आरोप कब और किस आधार पर लगाए जा सकते हैं। साथ ही कहा था कि ये निर्देश सभी पुलिस वालों को भेजे जाएं। फैसले का मराठी अनुवाद कर सभी पुलिस थानों के प्रमुखों को सर्कुलर के जरिये भेजा गया। अगर आपने सावधानी से उसे पढ़ा हो तो उसमें यह स्पष्ट तौर पर लिखा है कि सिर्फ अदालत के फैसलों पर निर्भर न रहें, राजद्रोह का आरोप लगाने से पहले स्वतंत्र रूप से कानूनी सलाह लें। और हां, यह बात जोर देकर कहना चाहूंगा कि राजद्रोह के बारे में कोई भी फैसला न तो हमारे मंत्रिमंडल ने लिया है न वह मान्यता के लिए राज्य सरकार के सामने लाया गया।

लेकिन श्रीमान सरदेसाई, आपको गहराई में जाकर मुद्‌दे को समझने की इच्छा नहीं है, क्योंकि आपको अपना वामपंथी झुकाव वाला एजेंडा पुरजोर तरीके से आगे ले जाना है। राज्य को अकालमुक्त करने के लिए चलाई जा रही जलयुक्त शिवार योजना का जिक्र करते हुए आपको कितना कष्ट हुआ। यह योजना बेहद सफल रही है। राज्य की जनता ने बेहद उदारता से 300 करोड़ रुपए का योगदान इसमें दिया है। इससे 6 हजार गांवों में तकरीबन एक लाख काम हम छह महीनों में पूरे कर सके। अब थोड़ी-सी बारिश में भी गांवों में पानी का विकेंद्रित जलसंचय उपलब्ध है। साथ ही जलस्तर भी बढ़ गया है। भारत के जलपुरुष राजेंद्र सिंहजी ने स्टाकहोम की अंतरराष्ट्रीय जल परिषद में इसे ऐतिहासिक मोड़ देने वाला प्रयोग घोषित किया है।

बुरा लगता है कि अपनी थाली में दो दिन मांसाहारी पदार्थ नहीं होंगे, यह सोचकर ही आप जैसे लोग बेचैन हो जाते हैं। दूसरी तरफ हमारा अन्नदाता किसान कुदरती प्रकोपों के कारण जिंदा रहने के लिए तड़प रहा है। श्रीमान सरदेसाई, मुझे आपसे ज्यादा किसान की थाली की चिंता है, इसीलिए राज्य सरकार ने 60 लाख किसानों को दो रुपए किलो गेहूं और तीन रुपए किलो चावल वितरित करने वाली अन्न सुरक्षा योजना तैयार की है। पिछले 15 साल के कुशासन व किसान आत्महत्या की यह विरासत हमारे लिए वास्तव में चुनौती है। इस कारण हमें नींद भी नहीं आती, लेकिन हमारी सरकार की ओर से शुरू की गई कुछ योजनाएं निश्चित रूप से अच्छे परिणाम सामने लाएंगी इसका मुझे भरोसा है। आपको अगर इसमें रुचि हो तो आइए और देखिए।

एक बात तो सच है कि मांसाहार बंदी हो या न हो, सामान्य जनता को इतनी ही आशा होती है कि उसकी थाली में रोटी या चावल होना चाहिए। मुझे इसी बात की ज्यादा चिंता है। आप अपनी थाली में क्या खा रहे हैं यह देखने के लिए मेरे पास समय नहीं है और न मैं उस बारे में चिंतित हूं। एअरकंडीशन्ड कमरों में बैठने वालों के लिए किसानों की चिंता के अलावा बाकी एजेंडे हो सकते हैं। श्रीमान सरदेसाई, आपके पत्र का ब्योरा आपके व्यावसायिक काम का हिस्सा हो सकता है, पर यह जवाब मेरी ओर से शुरू किए गए अभियान का हिस्सा है और मैं उसे पूरा किए बिना चैन से नहीं बैठूंगा। करो या मरो, यही मेरे जीवन का मंत्र है और आने वाला समय ही मेरा भाग्य तय करेगा।
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किसी भी तरह की द्वेषभावना के बिना, आपका नम्र, 
देवेंद्र फडणवीस 

हिंदुओं की मातृस्वरूपा गाय के मांस को गरीबों का प्रोटीन कहना दुर्भाग्यपूर्ण - तरुण विजय

राज्यसभा में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी पर एक पूर्व न्यायाधीश द्वारा अवांछनीय टिप्पणी की सर्वसम्मति से निंदा की गई, लेकिन उसी सदन में जिस प्रतीक को गांधी मातृस्वरूपा मानते थे, उसके मांस को सर्वसुलभ करने की भी मांग की गई। अजीब सेक्युलर गणतंत्र है हमारा। गांधी छह दशक पुराने संविधान के अंतर्गत एक ऐसे स्थान पर प्रतिष्ठित हैं जहां उनके विरुद्ध अपशब्द संसद द्वारा नकार दिए जाते हैं, पर जिनकी गांधीजी पूजा करते थे और जो हजारों वर्ष पुराने हमारे राष्ट्रीय सांस्कृतिक संविधान में पूजित हैं, उसे वधशाला में भेजने व उसका मांस गरीबों के लिए सस्ता प्रोटीन घोषित करना हमारी आजादी का स्वीकार्य हिस्सा माना गया। इस मुद्दे को संसद के शून्य काल में तृणमूल कांग्रेस के एक सांसद ने महाराष्ट्र में गोमांस पर प्रतिबंध से हजारों लोगों की आजीविका प्रभावित होने के नाम पर उठाया।

यह सब देख-सुनकर हम कुछ क्षणों के लिए स्तब्ध और अवाक रह गए। एक हिंदू बहुल देश में, अधिकांशतया हिंदुओं द्वारा श्रद्धा से देखी और पूजी जाने वाली गाय के मांस को गरीबों का प्रोटीन घोषित करने का एक अहिंदू सदस्य का मंतव्य भारतीय लोकतंत्र का दुर्भाग्यजनक दिन ही कहा जाएगा। कोई क्या खाता है या क्या-क्या निषिद्ध मानता है, यह उसकी निजी पसंद-नापसंद का मामला हो सकता है। परंतु क्या किसी नास्तिक या अन्य आस्था वाले व्यक्ति को अपनी पसंद इस रूप में देश की संसद में व्यक्त करना चाहिए, जिसे करोड़ों आस्थावान लोग अपनी मां पर आक्रमण के रूप में देखें? क्या संसद किसी अन्य समुदाय की आस्था से जुड़े किसी विषय पर प्रोटीन जैसे बहाने से किसी हिंदू को अपना मत व्यक्त करने की इजाजत देगी? वह भी उसी स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्गत जिसके सहारे आस्थावान हिंदुओं की मातृस्वरूपा गाय के मांस को गरीबों का प्रोटीन बताकर उसे वधशाला भेजने योग्य कहा गया। जहां शरद पवार ने इसका समर्थन किया वहीं दुर्भाग्य से कांग्रेस के सदस्य भी इस विषय पर खामोश रहे। अकाली दल भी चुप रहा। क्या हिंदू आस्था के मुद्दे केवल भाजपा के जिम्मे है? क्या अन्य दलों में बैठे हिंदू अपनी आस्था से जुड़े किसी विषय पर राजनीतिक लाभालाभ देखकर बोलेंगे?

महात्मा गांधी ने कहा था कि मैं गाय की पूजा करता हूं और इसके लिए चाहे पूरी दुनिया मेरे खिलाफ हो जाए मैं उसकी रक्षा करूंगा। उनके ही शब्दों में, गोमाता अनेक अर्थो में हमें जन्म देने वाली मां से भी श्रेयस्कर है। हमारी मां कुछ वर्ष हमें दूध देती है फिर अपेक्षा करती है कि बुढ़ापे में हम उसकी सेवा करें, परंतु गोमाता हमसे सिवाय घास और दाने के कुछ अधिक की अपेक्षा नहीं करती।

विडंबना देखिए, गांधी के विरुद्ध अपशब्द इस सेक्युलर लोकतंत्र को बर्दाश्त नहीं और यह ठीक भी है। हमने भी अपशब्द कहने वाले की निंदा की, लेकिन गांधी द्वारा पूजित करोड़ों हिंदुओं की आस्था के प्रतीक पर आघात कैसे हमारी अभिव्यक्ति की आजादी का स्वर बन गया?

गोहत्या बंदी के लिए इस देश में सैकड़ों लोगों ने जान दी है। फिर भी वह सब लागू कर पाना संभव न हुआ। इस देश में सबसे ज्यादा ईसाई अंग्रेजों ने अपनी सेना के लिए गोवध को बड़े पैमाने पर लागू किया ताकि उनकी जरूरतों को पूरा किया जा सके। सच यह भी है कि राजस्थान से बांग्लादेश की सीमा तक हजारों गायों की तस्करी हिंदू सरकारी कर्मचारियों की मिलीभगत से होती है और देश के बड़े गोमांस निर्यातकों में तथाकथित ऊंची जाति के हिंदू अग्रणी हैं। पर यह हिंदू समाज के भीतरी पाखंड और हिंदू मुद्दों पर शोर मचाने पर कुछ नहीं करना हमारी दास मानसिकता का कुफल है।

सवाल यह है कि क्या हिंदू आस्था पर चोट सेक्युलरवाद का मुख्य परचम बनने दिया जाएगा? हिंदू संपूर्ण दक्षिण एशिया में अहिंदू आक्रमणों का शिकार हो रहे हैं। उनकी जनसंख्या इस उपमहाद्वीप में लगातार घटती जा रही है। पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदुओं पर तमाम तरह के अत्याचार हो रहे हैं, हिंदुओं को बलात धर्म परिवर्तन कराया जाता है। इतना ही नहीं, यह निकाह के सबसे बड़े केंद्र भी हैं। श्रीलंका में भी सबसे भीषण दमन और संकट तमिलभाषी हिंदुओं को एक लंबे अर्से से ङोलना पड़ रहा है पर हम उनके बारे में आवाज तक उठाने तक में असमर्थ रहते हैं। हमारे बड़े-बड़े महासम्मेलन, घोषणाएं, धमकियां, प्रस्ताव और सेमिनार राजनीतिक घाटे का विषय हैं। इस बात को देश की जनता अब अच्छे से समझ चुकी है। वैसे भी भारत में अपनी आस्था के लिए प्रयास करना और उसके पक्ष में बोलना अब तमाशे का रूप बना दिया गया है। ओबामा तक शिकायत करने वाले वही लोग हैं जिनके पूर्वज पहले हिंदुओं के खिलाफ अंग्रेज वायसराय से शिकायत करते थे।1इसमें संदेह नहीं कि देश में अनेक लोग गोमांस खाते हैं। अनेक नगर हैं जहां खुलेआम लिखा होता है कि यहां बीफ यानी गाय का मांस मिलता है। एक सेक्युलर पत्रकार ने तो अपने स्तंभ में यहां तक लिखा है कि उसे किस किस्म का बीफ या गाय का मांस पसंद है। अब यह विषय संसद में भी उठा दिया गया।

यह भी संभव है कि यह कहते हुए कि गाय के मांस को धार्मिक आस्था से न जोड़ा जाए और इसे गरीबों का प्रोटीन और अपनी पसंद का खाने के लोकतांत्रिक अधिकार के अंतर्गत रखते हुए संसद में गरीब सांसदों को प्रोटीन उपलब्ध कराने के लिए संसद की कैंटीन के मैन्यू में भी गाय के मांस को जोड़ने की मांग उठाई जाए। जिन्हें गाय का मांस पसंद है वे हिंदू हों या अन्य, उनके बारे में कुछ नहीं कहना। पर क्या उन्हें गाय को मां मानने वालों के घाव पर संसद में नमक छिड़ने का अधिकार है? क्या यही अधिकार वे अपनी आस्था से जुड़े विषय पर टिप्पणी के लिए अन्य लोगों को दे सकते हैं? हिंदुओं को एकतरफा सुधार की प्रयोगशाला का जंतु बनाने की सेक्युलर परंपरा कब तक सही जाएगी? सिर्फ हिंदुओं को ही सुधारने का अंहिंदू उत्साह उस समय भयावह प्रतिशोधी भाव में बदल जाता है जब उनके यहां व्याप्त कुरीतियों को खत्म करने की मांग की जाती है। हिंदू समाज आत्मनिरीक्षण करे। दोष अन्यों में नहीं, उसके भीतर व्याप्त असंगठन, जातिभेद, दलितों के प्रति अन्यायी दृष्टि और पाखंड का है।

[तरुण विजय: लेखक राज्यसभा सदस्य हैं]

जानिये, दूध न देने वाली गाय से कैसे कमाए जाते सकते हैं हर महीना 10 हजार

जो गाय दूध नही देती है। उससे कैसे 10 हजार रुपये प्रतिमाह कमाए जा सकते हैं। इसकी जानकारी राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ ने मंच से लोगों को दी। इसके साथ ही संघ का उदेश्य भारत की एकता और अखंडता को बचाना भी बताया।

शुक्रवार को बांदा मुख्यालय स्थित जीआईसी मैदान में राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ का एकत्रीकरण किया गया। इस मौके पर अखिल भारतीय बौद्धिक शिक्षण प्रमुख वी गागैय्या ने स्वयं सेवकों को संबोधित करते हुए कहा कि भारत हिंदू राष्ट्र हैं, यहां का रहने वाला समाज हिंदू समाज के आधार पर ही विश्व में पहचान होती है। विविधता में एकात्मता को देखना ही हिंदुत्व है। 

इसी के साथ गौ रक्षा, कृषि विकास, साक्षरता पर विशेष जोर देते हुए कहा कि गो-मूत्र, गोबर से किसानों में एक कांति का निर्माण हुआ है। गांव में कृषि करना किसानों के लिए सम्मान का विषय होना चाहिए। जो गाय दूध नहीं भी देती है। उससे भी हम 5 से 10 हजार रुपये कमा सकते हैं। यह बात स्थानीय स्वंय सेवक किसानों को समझाएं। ताकि वह ऐसी गाय को बाजार में कटने के लिए न बेंचे। इस मौके पर प्रांत प्रचारक अनिल, सह प्रांत प्रचारक वीरेंद्र चतुर्वेदी, अजय, सहित तमाम लोग मौजूद रहे।

ऐसे कमाए जा सकते हैं रुपए:

- गौ मूत्र दवा बनाने के काम आती है।
- गाय के गोबर से कागज, मोटा कागज, झोले इत्यादि बनाए जा सकते हैं।
- चर्म रोग जैसे रोगों के लिए गाय का काफी लाभदायक होता है।
- वायु विकार, गैस इत्यादि जैसी बीमारियों के लिए गौ-मूत्र बेहद फायदे मंद होता है।
- गाय के गोबर से बनी खाद खेती के लिए बेहद ही लाभदायक व उर्वरक बढ़ाने वाली होती।

गाय हमारी माता, काटने वाले को हिंदुस्तान में रहने का हक नहीं: अजीज कुरैशी

उत्तराखंड के राज्यपाल अजीज कुरैशी ने अपने बयान से एक बार फिर सनसनी पैदा कर दी है। कुरैशी ने शुक्रवार को कहा कि गाय काटने वालों को हिंदुस्तान में रहने का कोई हक नहीं है।

कुरैशी ने एक कार्यक्रम में कहा कि गाय हमारी माता है और लोग उससे जुड़े हुए हैं। अगर कोई गाय को मारता है तो, हमें उसे समाज से बहिष्कृत करते हुए उसका बॉयकॉट करना चाहिए। कुरैशी ने आगे कहा कि जो गाय को मारता है वह हिंदुस्तानी नहीं हो सकता है। ऐसे शख्स को भारत में भी रहने का कोई अधिकार नहीं है।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने इसे राज्यपाल की निजी राय बताया, लेकिन वह इस पर कुरैशी का बचाव करते भी दिखे। रावत ने कहा कि जहां तक कानून का सवाल है तो गौहत्या पर पाबंदी है। इसके लिए सजा का प्रावधान भी है।

गौरतलब है कि कुरैशी अपने बयानों को लेकर जब-तब कट्टरपंथियों के निशाने पर रहे हैं।राज्यपाल ने 3 अप्रैल 2013 को अखिल भारतीय कुरैशी महासभा देहरादून में गोवध करने पर मुंह काला कर सरेआम बिरादरी से निकालने सम्बन्धी प्रस्ताव भी पारित करा दिया। 

उत्तराखंड का गवर्नर नियुक्त किए जाने के वक्त कुरैशी के एक बेबाक बयान पर भी तब खूब बवाल हुआ था।कुरैशी ने तब कहा था, 'मैं हमेशा गांधी-नेहरू परिवार के प्रति वफादार रहा, मेरी नियुक्ति यह साबित करती है कि मुझे मेरी वफादारी का इनाम मिला। सिर्फ सोनिया गांधी के आशीर्वाद की वजह से मैं उत्तराखंड का गवर्नर बन सका।'

गाय माता को काटने वाला हमारा भाई कैसे हुआ ?

२० जनवरी को  प.पू. तात्यासाहेब कोटनीस महाराज की ९० वें पुण्यतिथि उत्सव के निमित्त आयोजित ‘हिंदु राष्ट्र की आवश्यकता’ विषयपर मार्गदर्शन करते समय हिंदू जनजागृति समिति के पश्चिम महाराष्ट्र समन्वयक श्री. मनोज खाडये ने स्पष्ट रूप से प्रश्न उपस्थित करते हुए कहा कि प्रतिदिन नए-नए पशुवधगृहों का निर्माण कार्य हो रहा है । जो लोग भूमाता, स्वमाता एवं गोमाता का वंदन करते हैं, उन्हें हम हमारे अपने मानते हैं । निरपेक्षतावादी राजनेता हिंदू-मुसलमान भाई-भाई ऐसी भ्रामक कल्पनाओं को हमारे गले उतारने का प्रयास कर रहे हैं; परंतु हमारी माता समान गाय को जो काटता है, वह हमारा बंधु कैसे हो सकता है ? आरंभ में प.पू. गुरुनाथ कोटनीस महाराजद्वारा श्री. खाडये का सम्मान किया गया । 

श्री. खाडये ने स्वतंत्राप्राप्ति के पश्चात हुई देश की दुरावस्था के संदर्भ में जानकारी देकर कहा कि कांग्रेसी राजनेताओं के कारण ही देश की पहचान भ्रष्टाचारी एवं बलात्कारी के रूपमें हो गई है । हिंदु धर्म पर होने वाले विविध आघातों की जानकारी देकर उन्होंने आवाहन किया कि राजनेताओं को झुकाने हेतु हिंदुओं को दबावगुट स्थापित करना चाहिए । धर्मशिक्षा के अभाव के कारण हिंदुओं में धर्माभिमान नहीं है । 

इसके लिए प्रत्येक को धर्मशिक्षा लेकर प्रतिदिन न्यूनतम एक घंटा धर्मके लिए देना अपेक्षित है । उत्सव में होने वाली अनुचित घटानाएं टालकर ‘हिंदु राष्ट्र’ की स्थापना करने हेतु कार्यरत हिंदू जनजागृति समिति के कार्यमें यशाशक्ति साम्मिलित होना चाहिए । 

मार्गदर्शन सुननेपर अनेक लोगों द्वारा श्री. खाडये के  मार्गदर्शन की दृक्श्राव्य चक्रिका की मांग की गई ।

'गुजरात गो दर्शन' गौ माता पर एक अद्भुत पुस्तक


देवनार मजबाह (स्लाटर हाउस) में दो लाख 11 हजार 109 बकरे बेचे गए। दसवीं और ग्यारहवीं जिलहज्जा को 8 हजार 550 बैलों की कुर्बानी दी गई। इस वर्ष पशुओं के अभाव में मुम्बई वासियों को निराशा का सामना करना पड़ा। संयोग से उसी दिन यह समाचार भी मिला कि 28 अक्तूबर को प्रख्यात जैन संत विमलकुमार सागर जी महाराज ने भिवंडी में श्री घनश्याम गोपालन ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित एक पुस्तक का विमोचन किया जिसका शीर्षक है 'गुजरात गो दर्शन।' भारत में हर-मत पंथ के लोग मानते हैं कि भारत एक कृषि प्रधान देश है इसलिए यहां पशुओं की सुरक्षा अत्यंत अनिवार्य है। इन पशुओं में गाय का अपना महत्व है। भारत में केवल हिन्दू ही नहीं गाय को पालने और चराने में महत्वपूर्ण भूमिका यहां के अनेक मुस्लिम बंधु भी निभाते रहे हैं। इसलिए गाय इस देश की सांस्कृतिक और आर्थिक बुनियाद में नींव का पहला पत्थर है।

इस बात को ध्यान में रखकर 'गुजरात गो दर्शन' को प्रचारित और प्रसारित करने के लिए विद्यालयी पाठ्यक्रम में इसे स्थान मिले इसका प्रयास किया जा रहा है। भारतीय गो विज्ञान परीक्षा समिति ने 2011 में गुजरात सहित देश के 17 राज्यों में परीक्षाओं का आयोजन किया ताकि विद्यार्थी गो की महत्ता को समझ सकें। उक्त योजना के संचालकों का यह कार्यक्रम है कि तीसरी कक्षा से माध्यमिक स्तर तक उक्त परीक्षाओं का आयोजन किया जाए जिससे गो का महत्व और उसके भीतर छिपी शक्तियों से नई पीढ़ी अवगत हो सके। नरेन्द्र मोदी सहित देश के अन्य मुख्यमंत्रियों ने भी इस योजना का स्वागत किया है। 

जानकारी के अनुसार अनेक स्थानों पर इस प्रकार की परीक्षाएं प्रारंभ हो चुकी हैं। इस योजना के आयोजकों का मत है कि इससे विद्यार्थियों में गाय के प्रति समझ तो बढ़ेगी ही देश की सांस्कृतिक एकता का भी प्रचार-प्रसार होगा। उक्त पुस्तक में महर्षि दयानंद सरस्वती को उद्धृत करते हुए लिखा गया है कि भारत की एकता तभी संभव है जब यहां का बहुसंख्यक समाज संगठित हो। उक्त कार्य असंभव तो नहीं, लेकिन कठिन अवश्य लगता है। लेकिन गो एक ऐसा आधार है जो यहां के विभिन्न मत-पंथों, विचारकों और सांस्कृतिक प्रवाहों को एक सूत्र में बांध सकती है। हमारा राष्ट्रगीत और राष्ट्रीय ध्वज जिस प्रकार से भारत की एकता और अखंडता का प्रतीक है वही स्थान भारतीय संस्कृति और अर्थव्यवस्था में गाय का है।

विश्व पर एक दृष्टि डालें तो कृषि प्रधान देशों में वहां पाए जाने वाले पशु ने महत्व की भूमिका निभाई है। न्यूजीलैंड की राजधानी का नाम ओकलैंड है। वहां के निवासी मावरी कहे जाते हैं। मावरी भाषा में ओक का अर्थ होता है गाय। आज भी न्यूजीलैंड का मुख्य व्यवसाय कृषि और डेरी ही है। वहां दूध बहुत बड़े प्रमाण में उपलब्ध है। इसलिए उसका पाउडर सारी दुनिया में निर्यात किया जाता है। दुनिया की डेरी कहा जाने वाला देश डेनमार्क है। उसकी राजधानी का नाम कोपनहेगन है। 

पुराने मानचित्रों में आज भी कोपनहेगन की 'स्पेलिंग' सी ओ डब्ल्यू से ही लिखी गई है जो 'काऊ' शब्द को उसके साथ जोड़ती है। कोपनहेगन अपने दुग्ध व्यवसाय के लिए आज भी विश्व में प्रसिद्ध है। यूरोप में जब तक ट्रैक्टर की खोज नहीं हुई थी उस समय तक बैलों के द्वारा ही खेती की जाती थी। इंग्लैंड का प्रसिद्ध घराना फोर्ड बैलों के व्यवसाय के लिए जाना माना था इसलिए उस नगर का नाम ही आक्सफोर्ड पड़ गया। कहने की आवश्यकता नहीं कि गाय और बैल हर देश में कृषि के लिए प्रासंगिक रहे हैं। पुराने मिस्र में भी गाय को इसीलिए पवित्र माना गया है। 

मध्य पूर्व के देशों में आकाश से उतरी पहली आसमानी पुस्तक जबूर में गाय का विवरण है। इसी प्रकार पवित्र कुरान में अलबकर सूरा है। अरबी में गाय को बकर कहा जाता है। तिब्बत का याक वहां की गाय का सूचक है। पाठकों को बता दें कि तिब्बत और नेपाल में याक की हत्या प्रतिबंधित है। भारतीय इसलिए अपनी गाय को कामधेनु की संज्ञा देते हैं। भारत में जितने भी महान देवी देवता हुए हैं उनका संबंध गाय से रहा है। आदर्श राम राज्य की कल्पना को साकार करने के लिए महर्षि वशिष्ठ ने राजा को गो सेवा करने का निर्देश दिया। नंदिनी गाय की रक्षा के लिए ही उन्हें राम का अवतार मिला। गाय के दूध से भगवान श्री नाथ जी प्रकट हुए। इस प्रकार उक्त छोटी सी पुस्तक अनेक जानकारी प्रदान करके लोगों को रोमांचित कर देती है। सारा देश जानता है कि गो की चर्बी वाले कारतूस ही तो मंगल पांडे के लिए 1857 की क्रांति का कारण बने थे।

भारतीय पाठशालाओं में बालकों को गाय के संबंध में ज्ञान देने वाली 'गुजरात गो दर्शन' एक ऐसी अद्भुत पुस्तक है, जो संस्कृति से लेकर धर्म, व्यापार, विज्ञान और जीवन के लिए आवश्यक कलाओं के साथ लाभप्रद वाणिज्य के दर्शन करवाती है। हजरत अली के शब्दों में गाय का दूध दुनिया की असंख्य बीमारियों के इलाज के रूप में शिफा है। पुस्तक कहती है कि इंसान का बच्चा भी जन्म लेते ही अपनी मां को नहीं पुकारता। लेकिन गाय का जाया (बछड़ा) पैदा होते ही जो आवाज लगाता है उसमें मां शब्द सुनाई पड़ता है। गाय जब रंभाती है तो लगता है कोई मां अपनी ममता से ओतप्रोत होकर उसे वात्सल्य प्रदान कर रही है। इसलिए उसे माता शब्द से विभूषित किया गया है। पुस्तक को जब पढ़ते हैं तो लगता है गाय तो माता के साथ-साथ एक चलता-फिरता दवाखाना है। उसका कौन सा अंग है जो इंसान की सेवा नहीं करता। 

जीवित रहने तक उसे अपने दूध की धारा पिलाती है, जिसे हम गोबर कहते हैं वह तो अपने आपमें गो वर है। उसके मूत्र में आयुर्वेद के नुस्खे भरे पड़े हैं। जीवित है तब तक तो गाय जीवनदायी है ही, लेकिन मर जाने के बाद भी न जाने अपने बेटे-बेटियों के लिए क्या-क्या छोड़ जाती है। सऊदी अरब की अलखिराज गोशाला में 1800 गायें हैं जिन्हें मर जाने के बाद दफना दिया जाता है। विदेशी होने के बाद भी वे गाय के वरदान से परिचित हैं लेकिन हम भारतीय होने के बाद भी उसके गुणों से परिचित नहीं हैं। यदि हैं तो उससे लापरवाह हैं।

इस पुस्तक में एक दिलचस्प प्रश्नावली प्रकाशित की गई है जिसे पढ़कर हम इस नतीजे पर पहुंच सकते हैं कि गाय हमारे लिए कहीं माता है तो कहीं डाक्टर, कहीं भरापूरा औषधालय, कहीं स्वादिष्ट मिठाई का खानपान भंडार और कहीं मनोविज्ञान सिखाने वाला चलता-फिरता प्राध्यापक। गाय के दूध से क्या क्या बनता है, और वह किस रोग में कितना लाभदायी है? घनश्याम गोपालन ट्रस्ट के इस अभियान में अब योगदान देने का संकल्प जागरण नामक संगठन भी कर चुका है।

विहिप ने पंजाब में आयोजित की 'गो विज्ञान' परीक्षा

विश्व हिंदू परिषद द्वारा आयोजित गो विज्ञान परीक्षा में जिले के 3100 छात्रों ने भाग लिया। विश्व हिंदू परिषद के हरिंदर अग्रवाल व जिला प्रमुख विशाल ने बताया कि विद्यार्थियों से गोमाता के संबंध में जानकारी लेने व उनका बौद्धिक स्तर नापने के लिए सारे देश में गो विज्ञान परीक्षा ली गई है। 

जिले में पंजाब चिल्ड्रेन एकेडमी, सर्वहितकारी विद्या मंदिर, एसडी पब्लिक स्कूल, ममता निकेतन स्कूल, क्यूपिड पब्लिक स्कूल, माडल स्कूल, बीबीएन पब्लिक स्कूल, नेशनल स्कूल, आक्सफोर्ड स्कूल के विद्यार्थियों ने भाग लिया।

जेएनयू में गुपचुप तरीके से गोमांस पार्टी की तैयारी


देश के प्रतिष्ठित संस्थान जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में एक संगठन गोमांस पार्टी की तैयारी कर रहा है। इस संगठन को एक वामपंथी संगठन बढ़ावा दे रहा है। माहौल बिगड़ने की आशंका को देखते हुए पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हो गई हैं। विश्व हिंदू परिषद व अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने पार्टी आयोजित करने पर गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी है। हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय में भी इस तरह की एक पार्टी हुई थी। विरोध में एक छात्र को चाकू मार दिया गया। इसके बाद भड़की हिंसा में पांच छात्र बुरी तरह घायल हुए थे और कई वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया।

जेएनयू में 'द न्यू मटेरियलिस्ट' नामक एक संगठन गुपचुप तरीके से गोमांस पार्टी की तैयारी कर रहा है। छात्रसंघ चुनाव के दौरान उसने माहौल को गर्म करने के लिए शनिवार रात कई छात्र संगठनों की बैठक कर पार्टी आयोजन के लिए समिति का गठन किया है। पहले यह पार्टी 17 सितंबर को ईवीआर पेरियार के जन्म दिवस पर होनी थी, मगर अब यह छात्रसंघ चुनाव के चलते 28 सितंबर को शहीद भगत सिंह के जन्म दिवस पर होगी। इसे लेकर कैंपस में पर्चे बांटे जा रहे हैं, जिसमें जन्माष्टमी को रसिया का जन्मदिन और होली पर भांग पीने का हवाला देते हुए गोमांस पार्टी आयोजित कर खाने की स्वतंत्रता की मांग की गई है। वामपंथी छात्र संगठनों ने यह तय किया है कि गोमांस को सार्वजनिक तौर पर ना पका कर अपनी-अपनी रसोइयों में पकाएंगे। इसके बाद पार्टी में उसका सेवन किया जाएगा। दक्षिणी जिला की पुलिस उपायुक्त छाया शर्मा का कहना है कि पुलिस पूरे मामले पर नजर रखे हुए है।

कावेरी छात्रावास में हुई बैठक पर जेएनयू सेंटर फॉर अफ्रीकन स्टडीज में पीएचडी कर रहे अनूप कहते हैं कि गोमांस कहां से आएगा और कैंपस में पार्टी कहां होगी, इसका निर्णय कमेटी के सदस्य मिलकर करेंगे। हमारा उद्देश्य भाजपा, आरएसएस सहित हिंदूवादी संगठनों की राजनीति पर प्रहार करना है। ऐसे संगठनों ने गाय को राजनीति का केंद्र बनाया हुआ है। अनूप का कहना है कि जेएनयू संसद के कानून द्वारा बना शैक्षणिक संस्थान है। इसलिए गोमांस पार्टी पर दिल्ली एनसीआर एक्ट-1994 को वह नहीं मानते। गोमांस पार्टी आयोजन को लेकर अभी तक हुई बैठकों में जेएनयू व डीयू के कई प्राध्यापक भी शिरकत कर चुके हैं।

जेएनयू के कुलपति प्रो. एसके सोपोरी ने कहा है कि छात्रों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। लेकिन ऐसा आयोजन किसी भी कीमत पर नहीं होने दिया जाएगा। दिल्ली में गोमांस प्रतिबंधित है। ऐसा करने पर छात्रों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

वहीं विश्व हिंदू परिषद दिल्ली के महामंत्री सत्येंद्र मोहन ने इस मुद्दे पर पार्टी मनाने वालों को सख्त लहजे में चेतावनी देते हुए कहा है कि गोमांस पार्टी करने वाले को देश में नहीं रहने दिया जाएगा। गौ माता का मांस खाने वाले इस आयोजन से पहले अपने मांस की चिंता कर लें। अगर ऐसा हुआ तो उसके गंभीर नतीजे होंगे।

वहीं, जेएनयू छात्रा और एबीवीपी की प्रदेश उपाध्यक्ष गायत्री दीक्षित ने इस मसले पर अपना विरोध दर्ज कराते हुए कहा कि मैने कुलपति को शिकायत कर अपना विरोध जताया है। अगर जेएनयू में ऐसा हुआ तो यहां की शांति भंग हो जाएगी।

शर्मनाक : गौ मांस निर्यात में भारत एक नंबर पर

भारत में बड़ी तादाद में लोग गाय को पवित्र मानते हैं। लेकिन आप यह जानकर हैरान हो सकते हैं कि 2012 में भारत दुनिया में सबसे ज़्यादा गोमांस निर्यात करने वाला देश बन जाएगा।
 
यूएसडीए की विदेशी कृषि सेवा के आंकड़े के मुताबिक इस साल के अंत तक भारत ऑस्ट्रेलिया को पीछे छोड़ते हुए 15 लाख मीट्रिक टन गोमांस का निर्यात करेगा। जानकारों के मुताबिक भारत से गोमांस के निर्यात के आंकड़े में तीन सालों में जबर्दस्त बढ़ोतरी हुई है। तीन साल पहले भारत ने 6.5 लाख मीट्रिक टन से भी कम गोमांस का निर्यात किया था।
 
भारत में वैसे तो गाय और दूध देने वाली भैंसों के काटने और उनके मांस की बिक्री पर प्रतिबंध है। यूएसडीए के मुताबिक भारत में बैल और भैंसे के मांस का बड़े पैमाने पर निर्यात हो रहा है। यूएसडीए बैल और भैंसे के मांस को भी गोमांस की श्रेणी में रखता है जो मध्य पूर्व, उत्तर अफ्रीका और दक्षिण पूर्वी एशिया में बड़ी संख्या में मांसाहारी लोगों की जरूरतें पूरी करता है।

मुस्लिम संघठन का बीफ फेस्टिवल के विरोध में प्रदर्शन

हैदराबाद स्थित उस्मानिया विश्वविधालय में कुछ दलित छात्रों द्वारा मनाए गए "बीफ फेस्टिवल" का जम कर विरोध हुआ। और इस विरोध को करने वाला कोई और नहीं बल्कि एक मुस्लिम संगठन है। आपको बताते चलें की छत्तीसगढ़ के बुधापारा में मुस्लिम राष्ट्रीय मंच द्वारा गोमांस और गोहत्या के विरोध एक धरने का आयोजन किया गया।धरने में मौजूद लोगों ने अपना तर्क देते हुए कहा की इस तरह के आयोजनों से गोहत्या को बढ़ावा मिल रहा है जो की समाज के हित में बिलकुल भी ठीक नहीं है। 

धरने के दौरान मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष मोहम्मद अफजल ने अपना रोष प्रकट करते हुए कहा कि , ऐसे पर्व हमारी सभ्यता और संस्कृति के साथ खिलवाड़ हैं। ऐसे पर्व महज गोहत्या को प्रोत्साहित करने का माध्यम बनते जा रहे हैं। जिसकी इजाजत हमारी संस्कृति बिलकुल भी नहीं देती है। अफजल ने गोहत्या के विषय पर जोर देते हुए कहा कि सरकार को तुरंत कि इसके खिलाफ मुहीम चलानी चाहिए और अगर फिर भी कोई व्यक्ति या संस्था गोहत्या में संलिप्त पाई जाती है तो उस पर कठोर दंडात्मक कार्यवाही हो । 

अफजल ने मांग करते हुए कहा कि ऐसे पर्व हिन्दू मुस्लिम एकता के बीच एक दीवार का काम कर रहे हैं और अगर इन्हें नहीं रोका गया तो इससे दोनों संस्कृतियों के बीच एक बहुत बड़ी दरार पैदा हो सकती है। 

छत्तीसगढ़ यूनिट के अध्यक्ष डाक्टर शाहिद राज ने अपनी बात रखते हुए कहा कि ऐसे पर्व एक विश्वविधालय के अन्दर शोभा नहीं देते ऐसे पर्व कौमी एकता के मुद्दे पर संकट के बदल लाते हैं साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि विश्वविधालय प्रशासन को इसकी आयोजन समिति पर कठोर अनुशासनात्मक कार्यवाही करनी चाहिए। 

धरने में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने उत्तर प्रदेश के आगरा से आये शहजाद अली ने चिंता प्रकट करते हुए ऐसे पर्वों को आसामाजिक तत्वों द्वारा कि गयी पहल का हिस्सा बताते हुए कहा कि बड़े अफ़सोस की बात है की हमारी सरकार ऐसे आयोजनों के लिए इजाजत दे देती है। 

आगे बोलते हुए शहजाद ने कहा की ऐसे कृत समाज में एक दूसरे के लिए नफरत को बढ़ावा देने के अलावा कुछ नहीं कर सकते। उन्होंने सरकार के साथ साथ उस्मानिया विश्वविधालय प्रशासन से मांग करते हुए कहा की वो तत्काल इस पर्व "बीफ फेस्टिवल" पर रोक लगाये। धरने के दौरान मौजूद लोगों ने ये भी कहा की अगर सरकार उनकी मांगों को पूरा नहीं करती है तो एक बड़े स्तर में, सम्पूर्ण भारत भर में इस बीफ फेस्टिवल के खिलाफ विरोध किया जायगा ।

भाजपा का गौवंश विकास प्रकोष्ठ का जयपुर में गौ सम्मलेन

भाजपा के गौ वंश विकास प्रकोष्ठ की ओर से जून के प्रथम सप्ताह में दो दिवसीय गौ सम्मेलन का आयोजन किया जाएगा।इस सम्मेलन में देश भर के गौ-विशेषज्ञ तथा गौ-रक्षण एवं संवर्धन में जुटे हुए गो-प्रेमी भाग लेंगे। सम्मेलन में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी और वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी सहित अनेक दिग्गज विशेष रूप से उपस्थित रहेंगे। 

भाजपा के गौवंश विकास प्रकोष्ठ के प्रदेश संयोजक हरिहर लाल पारीक ने बताया कि इस सम्मेलन के दौरान प्रदेश की गौशालाओं में निर्मित पंचगव्य औषधियों के विशेषज्ञों का चिन्तन वर्ग तथा गौशालाओं के प्रतिनिधियों का विराट सम्मेलन भी सम्पन्न होगा। 

पारीक ने बताया कि इस सम्मेलन के माध्यम से आम आदमी तक पंचगव्य औषधियों तथा उत्पादों का महत्व पहुंचाने का प्रयास किया जाएगा। साथ ही गौ-वंश आधारित कृषि के बारे में भी जानकारी देंगे।

गुजरात में गौ हत्या पर 7 साल की जेल 50 हज़ार जुर्माना

गुजरात में गौ हत्या करने वालों की अब खैर नहीं। गुजरात सरकार ने गौ हत्या पर जुर्माने और सजा के नियमों को बेहद कड़ा कर दिया है। मंगलवार को इससे जुड़ा विधेयक सर्वसम्मति से विधानसभा में पारित कर दिया गया। इस विधेयक के मुताबिक गाय को हत्या के नीयत से ले जा रहे शख्स को 7 साल जेल हो सकती है।

गौ हत्या को बैन करने वाले गुजरात एनिमल प्रेजर्वेशन ऐक्ट (जीएपीए) 1954 में इस इरादे से मवेशियों को ले जाते वक्त पकड़े जाने वालों पर कार्रवाई का कोई प्रावधान नहीं था। मंगलवार को गुजरात एनिमल प्रेजर्वेशन (संशोधित) बिल 2011 पेश करते हुए राज्य के कृषि मंत्री दिलीप संघानी ने कहा कि नए कानून में गौ हत्या के जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कड़े प्रावधान किए गए हैं। इस विधेयक को विपक्षी कांग्रेस ने भी अपना समर्थन दिया है।

इसके तहत गौ हत्या पर 6 माह की सजा को बढ़ाकर 7 साल और जुर्माना 1,000 से बढ़ाकर 50,000 रुपये कर दिया गया है। नए विधेयक में हत्या के मकसद से गायों को ले जा रहे वाहन को भी जब्त करने का प्रावधान किया गया है। कृषि कार्य या पालन के उद्देश्य से मवेशियों को एक से दूसरी जगह ले जाने के लिए पूर्व अनुमति लेनी पड़ेगी।

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