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बंटवारे के लिए सिर्फ नेहरू थे जिम्मेदार : मौलाना आजाद


मिस्टर जिन्ना सन् 1946 के आरंभ में अखंड भारत के लिए तैयार हो गये थे, पर उसी साल के मध्य में जवाहर लाल नेहरू ने एक ऐसा बयान दे दिया कि जिन्ना ने डायरेक्ट एक्शन का नारा देकर पाकिस्तान बनवा लिया। यह बात आजाद भारत के पहले शिक्षा मंत्री अबुल कलाम आजाद ने लिखी है। अपनी आत्मकथा ‘आजादी की कहानी’ में आजाद ने लिखा कि ब्रिटिश सरकार के कैबिनेट मिशन, कांग्रेस महासमिति और मुस्लिम लीग परिषद के बीच इस बात पर आपसी सहमति बन चुकी थी कि अखंड आजाद भारत की केंद्रीय सरकार के अधीन तीन विषय होंगे-रक्षा, विदेश और संचार। राज्यों को तीन श्रेणियों में बांट दिया जाएगा। उन्हें स्वायतता रहेगी। ‘बी’ श्रेणी के राज्यों में पंजाब, सिंध, उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत व ब्रिटिश बलोचिस्तान शामिल किए जाएंगे। ‘सी’ श्रेणी के राज्यों में बंगाल और असम शामिल थे। बाकी राज्य ‘ए’ श्रेणी में रखे गये थे। कैबिनेट मिशन का ख्याल था कि इस भावी व्यवस्था से मुसलमान अल्पसंख्यक वर्ग को पूरी तरह से इतमिनान हो जाएगा।

याद रहे कि आजादी के लिए हिंदुस्तान के प्रतिनिधियों से विचार-विमर्श की खातिर ब्रिटिश सरकार ने कैबिनेट मिशन भारत भेजा था। मौलाना आजाद ने लिखा कि ‘मिशन ने मेरी यह बात भी मान ली थी कि अधिकतर विषय प्रांतीय धरातल पर संभाले जाएंगे। इसलिए बहुमत वाले राज्यों में मुसलमानों को प्रायः पूरी स्वायत्तता प्राप्त होगी। बी और सी श्रेणियों के राज्यों में मुसलमानों का बहुमत था। इस तरह वे अपनी सारी औचित्यपूर्ण आशाओं को सफल बना सकते थे।’

‘शुरू- शुरू में मि. जिन्ना ने इस योजना का घोर विरोध किया। मुस्लिम लीग स्वतंत्र देश की अपनी मांग को लेकर इतना आगे बढ़ चुकी थी कि उसके लिए कदम वापस लौटाना मुश्किल था। पर कैबिनेट मिशन ने बहुत ही साफ -साफ और असंदिग्ध शब्दों में कह दिया कि वह देश के बंटवारे का सुझाव कभी नहीं दे सकता। मिशन के सदस्य लाॅर्ड पेथिक लारेंस और सर स्टैफर्ड क्रिप्स ने बार- बार कहा कि हमारी समझ में नहीं आता कि मुस्लिम लीग जिस पाकिस्तान सरीखे राज्य की कल्पना कर रही है, वह कैसे जियेगा, कैसे बढ़ेगा और कैसे स्थायी होगा? उनका ख्याल था कि मैंने जो सूत्र दिया है, वही समस्या का हल है। मंत्रिमंडलीय मिशन का ख्याल था कि इसमें कोई हर्ज नहीं है ।’

मौलाना आजाद ने लिखा कि ‘मुस्लिम लीग परिषद की तीन दिन तक बैठक हुई। तब कहीं जाकर वह किसी फैसले पर पहुंच सकी। आखिरी दिन जिन्ना को यह तसलीम करना पड़ा कि मिशन की योजना में जो हल प्रस्तुत किया गया है, अल्पसंख्यकों की समस्या का उससे अधिक न्यायपूर्ण हल और कोई नहीं हो सकता। और उन्हें इससे अच्छी शर्तें मिल ही नहीं सकतीं। उन्होंने परिषद को बताया कि मंत्रिमंडल मिशन ने जो योजना प्रस्तुत की है, उससे और कुछ भी ज्यादा मैं नहीं कर सकता। इसलिए उन्होंने मुस्लिम लीग को योजना मान लेने की सलाह दी और लीग परिषद ने सर्वसम्मति से उसके पक्ष में वोट दिया।’

इस संबंध में कांग्रेस के फैसले के बारे में मौलाना आजाद ने लिखा कि ‘कांग्रेस कार्य समिति में जो विचार विमर्श हुआ, उसमें मैंने कहा कि कैबिनेट मिशन की योजना मूलतः वही है जो कांग्रेस पहले स्वीकार कर चुकी है। ऐसी हालत में योजना में जो प्रमुख राजनीतिक हल प्रस्तुत किया गया था, उसे मान लेने में कार्यसमिति को कोई मुश्किल नहीं हुई। 26 जून, 1946 के अपने प्रस्ताव में कांग्रेस कार्य समिति ने भविष्य के संबंध में कैबिनेट मिशन की योजना स्वीकार कर ली-यद्यपि उसने अंतरिम सरकार का सुझाव मानने में अपनी असमर्थता प्रकट की। कैबिनेट मिशन योजना का कांग्रेस व मुस्लिम लीग दोनों के द्वारा स्वीकार कर लिया जाना हिंदुस्तान के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास की एक गौरवमय घटना थी। यह भी लगा मानो हम आखिरकार सांप्रदायिक कठिनाइयों को भी पीछे छोड़ आए हैं। मि. जिन्ना बहुत खुश न थे, लेकिन और कोई रास्ता न था, इसलिए योजना मानने के लिए उन्होंने खुद को तैयार कर लिया था।’

पर इस पूरी योजना को पलीता लगाने वाली घटना की चर्चा करते हुए मौलाना अबुल कलाम आजाद ने लिखा कि ‘तभी एक ऐसी दुःखद घटना घटी जिसने इतिहास का क्रम ही बदल दिया। दस जुलाई को कांग्रेस अध्यक्ष जवाहर लाल नेहरू ने बम्बई में एक संवाददाता सम्मेलन बुलाया। वहां उन्होंने एक बयान दिया जिस पर शायद सामान्य परिस्थितियों में कोई ध्यान भी न देता। पर उस बयान ने शंका और घृणा के तत्कालीन वातावरण में बड़े ही दुर्भाग्यपूर्ण परिणामों के एक क्रम को जन्म दिया।’

‘कुछ पत्र प्रतिनिधियों ने उनसे सवाल किया, ‘क्या कांग्रेस कार्य समिति के प्रस्ताव पास कर देने का मतलब यह है कि कांग्रेस ने योजना को पूर्ण रूप से स्वीकार कर लिया है जिसमें अंतरिम सरकार के गठन का सवाल भी निहित है ?’

जवाब में जवाहर लाल ने कहा कि कांग्रेस करारों की बेड़ियों से बिलकुल मुक्त रह कर और जब जैसी स्थिति पैदा होगी, उसका मुकाबला करने के लिए स्वतंत्र रहते हुए, संविधान सभा में जाएगी।’ पत्र प्रतिनिधियों ने फिर पूछा कि क्या इसका मतलब यह है कि कैबिनेट मिशन योजना में संशोधन किए जा सकते हैं?

जवाहर लाल बड़ा जोर देकर जवाब दिया कि कांग्रेस ने सिर्फ संविधान सभा में भाग लेना स्वीकार किया है और वह मिशन योजना में जैसा उचित समझे, वैसा संशोधन-परिवर्तन करने के लिए अपने आपको स्वतंत्र समझती है।मौलाना आजाद ने लिखा कि ‘मैं यह कह दूं कि जवाहर लाल का बयान गलत था।

यह कहना सही न था कि कांग्रेस योजना में जो चाहे संशोधन करने के लिए स्वतंत्र है। असल में यह तो हम मान चुके थे कि केंद्रीय सरकार संघीय होगी ।’ (आजादी की कहानी:मौलाना अबुल कलाम आजाद की आत्म कथा-पृष्ठ-173)

आजाद के शब्दों में ‘जवाहर लाल नेहरू के इस बयान से मि. जिन्ना भौंचक रह गये। उन्होंने तुरंत एक बयान जारी किया कि कांग्रेस अध्यक्ष के इस वक्तव्य से सारी स्थिति पर फिर से विचार करना जरूरी हो गया है। जिन्ना ने लियाकत अली खान से लीग परिषद की बैठक बुलाने के लिए कहा और अपने बयान में कहा कि मुस्लिम लीग परिषद ने दिल्ली में कैबिनेट मिशन की योजना इसलिए स्वीकार कर ली थी कि यह आश्वासन दिया गया था कि कांग्रेस ने भी उसे स्वीकार कर लिया है और यह योजना हिंदुस्तान के भावी संविधान का आधार होगी। अब चूंकि कांग्रेस अध्यक्ष ने यह एलान किया है कि कांग्रेस संविधान सभा में अपने बहुमत से योजना को बदल सकती है, इसलिए इसका मतलब यह हुआ कि अल्पसंख्यक वर्ग बहुसंख्यक की दया पर जियेगा।

उसके बाद मुस्लिम लीग की बैठक 27 जुलाई को बम्बई में हुई। अपने उद्घाटन भाषण में मिस्टर जिन्ना ने फिर से पाकिस्तान की मांग की और कहा कि मुस्लिम लीग के सामने यही एक रास्ता रह गया है। तीन दिनों की बहस के बाद लीग परिषद ने मिशन योजना को अस्वीकार करते हुए एक प्रस्ताव पास कर दिया। उसने पाकिस्तान की मांग पूरी कराने के लिए ‘सीधी कार्रवाई’ करने का भी फैसला किया।’

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