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हिंदुओं की मातृस्वरूपा गाय के मांस को गरीबों का प्रोटीन कहना दुर्भाग्यपूर्ण - तरुण विजय

राज्यसभा में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी पर एक पूर्व न्यायाधीश द्वारा अवांछनीय टिप्पणी की सर्वसम्मति से निंदा की गई, लेकिन उसी सदन में जिस प्रतीक को गांधी मातृस्वरूपा मानते थे, उसके मांस को सर्वसुलभ करने की भी मांग की गई। अजीब सेक्युलर गणतंत्र है हमारा। गांधी छह दशक पुराने संविधान के अंतर्गत एक ऐसे स्थान पर प्रतिष्ठित हैं जहां उनके विरुद्ध अपशब्द संसद द्वारा नकार दिए जाते हैं, पर जिनकी गांधीजी पूजा करते थे और जो हजारों वर्ष पुराने हमारे राष्ट्रीय सांस्कृतिक संविधान में पूजित हैं, उसे वधशाला में भेजने व उसका मांस गरीबों के लिए सस्ता प्रोटीन घोषित करना हमारी आजादी का स्वीकार्य हिस्सा माना गया। इस मुद्दे को संसद के शून्य काल में तृणमूल कांग्रेस के एक सांसद ने महाराष्ट्र में गोमांस पर प्रतिबंध से हजारों लोगों की आजीविका प्रभावित होने के नाम पर उठाया।

यह सब देख-सुनकर हम कुछ क्षणों के लिए स्तब्ध और अवाक रह गए। एक हिंदू बहुल देश में, अधिकांशतया हिंदुओं द्वारा श्रद्धा से देखी और पूजी जाने वाली गाय के मांस को गरीबों का प्रोटीन घोषित करने का एक अहिंदू सदस्य का मंतव्य भारतीय लोकतंत्र का दुर्भाग्यजनक दिन ही कहा जाएगा। कोई क्या खाता है या क्या-क्या निषिद्ध मानता है, यह उसकी निजी पसंद-नापसंद का मामला हो सकता है। परंतु क्या किसी नास्तिक या अन्य आस्था वाले व्यक्ति को अपनी पसंद इस रूप में देश की संसद में व्यक्त करना चाहिए, जिसे करोड़ों आस्थावान लोग अपनी मां पर आक्रमण के रूप में देखें? क्या संसद किसी अन्य समुदाय की आस्था से जुड़े किसी विषय पर प्रोटीन जैसे बहाने से किसी हिंदू को अपना मत व्यक्त करने की इजाजत देगी? वह भी उसी स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्गत जिसके सहारे आस्थावान हिंदुओं की मातृस्वरूपा गाय के मांस को गरीबों का प्रोटीन बताकर उसे वधशाला भेजने योग्य कहा गया। जहां शरद पवार ने इसका समर्थन किया वहीं दुर्भाग्य से कांग्रेस के सदस्य भी इस विषय पर खामोश रहे। अकाली दल भी चुप रहा। क्या हिंदू आस्था के मुद्दे केवल भाजपा के जिम्मे है? क्या अन्य दलों में बैठे हिंदू अपनी आस्था से जुड़े किसी विषय पर राजनीतिक लाभालाभ देखकर बोलेंगे?

महात्मा गांधी ने कहा था कि मैं गाय की पूजा करता हूं और इसके लिए चाहे पूरी दुनिया मेरे खिलाफ हो जाए मैं उसकी रक्षा करूंगा। उनके ही शब्दों में, गोमाता अनेक अर्थो में हमें जन्म देने वाली मां से भी श्रेयस्कर है। हमारी मां कुछ वर्ष हमें दूध देती है फिर अपेक्षा करती है कि बुढ़ापे में हम उसकी सेवा करें, परंतु गोमाता हमसे सिवाय घास और दाने के कुछ अधिक की अपेक्षा नहीं करती।

विडंबना देखिए, गांधी के विरुद्ध अपशब्द इस सेक्युलर लोकतंत्र को बर्दाश्त नहीं और यह ठीक भी है। हमने भी अपशब्द कहने वाले की निंदा की, लेकिन गांधी द्वारा पूजित करोड़ों हिंदुओं की आस्था के प्रतीक पर आघात कैसे हमारी अभिव्यक्ति की आजादी का स्वर बन गया?

गोहत्या बंदी के लिए इस देश में सैकड़ों लोगों ने जान दी है। फिर भी वह सब लागू कर पाना संभव न हुआ। इस देश में सबसे ज्यादा ईसाई अंग्रेजों ने अपनी सेना के लिए गोवध को बड़े पैमाने पर लागू किया ताकि उनकी जरूरतों को पूरा किया जा सके। सच यह भी है कि राजस्थान से बांग्लादेश की सीमा तक हजारों गायों की तस्करी हिंदू सरकारी कर्मचारियों की मिलीभगत से होती है और देश के बड़े गोमांस निर्यातकों में तथाकथित ऊंची जाति के हिंदू अग्रणी हैं। पर यह हिंदू समाज के भीतरी पाखंड और हिंदू मुद्दों पर शोर मचाने पर कुछ नहीं करना हमारी दास मानसिकता का कुफल है।

सवाल यह है कि क्या हिंदू आस्था पर चोट सेक्युलरवाद का मुख्य परचम बनने दिया जाएगा? हिंदू संपूर्ण दक्षिण एशिया में अहिंदू आक्रमणों का शिकार हो रहे हैं। उनकी जनसंख्या इस उपमहाद्वीप में लगातार घटती जा रही है। पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदुओं पर तमाम तरह के अत्याचार हो रहे हैं, हिंदुओं को बलात धर्म परिवर्तन कराया जाता है। इतना ही नहीं, यह निकाह के सबसे बड़े केंद्र भी हैं। श्रीलंका में भी सबसे भीषण दमन और संकट तमिलभाषी हिंदुओं को एक लंबे अर्से से ङोलना पड़ रहा है पर हम उनके बारे में आवाज तक उठाने तक में असमर्थ रहते हैं। हमारे बड़े-बड़े महासम्मेलन, घोषणाएं, धमकियां, प्रस्ताव और सेमिनार राजनीतिक घाटे का विषय हैं। इस बात को देश की जनता अब अच्छे से समझ चुकी है। वैसे भी भारत में अपनी आस्था के लिए प्रयास करना और उसके पक्ष में बोलना अब तमाशे का रूप बना दिया गया है। ओबामा तक शिकायत करने वाले वही लोग हैं जिनके पूर्वज पहले हिंदुओं के खिलाफ अंग्रेज वायसराय से शिकायत करते थे।1इसमें संदेह नहीं कि देश में अनेक लोग गोमांस खाते हैं। अनेक नगर हैं जहां खुलेआम लिखा होता है कि यहां बीफ यानी गाय का मांस मिलता है। एक सेक्युलर पत्रकार ने तो अपने स्तंभ में यहां तक लिखा है कि उसे किस किस्म का बीफ या गाय का मांस पसंद है। अब यह विषय संसद में भी उठा दिया गया।

यह भी संभव है कि यह कहते हुए कि गाय के मांस को धार्मिक आस्था से न जोड़ा जाए और इसे गरीबों का प्रोटीन और अपनी पसंद का खाने के लोकतांत्रिक अधिकार के अंतर्गत रखते हुए संसद में गरीब सांसदों को प्रोटीन उपलब्ध कराने के लिए संसद की कैंटीन के मैन्यू में भी गाय के मांस को जोड़ने की मांग उठाई जाए। जिन्हें गाय का मांस पसंद है वे हिंदू हों या अन्य, उनके बारे में कुछ नहीं कहना। पर क्या उन्हें गाय को मां मानने वालों के घाव पर संसद में नमक छिड़ने का अधिकार है? क्या यही अधिकार वे अपनी आस्था से जुड़े विषय पर टिप्पणी के लिए अन्य लोगों को दे सकते हैं? हिंदुओं को एकतरफा सुधार की प्रयोगशाला का जंतु बनाने की सेक्युलर परंपरा कब तक सही जाएगी? सिर्फ हिंदुओं को ही सुधारने का अंहिंदू उत्साह उस समय भयावह प्रतिशोधी भाव में बदल जाता है जब उनके यहां व्याप्त कुरीतियों को खत्म करने की मांग की जाती है। हिंदू समाज आत्मनिरीक्षण करे। दोष अन्यों में नहीं, उसके भीतर व्याप्त असंगठन, जातिभेद, दलितों के प्रति अन्यायी दृष्टि और पाखंड का है।

[तरुण विजय: लेखक राज्यसभा सदस्य हैं]

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