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मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का राजदीप सरदेसाई को करारा थप्पड़

प्रिय राजदीप, 

आम तौर पर मैं वरिष्ठ पत्रकारों के सार्वजनिक पत्रों का जवाब नहीं देता, लेकिन आपका पत्र पढ़ने के बाद सोचा कि अगर जवाब नहीं दिया तो गोबल्स नीति सफल हो सकती है। आपका पत्र यानी सही जानकारी न लेकर सरकार को फटकारने की शानदार मिसाल है।
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आपने मुझे 2010 में देखा है ऐसा कहा है पर मैं तो आपको 2000 से देख और सुन रहा हूं। एक साहसी पत्रकार कालांतर में निजी एजेंडे और विशिष्ट वैचारिक निष्ठा से अभिभूत होकर किस तरह बेहद पक्षपाती हो सकता है यह देखना वेदनापूर्ण है!
राज्य सरकार के नाम पर कई अच्छे कामों की मुहर लगने के बावजूद आप अपनी मर्जी से तीन मुद्‌दे चुनकर सरकार के कामकाज का मूल्यांकन करना चाहते हैं। पर मैं आपसे कहना चाहता हूं कि पिछली सरकार के गलत व भ्रष्ट कामों के बारे में ठोस भूमिका अपनाने के संकल्प से मैं जरा भी विचलित नहीं हुआ हूं। इसका अनुभव आपको राज्य भ्रष्टाचार प्रतिबंधक ब्यूरो की ओर से की जा रही कई मामलों की जांच से आसानी से मिल सकता है।

मांसाहार पर पाबंदी लगाने के बारे में मेरी सरकार ने कोई फैसला नहीं लिया। इस बारे में मेरे कार्यकाल से एक भी नया आदेश नहीं दिया गया। 2004 में कांग्रेस सरकार ने पर्यूषण पर्व के दौरान दो दिन कत्लखाने बंद रखने का फैसला किया था। मुंबई को लेकर ऐसे निर्णय पर 1994 से अमल किया जा रहा है। आश्चर्य है कि हमारे सत्ता में आने से पहले आप में से किसी ने आपत्ति नहीं जताई। यानी पहले की सरकार कितनी भी भ्रष्ट व अकार्यक्षम रही हो, उसकी ढोंगी एवं कथित धर्मनिरपेक्षता आपके विचारों से मेल खाती थी, इसलिए आपको आक्षेप नहीं था।

श्री राकेश मारिया के मामले में आप भ्रमित लगते हैं, इसीलिए दोनों तरह की बातें कह रहे हैं। पत्र के अंत में आपने लिखा, ‘चटपटी खबरों के पीछे पड़ा मीडिया भी उतना ही दोषी है। क्रूर हत्या के मामलों में उन्हें दिलचस्पी होती है, जबकी किसानों की मौत का जिक्र भी नहीं किया जाता।’ अब आप ही मुझे बताइए कि आप भी इसी कत्ल के मामले का संबंध पुलिस कमिश्नर के तबादले से कैसे लगा रहे हैं? पुलिस प्रमुख जांच अधिकारी नहीं होता। वह हमेशा नियंत्रक की भूमिका निभाता है। वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को उनकी तरक्की की तय तारीख से पहले उच्च पद पर नियुक्त करना नई बात नहीं है। सितंबर और अक्तूबर गणेश चतुर्दशी, बकरीद व नवरात्रि के होते हैं। त्योहार शुरू होने से पहले ही नया अधिकारी आए तो उसे सुरक्षा संबंधी योजनाएं बनाने के लिए समय मिलता है। योग्य फैसला करने का काम सरकार पर सौंप देना चाहिए।

आपकी राजद्रोह विषय पर लिखी टिप्पणी भी जानकारी के अभाव में तर्कहीन है। सरकार को आरोपी के पिंजरे में खड़ा करने की जिद में कोई व्यक्ति किस स्तर तक पक्षपाती बन सकता है, यह इसका उत्तम उदाहरण है। क्या माननीय हाईकोर्ट के किसी आदेश को पुलिस तक पहुंचाना गलत है? हमारी सरकार ने कोई भी फैसला नहीं किया। पिछली कांग्रेस सरकार ने मामले में माननीय हाईकोर्ट में एक हलफनामा पेश किया था। उस पर माननीय हाईकोर्ट ने विस्तार से फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट किया था कि राजद्रोह संबंधी आरोप कब और किस आधार पर लगाए जा सकते हैं। साथ ही कहा था कि ये निर्देश सभी पुलिस वालों को भेजे जाएं। फैसले का मराठी अनुवाद कर सभी पुलिस थानों के प्रमुखों को सर्कुलर के जरिये भेजा गया। अगर आपने सावधानी से उसे पढ़ा हो तो उसमें यह स्पष्ट तौर पर लिखा है कि सिर्फ अदालत के फैसलों पर निर्भर न रहें, राजद्रोह का आरोप लगाने से पहले स्वतंत्र रूप से कानूनी सलाह लें। और हां, यह बात जोर देकर कहना चाहूंगा कि राजद्रोह के बारे में कोई भी फैसला न तो हमारे मंत्रिमंडल ने लिया है न वह मान्यता के लिए राज्य सरकार के सामने लाया गया।

लेकिन श्रीमान सरदेसाई, आपको गहराई में जाकर मुद्‌दे को समझने की इच्छा नहीं है, क्योंकि आपको अपना वामपंथी झुकाव वाला एजेंडा पुरजोर तरीके से आगे ले जाना है। राज्य को अकालमुक्त करने के लिए चलाई जा रही जलयुक्त शिवार योजना का जिक्र करते हुए आपको कितना कष्ट हुआ। यह योजना बेहद सफल रही है। राज्य की जनता ने बेहद उदारता से 300 करोड़ रुपए का योगदान इसमें दिया है। इससे 6 हजार गांवों में तकरीबन एक लाख काम हम छह महीनों में पूरे कर सके। अब थोड़ी-सी बारिश में भी गांवों में पानी का विकेंद्रित जलसंचय उपलब्ध है। साथ ही जलस्तर भी बढ़ गया है। भारत के जलपुरुष राजेंद्र सिंहजी ने स्टाकहोम की अंतरराष्ट्रीय जल परिषद में इसे ऐतिहासिक मोड़ देने वाला प्रयोग घोषित किया है।

बुरा लगता है कि अपनी थाली में दो दिन मांसाहारी पदार्थ नहीं होंगे, यह सोचकर ही आप जैसे लोग बेचैन हो जाते हैं। दूसरी तरफ हमारा अन्नदाता किसान कुदरती प्रकोपों के कारण जिंदा रहने के लिए तड़प रहा है। श्रीमान सरदेसाई, मुझे आपसे ज्यादा किसान की थाली की चिंता है, इसीलिए राज्य सरकार ने 60 लाख किसानों को दो रुपए किलो गेहूं और तीन रुपए किलो चावल वितरित करने वाली अन्न सुरक्षा योजना तैयार की है। पिछले 15 साल के कुशासन व किसान आत्महत्या की यह विरासत हमारे लिए वास्तव में चुनौती है। इस कारण हमें नींद भी नहीं आती, लेकिन हमारी सरकार की ओर से शुरू की गई कुछ योजनाएं निश्चित रूप से अच्छे परिणाम सामने लाएंगी इसका मुझे भरोसा है। आपको अगर इसमें रुचि हो तो आइए और देखिए।

एक बात तो सच है कि मांसाहार बंदी हो या न हो, सामान्य जनता को इतनी ही आशा होती है कि उसकी थाली में रोटी या चावल होना चाहिए। मुझे इसी बात की ज्यादा चिंता है। आप अपनी थाली में क्या खा रहे हैं यह देखने के लिए मेरे पास समय नहीं है और न मैं उस बारे में चिंतित हूं। एअरकंडीशन्ड कमरों में बैठने वालों के लिए किसानों की चिंता के अलावा बाकी एजेंडे हो सकते हैं। श्रीमान सरदेसाई, आपके पत्र का ब्योरा आपके व्यावसायिक काम का हिस्सा हो सकता है, पर यह जवाब मेरी ओर से शुरू किए गए अभियान का हिस्सा है और मैं उसे पूरा किए बिना चैन से नहीं बैठूंगा। करो या मरो, यही मेरे जीवन का मंत्र है और आने वाला समय ही मेरा भाग्य तय करेगा।
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किसी भी तरह की द्वेषभावना के बिना, आपका नम्र, 
देवेंद्र फडणवीस 

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