जानिए क्यों और किसने जला दिया था विश्व का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय

अत्यंत सुनियोजित ढंग से और विस्तृत क्षेत्र में बना हुआ नालंदा विश्वविद्यालय प्राचीन दुनिया का संभवत: पहला विश्वविद्यालय था, जहां न सिर्फ देश के, बल्कि विदेशों से भी छात्र पढ़ने आते थे। इस विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम ने ४५०-४७० ई. के बीच की थी। पटना से ८८.५ किलोमीटर दक्षिण-पूर्व और राजगीर से ११.५ किलोमीटर उत्तर में स्थापित इस विश्वविद्यालय में तब १२ हजार छात्र और २००० शिक्षक हुआ करते थे। 

गुप्तवंश के पतन के बाद भी सभी शासक वंशों ने इसकी समृद्धि में अपना योगदान जारी रखा। लेकिन एक सनकी और चिड़चिड़े स्वभाव के तुर्क लुटेरे ने नालंदा विश्वविद्यालय को जला कर इसके अस्तित्व को पूर्णत: नष्ट कर दिया।
   
यह प्राचीन भारत में उच्च शिक्षा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण और विख्यात केंद्र था। इस विश्वविद्यालय में विभिन्न धर्मों के तथा अनेक देशों के छात्र पढ़ते थे। इस विश्वविद्यालय की खोज अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा की गई थी। इस महान विश्वविद्यालय के भग्नावशेष इसके वैभव का अहसास करा देते हैं। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने ७ वीं शताब्दी में अपने जीवन का एक वर्ष एक विद्यार्थी और एक शिक्षक के रूप में यहां व्यतीत किया था। प्रसिद्ध 'बौद्ध सारिपुत्र' का जन्म यहीं पर हुआ था। 

यह विश्व का प्रथम पूर्णतः आवासीय विश्वविद्यालय था। विकसित स्थिति में इसमें विद्यार्थियों की संख्या करीब १०,००० एवं अध्यापकों की संख्या २००० थी। सातवीं शती में जब ह्वेनसांग आया था, १०,००० विद्यार्थी और १५१० आचार्य नालंदा विश्वविद्यालय में थे। इस विश्वविद्यालय में भारत के विभिन्न क्षेत्रों से ही नहीं, बल्कि कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, फारस तथा तुर्की से भी विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे। नालंदा के विशिष्ट शिक्षाप्राप्त स्नातक बाहर जाकर बौद्ध धर्म का प्रचार करते थे। इस विश्वविद्यालय की नौवीं सदी से बारहवीं सदी तक अंतरराष्ट्रीय ख्याति रही थी।

नालंदा विश्वविद्यालय को एक सनकी और चिड़चिड़े स्वभाव वाले तुर्क लुटेरे बख्तियार खिलजी ने ११९९ ई. में जला कर पूर्णत: नष्ट कर दिया। उसने उत्तर भारत में बौद्धों द्वारा शासित कुछ क्षेत्रों पर कब्ज़ा कर लिया था। 
ऐसा कहा जाता है कि बख्तियार खिलजी एक बार बहुत बीमार पड़ गया। उसके हकीमों ने उसे ठीक करने की पूरी कोशिश की, मगर वह स्वस्थ नहीं हो सका। किसी ने उसे नालंदा विश्वविद्यालय के आयुर्वेद विभाग के प्रमुख आचार्य राहुल श्रीभद्र से इलाज कराने की सलाह दी। उसे यह सलाह पसंद नहीं आई। उसने सोचा कि कोई भारतीय वैद्य उसके हकीमों से उत्तम ज्ञान कैसे रख सकता है और वह किसी काफ़िर से अपना इलाज क्यों करवाए। फिर भी उसे अपनी जान बचाने के लिए उनको बुलाना पड़ा।

जब वैद्यराज इलाज करने पहुंचे तो उसने उनके सामने शर्त रखी कि वह उनके द्वारा दी कोई दवा नहीं खाएगा, लेकिन किसी भी तरह वह ठीक करे, वर्ना मरने के लिए तैयार रहे। बेचारे वैद्यराज को नींद नहीं आई, बहुत उपाय सोचा और अगले दिन उस सनकी बख्तियार खिलजी के पास कुरान लेकर चले गए। उन्होंने कहा कि इस कुरान की पृष्ठ संख्या इतने से इतने तक पढ़ लीजिये, आप ठीक हो जाएंगे! 

वैद्यराज के कहे अनुसार, उसने कुरान पढ़ा और ठीक हो गया। लेकिन ठीक होने पर खुश होने की जगह उसे बड़ी झुंझलाहट हुई और गुस्सा आया कि उसके हकीमों से इन भारतीय वैद्यों का ज्ञान श्रेष्ठ क्यों है?

बौद्ध धर्म और आयुर्वेद का एहसान मानने  व वैद्य को पुरस्कार देने के बदले बख्र्तियार खिलजी ने नालंदा विश्वविद्यालय में ही आग लगवा दिया। उसने पुस्तकालयों को भी जला कर राख कर दिया। वहां इतनी पुस्तकें थी कि आग लगी भी तो तीन माह तक पुस्तकें धू-धू करके जलती रहीं। यही नहीं, उसने अनेक धर्माचार्यों और बौद्ध भिक्षुओं को मार डाला। 

बता दें कि नालंदा विश्वविद्यालय प्राचीन भारत में उच्च शिक्षा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण और विख्यात केंद्र था। प्रवेश परीक्षा अत्यंत कठिन होती थी। अत्यंत प्रतिभाशाली विद्यार्थी ही प्रवेश पा सकते थे। उन्हें तीन कठिन परीक्षा स्तरों को उत्तीर्ण करना होता था। यह विश्व का प्रथम ऐसा दृष्टांत है। शुद्ध आचरण और संघ के नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक था।

वरुण गाँधी ने गयाजी में अपने पूर्वजो का पिंडदान किया

मोक्ष धाम गयाजी में भाजपा सांसद वरुण गांधी ने गुरुवार को अपने पूर्वजों का  विधिपूर्वक पिंडदान किया।

विष्णुपद क्षेत्र में उनके आगमन को लेकर कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की गई थी। लगभग छह घंटे तक क्षेत्र की विभिन्न पिंडवेदियों पर जाकर वरुण ने पूर्वजों के नामित पिंड को अर्पित किया। बाद में उन्होंने गया में अपने पिता संजय गांधी की स्मृति में एक धर्मशाला बनवाने की घोषणा की।

विशेष विमान से वरुण गांधी प्रात : साढ़े आठ बजे बिहार के गया पहुंचे। विष्णुपद मंदिर में गुरुवार को निर्जला एकादशी को लेकर काफी भीड़भाड़ थी। मुख्य मंदिर से सटे बालाजी हनुमान मंदिर में पिंडदान की व्यवस्था की गई थी। 11 पुरोहितों के साथ मुख्य आचार्य चंद्रशेखर शास्त्री के नेतृत्व में कर्मकांड कराया गया।

वरुण गांधी ने पितृदोष निवारण के लिए सर्वप्रथम नारायणबली श्राद्ध और त्रिपिंडी श्राद्ध किया, जिसे बाद में गया कूप में जाकर विसर्जित किया। तदोपरांत गया श्राद्ध का कर्म किया गया। बाद में गया तीर्थ के गयापाल पंडा महेश लाल हल द्वारा उन्हें सुफल दिया गया।

नक्सलियों द्वारा रखे गये बम को निष्क्रिय करते वक्त एक जवान शहीद

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा के विरोध में 24 घंटे के राष्ट्रव्यापी बंद का आह्वान करने वाले नक्सलियों ने बिहार के औरंगाबाद, गया और मुजफ्फरपुर जिलों में विभिन्न स्थानों पर धमाके किए। उनके द्वारा लगाए गए एक बम को निष्क्रिय करने के प्रयास में सोमवार को गया में बीएमपी का एक जवान शहीद हो गया और 5 अन्य लोग घायल हो गये।

पुलिस महानिदेशक नीलमणि ने बताया कि पूर्ण बंद लागू कराने के लिए नक्सलियों ने कल रात जिले के प्रखंड कार्यालय को धमाके से उड़ा दिया और चार ट्रकों को आग लगा दी। जिले के अमास पुलिस थाना क्षेत्र के पास 100 से अधिक नक्सलियों ने ट्रकों के ड्राइवरों और सहायकों को भगा दिया और उनके वाहनों को पेट्रोल और मिट्टी का तेल छिड़क कर आग लगा दी।

गया जिले में ओबामा की भारत यात्रा के बहिष्कार के पोस्टर भी बरामद किये गये हैं। उग्रवादियों ने यहां बांके बाजार में एक प्रखंड कार्यालय को धमाके से उड़ा दिया।

गया के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अमित लोढ़ा ने कहा कि प्रखंड कार्यालय में नक्सलियों द्वारा रखे गये बम को निष्क्रिय करते वक्त उसमें धमाका हो गया जिससे बीएमपी के एक जवान की मृत्यु हो गयी। दो महिलाओं सहित पांच लोग घायल हो गये। घायलों को गया के अस्पताल में भर्ती कराया गया है जिनमें से दो की हालत गंभीर बताई जाती है।

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