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वंदे मातरम और तिरंगा सांप्रदायिक, अन्ना खाली बर्तन - अरुंधति

अरुंधति रॉय ने अन्ना हजारे के आंदोलन पर हमला बोलते हुए राष्ट्रगीत वंदे मातरम और राष्ट्रीय झंडे को सांप्रदायिक और बांटने वाला करार दिया है। रवींद्र नाथ टैगोर का हवाला देते हुए रॉय ने कहा, '1937 में टैगोर ने कहा था कि यह अनुचित राष्ट्रगीत है, यह बांटता है। 

अरुंधति के मुताबिक वंदे मातरम का लंबा सांप्रदायिक इतिहास रहा है। ऐसे में भीड़ जब यह नारा लगाती है तो इसका क्या मतलब है? जब आप उपनिवेश के खिलाफ नारे लगाते समय हाथ में राष्ट्रीय झंडा उठाते हैं तो इसका एक मतलब है लेकिन जब आप एक तरह से आज़ाद हैं, तो आप लोगों को बांटते हैं, जोड़ते नहीं हैं।'

एक टीवी चैनल से बातचीत में अन्ना पर निशाना साधते हुए राय ने कहा, 'अन्ना का आंदोलन इसलिए अहिंसक था क्योंकि पुलिस डरी हुई थी और उसने लाठियां नहीं उठाईं। इस आंदोलन के पहले दौर में मंच की पृष्ठभूमि में भारत माता की तस्वीर लगी थी लेकिन दूसरे चरण में इसकी जगह गांधी जी की फोटो ने ले ली। 

वहां पर इस तरह की कई चीजें थीं, जो बेहद खतरनाक हैं। इसके अलावा क्या आप यह सोच सकते हैं कि गांधी जी किसी अनशन के बाद एक निजी अस्पताल में इलाज करवाते? एक ऐसा निजी अस्पताल जो राज्य सत्ता द्वारा गरीबों के इलाज के हक को छीन लेने का प्रतीक है।'

अरुंधति ने भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे की जमकर आलोचना की है। अरुंधति ने जनलोकपाल बिल को भी बेहद खतरनाक कानून करार दिया है जिसकी मांग अन्‍ना हजारे और उनकी टीम कर रही है। लेखिका ने अन्‍ना को ‘खाली बर्तन’ कहकर उनका मजाक भी उड़ाया।

रॉय ने कहा कि जनलोकपाल बिल में भी काफी कमियां है, लेकिन इसे जबरदस्ती थोपा नहीं जा सकता है, ऐसा नहीं है कि सरकारी लोकपाल बिल भी पूरी तरह से सही है, लेकिन इस मसले को आम राय से संसद में सुलझाना होगा न कि भीड़ इकट्ठा करने के बाद अनशन करके।

अरुंधति ने कहा, ‘जनलोकपाल पर संसद में सह‍मति बनने पर सभी खुश हैं और लोग इसे जीत करार दे रहे हैं। मैं भी इस पर खुश हूं क्‍योंकि मुझे लगता है कि जनलोकपाल बिल अपने मौजूदा स्‍वरुप में संसद से पास नहीं हो सकता। इसकी कई वजहें भी हैं। सबसे पहला तो यह कि यह कानून मेरे मुताबिक बेहद खतरनाक है।’ 

अरुंधति ने कहा, ‘मेरा मानना है कि अन्‍ना हजारे खाली बर्तन की तरह हैं जिसमें आप अपनी मर्जी के मुताबिक पानी भर सकते हैं। वह गांधी की तरह नहीं हैं जो सार्वजनिक जीवन में अपने आप में एक खासी शख्सियत थे। अन्‍ना हजारे अपने गांव के लिए खास हो सकते हैं लेकिन अभी हाल में जो कुछ हुआ उसमें उनका कोई योगदान नहीं था।'

अरुंधति ने कहा कि अन्‍ना कौन हैं, उनका किन लोगों से जुड़ाव रहा है और उन्‍होंने पहले क्‍या किया है, उसे लोग जानते हैं।’ 

इससे पहले एक अखबार में लिखे लेख में रॉय ने लोगों को भ्रष्टाचार के खिलाफ एक जुट करने के लिए अन्ना के तरीके और अभियान को गलत बताया था।

उसने अन्ना पर सवाल उठाते हुए कहा कि हजारे अपने गृहराज्य महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्या पर मौन क्यों हैं? रॉय ने लिखा कि अन्‍ना के तरीके भले ही गांधीवादी हों, लेकिन मांगें सही नहीं हैं। उनके अनशन का मकसद सिर्फ नया लोकपाल बिल पारित करवाना है।

वही फिल्मकार
अशोक पंडित का कहना है कि  ‘अरुंधति रॉय कहती हैं कि फोर्ड फाउंडेशन ने अन्‍ना हजारे को आर्थिक मदद की। मैं यह जानना चाहता हूं कि लोगों की हत्‍या करने के लिए गिलानी को कौन पैसे देता है जिसकी वो समर्थक हैं।’    -

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