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राम जन्मभूमि के मुद्दे का समाधान संवैधानिक दायरे में ही - भागवत

संघ प्रमुख मोहन राव भागवत ने दो टूक कहा है कि यदि कोर्ट का फैसला पक्ष में नहीं आया तो संघ अपनी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट ले जाएगा। स्थित महिला प्रेस क्लब में संघ प्रमुख ने मंदिर मुद्दे को आस्था का विषय बताया।

उन्होंने कहा कि कोर्ट का फैसला अगर उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा तो इस मुद्दे पर संघ कानूनी और संवैधानिक दायरे में आगे बढ़ेगा। कोर्ट के फैसले के बाद तनाव बढ़ने की आशंका को खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि संघ हिंसा और उग्रता में यकीन नहीं करता। उन्होंने लोगों से अपील की कि कोर्ट का फैसला चाहे जो हो, वे शांत रहें और कानून के दायरे में समाधान तलाशें। भागवत ने कहा कि यदि देश के मुस्लिम, मंदिर निर्माण में सहयोग दें और देश में सद्भाव बढ़ेगा।

आस्था के मुद्दे पर यदि सभी गौर करें तो टकराव नहीं होगा और सभी टकराव टालने की कोशिश करेंगे। ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द के प्रयोग पर नाराजगी जताते हुए उन्होंने कहा कि हिंदुत्व में आतंकवाद के लिए कोई जगह नहीं है। जिहाद या माओवाद की तरह हिंसा के लिए हिंदुत्व में विचारधारा नहीं है। इस्लाम जिहाद का समर्थन करता है और माओवाद भी कहता है कि सत्ता बंदूक की नली से मिलती है, लेकिन इस तरह की बात हिंदुत्व नहीं करता है।


अयोध्या मसले पर आने वाले हाईकोर्ट के फैसले से पहले, पूर्व गृहमंत्री बूटा सिंह ने कहा है कि 1989 में विश्व हिंदू परिषद के साथ बतौर गृहमंत्री किया गया उनका समझौता अभी भी लागू हो सकता है और पार्टी चाहे तो वह इस मसले पर मध्यस्थता को तैयार हैं। तत्कालीन राजीव गांधी सरकार में गृहमंत्री रहे बूटा ने 27 सितंबर 1989 को विहिप के साथ करार किया था जिसके तहत अयोध्या में गैर विवादित भूमि पर शिलान्यास की अनुमति दी गई थी।

करार के तहत केंद्र सरकार ने देशभर में रामशिला पूजा से जुड़े कार्यक्रम को मंजूरी दे दी थी बशर्ते राम मंदिर के लिए शिलान्यास गैर विवादित भूमि पर हो।बूटा ने कहा,‘मैने खुद शिलान्यास को मंजूरी दी थी। इससे पहले बाबरी एक्शन कमेटी और विहिप के नेताओं के साथ एनडी तिवारी के घर बैठक भी की गई। केंद्र सरकार का मानना था कि कोर्ट के फैसले को सभी पक्ष मानें। इसी संबंध में मैने विहिप के साथ समझौता भी किया, लेकिन बाद में उसने इसकी अवहेलना कर दी। इस बात को 21 साल बीत गए हैं, लेकिन वह समझौता अभी भी लागू हो सकता है। केंद्र सरकार और सोनियाजी चाहें तो मैं इस मामले पर सेवायें देने को तैयार हूं।

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